देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| २७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यावन्न गुणविच्छेदस्तावत्तद्दर्शनं कुतः।<br>तं पश्यति तदा चित्ते यदाहङ्कारवर्जितः॥ २१ | हो सकता है ? जबतक अन्तःकरण गुणोंसे रहित नहीं होता तबतक परमात्माका दर्शन कैसे सम्भव है ? जब मनुष्य अहंकारविहीन हो जाता है, तब वह अपने हृदयमें उनका साक्षात्कार कर लेता है॥ १९—२१॥ |
| नारद उवाच<br>स्वरूपं देवदेवेश त्रयाणामेव विस्तरात्।<br>गुणानां यत्स्वरूपोऽस्ति ह्यहङ्कारस्त्रिरूपकः॥ २२<br>सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च तथापरः।<br>विभेदेन स्वरूपाणि वदस्व पुरुषोत्तम॥ २३<br>यज्ज्ञात्वा विप्रमुच्येऽहं ज्ञानं तद्वद मे प्रभो।<br>गुणानां लक्षणान्येव विततानि विभागशः॥ २४ | **नारदजी बोले—**हे देवदेवेश! तीनों गुणोंका जो स्वरूप है, उसका विस्तारपूर्वक विवेचन कीजिये और त्रिगुणात्मक अहंकारके स्वरूपका भी वर्णन कीजिये। हे पुरुषोत्तम! सात्त्विक, राजस तथा तीसरे तामस अहंकारके स्वरूप-भेदको बताइये। इस प्रकार गुणोंके विस्तृत लक्षणोंको विभागपूर्वक मुझको बताइये। हे प्रभो! मुझे ऐसा ज्ञान दीजिये जिसे जानकर मैं पूर्णरूपेण मुक्त हो जाऊँ॥ २२—२४॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>त्रयाणां शक्तयस्तिस्रस्तद् ब्रवीमि तवानघ।<br>ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिरर्थशक्तिस्तथापरा॥ २५ | **ब्रह्माजी बोले—**हे निष्पाप! इस त्रिविध अहंकारकी तीन शक्तियाँ हैं, मैं उन्हें बताता हूँ। वे हैं—ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति तथा तीसरी अर्थशक्ति॥ २५॥ |
| सात्त्विकस्य ज्ञानशक्ती राजसस्य क्रियात्मिका।<br>द्रव्यशक्तिस्तामसस्य तिस्रश्च कथितास्तव॥ २६ | उनमें सात्त्विक अहंकारकी ज्ञानशक्ति, राजसकी क्रियाशक्ति और तामसकी द्रव्यशक्ति—ये तीन शक्तियाँ आपको बता दीं॥ २६॥ |
| तेषां कार्याणि वक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः।<br>तामस्या द्रव्यशक्तेश्च शब्दस्पर्शसमुद्भवः॥ २७<br>रूपं रसश्च गन्धश्च तन्मात्राणि प्रचक्षते।<br>शब्दैकगुणमाकाशं वायुः स्पर्शगुणस्तथा॥ २८<br>सुरूपैकगुणोऽग्निश्च जलं रसगुणात्मकम्।<br>पृथ्वी गन्धगुणा ज्ञेया सूक्ष्माण्येतानि नारद॥ २९ | हे नारद! अब मैं उनके कार्योंको सम्यक् रूपसे बताऊँगा, सुनिये। तामसी द्रव्यशक्ति (अर्थशक्ति)-से उत्पन्न शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये तन्मात्राएँ कही गयी हैं। आकाशका एकमात्र गुण शब्द, वायुका गुण स्पर्श, अग्निका गुण रूप, जलका गुण रस तथा पृथ्वीका गुण गन्ध है—ऐसा जानना चाहिये। हे नारद! ये तन्मात्राएँ अत्यन्त सूक्ष्म हैं॥ २७—२९॥ |
| दशैतानि मिलित्वा तु द्रव्यशक्तियुतानि वै।<br>तामसाहङ्कारजः स्यात्सर्गस्तदनुवृत्तिकः॥ ३० | द्रव्यशक्तिसे युक्त इन दसों (पाँच तन्मात्राओं तथा उनके पाँच गुणों)-से मिलकर तामस अहंकारकी अनुवृत्तिसे सृष्टिकी रचना होती है॥ ३०॥ |
| राजस्याश्च क्रियाशक्तेरुत्पन्नानि शृणुष्व मे।<br>श्रोत्रं त्वग्रसना चक्षुर्घाणं चैव च पञ्चमम्॥ ३१<br>ज्ञानेन्द्रियाणि चैतानि तथा कर्मेन्द्रियाणि च।<br>वाक्पाणिपादपायुश्च गुह्यान्तानि च पञ्च वै॥ ३२<br>प्राणोऽपानश्च व्यानश्च समानोदानवायवः।<br>पञ्चदश मिलित्वैव राजसः सर्ग उच्यते॥ ३३<br>साधनानि किलैतानि क्रियाशक्तिमयानि च।<br>उपादानं किलैतेषां चिदनुवृत्तिरुच्यते॥ ३४ | अब राजसी क्रियाशक्तिसे उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियोंके विषयमें मुझसे सुनिये। श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाणी, हाथ, पैर, गुदा और गुह्यांग—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ उससे उत्पन्न हैं। प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान—ये पाँच वायु होती हैं। इन पन्द्रह (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच वायु)-से मिलकर होनेवाली सृष्टि राजसी सृष्टि कही जाती है। ये सभी साधन क्रियाशक्तिसे सदा युक्त रहते हैं और इनके उपादानकारणको चित्-अनुवृत्ति कहा जाता है॥ ३१—३४॥ |