भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 303

| २९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अर्थ
किन्नु निन्दाम्यहं दैवं नूनं कर्म ममेदृशम्।<br>न दत्तं पुस्तकं कृत्वा ब्राह्मणाय महात्मने॥ १२<br><br>न वै विद्या मया दत्ता पूर्वजन्मनि निर्मला।<br>तेनाहं कर्मयोगेन शठोऽस्मि च द्विजाधमः॥ १३<br><br>न च तीर्थे तपस्तप्तं सेविता न च साधवः।<br>न द्विजाः पूजिता द्रव्यैस्तेन जातोऽस्मि दुष्टधीः॥ १४मैं दैवको दोष क्यों दूँ? निश्चित रूपसे मेरा कर्म ही ऐसा था। मैंने पुस्तक लिखकर उसे किसी महात्मा ब्राह्मणको दान नहीं दिया। मैंने पूर्वजन्ममें उत्तम विद्याका भी दान नहीं किया, इसीलिये प्रारब्धवश इस जन्ममें मूर्ख और अधम ब्राह्मण हुआ हूँ। मैंने किसी तीर्थमें तप नहीं किया और न साधुओंकी सेवा ही की। धन-दानसे मैंने ब्राह्मणोंकी पूजा भी नहीं की। इसी कारण मैं ऐसा दुर्बुद्धि हुआ॥ १२-१४॥
वर्तन्ते मुनिपुत्राश्च वेदशास्त्रार्थपारगाः।<br>अहं समूढः सञ्जातो दैवयोगेन केनचित्॥ १५[मेरे साथके] बहुत-से मुनिकुमार वेदशास्त्रमें पारंगत हो गये, किंतु मैं न जाने किस दुर्विपाकसे महामूर्ख रह गया॥ १५॥
न जानामि तपस्तप्तुं किं करोमि सुसाधनम्।<br>मिथ्यायं मेऽत्र सङ्कल्पो न मे भाग्यं शुभं किल॥ १६मैं तप करना भी नहीं जानता, तब कौन-सी साधना करूँ? अब तो मेरा यह सब सोचना भी व्यर्थ है; क्योंकि मेरा भाग्य ही अच्छा नहीं है॥ १६॥
दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>वृथा श्रमकृतं कार्यं दैवाद्व्रवति सर्वथा॥ १७मैं भाग्यको ही सर्वोपरि मानता हूँ। निरर्थक पुरुषार्थको धिक्कार है; क्योंकि परिश्रमसे किया गया कार्य भी प्रारब्धवश सर्वथा विफल हो जाता है॥ १७॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च शक्राद्याः किल देवताः।<br>कालस्य वशगाः सर्वे कालो हि दुरतिक्रमः॥ १८ब्रह्मा, विष्णु शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता भी कालके वशमें रहते हैं। इसलिये काल सर्वथा अजेय है॥ १८॥
एवंविधान्वितर्कांस्तु कुर्वाणोऽहर्निशं द्विजः।<br>स्थितस्तत्राश्रमे तीरे जाह्नव्याः पावने स्थले॥ १९दिन-रात इस प्रकारके अनेक तर्क-वितर्क करता हुआ वह द्विज गंगाके तटपर स्थित उस पावन आश्रममें रहता था॥ १९॥
विरक्तः स तु सञ्जातः स्थितस्तत्राश्रमे द्विजः।<br>कालातिवाहनं शान्तश्चकार विजने वने॥ २०अब वह ब्राह्मण सर्वथा विरक्त हो गया और उस निर्जन वनमें स्थित आश्रममें रहता हुआ शान्तचित्त होकर समय बिताने लगा॥ २०॥
एवं स्थितस्य तु वने विमलोदके वै<br>वर्षाणि तत्र नवपञ्च गतानि कामम्।<br>नाराधनं न च जपं न विवेद मन्त्रं<br>कालातिवाहनमसौ कृतवान्वने वै॥ २१इस प्रकार निर्मल जलवाले उस वनमें रहते हुए उस ब्राह्मणके चौदह वर्ष बीत गये; पर उसने न कोई जप किया, न आराधना की और न कोई मन्त्र ही वह जान सका, केवल उसने वनमें रहकर कालक्षेप ही किया॥ २१॥
जानाति तस्य विततं व्रतमेव लोकः<br>सत्यं वदत्यपि मुनिः किल नामजातम्।<br>जातं यशश्च सकलेषु जनेषु कामं<br>सत्यव्रतोऽयमर्निशं न मृषाभिभाषी॥ २२वहाँके लोग केवल उसके इस प्रसिद्ध व्रतको जानते थे कि यह मुनि सदा सत्य बोलता है। अतः सब लोगोंमें उसका यह सुयश फैल गया कि यह सदा सत्यव्रती है और मिथ्याभाषी नहीं॥ २२॥