देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 306, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 306
| अ० ११ ] | तृतीय स्कन्ध | २९७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| बाणाहतं वीक्ष्य दयान्वितञ्च<br>कोलं तदन्ते समुदाहृतं वचः।<br>तेन प्रसन्ना निजबीजतः शिवा<br>विद्यां दुरापां प्रददौ च तस्मै॥ ३८ | बाणसे आहत सूअरको देखकर मुनि सत्यव्रतके द्वारा जो करुणायुक्त ‘ऐ-ऐ’ शब्द उच्चरित हो गया था; उस अपने बीजमन्त्रसे प्रसन्न होकर भगवती शिवाने उन्हें दुर्लभ विद्या दे दी॥ ३८॥ |
| बीजोच्चारणतो देव्या विद्या प्रस्फुरिताखिला।<br>वाल्मीकेश्च यथा पूर्वं तथा स ह्यभवत्कविः॥ ३९ | देवीके बीजमन्त्रका उच्चारण करते ही मुनि सत्यव्रतके हृदयमें समस्त विद्याएँ प्रस्फुटित हो गयीं और वे उसी प्रकार कवि हो गये, जिस प्रकार पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकि॥ ३९॥ |
| तमुवाच द्विजो व्याधं सम्मुखस्थं धनुर्धरम्।<br>सत्यकामस्तु धर्मात्मा श्लोकमेकं दयापरः॥ ४०<br><br>या पश्यति न सा ब्रूते या ब्रूते सा न पश्यति।<br>अहो व्याध स्वकार्यार्थिन् किं पृच्छसि पुनः पुनः॥ ४१ | तत्पश्चात् सत्यकाम, धर्मात्मा तथा दयालु ब्राह्मण सत्यव्रतने अपने सामने खड़े उस धनुर्धारी व्याधसे एक श्लोक इस प्रकार कहा—जो (आँख) देखती है, वह बोलती नहीं है और जो (वाणी) बोलती है, वह देखती नहीं। अतः अपने ही प्रयोजनकी सिद्धिमें तत्पर हे व्याध! तुम बार-बार क्यों पूछ रहे हो?॥ ४०-४१॥ |
| इत्युक्तस्तु तदा तेन गतोऽसौ पशुहा पुनः।<br>निराशः सूकरे तस्मिन्परावृत्तो निजालये॥ ४२ | उस मुनिके ऐसा कहनेपर पशुओंका वध करनेवाला वह व्याध उस सूअरसे निराश होकर अपने घर लौट गया॥ ४२॥ |
| ब्राह्मणस्तु कविर्जातः प्राचेतस इवापरः।<br>प्रसिद्धः सर्वलोकेषु नाम्ना सत्यव्रतो द्विजः॥ ४३ | इस प्रकार वे सत्यव्रत नामक ब्राह्मण दूसरे वाल्मीकिके समान कवि हो गये और समस्त लोकोंमें प्रख्यात हो गये॥ ४३॥ |
| सारस्वतं ततो बीजं जजाप विधिपूर्वकम्।<br>पण्डितश्चातिविख्यातो द्विजोऽसौ धरणीतले॥ ४४ | तत्पश्चात् उन सत्यव्रतब्राह्मणने सारस्वत बीजमन्त्रका विधिपूर्वक जप किया और वे पृथ्वीतलपर पण्डितके रूपमें अत्यधिक विख्यात हो गये॥ ४४॥ |
| प्रतिपर्वसु गायन्ति ब्राह्मणा यद्यशः सदा।<br>आख्यानं चातिविस्तीर्णं स्तुवन्ति मुनयः किल॥ ४५ | अब ब्राह्मणलोग प्रत्येक पर्वपर उनका यशोगान करने लगे और मुनिगण उनके विस्तृत आख्यानकी निरन्तर प्रशंसा करने लगे॥ ४५॥ |
| तच्छ्रुत्वा सदनं तस्य समागत्य तदाश्रमे।<br>येन त्यक्तः पुरा तेन गृहं नीतोऽतिमानितः॥ ४६ | उनका महान् यश सुनकर उनके परिवारके वे ही लोग, जिन्होंने उन्हें पहले त्याग दिया था, उनके आश्रममें आकर विशेष आदर-सम्मानके साथ उन्हें घर ले गये॥ ४६॥ |
| तस्माद्राजन्सदा सेव्या पूजनीया च भक्तितः।<br>आदिशक्तिः परा देवी जगतां कारणं हि सा॥ ४७ | अतः हे राजन्! उन आदिशक्ति तथा जगत्की कारणस्वरूपा परादेवीकी सदा भक्तिपूर्वक सेवा तथा पूजा करनी चाहिये॥ ४७॥ |
| तस्या यज्ञं महाराज कुरु वेदविधानतः।<br>सर्वकामप्रदं नित्यं निश्चयं कथितं पुरा॥ ४८ | हे महाराज! आप मेरे द्वारा पहले ही बताये गये सर्वकामप्रदायक अम्बामखका अनुष्ठान वैदिक विधिके अनुसार नित्य नियमपूर्वक कीजिये॥ ४८॥ |