देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अथ सप्तमोऽध्यायः
| २७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
|---|
अथ सप्तमोऽध्यायः
ब्रह्माजीके द्वारा परमात्माके स्थूल और सूक्ष्म स्वरूपका वर्णन; सात्त्विक, राजस और तामस शक्तिका वर्णन; पंचतन्मात्राओं, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा पंचीकरण-क्रियाद्वारा सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन
| ब्रहोवाच<br>एवंप्रभावा सा देवी मया दृष्टाथ विष्णुना।<br>शिवेनापि महाभाग तास्ता देव्यः पृथक्पृथक् ॥ १ | ब्रह्माजी बोले—हे महाभाग! [नारद!] मैंने, विष्णु तथा शंकरने इस प्रकारके प्रभाववाली उन देवीको तथा अन्य सभी देवियोंको पृथक्-पृथक् देखा॥ १ ॥ |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य पितुर्वाक्यं नारदो मुनिसत्तमः।<br>पप्रच्छ परमप्रीतः प्रजापतिमिदं वचः॥ २ | व्यासजी बोले—पिताका यह वचन सुनकर मुनिवर नारदने परम प्रसन्न होकर प्रजापति ब्रह्माजीसे यह बात पूछी॥ २ ॥ |
| नारद उवाच<br>पुमानाद्योऽविनाशी यो निर्गुणोऽच्युतिरव्ययः।<br>दृष्टश्चैवानुभूतश्च तद्वदस्व पितामह॥ ३ | नारदजी बोले—हे पितामह! आपने जिन आदि, अविनाशी, निर्गुण, अच्युत तथा अव्यय परमपुरुषका दर्शन तथा अनुभव किया, उनके विषयमें बताइये॥ ३ ॥ |
| त्रिगुणा वीक्षिता शक्तिर्निर्गुणा कीदृशी पितः।<br>तस्याः स्वरूपं मे ब्रूहि पुरुषस्य च पद्मज॥ ४ | हे पिताजी! आपने त्रिगुणसम्पन्ना देवीका दर्शन तो कर लिया है; निर्गुणा शक्ति कैसी होती हैं? हे कमलोद्भव! अब आप मुझे उन शक्तिका तथा परमपुरुषका स्वरूप बताइये॥ ४ ॥ |
| यदर्थञ्च मया तप्तं श्वेतद्वीपे महातपः।<br>दृष्टाः सिद्धा महात्मानस्तापसा गतमन्यवः॥ ५<br><br>परमात्मा न सम्प्राप्तो मयासौ दृष्टिगोचरः।<br>पुनः पुनस्तपस्तीव्रं कृतं तत्र प्रजापते॥ ६ | जिनके लिये मैंने श्वेतद्वीपमें महान् तपश्चर्या की और क्रोधशून्य सिद्धपुरुषों, महात्माओं तथा तपस्वियोंके दर्शन किये; वे परमात्मा मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुए। हे प्रजापते! इसके बाद भी [उनके दर्शनार्थ] मैंने वहाँ बार-बार घोर तपस्या की॥ ५-६ ॥ |
| भवता सगुणा शक्तिर्दृष्टा तात मनोरमा।<br>निर्गुणा निर्गुणश्चैव कीदृशौ तौ वदस्व मे॥ ७ | हे तात! आपने मनोरमा सगुणा शक्तिका दर्शन किया है। आप मुझे बताइये कि निर्गुणा शक्ति और निर्गुण परमात्मा कैसे हैं?॥ ७ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति पृष्टः पिता तेन नारदेन प्रजापतिः।<br>उवाच वचनं तथ्यं स्मितपूर्वं पितामहः॥ ८ | व्यासजी बोले—नारदजीने अपने पिता प्रजापति ब्रह्मासे ऐसा पूछा, तब उन पितामहने मुसकराते हुए रहस्यपूर्ण वचन कहा॥ ८ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>निर्गुणस्य मुने रूपं न भवेद् दृष्टिगोचरम्।<br>दृश्यञ्च नश्वरं यस्मादरूपं दृश्यते कथम्॥ ९ | ब्रह्माजी बोले—हे मुने! निर्गुणतत्त्वका रूप दृष्टिगोचर नहीं हो सकता; क्योंकि जो दिखायी पड़ता है, वह तो नाशवान् होता है। जो रूपरहित है, वह दृष्टिगोचर कैसे हो सकता है?॥ ९ ॥ |
| अ० ७ ] | तृतीय स्कन्ध | २७५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निर्गुणा दुर्गमा शक्तिर्निर्गुणश्च तथा पुमान्।<br>ज्ञानगम्यौ मुनीनां तु भावनीयौ तथा पुनः॥ १० | निर्गुणा शक्तिको जान पाना अत्यन्त दुरूह है और उसी प्रकार निर्गुण परमपुरुषका साक्षात्कार भी अति दुष्कर है। ये दोनों केवल मुनिजनोंके द्वारा ज्ञानसे प्राप्त तथा अनुभूत किये जा सकते हैं॥ १०॥ |
| अनादिनिधनौ विद्धि सदा प्रकृतिपूरुषौ।<br>विश्वासेनाभिगम्यौ तौ नाविश्वासेन कर्हिचित्॥ ११ | आप प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको आदि-अन्तसे सर्वदा रहित जानिये। ये दोनों विश्वाससे जाने जा सकते हैं; अविश्वाससे कभी नहीं॥ ११॥ |
| चैतन्यं सर्वभूतेषु यत्तद्विद्धि परात्मकम्।<br>तेजः सर्वत्रगं नित्यं नानाभावेषु नारद॥ १२ | हे नारद! सभी प्राणियोंमें जो चैतन्य विद्यमान है, उसे ही परमात्मस्वरूप जानो। तेजःस्वरूप वे परमात्मा सर्वत्र व्याप्त हैं तथा सदा विराजमान हैं॥ १२॥ |
| तञ्च ताञ्च महाभाग व्यापकौ विद्धि सर्वगौ।<br>ताभ्यां विहीनं संसारे न किञ्चिद्वस्तु विद्यते॥ १३ | हे महाभाग! उन परमपुरुष तथा प्रकृतिको सर्वव्यापी तथा सर्वगामी समझिये। इस संसारमें कोई भी पदार्थ उन दोनोंसे रहित नहीं है॥ १३॥ |
| तौ विचिन्त्यौ सदा देहे मिश्रीभूतौ सदाव्ययौ।<br>एकरूपौ चिदात्मानौ निर्गुणौ निर्मलावुभौ॥ १४ | सर्वदा अव्यय, एकरूप, चिदात्मा, निर्गुण तथा निर्मल—उन दोनों (प्रकृति-पुरुष)-को एक ही शरीरमें सम्मिश्रित मानकर सदा इनका चिन्तन करना चाहिये॥ १४॥ |
| या शक्तिः परमात्मासौ योऽसौ सा परमा मता।<br>अन्तरं नैतयोः कोऽपि सूक्ष्मं वेद च नारद॥ १५ | हे नारद! जो शक्ति हैं, वे ही परमात्मा हैं और जो परमात्मा हैं, वे ही परमशक्ति मानी गयी हैं। इन दोनोंमें विद्यमान सूक्ष्म अन्तरको कोई भी नहीं जान सकता॥ १५॥ |
| अधीत्य सर्वशास्त्राणि वेदान्साङ्गांश्च नारद।<br>न जानाति तयोः सूक्ष्ममन्तरं विरतिं विना॥ १६ | हे नारद! कोई भी व्यक्ति समस्त शास्त्रों तथा अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन करके भी विरक्तिके बिना उन दोनोंके सूक्ष्म अन्तरको नहीं जान पाता है॥ १६॥ |
| अहङ्कारकृतं सर्वं विश्वं स्थावरजङ्गमम्।<br>कथं तद्रहितं पुत्र भवेत्कल्पशतैरपि॥ १७ | हे पुत्र! जड-चेतनरूप यह सारा जगत् अहंकारसे निर्मित है; ऐसी स्थितिमें सैकड़ों कल्पोंमें भी यह अहंकारसे रहित कैसे हो सकता है?॥ १७॥ |
| निर्गुणं सगुणः पुत्र कथं पश्यति चक्षुषा।<br>सगुणं च महाबुद्धे चेतसा संविचारय॥ १८ | हे पुत्र! सगुण मनुष्य निर्गुणको नेत्रसे कैसे देख सकता है? अतः हे महाबुद्धे! उन परमात्माके सगुण रूपका मनसे सम्यक् ध्यान करते रहो॥ १८॥ |
| पित्तेनाच्छादिता जिह्वा चक्षुश्च मुनिसत्तम।<br>कटु पित्तं विजानाति रसं रूपं न तत्तथा॥ १९ | हे मुनिश्रेष्ठ! पित्तसे आच्छादित जिह्वा जिस प्रकार यथार्थ रसका अनुभव न करके केवल कटुरसका अनुभव करती है तथा पित्ताच्छादित नेत्र यथार्थ रूप न देखकर केवल पीले रंगको ही देखता है, उसी प्रकार |
| गुणैः समावृतं चेतः कथं जानाति निर्गुणम्।<br>अहङ्कारोद्भवं तच्च तद्विहीनं कथं भवेत्॥ २० | गुणोंसे आच्छादित मन उस निर्गुण परमात्माको कैसे जान पायेगा? क्योंकि मन भी तो अहंकारसे उत्पन्न हुआ है, तब वह मन अहंकारसे रहित कैसे |
| २७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यावन्न गुणविच्छेदस्तावत्तद्दर्शनं कुतः।<br>तं पश्यति तदा चित्ते यदाहङ्कारवर्जितः॥ २१ | हो सकता है ? जबतक अन्तःकरण गुणोंसे रहित नहीं होता तबतक परमात्माका दर्शन कैसे सम्भव है ? जब मनुष्य अहंकारविहीन हो जाता है, तब वह अपने हृदयमें उनका साक्षात्कार कर लेता है॥ १९—२१॥ |
| नारद उवाच<br>स्वरूपं देवदेवेश त्रयाणामेव विस्तरात्।<br>गुणानां यत्स्वरूपोऽस्ति ह्यहङ्कारस्त्रिरूपकः॥ २२<br>सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च तथापरः।<br>विभेदेन स्वरूपाणि वदस्व पुरुषोत्तम॥ २३<br>यज्ज्ञात्वा विप्रमुच्येऽहं ज्ञानं तद्वद मे प्रभो।<br>गुणानां लक्षणान्येव विततानि विभागशः॥ २४ | **नारदजी बोले—**हे देवदेवेश! तीनों गुणोंका जो स्वरूप है, उसका विस्तारपूर्वक विवेचन कीजिये और त्रिगुणात्मक अहंकारके स्वरूपका भी वर्णन कीजिये। हे पुरुषोत्तम! सात्त्विक, राजस तथा तीसरे तामस अहंकारके स्वरूप-भेदको बताइये। इस प्रकार गुणोंके विस्तृत लक्षणोंको विभागपूर्वक मुझको बताइये। हे प्रभो! मुझे ऐसा ज्ञान दीजिये जिसे जानकर मैं पूर्णरूपेण मुक्त हो जाऊँ॥ २२—२४॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>त्रयाणां शक्तयस्तिस्रस्तद् ब्रवीमि तवानघ।<br>ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिरर्थशक्तिस्तथापरा॥ २५ | **ब्रह्माजी बोले—**हे निष्पाप! इस त्रिविध अहंकारकी तीन शक्तियाँ हैं, मैं उन्हें बताता हूँ। वे हैं—ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति तथा तीसरी अर्थशक्ति॥ २५॥ |
| सात्त्विकस्य ज्ञानशक्ती राजसस्य क्रियात्मिका।<br>द्रव्यशक्तिस्तामसस्य तिस्रश्च कथितास्तव॥ २६ | उनमें सात्त्विक अहंकारकी ज्ञानशक्ति, राजसकी क्रियाशक्ति और तामसकी द्रव्यशक्ति—ये तीन शक्तियाँ आपको बता दीं॥ २६॥ |
