देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 284, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 284
| अ० ७ ] | तृतीय स्कन्ध | २७५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| निर्गुणा दुर्गमा शक्तिर्निर्गुणश्च तथा पुमान्।<br>ज्ञानगम्यौ मुनीनां तु भावनीयौ तथा पुनः॥ १० | निर्गुणा शक्तिको जान पाना अत्यन्त दुरूह है और उसी प्रकार निर्गुण परमपुरुषका साक्षात्कार भी अति दुष्कर है। ये दोनों केवल मुनिजनोंके द्वारा ज्ञानसे प्राप्त तथा अनुभूत किये जा सकते हैं॥ १०॥ |
| अनादिनिधनौ विद्धि सदा प्रकृतिपूरुषौ।<br>विश्वासेनाभिगम्यौ तौ नाविश्वासेन कर्हिचित्॥ ११ | आप प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको आदि-अन्तसे सर्वदा रहित जानिये। ये दोनों विश्वाससे जाने जा सकते हैं; अविश्वाससे कभी नहीं॥ ११॥ |
| चैतन्यं सर्वभूतेषु यत्तद्विद्धि परात्मकम्।<br>तेजः सर्वत्रगं नित्यं नानाभावेषु नारद॥ १२ | हे नारद! सभी प्राणियोंमें जो चैतन्य विद्यमान है, उसे ही परमात्मस्वरूप जानो। तेजःस्वरूप वे परमात्मा सर्वत्र व्याप्त हैं तथा सदा विराजमान हैं॥ १२॥ |
| तञ्च ताञ्च महाभाग व्यापकौ विद्धि सर्वगौ।<br>ताभ्यां विहीनं संसारे न किञ्चिद्वस्तु विद्यते॥ १३ | हे महाभाग! उन परमपुरुष तथा प्रकृतिको सर्वव्यापी तथा सर्वगामी समझिये। इस संसारमें कोई भी पदार्थ उन दोनोंसे रहित नहीं है॥ १३॥ |
| तौ विचिन्त्यौ सदा देहे मिश्रीभूतौ सदाव्ययौ।<br>एकरूपौ चिदात्मानौ निर्गुणौ निर्मलावुभौ॥ १४ | सर्वदा अव्यय, एकरूप, चिदात्मा, निर्गुण तथा निर्मल—उन दोनों (प्रकृति-पुरुष)-को एक ही शरीरमें सम्मिश्रित मानकर सदा इनका चिन्तन करना चाहिये॥ १४॥ |
| या शक्तिः परमात्मासौ योऽसौ सा परमा मता।<br>अन्तरं नैतयोः कोऽपि सूक्ष्मं वेद च नारद॥ १५ | हे नारद! जो शक्ति हैं, वे ही परमात्मा हैं और जो परमात्मा हैं, वे ही परमशक्ति मानी गयी हैं। इन दोनोंमें विद्यमान सूक्ष्म अन्तरको कोई भी नहीं जान सकता॥ १५॥ |
| अधीत्य सर्वशास्त्राणि वेदान्साङ्गांश्च नारद।<br>न जानाति तयोः सूक्ष्ममन्तरं विरतिं विना॥ १६ | हे नारद! कोई भी व्यक्ति समस्त शास्त्रों तथा अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन करके भी विरक्तिके बिना उन दोनोंके सूक्ष्म अन्तरको नहीं जान पाता है॥ १६॥ |
| अहङ्कारकृतं सर्वं विश्वं स्थावरजङ्गमम्।<br>कथं तद्रहितं पुत्र भवेत्कल्पशतैरपि॥ १७ | हे पुत्र! जड-चेतनरूप यह सारा जगत् अहंकारसे निर्मित है; ऐसी स्थितिमें सैकड़ों कल्पोंमें भी यह अहंकारसे रहित कैसे हो सकता है?॥ १७॥ |
| निर्गुणं सगुणः पुत्र कथं पश्यति चक्षुषा।<br>सगुणं च महाबुद्धे चेतसा संविचारय॥ १८ | हे पुत्र! सगुण मनुष्य निर्गुणको नेत्रसे कैसे देख सकता है? अतः हे महाबुद्धे! उन परमात्माके सगुण रूपका मनसे सम्यक् ध्यान करते रहो॥ १८॥ |
| पित्तेनाच्छादिता जिह्वा चक्षुश्च मुनिसत्तम।<br>कटु पित्तं विजानाति रसं रूपं न तत्तथा॥ १९ | हे मुनिश्रेष्ठ! पित्तसे आच्छादित जिह्वा जिस प्रकार यथार्थ रसका अनुभव न करके केवल कटुरसका अनुभव करती है तथा पित्ताच्छादित नेत्र यथार्थ रूप न देखकर केवल पीले रंगको ही देखता है, उसी प्रकार |
| गुणैः समावृतं चेतः कथं जानाति निर्गुणम्।<br>अहङ्कारोद्भवं तच्च तद्विहीनं कथं भवेत्॥ २० | गुणोंसे आच्छादित मन उस निर्गुण परमात्माको कैसे जान पायेगा? क्योंकि मन भी तो अहंकारसे उत्पन्न हुआ है, तब वह मन अहंकारसे रहित कैसे |