देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| २८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एकदाहं कुरुश्रेष्ठ कुर्वंस्तीर्थाटनं शुचि।<br>सम्प्राप्तो नैमिषारण्यं पावनं मुनिसेवितम्॥ ६<br>प्रणम्याहं मुनीन्सर्वान् स्थितस्तत्र वराश्रमे।<br>विधिपुत्रास्तु यत्रासञ्जीवन्मुक्ता महाव्रताः॥ ७ | हे कुरुश्रेष्ठ! एक बार तीर्थाटन करता हुआ मैं मुनियोंद्वारा सेवित पवित्र क्षेत्र नैमिषारण्यमें जा पहुँचा। वहाँ सभी मुनियोंको प्रणाम करके मैं एक उत्तम आश्रममें ठहर गया, जहाँ ब्रह्माके पुत्र महाव्रती एवं जीवन्मुक्त मुनि निवास कर रहे थे॥ ६-७॥ |
| कथाप्रसङ्ग एवासीत्तत्र विप्रसमागमे।<br>जमदग्निस्तु पप्रच्छ मुनीनेवं सभास्थितः॥ ८ | उस ब्राह्मणसमाजमें कथाका ही प्रसंग चल रहा था। सभामें उपस्थित महर्षि जमदग्निने सब मुनियोंसे यह पूछा—॥ ८॥ |
| जमदग्निरुवाच<br>सन्देहोऽस्ति महाभागा मम चेतसि तापसाः।<br>समाजेषु मुनीनां वै निःसन्देहो भवाम्यहम्॥ ९<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो मघवा वरुणोऽनलः।<br>कुबेरः पवनस्त्वष्टा सेनानीश्च गणाधिपः॥ १०<br>सूर्योऽश्विनौ भगः पूषा निशानाथो ग्रहास्तथा।<br>आराधनीयतमः कोऽत्र वाञ्छितार्थफलप्रदः॥ ११<br>सुखसेव्यश्च सततं चाशुतोषश्च मानदाः।<br>ब्रुवन्तु मुनयः शीघ्रं सर्वज्ञाः संशितव्रताः॥ १२ | जमदग्नि बोले— हे महाभाग तपस्वियो! मेरे मनमें एक शंका है। निश्चय ही इस मुनिसमाजमें मैं शंकारहित हो जाऊँगा। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, वरुण, अग्नि, कुबेर, वायु, विश्वकर्मा, कार्तिकेय, गणेश, सूर्य, दोनों अश्विनीकुमार, भग, पूषा, चन्द्रमा और सभी ग्रह—इन सबमें सबसे अधिक आराधनीय तथा अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला कौन है? उनमें कौन देवता सदा सेव्य और शीघ्र प्रसन्न होनेवाला है? हे मानद! हे सर्वज्ञ! हे व्रतधारी मुनिगण! आप हमें शीघ्र बतायें॥ ९–१२॥ |
| एवं प्रश्ने कृते तत्र लोमशो वाक्यमब्रवीत्।<br>जमदग्ने शृणुष्वैतद्यत्पृष्टं वै त्वयाधुना॥ १३<br>सेवनीयतमा शक्तिः सर्वेषां शुभमिच्छताम्।<br>परा प्रकृतिराद्या च सर्वगा सर्वदा शिवा॥ १४<br>देवानां जननी सैव ब्रह्मादीनां महात्मनाम्।<br>आदिप्रकृतिमूलं सा संसारपादपस्य वै॥ १५ | इस प्रकार जमदग्निके प्रश्न करनेपर लोमश-ऋषिने कहा—हे जमदग्ने! आपने इस समय जो पूछा है, उसे सुनिये। अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले सभी लोगोंके लिये वे एकमात्र महाशक्ति ही आराधनीय हैं। वे ही परा-प्रकृति आदिसस्वरूपा, सर्वगामिनी, सर्वदायिनी और कल्याणकारिणी हैं। वे ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओंकी जननी हैं और वे ही संसाररूपी वृक्षकी मूलरूपिणी आदिप्रकृति हैं॥ १३–१५॥ |