| तेषां कार्याणि वक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः।<br>तामस्या द्रव्यशक्तेश्च शब्दस्पर्शसमुद्भवः॥ २७<br>रूपं रसश्च गन्धश्च तन्मात्राणि प्रचक्षते।<br>शब्दैकगुणमाकाशं वायुः स्पर्शगुणस्तथा॥ २८<br>सुरूपैकगुणोऽग्निश्च जलं रसगुणात्मकम्।<br>पृथ्वी गन्धगुणा ज्ञेया सूक्ष्माण्येतानि नारद॥ २९ | हे नारद! अब मैं उनके कार्योंको सम्यक् रूपसे बताऊँगा, सुनिये। तामसी द्रव्यशक्ति (अर्थशक्ति)-से उत्पन्न शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये तन्मात्राएँ कही गयी हैं। आकाशका एकमात्र गुण शब्द, वायुका गुण स्पर्श, अग्निका गुण रूप, जलका गुण रस तथा पृथ्वीका गुण गन्ध है—ऐसा जानना चाहिये। हे नारद! ये तन्मात्राएँ अत्यन्त सूक्ष्म हैं॥ २७—२९॥ |
| दशैतानि मिलित्वा तु द्रव्यशक्तियुतानि वै।<br>तामसाहङ्कारजः स्यात्सर्गस्तदनुवृत्तिकः॥ ३० | द्रव्यशक्तिसे युक्त इन दसों (पाँच तन्मात्राओं तथा उनके पाँच गुणों)-से मिलकर तामस अहंकारकी अनुवृत्तिसे सृष्टिकी रचना होती है॥ ३०॥ |
| राजस्याश्च क्रियाशक्तेरुत्पन्नानि शृणुष्व मे।<br>श्रोत्रं त्वग्रसना चक्षुर्घाणं चैव च पञ्चमम्॥ ३१<br>ज्ञानेन्द्रियाणि चैतानि तथा कर्मेन्द्रियाणि च।<br>वाक्पाणिपादपायुश्च गुह्यान्तानि च पञ्च वै॥ ३२<br>प्राणोऽपानश्च व्यानश्च समानोदानवायवः।<br>पञ्चदश मिलित्वैव राजसः सर्ग उच्यते॥ ३३<br>साधनानि किलैतानि क्रियाशक्तिमयानि च।<br>उपादानं किलैतेषां चिदनुवृत्तिरुच्यते॥ ३४ | अब राजसी क्रियाशक्तिसे उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियोंके विषयमें मुझसे सुनिये। श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाणी, हाथ, पैर, गुदा और गुह्यांग—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ उससे उत्पन्न हैं। प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान—ये पाँच वायु होती हैं। इन पन्द्रह (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच वायु)-से मिलकर होनेवाली सृष्टि राजसी सृष्टि कही जाती है। ये सभी साधन क्रियाशक्तिसे सदा युक्त रहते हैं और इनके उपादानकारणको चित्-अनुवृत्ति कहा जाता है॥ ३१—३४॥ |
| अ० ७ ] | तृतीय स्कन्ध | २७७ |
|---|
| ज्ञानशक्तिसमायुक्ताः सात्त्विकाच्च समुद्भवाः ।<br>दिशो वायुश्च सूर्यश्च वरुणश्चाश्विनावपि ॥ ३५<br><br>ज्ञानेन्द्रियाणां पञ्चानां पञ्चाधिष्ठातृदेवताः ।<br>चन्द्रो ब्रह्मा तथा रुद्रः क्षेत्रज्ञश्च चतुर्थकः ॥ ३६<br><br>इत्यन्तःकरणाख्यस्य बुद्ध्यादेश्चाधिदैवतम् ।<br>चत्वार्यैव तथा प्रोक्ताः किलाधिष्ठातृदेवताः ॥ ३७<br><br>मनसा सह चैतानि नूनं पञ्चदशैव तु ।<br>सात्त्विकस्य तु सर्गोऽयं सात्त्विकाख्यः प्रकीर्तितः ॥ ३८ | दिशाएँ, वायु, सूर्य, वरुण और दोनों अश्विनीकुमार ज्ञानशक्तिसे युक्त हैं और ये सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके ये ही पाँच अधिष्ठातृदेवता हैं। इसी प्रकार बुद्धि आदि अन्तःकरणचतुष्टयके चन्द्रमा, ब्रह्मा, रुद्र तथा क्षेत्रज्ञ—ये अधिदेव हैं। ये चारों अधिष्ठातृदेवता कहे गये हैं। मनसहित ये सब पन्द्रह होते हैं। यह सात्त्विक अहंकारकी सृष्टि है और ‘सात्त्विकी सृष्टि’ कही गयी है॥ ३५–३८॥ | | स्थूलसूक्ष्मादिभेदेन द्वे रूपे परमात्मनः ।<br>ज्ञानरूपं निराकारं निदानं तत्प्रचक्षते ॥ ३९ | स्थूल और सूक्ष्मभेदसे परमात्माके दो रूप होते हैं, उनमें ज्ञानरूप निराकारस्वरूप सबका कारण कहा गया है॥ ३९॥ | | साधकस्य तु ध्यानादौ स्थूलरूपं प्रचक्षते ।<br>शरीरं सूक्ष्ममेवेदं पुरुषस्य प्रकीर्तितम् ॥ ४० | साधकके ध्यान आदि कार्योंके लिये परमात्माके स्थूल रूपकी उपासना कही गयी है। यह उस परमपुरुषका सूक्ष्म शरीर ही बताया गया है॥ ४०॥ | | मम चैव शरीरं वै सूत्रमित्यभिधीयते ।<br>स्थूलं शरीरं वक्ष्यामि ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ४१<br><br>शृणु नारद यत्नेन यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यते ।<br>तन्मात्राणि पुरोक्तानि भूतसूक्ष्माणि यानि वै ॥ ४२ | मेरा यह शरीर सूत्रसंज्ञक है। अब मैं उस परब्रह्म परमात्माके स्थूल विराट् स्वरूपका वर्णन करूँगा। हे नारद! आप उसे सुनें, जिसे सावधानीसे सुनकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। इसके पहले मैंने गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द—इन पंच तन्मात्राओं तथा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन सूक्ष्म पंच महाभूतोंका वर्णन विस्तारसे कर दिया है॥ ४१-४२॥ | | पञ्चीकृत्य तु तान्येव पञ्चभूतसमुद्भवः ।<br>पञ्चीकरणभेदोऽयं शृणु संवदतः किल ॥ ४३ | उन्हीं पाँचोंको मिलाकर पंचीकरणकी क्रियासे परमात्माने पंचभूतमय देहकी सृष्टि की है। अब मैं पंचीकरणका भेद बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनिये—॥ ४३॥ | | प्रथमं रसतन्मात्रामुपादाय मनस्यपि ।<br>कल्पयेच्च तथा तद्वै यथा भवति चोदकम् ॥ ४४ | सबसे पहले रसरूप तन्मात्राका मनमें निश्चय करके जिस स्थूल रूपमें जल होता है, वैसी ही उसकी दो अंशोंमें भावना करे॥ ४४॥ | | शिष्टानां चैव भूतानामंशान्कृत्वा पृथक्पृथक् ।<br>उदके मिश्रयेच्चांशान्कृते रसमये ततः ॥ ४५<br><br>तदा भूतविभागे च चैतन्ये च प्रकाशिते । | उसी प्रकार अवशिष्ट चार भूतोंके भी दो-दो भाग करके, उसमेंसे आधे भागको पृथक् कर ले। शेष आधे अंशको चार प्रकारसे अलग करके आधे भागसे रहित उन अंशोंमें मिला दे। रस तन्मात्राको आधे भाग जलमें मिलाकर अवशिष्टभूत तन्मात्राके आधेको चारों भागोंमें मिश्रित कर दे। ऐसा करनेसे जब रसमय स्थूल जल हो जाय तब अन्य चार भूतोंके पंचीकरणका विभाग करे। उन |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे तत्त्वनिरूपणवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
| २७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
|---|
| चैतन्यस्य प्रवेशात्तु तदाहमिति संशयः ॥ ४६<br><br>प्रतीयमाने तेनैव विशेषेणाभिमानतः ।<br>आदिनारायणो देवो भगवानिति चोच्यते ॥ ४७ | पंचीकृत पंचभूतोंमें अधिष्ठानताके कारण उनके प्रतिबिम्बरूपसे जब चैतन्य प्रविष्ट हो जाता है, तब उस पंचभूतात्मक शरीरमें ‘अहम्’ भावरूप संशय उत्पन्न हो जाता है। वह संशय स्पष्टरूपसे जब भासित होने लगता है, तब उस स्थूल शरीरमें देहाभिमानके साथ चैतन्य जाग्रत् होने लगता है, वही दिव्य चैतन्य आदिनारायण भगवान्, परमात्मा आदि नामोंसे पुकारा जाता है॥ ४६-४७॥ |
| घनीभूतेऽथ भूतानां विभागे स्पष्टतां गते ।<br>वृद्धिं प्राप्य गुणैश्चेत्यमेकैकगुणवृद्धितः ॥ ४८ | इस प्रकार पंचीकरणसे सभी भूतोंका विभाग स्पष्ट हो जाने पर आकाश आदि सभी पंचभूत पूर्वोक्त तन्मात्राओंके कारण अपने-अपने विशेष गुणोंसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं और एक-एक गुणकी वृद्धिसे एक-एक भूत उत्पन्न हो जाता है॥ ४८॥ |
| आकाशस्य गुणश्चैकः शब्द एव न चापरः ।<br>शब्दस्पर्शौ च वायोश्च द्वौ गुणौ परिकीर्तितौ ॥ ४९<br><br>अग्नेः शब्दश्च स्पर्शश्च रूपमेते त्रयो गुणाः ।<br>शब्दस्पर्शरूपरसाश्चत्वारो वै जलस्य च ॥ ५०<br><br>स्पर्शशब्दरसा रूपं गन्धश्च पृथिवीगुणाः ।<br>एवं मिलितयोगैश्च ब्रह्माण्डोत्पत्तिरुच्यते ॥ ५१<br><br>सर्वे जीवा मिलित्वैव ब्रह्माण्डांशसमुद्भवाः ।<br>चतुरशीतिलक्षाश्च प्रोक्ता वै जीवजातयः ॥ ५२ | आकाशका केवल एकमात्र गुण शब्द है, दूसरा नहीं। वायुके शब्द और स्पर्श—ये दो गुण कहे गये हैं। शब्द, स्पर्श और रूप—ये तीन गुण अग्निके हैं। शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चार गुण जलके हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच गुण पृथ्वीके हैं। इस प्रकार इन पंचीकृत महाभूतोंके योगसे ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति कही जाती है। ब्रह्माण्डके अंशसे उत्पन्न सभी जीवोंको मिलाकर चौरासी लाख जीव-योनियाँ कही गयी हैं॥ ४९-५२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे तत्त्वनिरूपणवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणका वर्णन
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजी बोले— |
| सर्गोऽयं कथितस्तात यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना ।<br>गुणानां रूपसंस्थां वै शृणुष्वैकाग्रमानसः ॥ १ | हे तात! आपने जो मुझसे पूछा था, वह सृष्टिका वर्णन मैंने कर दिया। अब गुणोंका स्वरूप कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ १॥ |
| सत्त्वं प्रीत्यात्मकं ज्ञेयं सुखात्प्रीतिसमुद्भवः ।<br>आर्जवं च तथा सत्यं शौचं श्रद्धा क्षमा धृतिः ॥ २<br><br>अनुकम्पा तथा लज्जा शान्तिः सन्तोष एव च ।<br>एतैः सत्त्वप्रतीतिश्च जायते निश्चला सदा ॥ ३ | सत्त्वगुणको प्रीतिस्वरूप समझना चाहिये, वह प्रीति सुखसे उत्पन्न होती है। सरलता, सत्य, शौच, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, कृपा, लज्जा, शान्ति और सन्तोष—इन लक्षणोंसे सदैव निश्चल सत्त्वगुणकी प्रतीति होती है॥ २-३॥ |
