देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 304, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 304
| अ० ११ ] | तृतीय स्कन्ध | २९५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्रैकदा तु मृगयां रममाण एव<br>प्राप्तो निषादनिशठो धृतचापबाणः।<br>क्रीडन्वनेऽतिविपुले यमतुल्यदेहः<br>क्रूराकृतिर्हननकर्मणि चातिदक्षः॥ २३ | एक दिन आखेट करता हुआ एक महान् मूर्ख निषाद हाथोंमें धनुष-बाण लिये हुए उसी गहन वनमें आ पहुँचा। यमराजके समान शरीर तथा भीषण आकृतिवाला वह निषाद आखेट करते समय वधकार्यमें बड़ा ही कुशल जान पड़ता था॥ २३॥ |
| तेनातिकृष्टेन शरेण विद्धः<br>कोलः किरातेन धनुर्धरेण।<br>पलायमानो भयविह्वलश्च<br>मुनेः समीपं विद्रुतो जगाम॥ २४ | उस धनुर्धारी किरातने एक सूअरको लक्ष्य करके बड़े जोरसे खींचकर बाण चलाया। तब बाणसे बिंधा हुआ वह सूअर भयभीत होकर भागता हुआ उस मुनिके समीप जा पहुँचा॥ २४॥ |
| विकम्पमानो रुधिरार्द्रदेहो<br>यदा जगामाश्रममण्डलं वै।<br>कोलस्तदातीव दयार्द्रभावं<br>प्राप्तो मुनिस्तत्र समीक्ष्य दीनम्॥ २५<br><br>अग्रे व्रजन्तं रुधिरार्द्रदेहं<br>दृष्ट्वा मुनिः सूकरमाशु विद्धम्।<br>दयाभिवेशादतिकम्पमानः<br>सारस्वतं बीजमथोच्चचार॥ २६ | जब वह सूअर आश्रम-परिधिमें पहुँचा तो भयसे काँप रहा था और उसका शरीर रक्तसे लथपथ था। उस बेचारेको इस दशामें देखकर उस समय सत्यव्रतमुनि अत्यन्त दयार्द्रचित्त हो गये। रक्तसे सराबोर शरीरवाले उस आहत सूअरको अपने आगेसे जाते देखकर दयाके अतिरेकसे काँपते हुए मुनिने बिन्दुरहित सारस्वत बीजमन्त्र 'ऐ-ऐ' का उच्चारण किया॥ २५-२६॥ |
| अज्ञातपूर्वं च तथाश्रुतञ्च<br>दैवान्मुखे वै समुपागतञ्च।<br>न ज्ञातवान्बीजमदसौ विमूढो<br>ममज्ज शोके स मुनिर्महात्मा॥ २७ | उन्हें इसके पूर्व न तो इस मन्त्रका ज्ञान था और न उन्होंने कभी इसे सुना ही था; दैवयोगसे ही उनके मुखसे यह मन्त्र निकल पड़ा। अब भी उन विमूढ़को नहीं मालूम था कि यह सारस्वत बीजमन्त्र है। वे महात्मा सत्यव्रतमुनि तो उस घायल सूअरके शोकमें डूबे हुए थे॥ २७॥ |
| कोलः प्रविश्याश्रममण्डलं तद्<br>गतो निकुञ्जे प्रविलीय गूढम्।<br>अप्राप्तमार्गो दृढनिर्विण्णचेताः<br>प्रवेपमानः शरपीडितत्वात्॥ २८ | इसी बीच बाणकी पीड़ाके कारण अत्यन्त सन्तप्तचित्त तथा काँपते हुए शरीरवाला वह सूअर कोई दूसरा मार्ग न पाकर सत्यव्रतके आश्रममण्डलमें प्रविष्ट होकर कहीं झाड़ीमें छिप गया॥ २८॥ |
| ततः क्षणादाकर्णान्तकृष्टं<br>चापं दधानोऽतिकरालदेहः।<br>प्राप्तस्तदन्ते स च मृग्यमाणो<br>निषादराजः किल काल एव॥ २९ | थोड़ी देर बाद कानतक खींचे धनुषको धारण किये हुए दूसरे कालके समान विकराल देहवाला वह निषादराज भी उस सूअरको खोजता हुआ मुनिके निकट आ पहुँचा॥ २९॥ |
| दृष्ट्वा मुनिं तत्र कुशासने स्थितं<br>नाम्ना तु सत्यव्रतमद्वितीयम्।<br>व्याधः प्रणम्य प्रमुखे स्थितोऽसौ<br>पप्रच्छ कोलः क्व गतो द्विजेश॥ ३० | वहाँ कुशासनपर बैठे हुए अद्वितीय सत्यव्रतमुनिको देखकर वह व्याध प्रणाम करके उनके सामने खड़ा हो गया और पूछने लगा—हे द्विजराज! वह सूअर कहाँ गया?॥ ३०॥ |