| स्मृता चोच्चारिता देवी ददाति किल वाञ्छितम्।<br>सर्वदैवार्द्रचित्ता सा वरदानाय सेविता॥ १६ | वे भगवती केवल नामका उच्चारण तथा स्मरण करते ही निश्चितरूपसे अभीष्ट फल प्रदान करती हैं। जो लोग उनकी उपासना करते हैं, उन्हें वरदान देनेके लिये वे सर्वदा दयालुचित्त रहती हैं॥ १६॥ |
| इतिहासं प्रवक्ष्यामि शृण्वन्तु मुनयः शुभम्।<br>अक्षरोच्चारणादेव यथा प्राप्तं द्विजेन वै॥ १७ | हे मुनिगण! उनके नामाक्षरके उच्चारण-मात्रसे ही एक ब्राह्मणने जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की थी, वह पवित्र वृत्तान्त मैं आपलोगोंसे कहता हूँ, सुनिये—॥ १७॥ |
| कोसलेषु द्विजः कश्चिद्देवदत्तेति विश्रुतः।<br>अनपत्यश्चकारेष्टिं पुत्राय विधिपूर्वकम्॥ १८ | कोसलदेशमें देवदत्त नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहता था। वह निःसन्तान था, इसलिये उसने पुत्रप्राप्तिके लिये विधिपूर्वक यज्ञ किया॥ १८॥ |
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २८९
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २८९
| तमसातीरमास्थाय कृत्वा मण्डपमुत्तमम्।<br>द्विजानाहूय वेदज्ञान्सत्रकर्मविशारदान्॥ १९<br>कृत्वा वेदीं विधानेन स्थापयित्वा विभावसून्।<br>पुत्रेष्टिं विधिवत्तत्र चकार द्विजसत्तमः॥ २० | तमसानदीके तटपर पहुँचकर उसने उत्तम यज्ञ-मण्डप बनवाया और वेदज्ञ तथा यज्ञकर्ममें निपुण ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके विधिपूर्वक यज्ञवेदी बनवाकर तथा अग्नि-स्थापन करके उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ आरम्भ कर दिया॥ १९-२०॥ |
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| ब्रह्माणं कल्पयामास सुहोत्रं मुनिसत्तमम्।<br>अध्वर्युं याज्ञवल्क्यञ्च होतारं च बृहस्पतिम्॥ २१<br>प्रस्तोतारं तथा पैलमुद्गातारं च गोभिलम्।<br>सभ्यानन्यान्मुनीन्कृत्वा विधिवत्प्रददौ वसु॥ २२ | उसने उस यज्ञमें मुनिवर सुहोत्रको 'ब्रह्मा', याज्ञवल्क्यको 'अध्वर्यु' तथा बृहस्पतिको 'होता', पैलमुनिको 'प्रस्तोता' तथा गोभिलको 'उद्गाता' बनाया एवं अन्यान्य उपस्थित मुनियोंको यज्ञका सभासद् बनाकर उन्हें विधिवत् प्रचुर धन प्रदान किया॥ २१-२२॥ |
| उद्गाता सामगः श्रेष्ठः सप्तस्वरसमन्वितम्।<br>रथन्तरमगायत्तु स्वरितेन समन्वितम्॥ २३ | सामवेदका गान करनेवाले श्रेष्ठ उद्गाता गोभिलमुनि सातों स्वरोंसे युक्त तथा स्वरितसे समन्वित रथन्तर सामका गान करने लगे॥ २३॥ |
