देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ११] तृतीय स्कन्ध २९३
अथैकादशोऽध्यायः
सत्यव्रतद्वारा बिन्दुरहित सारस्वत बीजमन्त्र ‘ऐ-ऐ’ का उच्चारण तथा उससे प्रसन्न होकर भगवतीका सत्यव्रतको समस्त विद्याएँ प्रदान करना
| लोमश उवाच | लोमश बोले— |
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| न वेदाध्ययनं किञ्चिज्जानाति न जपं तथा।<br>ध्यानं न देवतानाञ्च न चैवाराधनं तथा॥ १<br><br>नासनं वेद विप्रोऽसौ प्राणायामं तथा पुनः।<br>प्रत्याहारं तु नो वेद भूतशुद्धिञ्च कारणम्॥ २<br><br>न मन्त्रकीलकं जाप्यं गायत्रीञ्च न वेद सः।<br>शौचं स्नानविधिञ्चैव तथाचमनकं पुनः॥ ३<br><br>प्राणाग्निहोत्रं नो वेद बलिदानं न चातिथिम्।<br>न सन्ध्यां समिधो होमं विवेद च तथा मुनिः॥ ४ | [हे जमदग्ने!] वह उतथ्य वेदाध्ययन, जप, ध्यान तथा देवताओंकी आराधना आदि कुछ भी नहीं जानता था। वह ब्राह्मण आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार भी नहीं जानता था। वह भूतशुद्धि तथा कारणके विषयमें भी कुछ नहीं जानता था। वह कीलक मन्त्र, जप, गायत्री नहीं जानता था। उसे सम्यक् रूपसे शौच, स्नान-विधि तथा आचमनतकका ज्ञान नहीं था। वह ब्राह्मण प्राणाग्निहोत्र, वैश्वदेव, अतिथि-सत्कार, सन्ध्या-वन्दन, समिधा तथा होम आदिके विषयमें भी नहीं जानता था॥ १-४॥ |
| सोऽकरोत्प्रातरुत्थाय यत्किञ्चिद्दन्तधावनम्।<br>स्नानं च शूद्रवत्तत्र गङ्गायां मन्त्रवर्जितम्॥ ५<br><br>फलान्यादाय वन्यानि मध्याह्नेऽपि यदृच्छया।<br>भक्ष्याभक्ष्यपरिज्ञानं न जानाति शठस्तथा॥ ६ | प्रातःकाल उठकर वह किसी तरह सामान्य रूपसे दन्तधावन कर लेता था, तत्पश्चात् शूद्रकी भाँति बिना मन्त्र बोले ही गंगामें स्नान कर लिया करता था। दोपहरके समय वह अपनी इच्छासे वन्य फल लाकर उन्हें खा लिया करता था। उस मूर्खको भक्ष्य तथा अभक्ष्यका भी ज्ञान नहीं था॥ ५-६॥ |
| सत्यं ब्रूते स्थितस्तत्र नानृतं वदते पुनः।<br>जनैः सत्यतपा नाम कृतमस्य द्विजस्य वै॥ ७ | वहाँ निवास करता हुआ वह ब्राह्मण सदैव सत्यभाषण करता था और झूठ कभी नहीं बोलता था। [उसकी इस सत्यनिष्ठासे प्रभावित होकर] लोगोंने इस ब्राह्मणका नाम ‘सत्यतपा’ रख दिया॥ ७॥ |
| नाहितं कस्यचित्कुर्यान्न तथाविहितं क्वचित्।<br>सुखं स्वपिति तत्रैव निर्भयश्चिन्तयन्निति॥ ८<br><br>कदा मे मरणं भावि दुःखं जीवामि कानने।<br>जीवितं धिक्च मूर्खस्य तरसा मरणं ध्रुवम्॥ ९ | वह न तो कभी किसीका अहित करता था और न अविहित कार्य ही करता था। वह यही सोचता हुआ निडर होकर उस कुटीमें सोता था कि मेरी मृत्यु कब होगी? मैं इस वनमें दुःखपूर्वक जी रहा हूँ। मुझ मूर्खके जीवनको धिक्कार है, अतः अब मेरा शीघ्र मर जाना ही उत्तम है॥ ८-९॥ |
| दैवेनाहं कृतो मूर्खो नान्योऽत्र कारणं मम।<br>प्राप्य चैवोत्तमं जन्म वृथा जातं ममाधुना॥ १० | दैवने ही मुझे मूर्ख बनाया है, इसके अतिरिक्त कोई अन्य कारण मुझे जान नहीं पड़ता। उत्तम कुलमें जन्म-ग्रहण करके भी मैंने अपना जीवन व्यर्थ गँवा दिया॥ १०॥ |
| यथा वन्ध्या सुरूपा च यथा वा निष्फलो द्रुमः।<br>अदुग्धदोहा धेनुश्च तथाहं निष्फलः कृतः॥ ११ | जैसे रूपसम्पन्न वन्ध्या स्त्री, फलरहित वृक्ष तथा दूध न देनेवाली गाय—ये सब निरर्थक होते हैं, उसी प्रकार मैं भी निष्फल कर दिया गया हूँ॥ ११॥ |