भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 889 में से

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पृष्ठ 308
अ० १२ ]तृतीय स्कन्ध२९९

अथ द्वादशोऽध्यायः

सात्त्विक, राजस और तामस यज्ञोंका वर्णन; मानसयज्ञकी महिमा और व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको देवी-यज्ञके लिये प्रेरित करना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राजोवाच<br>वद यज्ञविधिं सम्यग्देव्यास्तस्याः समन्ततः।<br>श्रुत्वा करोम्यहं स्वामिन् यथाशक्ति ह्यतन्द्रितः॥ १राजा बोले—हे स्वामिन्! अब आप उन देवीके यज्ञकी विधिका पूर्णरूपसे सम्यक् वर्णन कीजिये। उसे सुनकर मैं यथाशक्ति प्रमादरहित होकर वह यज्ञ करूँगा॥ १॥
पूजाविधिं च मन्त्रांश्च होमद्रव्यमसंशयम्।<br>ब्राह्मणाः कतिसंख्याश्च दक्षिणाश्च तथा पुनः॥ २उस यज्ञकी पूजा-विधि, उसके मन्त्र, होमद्रव्य, उसमें कितने ब्राह्मण हों और दक्षिणा—इन सभीके बारेमें निःसंकोच बताइये॥ २॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्या यज्ञं विधानतः।<br>त्रिविधं तु सदा ज्ञेयं विधिदृष्टेन कर्मणा॥ ३<br><br>सात्त्विकं राजसं चैव तामसं च तथापरम्।<br>मुनीनां सात्त्विकं प्रोक्तं नृपाणां राजसं स्मृतम्॥ ४<br><br>तामसं राक्षसानां वै ज्ञानिनां तु गुणोज्झितम्।<br>विमुक्तानां ज्ञानमयं विस्तरात्प्रब्रवीमि ते॥ ५व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, अब मैं आपसे देवीके यज्ञका विधानपूर्वक वर्णन करूँगा। अनुष्ठानमें विहित कर्मके अनुसार यह यज्ञ सात्त्विक, राजस तथा तामस भेदसे सदा तीन प्रकारका समझा जाना चाहिये। मुनियोंके लिये सात्त्विक यज्ञ, राजाओंके लिये राजस यज्ञ, राक्षसोंके लिये तामस यज्ञ, ज्ञानियोंके लिये निर्गुण यज्ञ और वैराग्ययुक्त लोगोंके लिये ज्ञानमय यज्ञ कहा गया है; मैं आपसे विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ॥ ३–५॥
देशः कालस्तथा द्रव्यं मन्त्राश्च ब्राह्मणास्तथा।<br>श्रद्धा च सात्त्विकी यत्र तं यज्ञं सात्त्विकं विदुः॥ ६जिस यज्ञमें देश, काल, द्रव्य, मन्त्र, ब्राह्मण तथा श्रद्धा—ये सब सात्त्विक हों; उसे सात्त्विक यज्ञ कहा गया है॥ ६॥
द्रव्यशुद्धिः क्रियाशुद्धिर्मन्त्रशुद्धिश्च भूमिप।<br>भवेद्यदि तदा पूर्णं फलं भवति नान्यथा॥ ७हे भूपाल! यदि द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और मन्त्रशुद्धिके साथ यज्ञ सम्पन्न होता है, तब पूर्ण फलकी प्राप्ति अवश्य होती है; अन्यथा नहीं होती॥ ७॥
अन्यायोपार्जितेनैव द्रव्येण सुकृतं कृतम्।<br>न कीर्तिरिह लोके च परलोके न तत्फलम्॥ ८अन्यायके द्वारा उपार्जित किये गये धनसे यदि पुण्य-कार्य किया जाता है तो इस लोकमें यशकी प्राप्ति नहीं होती और परलोकमें उसका कोई फल भी नहीं मिलता है, इसलिये न्यायपूर्वक उपार्जित धनसे ही सदा पुण्यकार्य करना चाहिये। ऐसा कार्य इस लोकमें कीर्ति तथा परलोकमें आनन्दके लिये होता है॥ ८-९॥
तस्मान्न्यायार्जितेनैव कर्तव्यं सुकृतं सदा।<br>यशसे परलोकाय भवत्येव सुखाय च॥ ९
प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र पाण्डवैस्तु मखः कृतः।<br>राजसूयः क्रतुवरः समाप्तवरदक्षिणः॥ १०हे राजेन्द्र! आपके सामने इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। पाण्डवोंने यज्ञोंमें उत्तम राजसूय-यज्ञ किया था, जिसकी समाप्तिपर उन्होंने श्रेष्ठ दक्षिणा भी दी थी,