| अ० ८ ] | तृतीय स्कन्ध | २७९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्वेतवर्णं तथा सत्त्वं धर्मे प्रीतिकरं सदा।<br>सच्छ्रद्धोत्पादकं नित्यमसच्छ्रद्धानिवारकम् ॥ ४ | सत्त्वगुणका वर्ण श्वेत है, यह सर्वदा धर्मके प्रति प्रीति उत्पन्न करता है, सत्-श्रद्धाका आविर्भाव करता है तथा असत्-श्रद्धाको समाप्त करता है ॥ ४ ॥ |
| सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च तथापरा।<br>श्रद्धा तु त्रिविधा प्रोक्ता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ५ | तत्त्वदर्शी मुनियोंने तीन प्रकारकी श्रद्धा बतलायी है—सात्त्विकी, राजसी एवं तीसरी तामसी ॥ ५ ॥ |
| रक्तवर्णं रजः प्रोक्तमप्रीतिकरमद्भुतम्।<br>अप्रीतिर्दुःखयोगत्वाद्वर्तत्येव सुनिश्चिता ॥ ६ | रजोगुण रक्तवर्णवाला कहा गया है। यह आश्चर्य एवं अप्रीतिको उत्पन्न करता है। दुःखसे योगके कारण ही निश्चितरूपसे अप्रीति उत्पन्न होती है ॥ ६ ॥ |
| प्रद्वेषोऽथ तथा द्रोहो मत्सरः स्तम्भ एव च।<br>उत्कण्ठा च तथा निद्रा श्रद्धा तत्र च राजसी ॥ ७ | जहाँ ईर्ष्या, द्रोह, मत्सर, स्तम्भन, उत्कण्ठा एवं निद्रा होती है, वहाँ राजसी श्रद्धा रहती है ॥ ७ ॥ |
| मानो मदस्तथा गर्वो रजसा किल जायते।<br>प्रत्येतव्यं रजस्त्वैतैर्लक्षणैश्च विचक्षणैः ॥ ८ | अभिमान, मद और गर्व—ये सब भी राजसी श्रद्धासे ही उत्पन्न होते हैं। अतः विद्वान् मनुष्योंको चाहिये कि वे इन लक्षणोंद्वारा राजसी श्रद्धा समझ लें ॥ ८ ॥ |
| कृष्णवर्णं तमः प्रोक्तं मोहनं च विषादकृत्।<br>आलस्यं च तथाज्ञानं निद्रा दैन्यं भयं तथा ॥ ९<br><br>विवादश्चैव कार्पण्यं कौटिल्यं रोष एव च।<br>वैषम्यं वातिनास्तिक्यं परदोषानुदर्शनम् ॥ १०<br><br>प्रत्येतव्यं तमस्त्वैतैर्लक्षणैः सर्वथा बुधैः।<br>तामस्या श्रद्धया युक्तं परतापोपपादकम् ॥ ११ | तमोगुणका वर्ण कृष्ण होता है। यह मोह और विषाद उत्पन्न करता है। आलस्य, अज्ञान, निद्रा, दीनता, भय, विवाद, कायरता, कुटिलता, क्रोध, विषमता, अत्यन्त नास्तिकता और दूसरोंके दोषको देखनेका स्वभाव—ये तामसिक श्रद्धाके लक्षण हैं। पण्डितजन इन लक्षणोंसे तामसी श्रद्धा जान लें; तामसी श्रद्धासे युक्त ये सभी लक्षण परपीड़ादायक हैं ॥ ९-११ ॥ |
| सत्त्वं प्रकाशयितव्यं नियन्तव्यं रजः सदा।<br>संहर्तव्यं तमः कामं जनेन शुभमिच्छता ॥ १२ | आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवालेको अपनेमें निरन्तर सत्त्वगुणका विकास करना चाहिये, रजोगुणपर नियन्त्रण रखना चाहिये तथा तमोगुणका नाश कर डालना चाहिये ॥ १२ ॥ |
| अन्योन्याभिभवाच्चैते विरुध्यन्ति परस्परम्।<br>तथान्योन्याश्रयाः सर्वे न तिष्ठन्ति निराश्रयाः ॥ १३ | ये तीनों गुण एक-दूसरेका उत्कर्ष होनेकी दशामें परस्पर विरोध करने लगते हैं। ये सब एक-दूसरेके आश्रित हैं, निराश्रय होकर नहीं रहते ॥ १३ ॥ |
| सत्त्वं न केवलं क्वापि न रजो न तमस्तथा।<br>मिलिताश्च सदा सर्वे तेनान्योन्याश्रयाः स्मृताः ॥ १४ | सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुणमेंसे कोई एक अकेला कभी नहीं रह सकता; ये सभी सदैव मिलकर रहते हैं, इसीलिये ये अन्योन्याश्रय सम्बन्धवाले कहे गये हैं ॥ १४ ॥ |
| अन्योन्यमिथुनाच्चैव विस्तारं कथयाम्यहम्।<br>शृणु नारद यज्ज्ञात्वा मुच्यते भवबन्धनात् ॥ १५ | हे नारद! ध्यानसे सुनिये, अब मैं इनके अन्योन्याश्रय-सम्बन्धसे होनेवाले विस्तारका वर्णन करता हूँ, जिसे जानकर मनुष्य भव-बन्धनसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है। इसमें आपको किसी प्रकारका |
| २८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सन्देहोऽत्र न कर्तव्यो ज्ञात्वेत्युक्तं मया वचः।<br>ज्ञातं तदनुभूतं यत्परिज्ञातं फले सति॥ १६ | सन्देह नहीं करना चाहिये। सम्यक् प्रकारसे जानकर ही मैंने यह बात कही है। मैंने पहले इसे जाना, तत्पश्चात् इसका अनुभव किया और पुनः परिणाम देखकर इसका परिज्ञान प्राप्त किया है॥ १५-१६॥ |
| श्रवणाद्दर्शनाच्चैव सद्येव महामते।<br>संस्कारानुभवाच्चैव परिज्ञातं न जायते॥ १७ | हे महामते! मात्र देख लेने, सुन लेने अथवा संस्कारजनित अपने अनुभवसे ही किसी भी वस्तुका तत्काल परिज्ञान नहीं हो जाता ॥ १७॥ |
| श्रुतं तीर्थं पवित्रञ्च श्रद्धोत्पन्ना च राजसी।<br>निर्गतस्तत्र तीर्थे वै दृष्टं चैव यथाश्रुतम्॥ १८<br><br>स्नातस्तत्र कृतं कृत्यं दत्तं दानं च राजसम्।<br>स्थितस्तत्र कियत्कालं रजोगुणसमावृतः॥ १९<br><br>रागद्वेषान्न निर्मुक्तः कामक्रोधसमावृतः।<br>पुनरेव गृहं प्राप्तो यथापूर्वं तथास्थितः॥ २० | जैसे किसी पवित्र तीर्थके विषयमें सुनकर किसी व्यक्तिके हृदयमें राजसी श्रद्धा उत्पन्न हो गयी और वह उस तीर्थमें चला गया। वहाँ पहुँचकर उसने वही देखा जैसा पहले सुना था। उस तीर्थमें उसने स्नान करके तीर्थकृत्य किया और राजसी दान भी किया। रजोगुणसे युक्त रहकर उस व्यक्तिने कुछ समयतक वहाँ तीर्थवास भी किया। किंतु ऐसा करके भी वह राग-द्वेषसे मुक्त नहीं हो पाया और काम-क्रोध आदि विकारोंसे आच्छादित ही रहा। पुनः अपने घर लौट आया और वह पूर्वकी भाँति वैसे ही रहने लगा॥ १८-२०॥ |
| श्रुतं च नानुभूतं वै तेन तीर्थं मुनीश्वर।<br>न प्राप्तं च फलं यस्मादश्रुतं विद्धि नारद॥ २१ | हे मुनीश्वर! उस व्यक्तिने तीर्थकी महिमा तो सुनी थी, किंतु उसका सम्यक् अनुभव नहीं किया। इसी कारण उसे तीर्थयात्राका कोई फल नहीं प्राप्त हुआ। अतः हे नारद! उसका सुनना न सुननेके बराबर समझें॥ २१॥ |
| निष्पापत्वं फलं विद्धि तीर्थस्य मुनिसत्तम।<br>कृषेः फलं यथा लोके निष्पन्नान्नस्य भक्षणम्॥ २२ | हे मुनिश्रेष्ठ! आप यह जान लें कि तीर्थयात्राका फल पापसे छुटकारा प्राप्त करना है; यह वैसे ही है जैसे संसारमें कृषिका फल उत्पादित अन्नका भक्षण है॥ २२॥ |
| पापदेहविकारा ये कामक्रोधादयः परे।<br>लोभो मोहस्तथा तृष्णा द्वेषो रागस्तथा मदः॥ २३<br><br>असूयेर्ष्याक्षमाशान्तिः पापान्येतानि नारद।<br>न निर्गतानि देहात्तु तावत्पापयुतो नरः॥ २४ | जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णा, द्वेष, राग, मद, परदोषदर्शन, ईर्ष्या, सहनशीलताका अभाव और अशान्ति आदि हैं, वे पापमय शरीरके विकार हैं। हे नारद! जबतक ये पाप शरीरसे नहीं निकलते, तबतक मनुष्य पापी ही रहता है॥ २३-२४॥ |
| कृते तीर्थे यदैतानि देहान्न निर्गतानि चेत्।<br>निष्फलः श्रम एवैकः कर्षकस्य यथा तथा॥ २५ | तीर्थयात्रा करनेपर भी यदि ये पाप देहसे नहीं निकले तो तीर्थाटन करनेका वह परिश्रम उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे किसी किसानका। |
| श्रमेणापीडितं क्षेत्रं कृष्टा भूमिः सुदुर्घटा।<br>उप्तं बीजं महार्घं च हिता वृत्तिरुदाहृता॥ २६ | उस किसानने परिश्रमपूर्वक खेतको खोदा, अत्यन्त कठोर भूमिको जोता, उसमें महँगा बीज बोया और अन्य आवश्यक कार्य किये तथा फलप्राप्तिकी इच्छासे उसकी रक्षाके |
अ० ८ ] तृतीय स्कन्ध २८१
अ० ८ ] तृतीय स्कन्ध २८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अहोरात्रं परिक्लिष्टो रक्षणार्थं फलोत्सुकः ।<br>काले सुप्तस्तु हेमन्ते वने व्याघ्रादिभिर्भृशम् ॥ २७<br><br>भक्षितं शलभैः सर्वं निराशश्च कृतः पुनः ।<br>तद्वत्तीर्थश्रमः पुत्र कष्टदो न फलप्रदः ॥ २८ | लिये दिन-रात अनेक कष्ट सहे, किंतु फल लगनेका समय हेमन्त-काल आनेपर वह सो गया, जिससे व्याघ्र आदि वन्य जन्तुओं तथा टिड्डियोंने उस फसलको खा लिया और अन्तमें वह किसान सर्वथा निराश हो गया। उसी प्रकार हे पुत्र! तीर्थमें किया गया वह श्रम भी कष्टदायक ही सिद्ध होता है, उसका कोई फल नहीं मिलता॥ २७-२८॥ |
| सत्त्वं समुत्कटं जातं प्रवृद्धं शास्त्रदर्शनात् ।<br>वैराग्यं तत्फलं जातं तामसार्थेषु नारद ॥ २९ | हे नारद! शास्त्रके अवलोकनसे सत्त्वगुण समुन्नत होता है तथा बड़ी तेजीसे बढ़ता है। उसका फल यह होता है कि तामस पदार्थोंके प्रति वैराग्य हो जाता है॥ २९॥ |
| प्रसह्माभिभवत्येव तद्रजस्तमसी उभे ।<br>रजः समुत्कटं जातं प्रवृत्तं लोभयोगतः ॥ ३०<br><br>तत्तथाभिभवत्येव तमःसत्त्वे तथा उभे ।<br>तमस्तथोत्कटं भूत्वा प्रवृद्धं मोहयोगतः ॥ ३१<br><br>तत्सत्त्वरजसी चोभे सङ्गम्याभिभवत्यपि ।<br>विस्तरं कथयाम्यद्य यथाभिभवतीति वै ॥ ३२ | वह सत्त्वगुण रज और तम—इन दोनोंको बलपूर्वक दबा देता है, लोभके कारण रजोगुण अत्यन्त तीव्र हो जाता है, वह बढ़ा हुआ रजोगुण सत्त्व तथा तम—इन दोनोंको दबा देता है। उसी प्रकार तमोगुण मोहके कारण तीव्रताको प्राप्त होकर सत्त्वगुण तथा रजोगुण—इन दोनोंको दबा देता है। ये गुण जिस प्रकार एक-दूसरेको दबाते हैं? उसे मैं यहाँपर विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ॥ ३०-३२॥ |
