देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 300, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 300
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २९१
| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
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| भुक्त्वान्नं वेदविद्विप्रो वेदाभ्यासं करोति वै।<br>क्रीडन्ति पूर्वजाः तस्य स्वर्गे प्रमुदिताः किल॥ ४३ | वेदज्ञ ब्राह्मण जिसका अन्न खाकर वेदाभ्यास करता है, उसके पूर्वज परम प्रसन्न होकर स्वर्गमें विहार करते हैं॥ ४३॥ |
| गोभिलातः किमुक्तं वै त्वया वेदविदुत्तम।<br>संसारे मूर्खपुत्रत्वं मरणादतिगर्हितम्॥ ४४ | अतएव हे वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ गोभिल मुने! आपने यह क्या कह दिया। इस संसारमें मूर्ख पुत्रका पिता होना तो मृत्युसे भी बढ़कर कष्टप्रद होता है॥ ४४॥ |
| कृपां कुरु महाभाग शापस्यानुग्रहं प्रति।<br>दीनोद्धारणशक्तोऽसि पतामि तव पादयोः॥ ४५ | हे महाभाग! अब आप इस शापसे मेरा उद्धार करनेकी कृपा कीजिये। आप दीनोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं। मैं आपके पैरोंपर पड़ता हूँ॥ ४५॥ |
| लोमश उवाच<br>इत्युक्त्वा देवदत्तस्तु पतितस्तस्य पादयोः।<br>स्तुवन्दीनहृदत्यर्थं कृपणः साश्रुलोचनः॥ ४६ | लोमश बोले— यह कहकर देवदत्त अत्यन्त दीनहृदय तथा असहाय होकर नेत्रोंमें आँसू भरकर स्तुति करता हुआ मुनिके पैरोंपर गिर पड़ा॥ ४६॥ |
| गोभिलस्तु तदा तत्र दृष्ट्वा तं दीनचेतसम्।<br>क्षणकोपा महान्तो वै पापिष्ठाः कल्पकोपनाः॥ ४७<br>जलं स्वभावतः शीतं पावकातपयोगतः।<br>उष्णं भवति तच्छीघ्रं तद्विना शिशिरं भवेत्॥ ४८<br>दयावान्गोभिलस्त्वाह देवदत्तं सुदुःखितम्।<br>मूर्खो भूत्वा सुतस्ते वै विद्वानपि भविष्यति॥ ४९ | तब उस दीनहृदय देवदत्तको देखकर गोभिल-मुनिको दया आ गयी। महात्मालोग क्षणभरके लिये ही कोप करते हैं, किंतु पापियोंका कोप कल्पपर्यन्त बना रहता है। जल स्वभावतः शीतल होता है। वही जल अग्नि तथा धूपके संयोगसे गर्म हो जाता है, किंतु पुनः उनका संयोग हटते ही वह शीघ्र शीतल हो जाता है। तब दयालु गोभिलमुनिने अत्यन्त दुःखित देवदत्तसे कहा—तुम्हारा पुत्र मूर्ख होकर भी बादमें विद्वान् हो जायगा॥ ४७-४९॥ |
| इति दत्तवरः सोऽथ मुदितोऽभूद् द्विजर्षभः।<br>इष्टिं समाप्य विप्रान्वै विससर्ज यथाविधि॥ ५० | इस प्रकार वर पा लेनेपर द्विजवर देवदत्त प्रसन्न हो गये। उन्होंने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त करके ब्राह्मणोंको विदा किया॥ ५०॥ |
| कालेन कियता तस्य भार्या रूपवती सती।<br>गर्भं दधार काले सा रोहिणी रोहिणीसमा॥ ५१ | कुछ समय बीतनेपर देवदत्तकी पतिव्रता तथा रूपवती भार्या रोहिणी जो रोहिणीके समान शुभ लक्षणोंवाली थी, उसने यथासमय गर्भधारण किया॥ ५१॥ |
| गर्भाधानादिकं कर्म चकार विधिवद् द्विजः।<br>पुंसवनविधानञ्च शृङ्गारकरणं तथा॥ ५२<br>सीमन्तोन्नयनञ्चैव कृतं वेदविधानतः।<br>ददौ दानानि मुदितो मत्वेष्टिं सफलां तथा॥ ५३ | देवदत्तने विधि-विधानके साथ गर्भाधान आदि कर्म किये। तत्पश्चात् पुंसवन, शृंगारकरण तथा सीमन्तोन्नयन-संस्कार वेद-विधिके साथ सम्पन्न किये। उस समय अपने यज्ञको सफल जानकर प्रसन्न मनसे उन्होंने बहुत-से दान दिये॥ ५२-५३॥ |
| शुभेऽह्नि सुषुवे पुत्रं रोहिणी रोहिणीयुते।<br>दिने लग्ने शुभेऽत्यर्थं जातकर्म चकार सः॥ ५४<br>पुत्रदर्शनकं कृत्वा नामकर्म चकार च।<br>उतथ्य इति पुत्रस्य कृतं नाम पुराविदा॥ ५५ | रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ दिनमें रोहिणीने पुत्रको जन्म दिया। देवदत्तने शुभ दिन और मुहूर्तमें नवजात शिशुका जातकर्म-संस्कार किया और पुत्रदर्शन करके यथासमय उसका नामकरण भी कर दिया। पूर्व बातोंको जाननेवाले देवदत्तने अपने पुत्रका नाम 'उतथ्य' रखा॥ ५४-५५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—10 C