भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 274
अ० ५ ]तृतीय स्कन्ध२६५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न किं त्वं समर्थासि विश्वं विधातुं<br>दृशैवाशु सर्वं चतुर्था विभक्तम्।<br>विनोदार्थमेवं विधिं मां विधाया-<br>दिसर्गे किलेदं करोषीति कामम्॥ ३५क्या आप विश्वकी रचना करनेमें समर्थ नहीं हैं? हे आदिसर्गे! आपके दृष्टिनिक्षेपमात्रसे ही यह सम्पूर्ण विश्व चार प्रकारके (अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, पिण्डज—जरायुज) जीवोंके रूपमें शीघ्र ही विभक्त हुआ है। इस प्रकार मुझ ब्रह्माकी सृष्टि तो आप अपने मनोविनोदके लिये करके पुनः स्वतन्त्र भावसे जो चाहती हैं, वह करती हैं॥ ३५॥
हरिः पालकः किं त्वयासौ मधोर्वा<br>तथा कैटभाद्रक्षितः सिन्धुमध्ये।<br>हरः संहृतः किं त्वयासौ न काले<br>कथं मे भ्रुवोर्मध्यदेशात्स जातः॥ ३६[महाप्रलयकी स्थितिमें] यदि महासागरमें आप मधु-कैटभसे विष्णुकी रक्षा न करतीं तो वे सृष्टि-पालक कैसे बन पाते और यदि आप सबके संहारक शिवका संहार न करतीं तो वे मेरे भ्रूमध्यसे कैसे प्रकट होते?॥ ३६॥
न ते जन्म कुत्रापि दृष्टं श्रुतं वा<br>कुतः सम्भवस्ते न कोऽपीह वेद।<br>किलाद्यासि शक्तिस्त्वमेका भवानि<br>स्वतन्त्रैः समस्तैरतो बोधितासि॥ ३७आपका जन्म कहाँ हुआ—इसे न तो किसीने देखा और न सुना और कोई यह भी नहीं जान पाया कि आपकी उत्पत्ति कहाँ हुई? हे भवानि! एकमात्र आप ही आद्या शक्ति हैं, अतएव वेदोंने इसी रूपमें आपका वर्णन किया है॥ ३७॥
त्वया संयुतोऽहं विकर्तुं समर्थो<br>हरिस्त्रातुमम्ब त्वया संयुतश्च।<br>हरः सम्प्रहर्तुं त्वयैवेह युक्तः<br>क्षमा नाद्य सर्वे त्वया विप्रयुक्ताः॥ ३८हे अम्ब! आपकी ही शक्तिसे प्रेरित होकर मैं सृष्टि करनेमें, विष्णु पालन करनेमें तथा शिव संहार करनेमें समर्थ होते हैं। आपकी शक्तिसे विलग रहकर अब हमलोग कुछ भी करनेमें सक्षम नहीं हैं॥ ३८॥
यथाहं हरिः शङ्करः किं तथान्ये<br>न जाता न सन्तीह नो वाभविष्यन्।<br>न मुह्यन्ति केऽस्मिंस्तवात्यन्तचित्रे<br>विनोदे विवादास्पदेऽल्पाशयानाम्॥ ३९जिस प्रकार मैं (ब्रह्मा), विष्णु और शिव उत्पन्न हुए हैं, उसी प्रकार क्या अन्य प्राणी उत्पन्न नहीं हुए, अथवा विद्यमान नहीं हैं या उत्पन्न नहीं होंगे? किंतु अल्प बुद्धिवाले प्राणियोंके लिये विवादास्पद तथा अत्यन्त विचित्र आपके इस लीलाविनोदसे कौन भ्रमित नहीं हो जाते?॥ ३९॥
अकर्ता गुणस्पष्ट एवाद्य देवो<br>निरीहोऽनुपाधिः सदैवैकलश्च।<br>तथापीश्वरस्ते वितीर्णं विनोदं<br>सुसम्पश्यतीत्याहुरेवं विधिज्ञाः॥ ४०वे आदिदेव ईश्वर अकर्ता, गुणोंसे स्फुट होनेवाले, निष्काम, उपाधिरहित तथा निर्गुण हैं, फिर भी वे आपके विस्तृत लीला-विनोदको भलीभाँति देखते रहते हैं—ज्ञानीजन ऐसा ही कहते हैं॥ ४०॥
दृष्टादृष्टविभेदेऽस्मिन्प्राक्तत्त्वो वै पुमान्परः।<br>नान्यः कोऽपि तृतीयोऽस्ति प्रमेये सुविचारिते॥ ४१मूर्त और अमूर्त भेदोंसे युक्त इस संसारमें आपसे पूर्व वे ही परमपुरुष थे; ज्ञान-तत्त्वपर सम्यक् प्रकारसे विचार करनेपर यह सर्वथा सिद्ध होता है कि अन्य तीसरा कोई भी नहीं है॥ ४१॥