| तदास्य स्वरभङ्गोऽभूत्कृते श्वासे मुहुर्मुहुः।<br>देवदत्तश्चुकोपाशु गोभिलं प्रत्युवाच ह॥ २४<br>मूर्खोऽसि मुनिमुख्याद्य स्वरभङ्गस्त्वया कृतः।<br>काम्यकर्मणि सञ्जाते पुत्रार्थं यजतश्च मे॥ २५ | बार-बार श्वास लेनेके कारण गोभिलका स्वर भंग हो गया। तब देवदत्तको क्रोध आ गया और उसने तुरंत गोभिलमुनिसे कहा—हे मुनिमुख्य! तुम मूर्ख हो, तुमने आज मेरेद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये किये जाते हुए इस काम्यकर्ममें स्वरभंग कर दिया॥ २४-२५॥ |
| गोभिलस्तु तदोवाच देवदत्तं सुकोपितः।<br>मूर्खस्ते भविता पुत्रः शठः शब्दविवर्जितः॥ २६<br>सर्वप्राणिशरीरे तु श्वासोच्छ्वासः सुदुर्ग्रहः।<br>न मेऽत्र दूषणं किञ्चित्स्वरभङ्गे महामते॥ २७ | तब गोभिलमुनि अत्यन्त क्रोधित होकर देवदत्तसे कहने लगे—[इस यज्ञके फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाला] तुम्हारा पुत्र मूर्ख, शठ और गूँगा होगा। हे महामते! सभी प्राणियोंके शरीरमें श्वास आता-जाता रहता है। इसे रोक पाना बड़ा कठिन है। अतः ऐसी स्थितिमें स्वरभंग हो जानेमें मेरा कुछ भी दोष नहीं है॥ २६-२७॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य गोभिलस्य महात्मनः।<br>शापाद्भीतो देवदत्तस्तमुवाचातिदुःखितः॥ २८<br>कथं क्रुद्धोऽसि विप्रेन्द्र वृथा मयि निरागसि।<br>अक्रोधना हि मुनयो भवन्ति सुखदाः सदा॥ २९ | महात्मा गोभिलका यह वचन सुनकर शापसे भयभीत देवदत्तने अत्यन्त दुःखी होकर उनसे कहा—हे विप्रवर! आप मुझ निर्दोषपर व्यर्थ ही क्यों क्रुद्ध हैं? मुनिलोग तो सदा क्रोधरहित और सुखदायक होते हैं॥ २८-२९॥ |
| स्वल्पेऽपराधे विप्रेन्द्र कथं शप्तस्त्वया ह्यहम्।<br>अपुत्रोऽहं सुतप्तः प्राक् तापयुक्तः पुनः कृतः॥ ३०<br>मूर्खपुत्रादपुत्रत्वं वरं वेदविदो विदुः।<br>तथापि ब्राह्मणो मूर्खः सर्वेषां निन्द्य एव हि॥ ३१ | हे विप्र! थोड़ेसे अपराधपर आपने मुझे शाप क्यों दे दिया? पुत्रहीन होनेके कारण मैं तो पहलेसे ही बहुत दुःखी था, उसपर भी शाप देकर आपने मुझे और भी दुःखी कर दिया। वेदके विद्वानोंने कहा है कि मूर्ख पुत्रकी अपेक्षा पुत्रहीन रहना अच्छा है। उसपर भी मूर्ख ब्राह्मण तो सबके लिये निन्दनीय होता |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 10 A
२९० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
| पशुवच्छूद्रवच्चैव न योग्यः सर्वकर्मसु।<br>किं करोमीह मूर्खेण पुत्रेण द्विजसत्तम॥ ३२ | है। वह पशु एवं शूद्रके समान सभी कार्योंमें अयोग्य माना जाता है। अतः हे विप्रवर! मूर्ख पुत्रको लेकर मैं क्या करूँगा?॥ ३०—३२॥ |
