देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| २७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| चैतन्यस्य प्रवेशात्तु तदाहमिति संशयः ॥ ४६<br><br>प्रतीयमाने तेनैव विशेषेणाभिमानतः ।<br>आदिनारायणो देवो भगवानिति चोच्यते ॥ ४७ | पंचीकृत पंचभूतोंमें अधिष्ठानताके कारण उनके प्रतिबिम्बरूपसे जब चैतन्य प्रविष्ट हो जाता है, तब उस पंचभूतात्मक शरीरमें ‘अहम्’ भावरूप संशय उत्पन्न हो जाता है। वह संशय स्पष्टरूपसे जब भासित होने लगता है, तब उस स्थूल शरीरमें देहाभिमानके साथ चैतन्य जाग्रत् होने लगता है, वही दिव्य चैतन्य आदिनारायण भगवान्, परमात्मा आदि नामोंसे पुकारा जाता है॥ ४६-४७॥ |
| घनीभूतेऽथ भूतानां विभागे स्पष्टतां गते ।<br>वृद्धिं प्राप्य गुणैश्चेत्यमेकैकगुणवृद्धितः ॥ ४८ | इस प्रकार पंचीकरणसे सभी भूतोंका विभाग स्पष्ट हो जाने पर आकाश आदि सभी पंचभूत पूर्वोक्त तन्मात्राओंके कारण अपने-अपने विशेष गुणोंसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं और एक-एक गुणकी वृद्धिसे एक-एक भूत उत्पन्न हो जाता है॥ ४८॥ |
| आकाशस्य गुणश्चैकः शब्द एव न चापरः ।<br>शब्दस्पर्शौ च वायोश्च द्वौ गुणौ परिकीर्तितौ ॥ ४९<br><br>अग्नेः शब्दश्च स्पर्शश्च रूपमेते त्रयो गुणाः ।<br>शब्दस्पर्शरूपरसाश्चत्वारो वै जलस्य च ॥ ५०<br><br>स्पर्शशब्दरसा रूपं गन्धश्च पृथिवीगुणाः ।<br>एवं मिलितयोगैश्च ब्रह्माण्डोत्पत्तिरुच्यते ॥ ५१<br><br>सर्वे जीवा मिलित्वैव ब्रह्माण्डांशसमुद्भवाः ।<br>चतुरशीतिलक्षाश्च प्रोक्ता वै जीवजातयः ॥ ५२ | आकाशका केवल एकमात्र गुण शब्द है, दूसरा नहीं। वायुके शब्द और स्पर्श—ये दो गुण कहे गये हैं। शब्द, स्पर्श और रूप—ये तीन गुण अग्निके हैं। शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चार गुण जलके हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच गुण पृथ्वीके हैं। इस प्रकार इन पंचीकृत महाभूतोंके योगसे ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति कही जाती है। ब्रह्माण्डके अंशसे उत्पन्न सभी जीवोंको मिलाकर चौरासी लाख जीव-योनियाँ कही गयी हैं॥ ४९-५२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे तत्त्वनिरूपणवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणका वर्णन
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजी बोले— |
| सर्गोऽयं कथितस्तात यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना ।<br>गुणानां रूपसंस्थां वै शृणुष्वैकाग्रमानसः ॥ १ | हे तात! आपने जो मुझसे पूछा था, वह सृष्टिका वर्णन मैंने कर दिया। अब गुणोंका स्वरूप कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ १॥ |
| सत्त्वं प्रीत्यात्मकं ज्ञेयं सुखात्प्रीतिसमुद्भवः ।<br>आर्जवं च तथा सत्यं शौचं श्रद्धा क्षमा धृतिः ॥ २<br><br>अनुकम्पा तथा लज्जा शान्तिः सन्तोष एव च ।<br>एतैः सत्त्वप्रतीतिश्च जायते निश्चला सदा ॥ ३ | सत्त्वगुणको प्रीतिस्वरूप समझना चाहिये, वह प्रीति सुखसे उत्पन्न होती है। सरलता, सत्य, शौच, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, कृपा, लज्जा, शान्ति और सन्तोष—इन लक्षणोंसे सदैव निश्चल सत्त्वगुणकी प्रतीति होती है॥ २-३॥ |