देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 273, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 273
२६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अद्याहं तव पादपङ्कजपरागादानगर्वेण वै<br>धन्योऽस्मीति यथार्थवादनिपुणो जातः प्रसादाच्च ते।<br>याचे त्वां भवभीतिनाशचतुरां मुक्तिप्रदां चेश्वरीं<br>हित्वा मोहकृतं महार्त्तिनिगडं त्वद्भक्तियुक्तं कुरु ॥ २८ | गर्वसे मैं वस्तुतः धन्य हो गया हूँ और आपकी कृपासे ही आज मैं यथातथ्यके ज्ञानमें निपुण हो गया हूँ। सांसारिक भयका नाश करनेमें दक्ष, मुक्तिदायिनी आप परमेश्वरीसे मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि मोहनिर्मित महादुःखदायी भवबन्धनसे मुक्त करके आप मुझे अपनी भक्तिसे समन्वित कीजिये॥ २७-२८॥ |
| अतोऽहञ्च जातो विमुक्तः कथं स्यां<br>सरोजादमेयात्त्वदाविष्कृताद्वै ।<br>तवाज्ञाकरः किङ्करोऽस्मीति नूनं<br>शिवे पाहि मां मोहमग्नं भवाब्धौ ॥ २९ | आपसे ही निर्मित अद्भुत कमलसे मैं आविर्भूत हुआ हूँ और मैं आपका आज्ञाकारी सेवक हूँ, अतः मैं कैसे मुक्त हो सकूँगा? हे शिवे! इस भवसागरमें पड़े हुए मुझ मोहमग्नकी रक्षा कीजिये॥ २९॥ |
| न जानन्ति ये मानवास्ते वदन्ति<br>प्रभुं मां तवाद्यं चरित्रं पवित्रम्।<br>यजन्तीह ये याजकाः स्वर्गकामा<br>न ते ते प्रभावं विदन्त्येव कामम्॥ ३० | इस संसारमें जो लोग आपके सनातन पवित्र चरित्रको नहीं जानते, वे लोग मुझे ही ईश्वर कहते हैं और जो यज्ञकर्ता स्वर्गकी इच्छासे [इन्द्र आदि देवताओंका] यजन करते हैं, वे भी सर्वथा आपके प्रभावको नहीं जानते॥ ३०॥ |
| त्वया निर्मितोऽहं विधित्वे विहारं<br>विकर्तुं चतुर्धा विधायादिसर्गम्।<br>अहं वेद्मि कोऽन्यो विवेदादिमाये<br>क्षमस्वापराधं त्वहङ्कारजं मे ॥ ३१ | हे आदिमाये! सर्वप्रथम सृष्टिको चार भागों [अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और पिण्डज—जरायुज]—में विभक्त करनेके लिये ही आपने मुझे ब्रह्माके पदपर बैठाया, परंतु [मैंने यह समझ लिया कि] मैं ही सब कुछ जानता हूँ, दूसरा कौन जान सकता है—मेरे इस अहंकारजन्य अपराधको आप क्षमा कीजिये॥ ३१॥ |
| श्रमं येऽष्टधा योगमार्गे प्रवृत्ताः<br>प्रकुर्वन्ति मूढाः समाधौ स्थिता वै।<br>न जानन्ति ते नाम मोक्षप्रदं वा<br>समुच्चारितं जातु मातर्मिषेण॥ ३२ | जो लोग अष्टांगयोगका आश्रय लेते हैं और समाधि लगाकर व्यर्थ श्रम करते हैं, वे अज्ञानी हैं। हे माता! वे यह नहीं जानते कि किसी भी बहाने आपके नामोच्चारणमात्रसे ही उन्हें मुक्ति प्राप्त हो सकती है॥ ३२॥ |
| विचारे परे तत्त्वसंख्याविधाने<br>पदे मोहिता नाम ते संविहाय।<br>न किं ते विमूढा भवाब्धौ भवानि<br>त्वमेवासि संसारमुक्तिप्रदा वै॥ ३३ | कुछ लोग (सांख्यवादी) तो आपके नामका आश्रय छोड़कर विमोहित हो तत्त्वोंकी संख्याके फेरमें पड़ जाते हैं; क्या वे इस भवसागरमें मूर्ख नहीं हैं? हे भवानि! संसारसे मुक्ति प्रदान करनेवाली तो आप ही हैं॥ ३३॥ |
| परं तत्त्वविज्ञानमाद्यैर्जनैयै-<br>रजे चानुभूतं त्यजन्त्येव ते किम्।<br>निमेषार्धमात्रं पवित्रं चरित्रं<br>शिवा चाम्बिका शक्तिरीशेति नाम॥ ३४ | हे अजे! जिन विष्णु-शिव आदिने परम तत्त्वज्ञानका अनुभव कर लिया है, वे क्या आधे निमेषमात्रके लिये भी आपके पवित्र चरित्र तथा शिवा, अम्बिका, शक्ति, ईश्वरी आदि नामोंको विस्मृत करते हैं?॥ ३४॥ |