देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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२९० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
| पशुवच्छूद्रवच्चैव न योग्यः सर्वकर्मसु।<br>किं करोमीह मूर्खेण पुत्रेण द्विजसत्तम॥ ३२ | है। वह पशु एवं शूद्रके समान सभी कार्योंमें अयोग्य माना जाता है। अतः हे विप्रवर! मूर्ख पुत्रको लेकर मैं क्या करूँगा?॥ ३०—३२॥ |
| यथा शूद्रस्तथा मूर्खो ब्राह्मणो नात्र संशयः।<br>न पूजार्हो न दानार्हो निन्द्यश्च सर्वकर्मसु॥ ३३ | मूर्ख ब्राह्मण शूद्रतुल्य होता है; इसमें सन्देह नहीं है; क्योंकि वह न तो पूजाके योग्य होता है और न दान लेनेका पात्र ही होता है। वह सब कार्योंमें निन्द्य होता है॥ ३३॥ |
| देशे वै वसमानश्च ब्राह्मणो वेदवर्जितः।<br>करदः शूद्रवच्चैव मन्तव्यः स च भूभुजा॥ ३४ | किसी देशमें रहता हुआ वेदशास्त्रविहीन ब्राह्मण कर देनेवाले शूद्रकी भाँति एक राजाके द्वारा समझा जाना चाहिये॥ ३४॥ |
| नासने पितृकार्येषु देवकार्येषु स द्विजः।<br>मूर्खः समुपवेश्यश्च कार्यस्य फलमिच्छता॥ ३५ | फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि देव तथा पितृकार्योंके अवसरपर उस मूर्ख ब्राह्मणको आसनपर न बैठाये॥ ३५॥ |
| राज्ञा शूद्रसमो ज्ञेयो न योज्यः सर्वकर्मसु।<br>कर्षकस्तु द्विजः कार्यों ब्राह्मणो वेदवर्जितः॥ ३६ | राजा भी वेदविहीन ब्राह्मणको शूद्रके समान समझे और उसे शुभ कार्योंमें नियुक्त न करे, बल्कि उसे कृषिके काममें लगा दे॥ ३६॥ |
| विना विप्रेण कर्तव्यं श्राद्धं कुशचटेन वै।<br>न तु विप्रेण मूर्खेण श्राद्धं कार्यं कदाचन॥ ३७ | ब्राह्मणके अभावमें कुशके चटसे स्वयं श्राद्धकार्य कर लेना ठीक है, किंतु मूर्ख ब्राह्मणसे कभी भी श्राद्धकार्य नहीं कराना चाहिये॥ ३७॥ |
| आहारादधिकं चान्नं न दातव्यमपण्डिते।<br>दाता नरकमाप्नोति ग्रहीता तु विशेषतः॥ ३८ | मूर्ख ब्राह्मणको भोजनसे अधिक अन्न नहीं देना चाहिये; क्योंकि देनेवाला व्यक्ति नरकमें जाता है और लेनेवाला तो विशेषरूपसे नरकगामी होता है॥ ३८॥ |
| धिग्राज्यं तस्य राज्ञो वै यस्य देशेऽबुधा जनाः।<br>पूज्यन्ते ब्राह्मणा मूर्खा दानमानादिकैरपि॥ ३९ | उस राजाके राज्यको धिक्कार है, जिसके राज्यमें मूर्खलोग निवास करते हैं और मूर्ख ब्राह्मण भी दान, सम्मान आदिसे पूजित होते हैं, साथ ही जहाँ |
| आसने पूजने दाने यत्र भेदो न चाण्वपि।<br>मूर्खपण्डितयोर्भेदो ज्ञातव्यो विबुधेन वै॥ ४० | मूर्ख और पण्डितके बीच आसन, पूजन और दानमें रंचमात्र भी भेद नहीं माना जाता। अतः विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह मूर्ख और पण्डितकी जानकारी अवश्य कर ले॥ ३९—४०॥ |
| मूर्खा यत्र सुगर्विष्ठा दानमानपरिग्रहैः।<br>तस्मिन्देशे न वस्तव्यं पण्डितेन कथञ्चन॥ ४१ | जहाँ दान, मान तथा परिग्रहसे मूर्खलोग महान् गौरवशाली माने जाते हैं, उस देशमें पण्डितजनको किसी प्रकार भी नहीं रहना चाहिये। दुर्जन व्यक्तियोंकी |
| असतामुपकाराय दुर्जनानां विभूतयः।<br>पिचुमन्दः फलाढ्योऽपि काकैरैवोपभुज्यते॥ ४२ | सम्पत्तियाँ दुर्जनोंके उपकारके लिये ही होती हैं। जैसे अधिक फलोंसे लदे हुए नीमके वृक्षका उपभोग केवल कौए ही करते हैं॥ ४१—४२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 10 B