भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 889 में से

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पृष्ठ 288
अ० ८ ]तृतीय स्कन्ध२७९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्वेतवर्णं तथा सत्त्वं धर्मे प्रीतिकरं सदा।<br>सच्छ्रद्धोत्पादकं नित्यमसच्छ्रद्धानिवारकम् ॥ ४सत्त्वगुणका वर्ण श्वेत है, यह सर्वदा धर्मके प्रति प्रीति उत्पन्न करता है, सत्-श्रद्धाका आविर्भाव करता है तथा असत्-श्रद्धाको समाप्त करता है ॥ ४ ॥
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च तथापरा।<br>श्रद्धा तु त्रिविधा प्रोक्ता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ५तत्त्वदर्शी मुनियोंने तीन प्रकारकी श्रद्धा बतलायी है—सात्त्विकी, राजसी एवं तीसरी तामसी ॥ ५ ॥
रक्तवर्णं रजः प्रोक्तमप्रीतिकरमद्भुतम्।<br>अप्रीतिर्दुःखयोगत्वाद्वर्तत्येव सुनिश्चिता ॥ ६रजोगुण रक्तवर्णवाला कहा गया है। यह आश्चर्य एवं अप्रीतिको उत्पन्न करता है। दुःखसे योगके कारण ही निश्चितरूपसे अप्रीति उत्पन्न होती है ॥ ६ ॥
प्रद्वेषोऽथ तथा द्रोहो मत्सरः स्तम्भ एव च।<br>उत्कण्ठा च तथा निद्रा श्रद्धा तत्र च राजसी ॥ ७जहाँ ईर्ष्या, द्रोह, मत्सर, स्तम्भन, उत्कण्ठा एवं निद्रा होती है, वहाँ राजसी श्रद्धा रहती है ॥ ७ ॥
मानो मदस्तथा गर्वो रजसा किल जायते।<br>प्रत्येतव्यं रजस्त्वैतैर्लक्षणैश्च विचक्षणैः ॥ ८अभिमान, मद और गर्व—ये सब भी राजसी श्रद्धासे ही उत्पन्न होते हैं। अतः विद्वान् मनुष्योंको चाहिये कि वे इन लक्षणोंद्वारा राजसी श्रद्धा समझ लें ॥ ८ ॥
कृष्णवर्णं तमः प्रोक्तं मोहनं च विषादकृत्।<br>आलस्यं च तथाज्ञानं निद्रा दैन्यं भयं तथा ॥ ९<br><br>विवादश्चैव कार्पण्यं कौटिल्यं रोष एव च।<br>वैषम्यं वातिनास्तिक्यं परदोषानुदर्शनम् ॥ १०<br><br>प्रत्येतव्यं तमस्त्वैतैर्लक्षणैः सर्वथा बुधैः।<br>तामस्या श्रद्धया युक्तं परतापोपपादकम् ॥ ११तमोगुणका वर्ण कृष्ण होता है। यह मोह और विषाद उत्पन्न करता है। आलस्य, अज्ञान, निद्रा, दीनता, भय, विवाद, कायरता, कुटिलता, क्रोध, विषमता, अत्यन्त नास्तिकता और दूसरोंके दोषको देखनेका स्वभाव—ये तामसिक श्रद्धाके लक्षण हैं। पण्डितजन इन लक्षणोंसे तामसी श्रद्धा जान लें; तामसी श्रद्धासे युक्त ये सभी लक्षण परपीड़ादायक हैं ॥ ९-११ ॥
सत्त्वं प्रकाशयितव्यं नियन्तव्यं रजः सदा।<br>संहर्तव्यं तमः कामं जनेन शुभमिच्छता ॥ १२आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवालेको अपनेमें निरन्तर सत्त्वगुणका विकास करना चाहिये, रजोगुणपर नियन्त्रण रखना चाहिये तथा तमोगुणका नाश कर डालना चाहिये ॥ १२ ॥
अन्योन्याभिभवाच्चैते विरुध्यन्ति परस्परम्।<br>तथान्योन्याश्रयाः सर्वे न तिष्ठन्ति निराश्रयाः ॥ १३ये तीनों गुण एक-दूसरेका उत्कर्ष होनेकी दशामें परस्पर विरोध करने लगते हैं। ये सब एक-दूसरेके आश्रित हैं, निराश्रय होकर नहीं रहते ॥ १३ ॥
सत्त्वं न केवलं क्वापि न रजो न तमस्तथा।<br>मिलिताश्च सदा सर्वे तेनान्योन्याश्रयाः स्मृताः ॥ १४सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुणमेंसे कोई एक अकेला कभी नहीं रह सकता; ये सभी सदैव मिलकर रहते हैं, इसीलिये ये अन्योन्याश्रय सम्बन्धवाले कहे गये हैं ॥ १४ ॥
अन्योन्यमिथुनाच्चैव विस्तारं कथयाम्यहम्।<br>शृणु नारद यज्ज्ञात्वा मुच्यते भवबन्धनात् ॥ १५हे नारद! ध्यानसे सुनिये, अब मैं इनके अन्योन्याश्रय-सम्बन्धसे होनेवाले विस्तारका वर्णन करता हूँ, जिसे जानकर मनुष्य भव-बन्धनसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है। इसमें आपको किसी प्रकारका