| यथा शूद्रस्तथा मूर्खो ब्राह्मणो नात्र संशयः।<br>न पूजार्हो न दानार्हो निन्द्यश्च सर्वकर्मसु॥ ३३ | मूर्ख ब्राह्मण शूद्रतुल्य होता है; इसमें सन्देह नहीं है; क्योंकि वह न तो पूजाके योग्य होता है और न दान लेनेका पात्र ही होता है। वह सब कार्योंमें निन्द्य होता है॥ ३३॥ |
| देशे वै वसमानश्च ब्राह्मणो वेदवर्जितः।<br>करदः शूद्रवच्चैव मन्तव्यः स च भूभुजा॥ ३४ | किसी देशमें रहता हुआ वेदशास्त्रविहीन ब्राह्मण कर देनेवाले शूद्रकी भाँति एक राजाके द्वारा समझा जाना चाहिये॥ ३४॥ |
| नासने पितृकार्येषु देवकार्येषु स द्विजः।<br>मूर्खः समुपवेश्यश्च कार्यस्य फलमिच्छता॥ ३५ | फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि देव तथा पितृकार्योंके अवसरपर उस मूर्ख ब्राह्मणको आसनपर न बैठाये॥ ३५॥ |
| राज्ञा शूद्रसमो ज्ञेयो न योज्यः सर्वकर्मसु।<br>कर्षकस्तु द्विजः कार्यों ब्राह्मणो वेदवर्जितः॥ ३६ | राजा भी वेदविहीन ब्राह्मणको शूद्रके समान समझे और उसे शुभ कार्योंमें नियुक्त न करे, बल्कि उसे कृषिके काममें लगा दे॥ ३६॥ |
| विना विप्रेण कर्तव्यं श्राद्धं कुशचटेन वै।<br>न तु विप्रेण मूर्खेण श्राद्धं कार्यं कदाचन॥ ३७ | ब्राह्मणके अभावमें कुशके चटसे स्वयं श्राद्धकार्य कर लेना ठीक है, किंतु मूर्ख ब्राह्मणसे कभी भी श्राद्धकार्य नहीं कराना चाहिये॥ ३७॥ |
| आहारादधिकं चान्नं न दातव्यमपण्डिते।<br>दाता नरकमाप्नोति ग्रहीता तु विशेषतः॥ ३८ | मूर्ख ब्राह्मणको भोजनसे अधिक अन्न नहीं देना चाहिये; क्योंकि देनेवाला व्यक्ति नरकमें जाता है और लेनेवाला तो विशेषरूपसे नरकगामी होता है॥ ३८॥ |
| धिग्राज्यं तस्य राज्ञो वै यस्य देशेऽबुधा जनाः।<br>पूज्यन्ते ब्राह्मणा मूर्खा दानमानादिकैरपि॥ ३९ | उस राजाके राज्यको धिक्कार है, जिसके राज्यमें मूर्खलोग निवास करते हैं और मूर्ख ब्राह्मण भी दान, सम्मान आदिसे पूजित होते हैं, साथ ही जहाँ |
| आसने पूजने दाने यत्र भेदो न चाण्वपि।<br>मूर्खपण्डितयोर्भेदो ज्ञातव्यो विबुधेन वै॥ ४० | मूर्ख और पण्डितके बीच आसन, पूजन और दानमें रंचमात्र भी भेद नहीं माना जाता। अतः विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह मूर्ख और पण्डितकी जानकारी अवश्य कर ले॥ ३९—४०॥ |
| मूर्खा यत्र सुगर्विष्ठा दानमानपरिग्रहैः।<br>तस्मिन्देशे न वस्तव्यं पण्डितेन कथञ्चन॥ ४१ | जहाँ दान, मान तथा परिग्रहसे मूर्खलोग महान् गौरवशाली माने जाते हैं, उस देशमें पण्डितजनको किसी प्रकार भी नहीं रहना चाहिये। दुर्जन व्यक्तियोंकी |
| असतामुपकाराय दुर्जनानां विभूतयः।<br>पिचुमन्दः फलाढ्योऽपि काकैरैवोपभुज्यते॥ ४२ | सम्पत्तियाँ दुर्जनोंके उपकारके लिये ही होती हैं। जैसे अधिक फलोंसे लदे हुए नीमके वृक्षका उपभोग केवल कौए ही करते हैं॥ ४१—४२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 10 B
