भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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२९२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १०

| स चाष्टमे तथा वर्षे शुभे वै शुभवासरे।<br>तस्योपनयनं कर्म चकार विधिवत्पिता॥ ५६ | आठवें वर्षमें शुभ योग तथा शुभ दिनमें पिता देवदत्तने अपने उस पुत्रका विधिवत् उपनयन-संस्कार सम्पन्न किया॥ ५६॥ | | वेदमध्यापयामास गुरुस्तं वै व्रते स्थितम्।<br>नोच्चचार तथोतथ्यः संस्थितो मुग्धवत्तदा॥ ५७ | ब्रह्मचर्यव्रतमें स्थित उतथ्यको आचार्य वेद पढ़ाने लगे, किंतु वह एक शब्दका भी उच्चारण नहीं कर सका, मूढकी भाँति चुपचाप बैठा रहा॥ ५७॥ | | बहुधा पाठितः पित्रा न दधार मतिं शठः।<br>मूढवत्तिष्ठतेऽत्यर्थं तं शुशोच पिता तदा॥ ५८ | उसके पिताने उसे अनेक प्रकारसे पढ़ानेका प्रयत्न किया, किंतु उस मूर्खकी बुद्धि उस ओर प्रवृत्त नहीं होती थी। वह मूर्खके समान पड़ा रहता था। इससे उसके पिता देवदत्त उसके लिये बहुत चिन्तित हुए॥ ५८॥ | | एवं कुर्वन्सदाभ्यासं जातो द्वादशवार्षिकः।<br>न वेद विधिवत्कर्तुं सन्ध्यावन्दनकं विधिम्॥ ५९ | इस प्रकार निरन्तर वेदाभ्यास करते हुए वह बालक बारह वर्षका हो गया, किंतु भलीभाँति सन्ध्यावन्दन करनेतककी विधि भी न जान पाया॥ ५९॥ | | मूर्खोऽभूदिति लोकेषु गता वार्तातिविस्तरा।<br>ब्राह्मणेषु च सर्वेषु तापसेष्वितरेषु च॥ ६० | सभी ब्राह्मणों, तपस्वियों तथा अन्यान्य लोगोंमें यह बात विस्तृतरूपसे फैल गयी कि देवदत्तका पुत्र महामूर्ख निकल गया॥ ६०॥ | | जहास लोकस्तं विप्रं यत्र तत्र गतं वने।<br>पिता माता निनिन्दाथ मूर्खं तमतिभर्त्सयन्॥ ६१ | हे मुने! वह जहाँ कहीं जाता, लोग उसकी हँसी उड़ाते थे। यहाँतक कि उसके माता-पिता भी उस मूर्खको कोसते हुए उसकी निन्दा किया करते थे॥ ६१॥ | | निन्दितोऽथ जनैः कामं पितृभ्यामथ बान्धवैः।<br>वैराग्यमगमद्विप्रो जगाम वनमप्यसौ॥ ६२ | इस प्रकार जब सभी लोग, माता-पिता तथा बन्धु-बान्धव उसकी निन्दा करने लगे, तब उस ब्राह्मणबालकके मनमें वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह वनमें चला गया॥ ६२॥ | | अन्धो वरस्तथा पङ्गुर्न मूर्खस्तु वरः सुतः।<br>इत्युक्तोऽसौ पितृभ्यां वै विवेश काननं प्रति॥ ६३ | अन्धा या पंगु पुत्र ठीक है, किंतु मूर्ख पुत्र ठीक नहीं है—माता-पिताके ऐसा कहनेपर वह वनमें चला गया॥ ६३॥ | | गङ्गातीरे शुभे स्थाने कृत्वोटजमनुत्तमम्।<br>वन्यां वृत्तिं च संकल्प्य स्थितस्तत्र समाहितः॥ ६४ | गंगाके किनारे एक उत्तम स्थानपर सुन्दर पर्णकुटी बनाकर वह वनवासीका जीवन व्यतीत करते हुए एकनिष्ठ होकर वहीं रहने लगा॥ ६४॥ | | नियमं च परं कृत्वा नासत्यं प्रब्रवीम्यहम्।<br>स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये ब्रह्मचर्यव्रतो हि सः॥ ६५ | 'मैं असत्य नहीं बोलूँगा'—ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करके ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वह उसी सुन्दर आश्रममें रहने लगा॥ ६५॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सत्यव्रताख्यानवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 10 D