देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 297, कुल 889 में से
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| २८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एकदाहं कुरुश्रेष्ठ कुर्वंस्तीर्थाटनं शुचि।<br>सम्प्राप्तो नैमिषारण्यं पावनं मुनिसेवितम्॥ ६<br>प्रणम्याहं मुनीन्सर्वान् स्थितस्तत्र वराश्रमे।<br>विधिपुत्रास्तु यत्रासञ्जीवन्मुक्ता महाव्रताः॥ ७ | हे कुरुश्रेष्ठ! एक बार तीर्थाटन करता हुआ मैं मुनियोंद्वारा सेवित पवित्र क्षेत्र नैमिषारण्यमें जा पहुँचा। वहाँ सभी मुनियोंको प्रणाम करके मैं एक उत्तम आश्रममें ठहर गया, जहाँ ब्रह्माके पुत्र महाव्रती एवं जीवन्मुक्त मुनि निवास कर रहे थे॥ ६-७॥ |
| कथाप्रसङ्ग एवासीत्तत्र विप्रसमागमे।<br>जमदग्निस्तु पप्रच्छ मुनीनेवं सभास्थितः॥ ८ | उस ब्राह्मणसमाजमें कथाका ही प्रसंग चल रहा था। सभामें उपस्थित महर्षि जमदग्निने सब मुनियोंसे यह पूछा—॥ ८॥ |
| जमदग्निरुवाच<br>सन्देहोऽस्ति महाभागा मम चेतसि तापसाः।<br>समाजेषु मुनीनां वै निःसन्देहो भवाम्यहम्॥ ९<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो मघवा वरुणोऽनलः।<br>कुबेरः पवनस्त्वष्टा सेनानीश्च गणाधिपः॥ १०<br>सूर्योऽश्विनौ भगः पूषा निशानाथो ग्रहास्तथा।<br>आराधनीयतमः कोऽत्र वाञ्छितार्थफलप्रदः॥ ११<br>सुखसेव्यश्च सततं चाशुतोषश्च मानदाः।<br>ब्रुवन्तु मुनयः शीघ्रं सर्वज्ञाः संशितव्रताः॥ १२ | जमदग्नि बोले— हे महाभाग तपस्वियो! मेरे मनमें एक शंका है। निश्चय ही इस मुनिसमाजमें मैं शंकारहित हो जाऊँगा। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, वरुण, अग्नि, कुबेर, वायु, विश्वकर्मा, कार्तिकेय, गणेश, सूर्य, दोनों अश्विनीकुमार, भग, पूषा, चन्द्रमा और सभी ग्रह—इन सबमें सबसे अधिक आराधनीय तथा अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला कौन है? उनमें कौन देवता सदा सेव्य और शीघ्र प्रसन्न होनेवाला है? हे मानद! हे सर्वज्ञ! हे व्रतधारी मुनिगण! आप हमें शीघ्र बतायें॥ ९–१२॥ |
| एवं प्रश्ने कृते तत्र लोमशो वाक्यमब्रवीत्।<br>जमदग्ने शृणुष्वैतद्यत्पृष्टं वै त्वयाधुना॥ १३<br>सेवनीयतमा शक्तिः सर्वेषां शुभमिच्छताम्।<br>परा प्रकृतिराद्या च सर्वगा सर्वदा शिवा॥ १४<br>देवानां जननी सैव ब्रह्मादीनां महात्मनाम्।<br>आदिप्रकृतिमूलं सा संसारपादपस्य वै॥ १५ | इस प्रकार जमदग्निके प्रश्न करनेपर लोमश-ऋषिने कहा—हे जमदग्ने! आपने इस समय जो पूछा है, उसे सुनिये। अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले सभी लोगोंके लिये वे एकमात्र महाशक्ति ही आराधनीय हैं। वे ही परा-प्रकृति आदिसस्वरूपा, सर्वगामिनी, सर्वदायिनी और कल्याणकारिणी हैं। वे ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओंकी जननी हैं और वे ही संसाररूपी वृक्षकी मूलरूपिणी आदिप्रकृति हैं॥ १३–१५॥ |
| स्मृता चोच्चारिता देवी ददाति किल वाञ्छितम्।<br>सर्वदैवार्द्रचित्ता सा वरदानाय सेविता॥ १६ | वे भगवती केवल नामका उच्चारण तथा स्मरण करते ही निश्चितरूपसे अभीष्ट फल प्रदान करती हैं। जो लोग उनकी उपासना करते हैं, उन्हें वरदान देनेके लिये वे सर्वदा दयालुचित्त रहती हैं॥ १६॥ |
| इतिहासं प्रवक्ष्यामि शृण्वन्तु मुनयः शुभम्।<br>अक्षरोच्चारणादेव यथा प्राप्तं द्विजेन वै॥ १७ | हे मुनिगण! उनके नामाक्षरके उच्चारण-मात्रसे ही एक ब्राह्मणने जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की थी, वह पवित्र वृत्तान्त मैं आपलोगोंसे कहता हूँ, सुनिये—॥ १७॥ |
| कोसलेषु द्विजः कश्चिद्देवदत्तेति विश्रुतः।<br>अनपत्यश्चकारेष्टिं पुत्राय विधिपूर्वकम्॥ १८ | कोसलदेशमें देवदत्त नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहता था। वह निःसन्तान था, इसलिये उसने पुत्रप्राप्तिके लिये विधिपूर्वक यज्ञ किया॥ १८॥ |