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २९१
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २९१
| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
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| भुक्त्वान्नं वेदविद्विप्रो वेदाभ्यासं करोति वै।<br>क्रीडन्ति पूर्वजाः तस्य स्वर्गे प्रमुदिताः किल॥ ४३ | वेदज्ञ ब्राह्मण जिसका अन्न खाकर वेदाभ्यास करता है, उसके पूर्वज परम प्रसन्न होकर स्वर्गमें विहार करते हैं॥ ४३॥ |
| गोभिलातः किमुक्तं वै त्वया वेदविदुत्तम।<br>संसारे मूर्खपुत्रत्वं मरणादतिगर्हितम्॥ ४४ | अतएव हे वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ गोभिल मुने! आपने यह क्या कह दिया। इस संसारमें मूर्ख पुत्रका पिता होना तो मृत्युसे भी बढ़कर कष्टप्रद होता है॥ ४४॥ |
| कृपां कुरु महाभाग शापस्यानुग्रहं प्रति।<br>दीनोद्धारणशक्तोऽसि पतामि तव पादयोः॥ ४५ | हे महाभाग! अब आप इस शापसे मेरा उद्धार करनेकी कृपा कीजिये। आप दीनोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं। मैं आपके पैरोंपर पड़ता हूँ॥ ४५॥ |
| लोमश उवाच<br>इत्युक्त्वा देवदत्तस्तु पतितस्तस्य पादयोः।<br>स्तुवन्दीनहृदत्यर्थं कृपणः साश्रुलोचनः॥ ४६ | लोमश बोले— यह कहकर देवदत्त अत्यन्त दीनहृदय तथा असहाय होकर नेत्रोंमें आँसू भरकर स्तुति करता हुआ मुनिके पैरोंपर गिर पड़ा॥ ४६॥ |
| गोभिलस्तु तदा तत्र दृष्ट्वा तं दीनचेतसम्।<br>क्षणकोपा महान्तो वै पापिष्ठाः कल्पकोपनाः॥ ४७<br>जलं स्वभावतः शीतं पावकातपयोगतः।<br>उष्णं भवति तच्छीघ्रं तद्विना शिशिरं भवेत्॥ ४८<br>दयावान्गोभिलस्त्वाह देवदत्तं सुदुःखितम्।<br>मूर्खो भूत्वा सुतस्ते वै विद्वानपि भविष्यति॥ ४९ | तब उस दीनहृदय देवदत्तको देखकर गोभिल-मुनिको दया आ गयी। महात्मालोग क्षणभरके लिये ही कोप करते हैं, किंतु पापियोंका कोप कल्पपर्यन्त बना रहता है। जल स्वभावतः शीतल होता है। वही जल अग्नि तथा धूपके संयोगसे गर्म हो जाता है, किंतु पुनः उनका संयोग हटते ही वह शीघ्र शीतल हो जाता है। तब दयालु गोभिलमुनिने अत्यन्त दुःखित देवदत्तसे कहा—तुम्हारा पुत्र मूर्ख होकर भी बादमें विद्वान् हो जायगा॥ ४७-४९॥ |
| इति दत्तवरः सोऽथ मुदितोऽभूद् द्विजर्षभः।<br>इष्टिं समाप्य विप्रान्वै विससर्ज यथाविधि॥ ५० | इस प्रकार वर पा लेनेपर द्विजवर देवदत्त प्रसन्न हो गये। उन्होंने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त करके ब्राह्मणोंको विदा किया॥ ५०॥ |