| यदा सत्त्वं प्रवृद्धं वै मतिर्धर्मे स्थिता तदा ।<br>न चिन्तयति बाह्यार्थं रजस्तमःसमुद्भवम् ॥ ३३ | जब सत्त्वगुण बढ़ता है, उस समय बुद्धि धर्ममें स्थित रहती है। उस समय वह रजोगुण या तमोगुणसे उत्पन्न बाह्य विषयोंका चिन्तन नहीं करती है॥ ३३॥ |
| अर्थं सत्त्वसमुद्भूतं गृह्णाति च न चान्यथा ।<br>अनायासकृतं चार्थं धर्मं यज्ञं च वाञ्छति ॥ ३४<br><br>सात्त्विकेष्वेव भोगेषु कामं वै कुरुते तदा ।<br><br>राजसेषु न मोक्षार्थं तामसेषु पुनः कुतः ॥ ३५ | उस समय बुद्धि सत्त्वगुणसे उत्पन्न होनेवाले कार्यको अपनाती है; इसके अतिरिक्त वह अन्य कार्योंमें नहीं फँसती। बुद्धि बिना प्रयासके ही धर्म तथा यज्ञादि कर्ममें प्रवृत्त हो जाती है। मोक्षकी अभिलाषासे मनुष्य उस समय सात्त्विक पदार्थोंके भोगमें प्रवृत्त रहता है; वह राजसी भोगोंमें लिप्त नहीं होता, तब भला वह तमोगुणी कार्योंमें क्यों लगेगा?॥ ३४-३५॥ |
| एवं जित्वा रजः पूर्वं ततश्च तमसो जयः ।<br>सत्त्वं च केवलं पुत्र तदा भवति निर्मलम् ॥ ३६ | इस प्रकार पहले रजोगुणको जीत करके वह तमोगुणको पराजित करता है। हे तात! उस समय एकमात्र विशुद्ध सत्त्वगुण ही स्थित रहता है॥ ३६॥ |
| यदा रजः प्रवृद्धं वै त्यक्त्वा धर्मान् सनातनान् ।<br>अन्यथाकुरुते धर्माञ्छ्रद्धां प्राप्य तु राजसीम् ॥ ३७ | जब मनुष्यके मनमें रजोगुणकी वृद्धि होती है, तब वह सनातन धर्मोंको त्यागकर राजसी श्रद्धाके वशीभूत हो विपरीत धर्माचरण करने लगता है॥ ३७॥ |
| २८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजसादर्थसंवृद्धिस्तथा भोगस्तु राजसः।<br>सत्त्वं विनिर्गतं तेन तमसश्चापि निग्रहः॥ ३८ | रजोगुण बढ़नेसे धनकी वृद्धि होती है और भोग भी राजसी हो जाता है। उस दशामें सत्त्वगुण दूर चला जाता है और उससे तमोगुण भी दब जाता है॥ ३८॥ |
| यदा तमो विवृद्धं स्यादुत्कटं सम्बभूव ह।<br>तदा वेदे न विश्वासो धर्मशास्त्रे तथैव च॥ ३९<br><br>श्रद्धां च तामसीं प्राप्य करोति च धनात्ययम्।<br>द्रोहं सर्वत्र कुरुते न शान्तिमधिगच्छति॥ ४०<br><br>जित्वा सत्त्वं रजश्चैव क्रोधनो दुर्मतिः शठः।<br>वर्तते कामचारेण भावेषु विततेषु च॥ ४१ | जब तमोगुणकी वृद्धि होती है और वह उत्कट हो जाता है, तब वेद तथा धर्मशास्त्रमें विश्वास नहीं रह जाता। उस समय मनुष्य तामसी श्रद्धा प्राप्त करके धनका दुरुपयोग करता है, सबसे द्रोह करने लगता है तथा उसे शान्ति नहीं मिलती। वह क्रोधी, दुर्बुद्धि तथा दुष्ट मनुष्य सत्त्व तथा रजोगुणको दबाकर अनेकविध तामसिक विचारोंमें लीन रहता हुआ मनमाना आचरण करने लगता है॥ ३९-४१॥ |
| एकं सत्त्वं न भवति रजश्चैकं तमस्तथा।<br>सहैवाश्रित्य वर्तन्ते गुणा मिथुनधर्मिणः॥ ४२ | किसी भी प्राणीमें सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण अकेले नहीं रहते; अपितु मिश्रित धर्मवाले वे तीनों गुण एक-दूसरेके आश्रयीभूत होकर रहते हैं॥ ४२॥ |
| रजो विना न सत्त्वं स्याद्रजः सत्त्वं विना क्वचित्।<br>तमो विना न चैवैते वर्तन्ते पुरुषर्षभ॥ ४३<br><br>तमस्ताभ्यां विहीनं तु केवलं न कदाचन।<br>सर्वे मिथुनधर्माणो गुणाः कार्यान्तरेषु वै॥ ४४ | हे पुरुषश्रेष्ठ! रजोगुणके बिना सत्त्वगुण और सत्त्वगुणके बिना रजोगुण कदापि रह नहीं सकते। इसी प्रकार तमोगुणके बिना ये दोनों गुण नहीं रह सकते। इस प्रकार ये गुण परस्पर स्थित रहते हैं। सत्त्वगुण तथा रजोगुणके बिना तमोगुण नहीं रहता; क्योंकि इन मिश्रित धर्मवाले सभी गुणोंकी स्थिति कार्य-कारण-भावसे विभिन्न प्रकारकी होती है॥ ४३-४४॥ |
| अन्योन्यसंश्रिताः सर्वे तिष्ठन्ति न वियोजिताः।<br>अन्योन्यजनकाश्चैव यतः प्रसवधर्मिणः॥ ४५ | ये सभी गुण अन्योन्याश्रयभावसे विद्यमान रहते हैं, अलग-अलग भावसे नहीं। प्रसवधर्मी होनेके कारण ये एक-दूसरेके उत्पादक भी होते हैं॥ ४५॥ |
| सत्त्वं कदाचिच्च रजस्तमसी जनयत्युत।<br>कदाचित्तु रजः सत्त्वतमसी जनयत्यपि॥ ४६<br><br>कदाचित्तु तमः सत्त्वरजसी जनयत्युभे।<br>जनयन्त्येवमन्योन्यं मृत्पिण्डश्च घटं यथा॥ ४७ | सत्त्वगुण कभी रजोगुणको और कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है; इसी तरह रजोगुण कभी सत्त्वगुणको तथा कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है। इसी प्रकार तमोगुण कभी सत्त्वगुणको एवं कभी रजोगुणको भी उत्पन्न करता है। ये तीनों गुण आपसमें एक-दूसरेको उसी प्रकार उत्पन्न कर देते हैं, जिस प्रकार मिट्टीका लोंदा घड़ेको उत्पन्न कर देता है॥ ४६-४७॥ |
| बुद्धिस्थास्ते गुणाः कामान्बोधयन्ति परस्परम्।<br>देवदत्तविष्णुमित्रयज्ञदत्तादयो यथा॥ ४८ | मनुष्योंकी बुद्धिमें स्थित ये तीनों गुण परस्पर कामनाओंको उसी प्रकार जाग्रत् करते हैं; जैसे देवदत्त, विष्णुमित्र और यज्ञदत्त आदि मिलकर काम करते हैं॥ ४८॥ |
अ० ९ ] तृतीय स्कन्ध २८३
अ० ९ ] तृतीय स्कन्ध २८३
| यथा स्त्रीपुरुषश्चैव मिथुनौ च परस्परम्।<br>तथा गुणाः समायान्ति युग्मभावं परस्परम्॥ ४९ | जिस प्रकार स्त्री और पुरुष आपसमें मिथुन-भावको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार ये तीनों गुण परस्पर युग्म-भावको प्राप्त रहते हैं॥ ४९॥ |
| रजसो मिथुने सत्त्वं सत्त्वस्य मिथुने रजः।<br>उभे ते सत्त्वरजसी तमसो मिथुने विदुः॥ ५० | रजोगुणका युग्म-भाव होनेपर सत्त्वगुण, सत्त्वगुणका युग्म-भाव होनेपर रजोगुण और तमोगुणके युग्म-भावसे सत्त्वगुण तथा रजोगुण—ये दोनों उत्पन्न होते हैं—ऐसा कहा गया है॥ ५०॥ |
| नारद उवाच<br>इत्येतत्कथितं पित्रा गुणरूपमनुत्तमम्।<br>श्रुत्वाप्येतत्स एवाहं ततोऽपृच्छं पितामहम्॥ ५१ | नारदजी बोले—इस प्रकार पिताजीने तीनों गुणोंके अत्युत्तम स्वरूपका वर्णन किया। इसे सुननेके पश्चात् मैंने पुनः पितामह ब्रह्माजीसे पूछा॥ ५१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे<br>गुणानां रूपसंस्थानादिवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
अथ नवमोऽध्यायः
गुणोंके परस्पर मिश्रीभावका वर्णन, देवीके बीजमन्त्रकी महिमा
| नारद उवाच<br>गुणानां लक्षणं तात भवता कथितं किल।<br>न तृप्तोऽस्मि पिबन्मिष्टं त्वन्मुखात्प्रच्युतं रसम्॥ १ | नारदजी बोले—हे तात! आपने गुणोंके लक्षणोंका वर्णन किया, किंतु आपके मुखसे निःसृत वाणीरूपी मधुर रसका पान करता हुआ मैं अभी भी तृप्त नहीं हुआ हूँ॥ १॥ |
| गुणानां तु परिज्ञानं यथावदनुवर्णय।<br>येनाहं परमां शान्तिमधिगच्छामि चेतसि॥ २ | अतएव अब आप इन गुणोंके सूक्ष्म ज्ञानका यथावत् वर्णन कीजिये, जिससे मैं अपने हृदयमें परम शान्तिका अनुभव कर सकूँ॥ २॥ |
| व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तु पुत्रेण नारदेन महात्मना।<br>उवाच च जगत्कर्ता रजोगुणसमुद्भवः॥ ३ | व्यासजी बोले—अपने पुत्र महात्मा नारदके इस प्रकार पूछनेपर रजोगुणसे आविर्भूत सृष्टि-निर्माता ब्रह्माजीने कहा॥ ३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>शृणु नारद वक्ष्यामि गुणानां परिवर्णनम्।<br>सम्यङ् नाहं विजानामि यथामति वदामि ते॥ ४ | ब्रह्माजी बोले—हे नारद! सुनिये, अब मैं गुणोंका विस्तृत वर्णन करूँगा; यद्यपि मैं इस विषयमें सम्यक् ज्ञान नहीं रखता फिर भी अपनी बुद्धिके अनुसार आपसे वर्णन कर रहा हूँ॥ ४॥ |
| सत्त्वं तु केवलं नैव कुत्रापि परिलक्ष्यते।<br>मिश्रीभावस्तु तेषां वै मिश्रत्वं प्रतिभाति वै॥ ५ | केवल सत्त्वगुण कहीं भी परिलक्षित नहीं होता है। गुणोंका परस्पर मिश्रीभाव होनेके कारण वह सत्त्वगुण भी मिश्रित दिखायी देता है॥ ५॥ |
| यथा काचिद्वरा नारी सर्वभूषणभूषिता।<br>हावभावयुता कामं भर्तुः प्रीतिकरी भवेत्॥ ६ | जिस प्रकार सब भूषणोंसे विभूषित तथा हाव-भावसे युक्त कोई सुन्दरी स्त्री अपने पतिको विशेष प्रिय होती है तथा माता-पिता एवं बन्धु-बान्धवोंके |
| २८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मातापित्रोस्तथा सैव बन्धुवर्गस्य प्रीतिदा।<br>दुःखं मोहं सपत्नीषु जनयत्यपि सैव हि॥ ७<br><br>एवं सत्त्वेन तेनैव स्त्रीत्वमापादितेन च।<br>रजस्तमसश्चैव जनिता वृत्तिरन्यथा॥ ८<br><br>रजसा स्त्रीकृतेनैव तमसा च तथा पुनः।<br>अन्योन्यस्य समायोगादन्यथा प्रतिभाति वै॥ ९ | लिये भी प्रीतिकर होती है, किंतु वही स्त्री अपनी सौतोंके मनमें दुःख और मोह उत्पन्न करती है। इसी प्रकार सत्त्वगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर रजोगुण और तमोगुणसे मिलनेपर भिन्न वृत्ति उत्पन्न होती है। ऐसे ही रजोगुण तथा तमोगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर एक-दूसरेके परस्पर संयोगके कारण विपरीत भावना प्रतीत होती है॥ ६-९॥ |
