भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 307
२९८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| स्मृता सम्पूजिता भक्त्या ध्याता चोच्चारिता स्तुता।<br>ददाति वाञ्छितार्थान्कामदा तेन कीर्त्यते ॥ ४९ | वे भगवती स्मरण करने, पूजा करने, श्रद्धापूर्वक ध्यान करने, नामोच्चारण करने तथा स्तुति करनेसे [परम प्रसन्न होकर] सभी इच्छित मनोरथोंको पूर्ण कर देती हैं। इसीलिये वे 'कामदा' कही जाती हैं॥ ४९॥ | | अनुमानमिदं राजन् कर्तव्यं सर्वथा बुधैः।<br>दृष्ट्वा रोगयुतान्दीनान्क्षुधितान्निर्धनाञ्छठान् ॥ ५०<br><br>जनानार्तांस्तथा मूर्खान्पीडितान्वैरिविः सदा।<br>दासानाज्ञाकराञ्क्षुद्रान्विकलान्विह्वलानथ ॥ ५१<br><br>अतृप्तान्भोजने भोगे सदार्तानजितेन्द्रियान्।<br>तृष्णाधिकानशक्तांश्च सदाधिपरिपीडितान् ॥ ५२<br><br>तथा विभवसम्पन्नान् पुत्रपौत्रविवर्धनान्।<br>पुष्टदेहांश्च सम्भोगैः संयुतान्वेदवादिनः ॥ ५३<br><br>राजलक्ष्म्या युताञ्छूरान्वशीकृतजनानथ।<br>स्वजनैरवियुक्तांश्च सर्वलक्षणलक्षितान् ॥ ५४<br><br>व्यतिरेकान्वयाभ्यां च विचेतव्यं विचक्षणैः।<br>एभिर्न पूजिता देवी सर्वार्थफलदा शिवा ॥ ५५<br><br>समाराधिता च तथा नृभिरेभिः सदाम्बिका।<br>यतोऽमी सुखिनः सर्वे संसारेऽस्मिन्न संशयः ॥ ५६ | हे राजन्! रुग्ण, दीन, क्षुधापीडित, धनहीन, शठ, दुःखी, मूर्ख, शत्रुओंसे सदा प्रताड़ित, आज्ञाके अधीन रहनेवाले दास, क्षुद्र, विकल, अशान्त, भोजन तथा भोगसे अतृप्त, सदा कष्टमें रहनेवाले, अजितेन्द्रिय, अधिक तृष्णायुक्त, शक्तिहीन तथा सदैव मानसिक रोगोंसे पीड़ित रहनेवाले प्राणियोंको देखकर बुद्धिमानोंको यह अनुमान कर लेना चाहिये कि इन लोगोंने भगवतीकी सम्यक् उपासना नहीं की है। इसी प्रकार वैभवयुक्त, पुत्र-पौत्रादिसे सम्पन्न, हृष्ट-पुष्ट शरीरवाले, भोगयुक्त, वेदवादी, राजलक्ष्मीसे सम्पन्न, पराक्रमी, लोगोंको अपने वशमें रखनेवाले, स्वजनोंके साथ आनन्दपूर्वक रहनेवाले और समस्त उत्तम लक्षणोंसे युक्त लोगोंको देखकर यह अनुमान कर लेना चाहिये कि इन लोगोंने भगवतीकी उपासना की है। इस प्रकार पण्डितजनोंको व्यतिरेक-अन्वयके क्रमसे यह जान लेना चाहिये कि उपर्युक्त [दीन आदि] लोगोंने सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली शिवाकी पूजा नहीं की है तथा उपर्युक्त [विभवयुक्त] लोगोंने भगवती अम्बाकी सर्वदा विधिपूर्वक आराधना की है, जिससे ये सभी लोग इस संसारमें सुखी हैं। इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है॥ ५०—५६॥ | | व्यास उवाच<br>इति राजञ्छ्रुतं तत्र मया मुनिसमागमे।<br>लोमशस्य मुखात्कामं देवीमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ ५७ | व्यासजी बोले— हे राजन्! मैंने नैमिषारण्यतीर्थमें मुनियोंके समाजमें लोमशऋषिके मुखसे भगवतीका यह अत्युत्तम माहात्म्य सुना॥ ५७॥ | | इति सञ्चिन्त्य राजेन्द्र कर्तव्यं च सदार्चनम्।<br>भक्त्या परमया देव्याः प्रीत्या च पुरुषर्षभ ॥ ५८ | हे राजेन्द्र! हे पुरुषश्रेष्ठ! इसपर सम्यक् विचार करके परम भक्तिके साथ प्रेमपूर्वक भगवतीकी सदा अर्चना करनी चाहिये॥ ५८॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
सत्यव्रताख्यानवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
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