| कालेन कियता तस्य भार्या रूपवती सती।<br>गर्भं दधार काले सा रोहिणी रोहिणीसमा॥ ५१ | कुछ समय बीतनेपर देवदत्तकी पतिव्रता तथा रूपवती भार्या रोहिणी जो रोहिणीके समान शुभ लक्षणोंवाली थी, उसने यथासमय गर्भधारण किया॥ ५१॥ |
| गर्भाधानादिकं कर्म चकार विधिवद् द्विजः।<br>पुंसवनविधानञ्च शृङ्गारकरणं तथा॥ ५२<br>सीमन्तोन्नयनञ्चैव कृतं वेदविधानतः।<br>ददौ दानानि मुदितो मत्वेष्टिं सफलां तथा॥ ५३ | देवदत्तने विधि-विधानके साथ गर्भाधान आदि कर्म किये। तत्पश्चात् पुंसवन, शृंगारकरण तथा सीमन्तोन्नयन-संस्कार वेद-विधिके साथ सम्पन्न किये। उस समय अपने यज्ञको सफल जानकर प्रसन्न मनसे उन्होंने बहुत-से दान दिये॥ ५२-५३॥ |
| शुभेऽह्नि सुषुवे पुत्रं रोहिणी रोहिणीयुते।<br>दिने लग्ने शुभेऽत्यर्थं जातकर्म चकार सः॥ ५४<br>पुत्रदर्शनकं कृत्वा नामकर्म चकार च।<br>उतथ्य इति पुत्रस्य कृतं नाम पुराविदा॥ ५५ | रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ दिनमें रोहिणीने पुत्रको जन्म दिया। देवदत्तने शुभ दिन और मुहूर्तमें नवजात शिशुका जातकर्म-संस्कार किया और पुत्रदर्शन करके यथासमय उसका नामकरण भी कर दिया। पूर्व बातोंको जाननेवाले देवदत्तने अपने पुत्रका नाम 'उतथ्य' रखा॥ ५४-५५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—10 C
| २९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| स चाष्टमे तथा वर्षे शुभे वै शुभवासरे।<br>तस्योपनयनं कर्म चकार विधिवत्पिता॥ ५६ | आठवें वर्षमें शुभ योग तथा शुभ दिनमें पिता देवदत्तने अपने उस पुत्रका विधिवत् उपनयन-संस्कार सम्पन्न किया॥ ५६॥ | | वेदमध्यापयामास गुरुस्तं वै व्रते स्थितम्।<br>नोच्चचार तथोतथ्यः संस्थितो मुग्धवत्तदा॥ ५७ | ब्रह्मचर्यव्रतमें स्थित उतथ्यको आचार्य वेद पढ़ाने लगे, किंतु वह एक शब्दका भी उच्चारण नहीं कर सका, मूढकी भाँति चुपचाप बैठा रहा॥ ५७॥ | | बहुधा पाठितः पित्रा न दधार मतिं शठः।<br>मूढवत्तिष्ठतेऽत्यर्थं तं शुशोच पिता तदा॥ ५८ | उसके पिताने उसे अनेक प्रकारसे पढ़ानेका प्रयत्न किया, किंतु उस मूर्खकी बुद्धि उस ओर प्रवृत्त नहीं होती थी। वह मूर्खके समान पड़ा रहता था। इससे उसके पिता देवदत्त उसके लिये बहुत चिन्तित हुए॥ ५८॥ | | एवं कुर्वन्सदाभ्यासं जातो द्वादशवार्षिकः।<br>न वेद विधिवत्कर्तुं सन्ध्यावन्दनकं विधिम्॥ ५९ | इस प्रकार निरन्तर वेदाभ्यास करते हुए वह बालक बारह वर्षका हो गया, किंतु भलीभाँति सन्ध्यावन्दन करनेतककी विधि भी न जान पाया॥ ५९॥ | | मूर्खोऽभूदिति लोकेषु गता वार्तातिविस्तरा।<br>ब्राह्मणेषु च सर्वेषु तापसेष्वितरेषु च॥ ६० | सभी ब्राह्मणों, तपस्वियों तथा अन्यान्य लोगोंमें यह बात विस्तृतरूपसे फैल गयी कि देवदत्तका पुत्र महामूर्ख निकल गया॥ ६०॥ | | जहास लोकस्तं विप्रं यत्र तत्र गतं वने।<br>पिता माता निनिन्दाथ मूर्खं तमतिभर्त्सयन्॥ ६१ | हे मुने! वह जहाँ कहीं जाता, लोग उसकी हँसी उड़ाते थे। यहाँतक कि उसके माता-पिता भी उस मूर्खको कोसते हुए उसकी निन्दा किया करते थे॥ ६१॥ | | निन्दितोऽथ जनैः कामं पितृभ्यामथ बान्धवैः।<br>वैराग्यमगमद्विप्रो जगाम वनमप्यसौ॥ ६२ | इस प्रकार जब सभी लोग, माता-पिता तथा बन्धु-बान्धव उसकी निन्दा करने लगे, तब उस ब्राह्मणबालकके मनमें वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह वनमें चला गया॥ ६२॥ | | अन्धो वरस्तथा पङ्गुर्न मूर्खस्तु वरः सुतः।<br>इत्युक्तोऽसौ पितृभ्यां वै विवेश काननं प्रति॥ ६३ | अन्धा या पंगु पुत्र ठीक है, किंतु मूर्ख पुत्र ठीक नहीं है—माता-पिताके ऐसा कहनेपर वह वनमें चला गया॥ ६३॥ | | गङ्गातीरे शुभे स्थाने कृत्वोटजमनुत्तमम्।<br>वन्यां वृत्तिं च संकल्प्य स्थितस्तत्र समाहितः॥ ६४ | गंगाके किनारे एक उत्तम स्थानपर सुन्दर पर्णकुटी बनाकर वह वनवासीका जीवन व्यतीत करते हुए एकनिष्ठ होकर वहीं रहने लगा॥ ६४॥ | | नियमं च परं कृत्वा नासत्यं प्रब्रवीम्यहम्।<br>स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये ब्रह्मचर्यव्रतो हि सः॥ ६५ | 'मैं असत्य नहीं बोलूँगा'—ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करके ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वह उसी सुन्दर आश्रममें रहने लगा॥ ६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सत्यव्रताख्यानवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 10 D
अ० ११] तृतीय स्कन्ध २९३
अ० ११] तृतीय स्कन्ध २९३
अथैकादशोऽध्यायः
सत्यव्रतद्वारा बिन्दुरहित सारस्वत बीजमन्त्र ‘ऐ-ऐ’ का उच्चारण तथा उससे प्रसन्न होकर भगवतीका सत्यव्रतको समस्त विद्याएँ प्रदान करना
| लोमश उवाच | लोमश बोले— |
|---|---|
| न वेदाध्ययनं किञ्चिज्जानाति न जपं तथा।<br>ध्यानं न देवतानाञ्च न चैवाराधनं तथा॥ १<br><br>नासनं वेद विप्रोऽसौ प्राणायामं तथा पुनः।<br>प्रत्याहारं तु नो वेद भूतशुद्धिञ्च कारणम्॥ २<br><br>न मन्त्रकीलकं जाप्यं गायत्रीञ्च न वेद सः।<br>शौचं स्नानविधिञ्चैव तथाचमनकं पुनः॥ ३<br><br>प्राणाग्निहोत्रं नो वेद बलिदानं न चातिथिम्।<br>न सन्ध्यां समिधो होमं विवेद च तथा मुनिः॥ ४ | [हे जमदग्ने!] वह उतथ्य वेदाध्ययन, जप, ध्यान तथा देवताओंकी आराधना आदि कुछ भी नहीं जानता था। वह ब्राह्मण आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार भी नहीं जानता था। वह भूतशुद्धि तथा कारणके विषयमें भी कुछ नहीं जानता था। वह कीलक मन्त्र, जप, गायत्री नहीं जानता था। उसे सम्यक् रूपसे शौच, स्नान-विधि तथा आचमनतकका ज्ञान नहीं था। वह ब्राह्मण प्राणाग्निहोत्र, वैश्वदेव, अतिथि-सत्कार, सन्ध्या-वन्दन, समिधा तथा होम आदिके विषयमें भी नहीं जानता था॥ १-४॥ |