| अवस्थानात्स्वभावेषु न वै जात्यन्तराणि च।<br>लक्ष्यन्ते विपरीतानि योगान्नारद कुत्रचित्॥ १० | हे नारद! यदि ये तीनों गुण परस्पर मिश्रित न होते तो उनके स्वभावमें एक-सी ही प्रवृत्ति रहती, किंतु तीनों गुणोंमें मिश्रण होनेके कारण ही विभिन्नताएँ दिखायी देती हैं॥ १०॥ |
| यथा रूपवती नारी यौवनेन विभूषिता।<br>लज्जामाधुर्ययुक्ता च तथा विनयसंयुता॥ ११<br><br>कामशास्त्रविधिज्ञा च धर्मशास्त्रेऽपि सम्मता।<br>भर्तुः प्रीतिकरी भूत्वा सपत्नीनां च दुःखदा॥ १२ | जैसे कोई रूपवती स्त्री यौवन, लज्जा, माधुर्य तथा विनयसे युक्त हो, साथ ही वह धर्मशास्त्रके अनुकूल हो तथा कामशास्त्रको जाननेवाली हो, तो वह अपने पतिके लिये प्रीतिकर होती है; किंतु सौतोंके लिये कष्ट देनेवाली होती है॥ ११-१२॥ |
| मोहदुःखस्वभावस्था सत्त्वस्थेत्युच्यते जनैः।<br>तथा सत्त्वं विकुर्वाणमन्यभावं विभाति वै॥ १३ | [सौतोंके लिये] मोह तथा दुःख देनेवाली होनेपर भी कुछ लोगोंके द्वारा वह सत्त्वगुणी कही जाती है और सत्त्वगुणके अनेक शुभ कार्य करनेपर भी वह सौतोंको विपरीत भाववाली प्रतीत होती है॥ १३॥ |
| चौरैरुपद्रुतानां हि साधूनां सुखदा भवेत्।<br>दुःखा मूढा च दस्यूनां सैव सेना तथागुणा॥ १४ | जैसे राजाकी सेना चोरोंसे पीड़ित सज्जनोंके लिये सुख देनेवाली होती है, किंतु वही सेना चोरोंके लिये दुःखदायिनी, मूढ़ तथा गुणहीन होती है॥ १४॥ |
| विपरीतप्रतीतिं वै जनयन्ति स्वभावतः।<br>यथा च दुर्दिनं जातं महामेघघनावृतम्॥ १५<br><br>विद्युत्स्तनितसंयुक्तं तिमिरेणावगुण्ठितम्।<br>सिञ्चद्भूमिं प्रवर्षद्वै तमोरूपमुदाहृतम्॥ १६<br><br>यदेतत्कर्षकाणां वै तदेवातीव दुर्दिनम्।<br>बीजोपस्करयुक्तानां सुखदं प्रभवत्युत॥ १७<br><br>अप्रच्छन्नगृहाणाञ्च दुर्भागानां विशेषतः।<br>तृणकाष्ठगृहीतानां दुःखदं गृहमेधिनाम्॥ १८ | इससे प्रकट होता है कि स्वाभाविक गुण भी विपरीत लक्षणोंवाले दीख पड़ते हैं। जैसे किसी दिन जब चारों ओर काले-काले मेघ घिर आये हों, बिजली चमक रही हो, मेघ गरज रहे हों, अन्धकारसे आच्छादित हो और घनघोर वर्षाके कारण सूखी भूमि सिंच रही हो, तब भी लोग उसे तमोरूप गाढ़ान्धकारसे व्याप्त दुर्दिन नामसे ही पुकारते हैं। एक ओर वही दुर्दिन किसानोंको खेत जोतने तथा बीज बोनेकी सुविधा देनेके कारण सुखदायी प्रतीत होता है, किंतु दूसरी ओर वही दुर्दिन उन अभागे गृहस्थोंके लिये दुःखदायी हो जाता है, जिनके घर अभी छाये नहीं जा सके हैं और जो तृण, काष्ठ आदिके संग्रहमें व्यस्त हैं। साथ ही वही दुर्दिन उन स्त्रियोंके हृदयमें शोक उत्पन्न करता है, जिनके पति परदेश गये हों। |
| अ० ९ ] | तृतीय स्कन्ध | २८५ |
|---|
| प्रोषितभर्तृकाणां वै मोहदं प्रवदन्त्यपि।<br>स्वभावस्था गुणाः सर्वे विपरीता विभान्ति वै॥ १९ | उसी प्रकार ये सत्त्वादि गुण अपनी स्वाभाविक परिस्थितिमें रहते हुए भी अन्य गुणोंसे मिलनेपर विपरीत दृष्टिगोचर होते हैं॥ १५—१९॥ | | लक्षणानि पुनस्तेषां शृणु पुत्र ब्रवीम्यहम्।<br>लघुप्रकाशकं सत्त्वं निर्मलं विशदं सदा॥ २० | हे पुत्र! अब मैं उन गुणोंके लक्षण पुनः बता रहा हूँ; सुनो। सत्त्वगुण सूक्ष्म, प्रकाशक, स्वच्छ, निर्मल एवं व्यापक होता है। जब मानवके सम्पूर्ण अंग और नेत्र आदि इन्द्रियाँ हल्के हों, मन निर्मल हो तथा वह उन राजस एवं तामस विषयोंको न ग्रहण करता हो, तब यह समझ लेना चाहिये कि शरीरमें अब सत्त्वगुण प्रधानरूपसे विद्यमान है। जब जिस किसीकी देहमें रजोगुण प्रधानरूपसे विद्यमान रहता है तब यह बार-बार जम्हाई, स्तम्भन, तन्द्रा तथा चंचलता उत्पन्न करता है। इसी प्रकार जब अत्यन्त कलह करनेका मन चाहता हो, अन्यत्र जानेकी इच्छा हो, चित्त चंचल हो और वाद-विवादमें उलझनेकी प्रवृत्ति हो, मनमें काम-भावनाका गहरा परदा पड़ जाय, तब यह समझ ले कि शरीरमें तमोगुणकी प्रधानता है। उस समय शरीरके अंग भारी हो जाते हैं, इन्द्रियाँ तामसिक भावोंके वशीभूत रहती हैं, चित्त विमूढ़ रहता है और वह निद्राकी इच्छा नहीं करता। हे नारद! इस प्रकार सभी गुणोंके लक्षण समझना चाहिये॥ २०—२५ १/२॥ | | यदाङ्गानि लघून्येव नेत्रादीनीन्द्रियाणि च।<br>निर्मलं च तथा चेतो गृह्णाति विषयान्न तान्॥ २१ | | | तदा सत्त्वं शरीरे वै मन्तव्यञ्च समुत्कटम्।<br>जृम्भां स्तम्भं च तन्द्रां च चलञ्चैव रजः पुनः॥ २२ | | | यदा तदुत्कटं जातं देहे यस्य च कस्यचित्।<br>कलिं मृगयते कर्तुं गन्तुं ग्रामान्तरं तथा॥ २३ | | | चलचित्तश्च सोऽत्यर्थं विवादे चोद्यतस्तथा।<br>गुरुमावरणं कामं तमो भवति तद्यदा॥ २४ | | | तदाङ्गानि गुरूण्याशु प्रभवन्त्यावृतानि च।<br>इन्द्रियाणि मनः शून्यं निद्रां नैवाभिवाञ्छति॥ २५ | | | गुणानां लक्षणान्येवं विज्ञेयानीह नारद। | | | नारद उवाच<br>विभिन्नलक्षणाः प्रोक्ताः पितामह गुणास्त्रयः॥ २६<br><br>कथमेकत्र संस्थाने कार्यं कुर्वन्ति शाश्वतम्।<br>परस्परं मिलित्वा हि विभिन्नाः शत्रवः किल॥ २७<br><br>एकत्रस्थाः कथं कार्यं कुर्वन्तीति वदस्व मे। | **नारदजी बोले—**हे पितामह! आपने तीनों गुणोंको भिन्न-भिन्न लक्षणोंवाला बताया, तो फिर ये एक स्थानमें होकर निरन्तर कार्य कैसे करते हैं? विपरीत होते हुए भी शत्रुरूप ये गुण एकत्र होकर परस्पर मिल करके किस प्रकार कार्य करते हैं; यह मुझे बताइये॥ २६—२७ १/२॥ | | ब्रह्मोवाच<br>शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि गुणास्ते दीपवृत्तयः॥ २८<br><br>प्रदीपश्च यथा कार्यं प्रकरोत्यर्थदर्शनम्।<br>वर्तिस्तैलं यथार्चिश्च विरुद्धाश्च परस्परम्॥ २९<br><br>विरुद्धं हि तथा तैलमग्निना सह सङ्गतम्।<br>तैलं वर्तिविरोध्येव पावकोऽपि परस्परम्॥ ३०<br>एकत्रस्थाः पदार्थानां प्रकुर्वन्ति प्रदर्शनम्। | **ब्रह्माजी बोले—**हे पुत्र! सुनो, मैं बताता हूँ। उन तीनों गुणोंका स्वभाव दीपकके समान है। जैसे दीपकमें तेल, बत्ती और अग्निशिखा तीनों परस्पर विरोधी धर्मवाले हैं, परंतु तीनोंके सहयोगसे ही दीपक वस्तुओं आदिका दर्शन कराता है। यद्यपि आगके साथ मिला हुआ तेल आगका विरोधी है और तेल बत्ती तथा अग्निका विरोधी है तथापि वे एकत्र होकर वस्तुओंका दर्शन कराते हैं॥ २८—३० १/२॥ |
| २८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- | | नारद उवाच<br>एवं प्रकृतिजाः प्रोक्ता गुणाः सत्यवतीसुत ॥ ३१<br>विश्वस्य कारणं ते वै मया पूर्वं यथाश्रुतम् ।<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तं नारदेनाथ मम सर्वं सविस्तरम् ॥ ३२<br>गुणानां लक्षणं सर्वं कार्यं चैव विभागशः ।<br>आराध्या परमा शक्तिर्यया सर्वमिदं ततम् ॥ ३३<br>सगुणा निर्गुणा चैव कार्यभेदे सदैव हि ।<br>अकर्ता पुरुषः पूर्णो निरीहः परमोऽव्ययः ॥ ३४<br>करोत्येषा महामाया विश्वं सदसदात्मकम् ।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः सूर्यश्चन्द्रः शचीपतिः ॥ ३५<br>अश्विनौ वसवस्त्वष्टा कुबेरो यादसां पतिः ।<br>वह्निवायुस्तथा पूषा सेनानीश्च विनायकः ॥ ३६<br>सर्वे शक्तियुताः शक्ताः कर्तुं कार्याणि स्वानि च ।<br>अन्यथा तेऽप्यशक्ता वै प्रस्पन्दितुमनीश्वराः ॥ ३७ | **नारदजी बोले—**हे सत्यवतीसुत व्यासजी! ये सत्त्वादि तीनों गुण भी प्रकृतिसे उत्पन्न कहे गये हैं और ये जगत्के कारण हैं, जैसा मैंने पहले भी सुना है॥ ३१ १/२ ॥<br><br>व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इस प्रकार नारदजीने विस्तारपूर्वक गुणोंके लक्षण और उनके विभागोंके सहित कार्योंको भी मुझे बतलाया है। सर्वदा उन्हीं परमशक्तिकी आराधना करनी चाहिये, जिनसे यह समस्त संसार व्याप्त है। वे भगवती कार्यभेदसे सगुणा और निर्गुणा दोनों हैं। वह परमपुरुष तो अकर्ता, पूर्ण, निःस्पृह तथा परम अविनाशी है; ये महामाया ही सत् और असद्रूप जगत्की रचना करती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार, आठों वसु, विश्वकर्मा, कुबेर, वरुण, अग्नि, वायु, पूषा, कुमार कार्तिकेय और गणपति—ये सभी देवता उन्हीं महामायाकी शक्तिसे युक्त होकर अपने-अपने कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। हे मुनीश्वरो! यदि ऐसा न हो तो वे हिलने-डुलनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते॥ ३२—३७॥ | | सा चैव कारणं राजन् जगतः परमेश्वरी ।<br>समाराधय तां भूप कुरु यज्ञं जनाधिप ॥ ३८<br>पूजनं परया भक्त्या तस्या एव विधानतः ।