भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 889 में से

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पृष्ठ 305
२९६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| जानामि तेऽहं सुव्रतं प्रसिद्धं<br>तेनाद्य पृच्छे मम बाणविद्धः।<br>क्षुधार्दितं मे सकलं कुटुम्बं<br>विभर्तुकामः किल आगतोऽस्मि॥ ३१ | मैं आपके सत्यभाषणके प्रसिद्ध व्रतको जानता हूँ इसलिये पूछता हूँ कि मेरे बाणसे घायल हुआ वह सूअर किधर गया ? मेरा सारा परिवार भूखसे पीड़ित है। मैं उनकी क्षुधा-शान्तिकी इच्छासे ही यहाँ आया हूँ॥ ३१॥ | | वृत्तिमैषा विहिता विधात्रा<br>नान्यास्ति विप्रेन्द्र ऋतं ब्रवीमि।<br>भर्तव्यमेवेह कुटुम्बमञ्जसा<br>केनाप्युपायेन शुभाशुभेन॥ ३२ | हे विप्रेन्द्र! विधाताने मेरी यही जीविका निर्धारित की है। इसके अतिरिक्त मेरा दूसरा कोई साधन नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ। अच्छे-बुरे किसी भी उपायसे अपने परिवारका पालन-पोषण तो निश्चितरूपसे करना ही चाहिये॥ ३२॥ | | सत्यं ब्रवीत्वद्य सत्यव्रतोऽसि<br>क्षुधातुरो वर्तते पोष्यवर्गः।<br>क्वासौ गतः सूकरो बाणविद्धः<br>पृच्छाम्यहं वाडव ब्रूहि तूर्णम्॥ ३३ | आप सत्यव्रत हैं, अतः मुझे अब सच-सच बता दीजिये। मेरा सारा कुटुम्ब भूखसे व्याकुल है। अतः हे विप्र! मैं आपसे पुनः पूछ रहा हूँ कि मेरे बाणसे घायल वह सूअर किधर गया है? आप मुझे शीघ्र बता दें॥ ३३॥ | | तेनेति पृष्टः स मुनिर्महात्मा<br>वितर्कमग्नः प्रबभूव कामम्।<br>सत्यव्रतं मेऽद्य भवेन्न भग्नं<br>न दृष्ट इत्युच्चरितेन किं वै॥ ३४ | उस व्याधके इस प्रकार बार-बार पूछनेपर महात्मा सत्यव्रतमुनि बड़े असमंजसमें पड़ गये और मनमें सोचने लगे कि अब मैं क्या करूँ? जिससे मेरा सत्यव्रत नष्ट न हो और मुझे यह भी न कहना पड़े कि ‘मैंने उसे नहीं देखा है’॥ ३४॥ | | गतोऽत्र कोलः शरविद्धदेहः<br>कथं ब्रवीम्यद्य मृषामृषा वा।<br>क्षुधार्दितोऽयं परिपृच्छतीव<br>दृष्ट्वा हनिष्यत्यपि सूकरं वै॥ ३५ | ‘तुम्हारे बाणसे घायल वह सूअर भाग गया।’ यह मिथ्या मैं कैसे कहूँ? और यदि इसे सच बता देता हूँ तो यह क्षुधासे आतुर होकर बार-बार सूअरको पूछ रहा है, अतः उसे खोजकर अवश्य ही मार डालेगा॥ ३५॥ | | सत्यं न सत्यं खलु यत्र हिंसा<br>दयान्वितं चानृतमेव सत्यम्।<br>हितं नराणां भवतीह येन<br>तदेव सत्यं न तथान्यथैव॥ ३६ | वह सत्य वास्तविक सत्य नहीं है जिससे किसी जीवकी हिंसा होती हो तथा वह असत्य भी सत्य ही है, जो दयासे युक्त हो। जिसके द्वारा प्राणियोंका कल्याण हो, वही सत्य है और जो इसके विपरीत है, वह असत्य है॥ ३६॥ | | हितं कथं स्यादुभयोर्विरुद्धयो-<br>स्तदुत्तरं किं न यथा मृषा वचः।<br>विचारयन्वाडव धर्मसङ्कटे<br>न प्राप वक्तुं वचनं यथोचितम्॥ ३७ | इन परस्पर विरोधी प्रसंगोंमें मेरा हित कैसे हो! मैं क्या उत्तर दूँ, जिससे मेरी बात झूठी न हो। [लोमशमुनिने कहा]—हे ब्राह्मण! ऐसा विचार करते हुए वे सत्यव्रतमुनि धर्मसंकटमें पड़ गये और व्याधको यथोचित उत्तर नहीं दे सके॥ ३७॥ |

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