भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 889 में से

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पृष्ठ 286
अ० ७ ]तृतीय स्कन्ध२७७

| ज्ञानशक्तिसमायुक्ताः सात्त्विकाच्च समुद्भवाः ।<br>दिशो वायुश्च सूर्यश्च वरुणश्चाश्विनावपि ॥ ३५<br><br>ज्ञानेन्द्रियाणां पञ्चानां पञ्चाधिष्ठातृदेवताः ।<br>चन्द्रो ब्रह्मा तथा रुद्रः क्षेत्रज्ञश्च चतुर्थकः ॥ ३६<br><br>इत्यन्तःकरणाख्यस्य बुद्ध्यादेश्चाधिदैवतम् ।<br>चत्वार्यैव तथा प्रोक्ताः किलाधिष्ठातृदेवताः ॥ ३७<br><br>मनसा सह चैतानि नूनं पञ्चदशैव तु ।<br>सात्त्विकस्य तु सर्गोऽयं सात्त्विकाख्यः प्रकीर्तितः ॥ ३८ | दिशाएँ, वायु, सूर्य, वरुण और दोनों अश्विनीकुमार ज्ञानशक्तिसे युक्त हैं और ये सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके ये ही पाँच अधिष्ठातृदेवता हैं। इसी प्रकार बुद्धि आदि अन्तःकरणचतुष्टयके चन्द्रमा, ब्रह्मा, रुद्र तथा क्षेत्रज्ञ—ये अधिदेव हैं। ये चारों अधिष्ठातृदेवता कहे गये हैं। मनसहित ये सब पन्द्रह होते हैं। यह सात्त्विक अहंकारकी सृष्टि है और ‘सात्त्विकी सृष्टि’ कही गयी है॥ ३५–३८॥ | | स्थूलसूक्ष्मादिभेदेन द्वे रूपे परमात्मनः ।<br>ज्ञानरूपं निराकारं निदानं तत्प्रचक्षते ॥ ३९ | स्थूल और सूक्ष्मभेदसे परमात्माके दो रूप होते हैं, उनमें ज्ञानरूप निराकारस्वरूप सबका कारण कहा गया है॥ ३९॥ | | साधकस्य तु ध्यानादौ स्थूलरूपं प्रचक्षते ।<br>शरीरं सूक्ष्ममेवेदं पुरुषस्य प्रकीर्तितम् ॥ ४० | साधकके ध्यान आदि कार्योंके लिये परमात्माके स्थूल रूपकी उपासना कही गयी है। यह उस परमपुरुषका सूक्ष्म शरीर ही बताया गया है॥ ४०॥ | | मम चैव शरीरं वै सूत्रमित्यभिधीयते ।<br>स्थूलं शरीरं वक्ष्यामि ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ४१<br><br>शृणु नारद यत्नेन यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यते ।<br>तन्मात्राणि पुरोक्तानि भूतसूक्ष्माणि यानि वै ॥ ४२ | मेरा यह शरीर सूत्रसंज्ञक है। अब मैं उस परब्रह्म परमात्माके स्थूल विराट् स्वरूपका वर्णन करूँगा। हे नारद! आप उसे सुनें, जिसे सावधानीसे सुनकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। इसके पहले मैंने गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द—इन पंच तन्मात्राओं तथा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन सूक्ष्म पंच महाभूतोंका वर्णन विस्तारसे कर दिया है॥ ४१-४२॥ | | पञ्चीकृत्य तु तान्येव पञ्चभूतसमुद्भवः ।<br>पञ्चीकरणभेदोऽयं शृणु संवदतः किल ॥ ४३ | उन्हीं पाँचोंको मिलाकर पंचीकरणकी क्रियासे परमात्माने पंचभूतमय देहकी सृष्टि की है। अब मैं पंचीकरणका भेद बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनिये—॥ ४३॥ | | प्रथमं रसतन्मात्रामुपादाय मनस्यपि ।<br>कल्पयेच्च तथा तद्वै यथा भवति चोदकम् ॥ ४४ | सबसे पहले रसरूप तन्मात्राका मनमें निश्चय करके जिस स्थूल रूपमें जल होता है, वैसी ही उसकी दो अंशोंमें भावना करे॥ ४४॥ | | शिष्टानां चैव भूतानामंशान्कृत्वा पृथक्पृथक् ।<br>उदके मिश्रयेच्चांशान्कृते रसमये ततः ॥ ४५<br><br>तदा भूतविभागे च चैतन्ये च प्रकाशिते । | उसी प्रकार अवशिष्ट चार भूतोंके भी दो-दो भाग करके, उसमेंसे आधे भागको पृथक् कर ले। शेष आधे अंशको चार प्रकारसे अलग करके आधे भागसे रहित उन अंशोंमें मिला दे। रस तन्मात्राको आधे भाग जलमें मिलाकर अवशिष्टभूत तन्मात्राके आधेको चारों भागोंमें मिश्रित कर दे। ऐसा करनेसे जब रसमय स्थूल जल हो जाय तब अन्य चार भूतोंके पंचीकरणका विभाग करे। उन |

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