<br>महालक्ष्मीर्महाकाली तथा महासरस्वती ॥ ३९<br>ईश्वरी सर्वभूतानां सर्वकारणकारणम् ।<br>सर्वकामार्थदा शान्ता सुखसेव्या दयान्विता ॥ ४० | हे राजन्! वे परमेश्वरी ही इस जगत्की परम कारण हैं, अतः हे नरपते! अब आप उन्हींकी आराधना करें, उन्हींका यज्ञ करें और परम भक्तिके साथ विधिवत् उन्हींका पूजन करें। वे ही महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती हैं। वे सब जीवोंकी अधीश्वरी, समस्त कारणोंकी एकमात्र कारण, सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली, शान्तस्वरूपिणी, सुखपूर्वक सेवनीय तथा दयासे परिपूर्ण हैं॥ ३८—४०॥ | | नामोच्चारणमात्रेण वाञ्छितार्थफलप्रदा ।<br>देवैराराधिता पूर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥ ४१<br>मोक्षकामैश्च विविधैस्तापसैर्विजितात्मभिः ।<br>अस्पष्टमपि यन्नाम प्रसङ्गेनापि भाषितम् ॥ ४२ | ये भगवती नामोच्चारणमात्रसे ही मनोवांछित फल देनेवाली हैं। पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओं तथा मोक्षकी कामना करनेवाले अनेक जितेन्द्रिय तपस्वियोंने उनकी आराधना की थी। किसी प्रसंगवश अस्पष्टरूपसे ही उच्चारित किया गया उनका नाम सर्वथा दुर्लभ मनोरथोंको भी पूर्ण कर देता है॥ ४१—४२ १/२ ॥ | | ददाति वाञ्छितानर्थान्दुर्लभानपि सर्वथा ।<br>ऐ ऐ इति भयार्तेन दृष्ट्वा व्याघ्रादिकं वने ॥ ४३ | हे नृपश्रेष्ठ! इस सम्बन्धमें एक दृष्टान्त है—सत्यव्रत नामके एक मुनिने वनमें व्याघ्रादि हिंसक पशुओंको देखकर भयसे पीड़ित होकर ‘ऐ-ऐ’ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे गुणपरिज्ञानवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
| अ० १० ] | तृतीय स्कन्ध | २८७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बिन्दुहीनमपीत्युक्तं वाञ्छितं प्रददाति वै।<br>तत्र सत्यव्रतस्यैव दृष्टान्तो नृपसत्तम॥ ४४<br><br>प्रत्यक्ष एव चास्माकं मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>ब्राह्मणानां समाजेषु तस्योदाहरणं बुधैः॥ ४५<br><br>कथ्यमानं मया राजञ्छ्रुतं सर्वं सविस्तरम्।<br>अनक्षरो महामूर्खो नाम्ना सत्यव्रतो द्विजः॥ ४६<br><br>श्रुत्वाक्षरं कोलमुखात्समुच्चार्य स्वयं ततः।<br>बिन्दुहीनं प्रसङ्गेन जातोऽसौ विबुधोत्तमः॥ ४७<br><br>ऐकारोच्चारणाद्देवी तुष्टा भगवती तदा।<br>चकार कविराजं तं दयार्द्रा परमेश्वरी॥ ४८ | शब्दका उच्चारण किया था। उस बिन्दुरहित बीज-मन्त्र (ऐं)-का उच्चारण करनेके फलस्वरूप उसे भगवतीने मनोवांछित फल प्रदान कर दिया था। यह दृष्टान्त हम पुण्यात्मा मुनियोंके लिये प्रत्यक्ष ही है॥ ४३-४४॥<br><br>हे राजन्! ब्राह्मणोंकी सभामें विद्वानोंके द्वारा उदाहरणके रूपमें उस सत्यव्रतके कहे जाते हुए सम्पूर्ण आख्यानको मैंने विस्तारपूर्वक सुना था। सत्यव्रत नामवाले उस निरक्षर तथा महामूर्ख ब्राह्मणने वह ‘ऐ-ऐ’ शब्द एक कोलके मुखसे सुनकर स्वयं भी उसका उच्चारण किया। बिन्दुरहित ‘ऐं’ बीजका उच्चारण करनेसे भी वह श्रेष्ठ विद्वान् हो गया। ऐकारके उच्चारणमात्रसे भगवती प्रसन्न हो गयीं और दयार्द्र होकर उन परमेश्वरीने उसे कविराज बना दिया॥ ४५-४८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे गुणपरिज्ञानवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
देवीके बीजमन्त्रकी महिमाके प्रसंगमें सत्यव्रतका आख्यान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जनमेजय उवाच<br>कोऽसौ सत्यव्रतो नाम ब्राह्मणो द्विजसत्तमः।<br>कस्मिन्देशे समुत्पन्नः कीदृशश्च वदस्व मे॥ १<br><br>कथं तेन श्रुतः शब्दः कथमुच्चारितः पुनः।<br>सिद्धिश्च कीदृशी जाता तस्य विप्रस्य तत्क्षणात्॥ २<br><br>कथं तुष्टा भवानी सा सर्वज्ञा सर्वसंस्थिता।<br>विस्तरेण वदस्वाद्य कथामेतां मनोरमाम्॥ ३<br><br>सूत उवाच<br>इति पृष्टस्तदा राज्ञा व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच परमोदारं वचनं रसवच्छुचि॥ ४<br><br>व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>श्रुता मुनिसमाजेषु मया पूर्वं कुरुद्वह॥ ५ | जनमेजय बोले—वह द्विजश्रेष्ठ सत्यव्रत नामक ब्राह्मण कौन था, वह किस देशमें पैदा हुआ था तथा कैसा था? यह मुझे बताइये॥ १॥<br><br>उस ब्राह्मणने ‘ऐ’ शब्द कैसे सुना और फिर स्वयं भी कैसे उसका उच्चारण किया? उच्चारण करते ही उसी क्षण उस ब्राह्मणको कैसी सिद्धि प्राप्त हुई? सर्वत्र विराजमान रहनेवाली तथा सब कुछ जाननेवाली वे भवानी उसपर किस प्रकार प्रसन्न हो गयीं? अब आप यह मनोरम कथा विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये॥ २-३॥<br><br>सूतजी बोले—राजा जनमेजयके यह पूछनेपर सत्यवतीसुत व्यासजी सरस, पवित्र एवं परम उदार वचन कहने लगे॥ ४॥<br><br>व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, मैं वह पवित्र पौराणिक कथा कह रहा हूँ। हे कुरुनन्दन! पूर्वकालमें मुनियोंके समाजमें मैंने यह कथा सुनी थी॥ ५॥ |
| २८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकदाहं कुरुश्रेष्ठ कुर्वंस्तीर्थाटनं शुचि।<br>सम्प्राप्तो नैमिषारण्यं पावनं मुनिसेवितम्॥ ६<br>प्रणम्याहं मुनीन्सर्वान् स्थितस्तत्र वराश्रमे।<br>विधिपुत्रास्तु यत्रासञ्जीवन्मुक्ता महाव्रताः॥ ७ | हे कुरुश्रेष्ठ! एक बार तीर्थाटन करता हुआ मैं मुनियोंद्वारा सेवित पवित्र क्षेत्र नैमिषारण्यमें जा पहुँचा। वहाँ सभी मुनियोंको प्रणाम करके मैं एक उत्तम आश्रममें ठहर गया, जहाँ ब्रह्माके पुत्र महाव्रती एवं जीवन्मुक्त मुनि निवास कर रहे थे॥ ६-७॥ |
| कथाप्रसङ्ग एवासीत्तत्र विप्रसमागमे।<br>जमदग्निस्तु पप्रच्छ मुनीनेवं सभास्थितः॥ ८ | उस ब्राह्मणसमाजमें कथाका ही प्रसंग चल रहा था। सभामें उपस्थित महर्षि जमदग्निने सब मुनियोंसे यह पूछा—॥ ८॥ |
| जमदग्निरुवाच<br>सन्देहोऽस्ति महाभागा मम चेतसि तापसाः।<br>समाजेषु मुनीनां वै निःसन्देहो भवाम्यहम्॥ ९<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो मघवा वरुणोऽनलः।<br>कुबेरः पवनस्त्वष्टा सेनानीश्च गणाधिपः॥ १०<br>सूर्योऽश्विनौ भगः पूषा निशानाथो ग्रहास्तथा।<br>आराधनीयतमः कोऽत्र वाञ्छितार्थफलप्रदः॥ ११<br>सुखसेव्यश्च सततं चाशुतोषश्च मानदाः।<br>ब्रुवन्तु मुनयः शीघ्रं सर्वज्ञाः संशितव्रताः॥ १२ | जमदग्नि बोले— हे महाभाग तपस्वियो! मेरे मनमें एक शंका है। निश्चय ही इस मुनिसमाजमें मैं शंकारहित हो जाऊँगा। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, वरुण, अग्नि, कुबेर, वायु, विश्वकर्मा, कार्तिकेय, गणेश, सूर्य, दोनों अश्विनीकुमार, भग, पूषा, चन्द्रमा और सभी ग्रह—इन सबमें सबसे अधिक आराधनीय तथा अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला कौन है? उनमें कौन देवता सदा सेव्य और शीघ्र प्रसन्न होनेवाला है? हे मानद! हे सर्वज्ञ! हे व्रतधारी मुनिगण! आप हमें शीघ्र बतायें॥ ९–१२॥ |
| एवं प्रश्ने कृते तत्र लोमशो वाक्यमब्रवीत्।<br>जमदग्ने शृणुष्वैतद्यत्पृष्टं वै त्वयाधुना॥ १३<br>सेवनीयतमा शक्तिः सर्वेषां शुभमिच्छताम्।<br>परा प्रकृतिराद्या च सर्वगा सर्वदा शिवा॥ १४<br>देवानां जननी सैव ब्रह्मादीनां महात्मनाम्।<br>आदिप्रकृतिमूलं सा संसारपादपस्य वै॥ १५ | इस प्रकार जमदग्निके प्रश्न करनेपर लोमश-ऋषिने कहा—हे जमदग्ने! आपने इस समय जो पूछा है, उसे सुनिये। अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले सभी लोगोंके लिये वे एकमात्र महाशक्ति ही आराधनीय हैं। वे ही परा-प्रकृति आदिसस्वरूपा, सर्वगामिनी, सर्वदायिनी और कल्याणकारिणी हैं। वे ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओंकी जननी हैं और वे ही संसाररूपी वृक्षकी मूलरूपिणी आदिप्रकृति हैं॥ १३–१५॥ |
| स्मृता चोच्चारिता देवी ददाति किल वाञ्छितम्।<br>सर्वदैवार्द्रचित्ता सा वरदानाय सेविता॥ १६ | वे भगवती केवल नामका उच्चारण तथा स्मरण करते ही निश्चितरूपसे अभीष्ट फल प्रदान करती हैं। जो लोग उनकी उपासना करते हैं, उन्हें वरदान देनेके लिये वे सर्वदा दयालुचित्त रहती हैं॥ १६॥ |
| इतिहासं प्रवक्ष्यामि शृण्वन्तु मुनयः शुभम्।<br>अक्षरोच्चारणादेव यथा प्राप्तं द्विजेन वै॥ १७ | हे मुनिगण! उनके नामाक्षरके उच्चारण-मात्रसे ही एक ब्राह्मणने जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की थी, वह पवित्र वृत्तान्त मैं आपलोगोंसे कहता हूँ, सुनिये—॥ १७॥ |
| कोसलेषु द्विजः कश्चिद्देवदत्तेति विश्रुतः।<br>अनपत्यश्चकारेष्टिं पुत्राय विधिपूर्वकम्॥ १८ | कोसलदेशमें देवदत्त नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहता था। वह निःसन्तान था, इसलिये उसने पुत्रप्राप्तिके लिये विधिपूर्वक यज्ञ किया॥ १८॥ |
