भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 283
२७४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ७

अथ सप्तमोऽध्यायः

ब्रह्माजीके द्वारा परमात्माके स्थूल और सूक्ष्म स्वरूपका वर्णन; सात्त्विक, राजस और तामस शक्तिका वर्णन; पंचतन्मात्राओं, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा पंचीकरण-क्रियाद्वारा सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन

ब्रहोवाच<br>एवंप्रभावा सा देवी मया दृष्टाथ विष्णुना।<br>शिवेनापि महाभाग तास्ता देव्यः पृथक्पृथक् ॥ १ब्रह्माजी बोले—हे महाभाग! [नारद!] मैंने, विष्णु तथा शंकरने इस प्रकारके प्रभाववाली उन देवीको तथा अन्य सभी देवियोंको पृथक्-पृथक् देखा॥ १ ॥
व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य पितुर्वाक्यं नारदो मुनिसत्तमः।<br>पप्रच्छ परमप्रीतः प्रजापतिमिदं वचः॥ २व्यासजी बोले—पिताका यह वचन सुनकर मुनिवर नारदने परम प्रसन्न होकर प्रजापति ब्रह्माजीसे यह बात पूछी॥ २ ॥
नारद उवाच<br>पुमानाद्योऽविनाशी यो निर्गुणोऽच्युतिरव्ययः।<br>दृष्टश्चैवानुभूतश्च तद्वदस्व पितामह॥ ३नारदजी बोले—हे पितामह! आपने जिन आदि, अविनाशी, निर्गुण, अच्युत तथा अव्यय परमपुरुषका दर्शन तथा अनुभव किया, उनके विषयमें बताइये॥ ३ ॥
त्रिगुणा वीक्षिता शक्तिर्निर्गुणा कीदृशी पितः।<br>तस्याः स्वरूपं मे ब्रूहि पुरुषस्य च पद्मज॥ ४हे पिताजी! आपने त्रिगुणसम्पन्ना देवीका दर्शन तो कर लिया है; निर्गुणा शक्ति कैसी होती हैं? हे कमलोद्भव! अब आप मुझे उन शक्तिका तथा परमपुरुषका स्वरूप बताइये॥ ४ ॥
यदर्थञ्च मया तप्तं श्वेतद्वीपे महातपः।<br>दृष्टाः सिद्धा महात्मानस्तापसा गतमन्यवः॥ ५<br><br>परमात्मा न सम्प्राप्तो मयासौ दृष्टिगोचरः।<br>पुनः पुनस्तपस्तीव्रं कृतं तत्र प्रजापते॥ ६जिनके लिये मैंने श्वेतद्वीपमें महान् तपश्चर्या की और क्रोधशून्य सिद्धपुरुषों, महात्माओं तथा तपस्वियोंके दर्शन किये; वे परमात्मा मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुए। हे प्रजापते! इसके बाद भी [उनके दर्शनार्थ] मैंने वहाँ बार-बार घोर तपस्या की॥ ५-६ ॥
भवता सगुणा शक्तिर्दृष्टा तात मनोरमा।<br>निर्गुणा निर्गुणश्चैव कीदृशौ तौ वदस्व मे॥ ७हे तात! आपने मनोरमा सगुणा शक्तिका दर्शन किया है। आप मुझे बताइये कि निर्गुणा शक्ति और निर्गुण परमात्मा कैसे हैं?॥ ७ ॥
व्यास उवाच<br>इति पृष्टः पिता तेन नारदेन प्रजापतिः।<br>उवाच वचनं तथ्यं स्मितपूर्वं पितामहः॥ ८व्यासजी बोले—नारदजीने अपने पिता प्रजापति ब्रह्मासे ऐसा पूछा, तब उन पितामहने मुसकराते हुए रहस्यपूर्ण वचन कहा॥ ८ ॥
ब्रह्मोवाच<br>निर्गुणस्य मुने रूपं न भवेद् दृष्टिगोचरम्।<br>दृश्यञ्च नश्वरं यस्मादरूपं दृश्यते कथम्॥ ९ब्रह्माजी बोले—हे मुने! निर्गुणतत्त्वका रूप दृष्टिगोचर नहीं हो सकता; क्योंकि जो दिखायी पड़ता है, वह तो नाशवान् होता है। जो रूपरहित है, वह दृष्टिगोचर कैसे हो सकता है?॥ ९ ॥