देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 296, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 296
| अ० १० ] | तृतीय स्कन्ध | २८७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| बिन्दुहीनमपीत्युक्तं वाञ्छितं प्रददाति वै।<br>तत्र सत्यव्रतस्यैव दृष्टान्तो नृपसत्तम॥ ४४<br><br>प्रत्यक्ष एव चास्माकं मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>ब्राह्मणानां समाजेषु तस्योदाहरणं बुधैः॥ ४५<br><br>कथ्यमानं मया राजञ्छ्रुतं सर्वं सविस्तरम्।<br>अनक्षरो महामूर्खो नाम्ना सत्यव्रतो द्विजः॥ ४६<br><br>श्रुत्वाक्षरं कोलमुखात्समुच्चार्य स्वयं ततः।<br>बिन्दुहीनं प्रसङ्गेन जातोऽसौ विबुधोत्तमः॥ ४७<br><br>ऐकारोच्चारणाद्देवी तुष्टा भगवती तदा।<br>चकार कविराजं तं दयार्द्रा परमेश्वरी॥ ४८ | शब्दका उच्चारण किया था। उस बिन्दुरहित बीज-मन्त्र (ऐं)-का उच्चारण करनेके फलस्वरूप उसे भगवतीने मनोवांछित फल प्रदान कर दिया था। यह दृष्टान्त हम पुण्यात्मा मुनियोंके लिये प्रत्यक्ष ही है॥ ४३-४४॥<br><br>हे राजन्! ब्राह्मणोंकी सभामें विद्वानोंके द्वारा उदाहरणके रूपमें उस सत्यव्रतके कहे जाते हुए सम्पूर्ण आख्यानको मैंने विस्तारपूर्वक सुना था। सत्यव्रत नामवाले उस निरक्षर तथा महामूर्ख ब्राह्मणने वह ‘ऐ-ऐ’ शब्द एक कोलके मुखसे सुनकर स्वयं भी उसका उच्चारण किया। बिन्दुरहित ‘ऐं’ बीजका उच्चारण करनेसे भी वह श्रेष्ठ विद्वान् हो गया। ऐकारके उच्चारणमात्रसे भगवती प्रसन्न हो गयीं और दयार्द्र होकर उन परमेश्वरीने उसे कविराज बना दिया॥ ४५-४८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे गुणपरिज्ञानवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
देवीके बीजमन्त्रकी महिमाके प्रसंगमें सत्यव्रतका आख्यान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जनमेजय उवाच<br>कोऽसौ सत्यव्रतो नाम ब्राह्मणो द्विजसत्तमः।<br>कस्मिन्देशे समुत्पन्नः कीदृशश्च वदस्व मे॥ १<br><br>कथं तेन श्रुतः शब्दः कथमुच्चारितः पुनः।<br>सिद्धिश्च कीदृशी जाता तस्य विप्रस्य तत्क्षणात्॥ २<br><br>कथं तुष्टा भवानी सा सर्वज्ञा सर्वसंस्थिता।<br>विस्तरेण वदस्वाद्य कथामेतां मनोरमाम्॥ ३<br><br>सूत उवाच<br>इति पृष्टस्तदा राज्ञा व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच परमोदारं वचनं रसवच्छुचि॥ ४<br><br>व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>श्रुता मुनिसमाजेषु मया पूर्वं कुरुद्वह॥ ५ | जनमेजय बोले—वह द्विजश्रेष्ठ सत्यव्रत नामक ब्राह्मण कौन था, वह किस देशमें पैदा हुआ था तथा कैसा था? यह मुझे बताइये॥ १॥<br><br>उस ब्राह्मणने ‘ऐ’ शब्द कैसे सुना और फिर स्वयं भी कैसे उसका उच्चारण किया? उच्चारण करते ही उसी क्षण उस ब्राह्मणको कैसी सिद्धि प्राप्त हुई? सर्वत्र विराजमान रहनेवाली तथा सब कुछ जाननेवाली वे भवानी उसपर किस प्रकार प्रसन्न हो गयीं? अब आप यह मनोरम कथा विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये॥ २-३॥<br><br>सूतजी बोले—राजा जनमेजयके यह पूछनेपर सत्यवतीसुत व्यासजी सरस, पवित्र एवं परम उदार वचन कहने लगे॥ ४॥<br><br>व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, मैं वह पवित्र पौराणिक कथा कह रहा हूँ। हे कुरुनन्दन! पूर्वकालमें मुनियोंके समाजमें मैंने यह कथा सुनी थी॥ ५॥ |