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २८९
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २८९
| तमसातीरमास्थाय कृत्वा मण्डपमुत्तमम्।<br>द्विजानाहूय वेदज्ञान्सत्रकर्मविशारदान्॥ १९<br>कृत्वा वेदीं विधानेन स्थापयित्वा विभावसून्।<br>पुत्रेष्टिं विधिवत्तत्र चकार द्विजसत्तमः॥ २० | तमसानदीके तटपर पहुँचकर उसने उत्तम यज्ञ-मण्डप बनवाया और वेदज्ञ तथा यज्ञकर्ममें निपुण ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके विधिपूर्वक यज्ञवेदी बनवाकर तथा अग्नि-स्थापन करके उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ आरम्भ कर दिया॥ १९-२०॥ |
|---|---|
| ब्रह्माणं कल्पयामास सुहोत्रं मुनिसत्तमम्।<br>अध्वर्युं याज्ञवल्क्यञ्च होतारं च बृहस्पतिम्॥ २१<br>प्रस्तोतारं तथा पैलमुद्गातारं च गोभिलम्।<br>सभ्यानन्यान्मुनीन्कृत्वा विधिवत्प्रददौ वसु॥ २२ | उसने उस यज्ञमें मुनिवर सुहोत्रको 'ब्रह्मा', याज्ञवल्क्यको 'अध्वर्यु' तथा बृहस्पतिको 'होता', पैलमुनिको 'प्रस्तोता' तथा गोभिलको 'उद्गाता' बनाया एवं अन्यान्य उपस्थित मुनियोंको यज्ञका सभासद् बनाकर उन्हें विधिवत् प्रचुर धन प्रदान किया॥ २१-२२॥ |
| उद्गाता सामगः श्रेष्ठः सप्तस्वरसमन्वितम्।<br>रथन्तरमगायत्तु स्वरितेन समन्वितम्॥ २३ | सामवेदका गान करनेवाले श्रेष्ठ उद्गाता गोभिलमुनि सातों स्वरोंसे युक्त तथा स्वरितसे समन्वित रथन्तर सामका गान करने लगे॥ २३॥ |
| तदास्य स्वरभङ्गोऽभूत्कृते श्वासे मुहुर्मुहुः।<br>देवदत्तश्चुकोपाशु गोभिलं प्रत्युवाच ह॥ २४<br>मूर्खोऽसि मुनिमुख्याद्य स्वरभङ्गस्त्वया कृतः।<br>काम्यकर्मणि सञ्जाते पुत्रार्थं यजतश्च मे॥ २५ | बार-बार श्वास लेनेके कारण गोभिलका स्वर भंग हो गया। तब देवदत्तको क्रोध आ गया और उसने तुरंत गोभिलमुनिसे कहा—हे मुनिमुख्य! तुम मूर्ख हो, तुमने आज मेरेद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये किये जाते हुए इस काम्यकर्ममें स्वरभंग कर दिया॥ २४-२५॥ |
| गोभिलस्तु तदोवाच देवदत्तं सुकोपितः।<br>मूर्खस्ते भविता पुत्रः शठः शब्दविवर्जितः॥ २६<br>सर्वप्राणिशरीरे तु श्वासोच्छ्वासः सुदुर्ग्रहः।<br>न मेऽत्र दूषणं किञ्चित्स्वरभङ्गे महामते॥ २७ | तब गोभिलमुनि अत्यन्त क्रोधित होकर देवदत्तसे कहने लगे—[इस यज्ञके फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाला] तुम्हारा पुत्र मूर्ख, शठ और गूँगा होगा। हे महामते! सभी प्राणियोंके शरीरमें श्वास आता-जाता रहता है। इसे रोक पाना बड़ा कठिन है। अतः ऐसी स्थितिमें स्वरभंग हो जानेमें मेरा कुछ भी दोष नहीं है॥ २६-२७॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य गोभिलस्य महात्मनः।<br>शापाद्भीतो देवदत्तस्तमुवाचातिदुःखितः॥ २८<br>कथं क्रुद्धोऽसि विप्रेन्द्र वृथा मयि निरागसि।<br>अक्रोधना हि मुनयो भवन्ति सुखदाः सदा॥ २९ | महात्मा गोभिलका यह वचन सुनकर शापसे भयभीत देवदत्तने अत्यन्त दुःखी होकर उनसे कहा—हे विप्रवर! आप मुझ निर्दोषपर व्यर्थ ही क्यों क्रुद्ध हैं? मुनिलोग तो सदा क्रोधरहित और सुखदायक होते हैं॥ २८-२९॥ |
| स्वल्पेऽपराधे विप्रेन्द्र कथं शप्तस्त्वया ह्यहम्।<br>अपुत्रोऽहं सुतप्तः प्राक् तापयुक्तः पुनः कृतः॥ ३०<br>मूर्खपुत्रादपुत्रत्वं वरं वेदविदो विदुः।<br>तथापि ब्राह्मणो मूर्खः सर्वेषां निन्द्य एव हि॥ ३१ | हे विप्र! थोड़ेसे अपराधपर आपने मुझे शाप क्यों दे दिया? पुत्रहीन होनेके कारण मैं तो पहलेसे ही बहुत दुःखी था, उसपर भी शाप देकर आपने मुझे और भी दुःखी कर दिया। वेदके विद्वानोंने कहा है कि मूर्ख पुत्रकी अपेक्षा पुत्रहीन रहना अच्छा है। उसपर भी मूर्ख ब्राह्मण तो सबके लिये निन्दनीय होता |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 10 A
२९० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
| पशुवच्छूद्रवच्चैव न योग्यः सर्वकर्मसु।<br>किं करोमीह मूर्खेण पुत्रेण द्विजसत्तम॥ ३२ | है। वह पशु एवं शूद्रके समान सभी कार्योंमें अयोग्य माना जाता है। अतः हे विप्रवर! मूर्ख पुत्रको लेकर मैं क्या करूँगा?॥ ३०—३२॥ |
| यथा शूद्रस्तथा मूर्खो ब्राह्मणो नात्र संशयः।<br>न पूजार्हो न दानार्हो निन्द्यश्च सर्वकर्मसु॥ ३३ | मूर्ख ब्राह्मण शूद्रतुल्य होता है; इसमें सन्देह नहीं है; क्योंकि वह न तो पूजाके योग्य होता है और न दान लेनेका पात्र ही होता है। वह सब कार्योंमें निन्द्य होता है॥ ३३॥ |
| देशे वै वसमानश्च ब्राह्मणो वेदवर्जितः।<br>करदः शूद्रवच्चैव मन्तव्यः स च भूभुजा॥ ३४ | किसी देशमें रहता हुआ वेदशास्त्रविहीन ब्राह्मण कर देनेवाले शूद्रकी भाँति एक राजाके द्वारा समझा जाना चाहिये॥ ३४॥ |
| नासने पितृकार्येषु देवकार्येषु स द्विजः।<br>मूर्खः समुपवेश्यश्च कार्यस्य फलमिच्छता॥ ३५ | फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि देव तथा पितृकार्योंके अवसरपर उस मूर्ख ब्राह्मणको आसनपर न बैठाये॥ ३५॥ |
| राज्ञा शूद्रसमो ज्ञेयो न योज्यः सर्वकर्मसु।<br>कर्षकस्तु द्विजः कार्यों ब्राह्मणो वेदवर्जितः॥ ३६ | राजा भी वेदविहीन ब्राह्मणको शूद्रके समान समझे और उसे शुभ कार्योंमें नियुक्त न करे, बल्कि उसे कृषिके काममें लगा दे॥ ३६॥ |
| विना विप्रेण कर्तव्यं श्राद्धं कुशचटेन वै।<br>न तु विप्रेण मूर्खेण श्राद्धं कार्यं कदाचन॥ ३७ | ब्राह्मणके अभावमें कुशके चटसे स्वयं श्राद्धकार्य कर लेना ठीक है, किंतु मूर्ख ब्राह्मणसे कभी भी श्राद्धकार्य नहीं कराना चाहिये॥ ३७॥ |
| आहारादधिकं चान्नं न दातव्यमपण्डिते।<br>दाता नरकमाप्नोति ग्रहीता तु विशेषतः॥ ३८ | मूर्ख ब्राह्मणको भोजनसे अधिक अन्न नहीं देना चाहिये; क्योंकि देनेवाला व्यक्ति नरकमें जाता है और लेनेवाला तो विशेषरूपसे नरकगामी होता है॥ ३८॥ |
| धिग्राज्यं तस्य राज्ञो वै यस्य देशेऽबुधा जनाः।<br>पूज्यन्ते ब्राह्मणा मूर्खा दानमानादिकैरपि॥ ३९ | उस राजाके राज्यको धिक्कार है, जिसके राज्यमें मूर्खलोग निवास करते हैं और मूर्ख ब्राह्मण भी दान, सम्मान आदिसे पूजित होते हैं, साथ ही जहाँ |
| आसने पूजने दाने यत्र भेदो न चाण्वपि।<br>मूर्खपण्डितयोर्भेदो ज्ञातव्यो विबुधेन वै॥ ४० | मूर्ख और पण्डितके बीच आसन, पूजन और दानमें रंचमात्र भी भेद नहीं माना जाता। अतः विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह मूर्ख और पण्डितकी जानकारी अवश्य कर ले॥ ३९—४०॥ |
| मूर्खा यत्र सुगर्विष्ठा दानमानपरिग्रहैः।<br>तस्मिन्देशे न वस्तव्यं पण्डितेन कथञ्चन॥ ४१ | जहाँ दान, मान तथा परिग्रहसे मूर्खलोग महान् गौरवशाली माने जाते हैं, उस देशमें पण्डितजनको किसी प्रकार भी नहीं रहना चाहिये। दुर्जन व्यक्तियोंकी |
| असतामुपकाराय दुर्जनानां विभूतयः।<br>पिचुमन्दः फलाढ्योऽपि काकैरैवोपभुज्यते॥ ४२ | सम्पत्तियाँ दुर्जनोंके उपकारके लिये ही होती हैं। जैसे अधिक फलोंसे लदे हुए नीमके वृक्षका उपभोग केवल कौए ही करते हैं॥ ४१—४२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 10 B
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २९१
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २९१
| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भुक्त्वान्नं वेदविद्विप्रो वेदाभ्यासं करोति वै।<br>क्रीडन्ति पूर्वजाः तस्य स्वर्गे प्रमुदिताः किल॥ ४३ | वेदज्ञ ब्राह्मण जिसका अन्न खाकर वेदाभ्यास करता है, उसके पूर्वज परम प्रसन्न होकर स्वर्गमें विहार करते हैं॥ ४३॥ |
| गोभिलातः किमुक्तं वै त्वया वेदविदुत्तम।<br>संसारे मूर्खपुत्रत्वं मरणादतिगर्हितम्॥ ४४ | अतएव हे वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ गोभिल मुने! आपने यह क्या कह दिया। इस संसारमें मूर्ख पुत्रका पिता होना तो मृत्युसे भी बढ़कर कष्टप्रद होता है॥ ४४॥ |
| कृपां कुरु महाभाग शापस्यानुग्रहं प्रति।<br>दीनोद्धारणशक्तोऽसि पतामि तव पादयोः॥ ४५ | हे महाभाग! अब आप इस शापसे मेरा उद्धार करनेकी कृपा कीजिये। आप दीनोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं। मैं आपके पैरोंपर पड़ता हूँ॥ ४५॥ |
| लोमश उवाच<br>इत्युक्त्वा देवदत्तस्तु पतितस्तस्य पादयोः।<br>स्तुवन्दीनहृदत्यर्थं कृपणः साश्रुलोचनः॥ ४६ | लोमश बोले— यह कहकर देवदत्त अत्यन्त दीनहृदय तथा असहाय होकर नेत्रोंमें आँसू भरकर स्तुति करता हुआ मुनिके पैरोंपर गिर पड़ा॥ ४६॥ |
