देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 298, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 298
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २८९
| तमसातीरमास्थाय कृत्वा मण्डपमुत्तमम्।<br>द्विजानाहूय वेदज्ञान्सत्रकर्मविशारदान्॥ १९<br>कृत्वा वेदीं विधानेन स्थापयित्वा विभावसून्।<br>पुत्रेष्टिं विधिवत्तत्र चकार द्विजसत्तमः॥ २० | तमसानदीके तटपर पहुँचकर उसने उत्तम यज्ञ-मण्डप बनवाया और वेदज्ञ तथा यज्ञकर्ममें निपुण ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके विधिपूर्वक यज्ञवेदी बनवाकर तथा अग्नि-स्थापन करके उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ आरम्भ कर दिया॥ १९-२०॥ |
|---|---|
| ब्रह्माणं कल्पयामास सुहोत्रं मुनिसत्तमम्।<br>अध्वर्युं याज्ञवल्क्यञ्च होतारं च बृहस्पतिम्॥ २१<br>प्रस्तोतारं तथा पैलमुद्गातारं च गोभिलम्।<br>सभ्यानन्यान्मुनीन्कृत्वा विधिवत्प्रददौ वसु॥ २२ | उसने उस यज्ञमें मुनिवर सुहोत्रको 'ब्रह्मा', याज्ञवल्क्यको 'अध्वर्यु' तथा बृहस्पतिको 'होता', पैलमुनिको 'प्रस्तोता' तथा गोभिलको 'उद्गाता' बनाया एवं अन्यान्य उपस्थित मुनियोंको यज्ञका सभासद् बनाकर उन्हें विधिवत् प्रचुर धन प्रदान किया॥ २१-२२॥ |
| उद्गाता सामगः श्रेष्ठः सप्तस्वरसमन्वितम्।<br>रथन्तरमगायत्तु स्वरितेन समन्वितम्॥ २३ | सामवेदका गान करनेवाले श्रेष्ठ उद्गाता गोभिलमुनि सातों स्वरोंसे युक्त तथा स्वरितसे समन्वित रथन्तर सामका गान करने लगे॥ २३॥ |
| तदास्य स्वरभङ्गोऽभूत्कृते श्वासे मुहुर्मुहुः।<br>देवदत्तश्चुकोपाशु गोभिलं प्रत्युवाच ह॥ २४<br>मूर्खोऽसि मुनिमुख्याद्य स्वरभङ्गस्त्वया कृतः।<br>काम्यकर्मणि सञ्जाते पुत्रार्थं यजतश्च मे॥ २५ | बार-बार श्वास लेनेके कारण गोभिलका स्वर भंग हो गया। तब देवदत्तको क्रोध आ गया और उसने तुरंत गोभिलमुनिसे कहा—हे मुनिमुख्य! तुम मूर्ख हो, तुमने आज मेरेद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये किये जाते हुए इस काम्यकर्ममें स्वरभंग कर दिया॥ २४-२५॥ |
| गोभिलस्तु तदोवाच देवदत्तं सुकोपितः।<br>मूर्खस्ते भविता पुत्रः शठः शब्दविवर्जितः॥ २६<br>सर्वप्राणिशरीरे तु श्वासोच्छ्वासः सुदुर्ग्रहः।<br>न मेऽत्र दूषणं किञ्चित्स्वरभङ्गे महामते॥ २७ | तब गोभिलमुनि अत्यन्त क्रोधित होकर देवदत्तसे कहने लगे—[इस यज्ञके फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाला] तुम्हारा पुत्र मूर्ख, शठ और गूँगा होगा। हे महामते! सभी प्राणियोंके शरीरमें श्वास आता-जाता रहता है। इसे रोक पाना बड़ा कठिन है। अतः ऐसी स्थितिमें स्वरभंग हो जानेमें मेरा कुछ भी दोष नहीं है॥ २६-२७॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य गोभिलस्य महात्मनः।<br>शापाद्भीतो देवदत्तस्तमुवाचातिदुःखितः॥ २८<br>कथं क्रुद्धोऽसि विप्रेन्द्र वृथा मयि निरागसि।<br>अक्रोधना हि मुनयो भवन्ति सुखदाः सदा॥ २९ | महात्मा गोभिलका यह वचन सुनकर शापसे भयभीत देवदत्तने अत्यन्त दुःखी होकर उनसे कहा—हे विप्रवर! आप मुझ निर्दोषपर व्यर्थ ही क्यों क्रुद्ध हैं? मुनिलोग तो सदा क्रोधरहित और सुखदायक होते हैं॥ २८-२९॥ |
| स्वल्पेऽपराधे विप्रेन्द्र कथं शप्तस्त्वया ह्यहम्।<br>अपुत्रोऽहं सुतप्तः प्राक् तापयुक्तः पुनः कृतः॥ ३०<br>मूर्खपुत्रादपुत्रत्वं वरं वेदविदो विदुः।<br>तथापि ब्राह्मणो मूर्खः सर्वेषां निन्द्य एव हि॥ ३१ | हे विप्र! थोड़ेसे अपराधपर आपने मुझे शाप क्यों दे दिया? पुत्रहीन होनेके कारण मैं तो पहलेसे ही बहुत दुःखी था, उसपर भी शाप देकर आपने मुझे और भी दुःखी कर दिया। वेदके विद्वानोंने कहा है कि मूर्ख पुत्रकी अपेक्षा पुत्रहीन रहना अच्छा है। उसपर भी मूर्ख ब्राह्मण तो सबके लिये निन्दनीय होता |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 10 A