| गोभिलस्तु तदा तत्र दृष्ट्वा तं दीनचेतसम्।<br>क्षणकोपा महान्तो वै पापिष्ठाः कल्पकोपनाः॥ ४७<br>जलं स्वभावतः शीतं पावकातपयोगतः।<br>उष्णं भवति तच्छीघ्रं तद्विना शिशिरं भवेत्॥ ४८<br>दयावान्गोभिलस्त्वाह देवदत्तं सुदुःखितम्।<br>मूर्खो भूत्वा सुतस्ते वै विद्वानपि भविष्यति॥ ४९ | तब उस दीनहृदय देवदत्तको देखकर गोभिल-मुनिको दया आ गयी। महात्मालोग क्षणभरके लिये ही कोप करते हैं, किंतु पापियोंका कोप कल्पपर्यन्त बना रहता है। जल स्वभावतः शीतल होता है। वही जल अग्नि तथा धूपके संयोगसे गर्म हो जाता है, किंतु पुनः उनका संयोग हटते ही वह शीघ्र शीतल हो जाता है। तब दयालु गोभिलमुनिने अत्यन्त दुःखित देवदत्तसे कहा—तुम्हारा पुत्र मूर्ख होकर भी बादमें विद्वान् हो जायगा॥ ४७-४९॥ |
| इति दत्तवरः सोऽथ मुदितोऽभूद् द्विजर्षभः।<br>इष्टिं समाप्य विप्रान्वै विससर्ज यथाविधि॥ ५० | इस प्रकार वर पा लेनेपर द्विजवर देवदत्त प्रसन्न हो गये। उन्होंने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त करके ब्राह्मणोंको विदा किया॥ ५०॥ |
| कालेन कियता तस्य भार्या रूपवती सती।<br>गर्भं दधार काले सा रोहिणी रोहिणीसमा॥ ५१ | कुछ समय बीतनेपर देवदत्तकी पतिव्रता तथा रूपवती भार्या रोहिणी जो रोहिणीके समान शुभ लक्षणोंवाली थी, उसने यथासमय गर्भधारण किया॥ ५१॥ |
| गर्भाधानादिकं कर्म चकार विधिवद् द्विजः।<br>पुंसवनविधानञ्च शृङ्गारकरणं तथा॥ ५२<br>सीमन्तोन्नयनञ्चैव कृतं वेदविधानतः।<br>ददौ दानानि मुदितो मत्वेष्टिं सफलां तथा॥ ५३ | देवदत्तने विधि-विधानके साथ गर्भाधान आदि कर्म किये। तत्पश्चात् पुंसवन, शृंगारकरण तथा सीमन्तोन्नयन-संस्कार वेद-विधिके साथ सम्पन्न किये। उस समय अपने यज्ञको सफल जानकर प्रसन्न मनसे उन्होंने बहुत-से दान दिये॥ ५२-५३॥ |
| शुभेऽह्नि सुषुवे पुत्रं रोहिणी रोहिणीयुते।<br>दिने लग्ने शुभेऽत्यर्थं जातकर्म चकार सः॥ ५४<br>पुत्रदर्शनकं कृत्वा नामकर्म चकार च।<br>उतथ्य इति पुत्रस्य कृतं नाम पुराविदा॥ ५५ | रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ दिनमें रोहिणीने पुत्रको जन्म दिया। देवदत्तने शुभ दिन और मुहूर्तमें नवजात शिशुका जातकर्म-संस्कार किया और पुत्रदर्शन करके यथासमय उसका नामकरण भी कर दिया। पूर्व बातोंको जाननेवाले देवदत्तने अपने पुत्रका नाम 'उतथ्य' रखा॥ ५४-५५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—10 C
| २९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
|---|
| स चाष्टमे तथा वर्षे शुभे वै शुभवासरे।<br>तस्योपनयनं कर्म चकार विधिवत्पिता॥ ५६ | आठवें वर्षमें शुभ योग तथा शुभ दिनमें पिता देवदत्तने अपने उस पुत्रका विधिवत् उपनयन-संस्कार सम्पन्न किया॥ ५६॥ | | वेदमध्यापयामास गुरुस्तं वै व्रते स्थितम्।<br>नोच्चचार तथोतथ्यः संस्थितो मुग्धवत्तदा॥ ५७ | ब्रह्मचर्यव्रतमें स्थित उतथ्यको आचार्य वेद पढ़ाने लगे, किंतु वह एक शब्दका भी उच्चारण नहीं कर सका, मूढकी भाँति चुपचाप बैठा रहा॥ ५७॥ | | बहुधा पाठितः पित्रा न दधार मतिं शठः।<br>मूढवत्तिष्ठतेऽत्यर्थं तं शुशोच पिता तदा॥ ५८ | उसके पिताने उसे अनेक प्रकारसे पढ़ानेका प्रयत्न किया, किंतु उस मूर्खकी बुद्धि उस ओर प्रवृत्त नहीं होती थी। वह मूर्खके समान पड़ा रहता था। इससे उसके पिता देवदत्त उसके लिये बहुत चिन्तित हुए॥ ५८॥ | | एवं कुर्वन्सदाभ्यासं जातो द्वादशवार्षिकः।<br>न वेद विधिवत्कर्तुं सन्ध्यावन्दनकं विधिम्॥ ५९ | इस प्रकार निरन्तर वेदाभ्यास करते हुए वह बालक बारह वर्षका हो गया, किंतु भलीभाँति सन्ध्यावन्दन करनेतककी विधि भी न जान पाया॥ ५९॥ | | मूर्खोऽभूदिति लोकेषु गता वार्तातिविस्तरा।<br>ब्राह्मणेषु च सर्वेषु तापसेष्वितरेषु च॥ ६० | सभी ब्राह्मणों, तपस्वियों तथा अन्यान्य लोगोंमें यह बात विस्तृतरूपसे फैल गयी कि देवदत्तका पुत्र महामूर्ख निकल गया॥ ६०॥ | | जहास लोकस्तं विप्रं यत्र तत्र गतं वने।<br>पिता माता निनिन्दाथ मूर्खं तमतिभर्त्सयन्॥ ६१ | हे मुने! वह जहाँ कहीं जाता, लोग उसकी हँसी उड़ाते थे। यहाँतक कि उसके माता-पिता भी उस मूर्खको कोसते हुए उसकी निन्दा किया करते थे॥ ६१॥ | | निन्दितोऽथ जनैः कामं पितृभ्यामथ बान्धवैः।<br>वैराग्यमगमद्विप्रो जगाम वनमप्यसौ॥ ६२ | इस प्रकार जब सभी लोग, माता-पिता तथा बन्धु-बान्धव उसकी निन्दा करने लगे, तब उस ब्राह्मणबालकके मनमें वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह वनमें चला गया॥ ६२॥ | | अन्धो वरस्तथा पङ्गुर्न मूर्खस्तु वरः सुतः।<br>इत्युक्तोऽसौ पितृभ्यां वै विवेश काननं प्रति॥ ६३ | अन्धा या पंगु पुत्र ठीक है, किंतु मूर्ख पुत्र ठीक नहीं है—माता-पिताके ऐसा कहनेपर वह वनमें चला गया॥ ६३॥ | | गङ्गातीरे शुभे स्थाने कृत्वोटजमनुत्तमम्।<br>वन्यां वृत्तिं च संकल्प्य स्थितस्तत्र समाहितः॥ ६४ | गंगाके किनारे एक उत्तम स्थानपर सुन्दर पर्णकुटी बनाकर वह वनवासीका जीवन व्यतीत करते हुए एकनिष्ठ होकर वहीं रहने लगा॥ ६४॥ | | नियमं च परं कृत्वा नासत्यं प्रब्रवीम्यहम्।<br>स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये ब्रह्मचर्यव्रतो हि सः॥ ६५ | 'मैं असत्य नहीं बोलूँगा'—ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करके ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वह उसी सुन्दर आश्रममें रहने लगा॥ ६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सत्यव्रताख्यानवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 10 D
अ० ११] तृतीय स्कन्ध २९३
अ० ११] तृतीय स्कन्ध २९३
अथैकादशोऽध्यायः
सत्यव्रतद्वारा बिन्दुरहित सारस्वत बीजमन्त्र ‘ऐ-ऐ’ का उच्चारण तथा उससे प्रसन्न होकर भगवतीका सत्यव्रतको समस्त विद्याएँ प्रदान करना
| लोमश उवाच | लोमश बोले— |
|---|---|
| न वेदाध्ययनं किञ्चिज्जानाति न जपं तथा।<br>ध्यानं न देवतानाञ्च न चैवाराधनं तथा॥ १<br><br>नासनं वेद विप्रोऽसौ प्राणायामं तथा पुनः।<br>प्रत्याहारं तु नो वेद भूतशुद्धिञ्च कारणम्॥ २<br><br>न मन्त्रकीलकं जाप्यं गायत्रीञ्च न वेद सः।<br>शौचं स्नानविधिञ्चैव तथाचमनकं पुनः॥ ३<br><br>प्राणाग्निहोत्रं नो वेद बलिदानं न चातिथिम्।<br>न सन्ध्यां समिधो होमं विवेद च तथा मुनिः॥ ४ | [हे जमदग्ने!] वह उतथ्य वेदाध्ययन, जप, ध्यान तथा देवताओंकी आराधना आदि कुछ भी नहीं जानता था। वह ब्राह्मण आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार भी नहीं जानता था। वह भूतशुद्धि तथा कारणके विषयमें भी कुछ नहीं जानता था। वह कीलक मन्त्र, जप, गायत्री नहीं जानता था। उसे सम्यक् रूपसे शौच, स्नान-विधि तथा आचमनतकका ज्ञान नहीं था। वह ब्राह्मण प्राणाग्निहोत्र, वैश्वदेव, अतिथि-सत्कार, सन्ध्या-वन्दन, समिधा तथा होम आदिके विषयमें भी नहीं जानता था॥ १-४॥ |
| सोऽकरोत्प्रातरुत्थाय यत्किञ्चिद्दन्तधावनम्।<br>स्नानं च शूद्रवत्तत्र गङ्गायां मन्त्रवर्जितम्॥ ५<br><br>फलान्यादाय वन्यानि मध्याह्नेऽपि यदृच्छया।<br>भक्ष्याभक्ष्यपरिज्ञानं न जानाति शठस्तथा॥ ६ | प्रातःकाल उठकर वह किसी तरह सामान्य रूपसे दन्तधावन कर लेता था, तत्पश्चात् शूद्रकी भाँति बिना मन्त्र बोले ही गंगामें स्नान कर लिया करता था। दोपहरके समय वह अपनी इच्छासे वन्य फल लाकर उन्हें खा लिया करता था। उस मूर्खको भक्ष्य तथा अभक्ष्यका भी ज्ञान नहीं था॥ ५-६॥ |
| सत्यं ब्रूते स्थितस्तत्र नानृतं वदते पुनः।<br>जनैः सत्यतपा नाम कृतमस्य द्विजस्य वै॥ ७ | वहाँ निवास करता हुआ वह ब्राह्मण सदैव सत्यभाषण करता था और झूठ कभी नहीं बोलता था। [उसकी इस सत्यनिष्ठासे प्रभावित होकर] लोगोंने इस ब्राह्मणका नाम ‘सत्यतपा’ रख दिया॥ ७॥ |
| नाहितं कस्यचित्कुर्यान्न तथाविहितं क्वचित्।<br>सुखं स्वपिति तत्रैव निर्भयश्चिन्तयन्निति॥ ८<br><br>कदा मे मरणं भावि दुःखं जीवामि कानने।<br>जीवितं धिक्च मूर्खस्य तरसा मरणं ध्रुवम्॥ ९ | वह न तो कभी किसीका अहित करता था और न अविहित कार्य ही करता था। वह यही सोचता हुआ निडर होकर उस कुटीमें सोता था कि मेरी मृत्यु कब होगी? मैं इस वनमें दुःखपूर्वक जी रहा हूँ। मुझ मूर्खके जीवनको धिक्कार है, अतः अब मेरा शीघ्र मर जाना ही उत्तम है॥ ८-९॥ |
| दैवेनाहं कृतो मूर्खो नान्योऽत्र कारणं मम।<br>प्राप्य चैवोत्तमं जन्म वृथा जातं ममाधुना॥ १० | दैवने ही मुझे मूर्ख बनाया है, इसके अतिरिक्त कोई अन्य कारण मुझे जान नहीं पड़ता। उत्तम कुलमें जन्म-ग्रहण करके भी मैंने अपना जीवन व्यर्थ गँवा दिया॥ १०॥ |
| यथा वन्ध्या सुरूपा च यथा वा निष्फलो द्रुमः।<br>अदुग्धदोहा धेनुश्च तथाहं निष्फलः कृतः॥ ११ | जैसे रूपसम्पन्न वन्ध्या स्त्री, फलरहित वृक्ष तथा दूध न देनेवाली गाय—ये सब निरर्थक होते हैं, उसी प्रकार मैं भी निष्फल कर दिया गया हूँ॥ ११॥ |