| सोऽकरोत्प्रातरुत्थाय यत्किञ्चिद्दन्तधावनम्।<br>स्नानं च शूद्रवत्तत्र गङ्गायां मन्त्रवर्जितम्॥ ५<br><br>फलान्यादाय वन्यानि मध्याह्नेऽपि यदृच्छया।<br>भक्ष्याभक्ष्यपरिज्ञानं न जानाति शठस्तथा॥ ६ | प्रातःकाल उठकर वह किसी तरह सामान्य रूपसे दन्तधावन कर लेता था, तत्पश्चात् शूद्रकी भाँति बिना मन्त्र बोले ही गंगामें स्नान कर लिया करता था। दोपहरके समय वह अपनी इच्छासे वन्य फल लाकर उन्हें खा लिया करता था। उस मूर्खको भक्ष्य तथा अभक्ष्यका भी ज्ञान नहीं था॥ ५-६॥ |
| सत्यं ब्रूते स्थितस्तत्र नानृतं वदते पुनः।<br>जनैः सत्यतपा नाम कृतमस्य द्विजस्य वै॥ ७ | वहाँ निवास करता हुआ वह ब्राह्मण सदैव सत्यभाषण करता था और झूठ कभी नहीं बोलता था। [उसकी इस सत्यनिष्ठासे प्रभावित होकर] लोगोंने इस ब्राह्मणका नाम ‘सत्यतपा’ रख दिया॥ ७॥ |
| नाहितं कस्यचित्कुर्यान्न तथाविहितं क्वचित्।<br>सुखं स्वपिति तत्रैव निर्भयश्चिन्तयन्निति॥ ८<br><br>कदा मे मरणं भावि दुःखं जीवामि कानने।<br>जीवितं धिक्च मूर्खस्य तरसा मरणं ध्रुवम्॥ ९ | वह न तो कभी किसीका अहित करता था और न अविहित कार्य ही करता था। वह यही सोचता हुआ निडर होकर उस कुटीमें सोता था कि मेरी मृत्यु कब होगी? मैं इस वनमें दुःखपूर्वक जी रहा हूँ। मुझ मूर्खके जीवनको धिक्कार है, अतः अब मेरा शीघ्र मर जाना ही उत्तम है॥ ८-९॥ |
| दैवेनाहं कृतो मूर्खो नान्योऽत्र कारणं मम।<br>प्राप्य चैवोत्तमं जन्म वृथा जातं ममाधुना॥ १० | दैवने ही मुझे मूर्ख बनाया है, इसके अतिरिक्त कोई अन्य कारण मुझे जान नहीं पड़ता। उत्तम कुलमें जन्म-ग्रहण करके भी मैंने अपना जीवन व्यर्थ गँवा दिया॥ १०॥ |
| यथा वन्ध्या सुरूपा च यथा वा निष्फलो द्रुमः।<br>अदुग्धदोहा धेनुश्च तथाहं निष्फलः कृतः॥ ११ | जैसे रूपसम्पन्न वन्ध्या स्त्री, फलरहित वृक्ष तथा दूध न देनेवाली गाय—ये सब निरर्थक होते हैं, उसी प्रकार मैं भी निष्फल कर दिया गया हूँ॥ ११॥ |
| २९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अर्थ |
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| किन्नु निन्दाम्यहं दैवं नूनं कर्म ममेदृशम्।<br>न दत्तं पुस्तकं कृत्वा ब्राह्मणाय महात्मने॥ १२<br><br>न वै विद्या मया दत्ता पूर्वजन्मनि निर्मला।<br>तेनाहं कर्मयोगेन शठोऽस्मि च द्विजाधमः॥ १३<br><br>न च तीर्थे तपस्तप्तं सेविता न च साधवः।<br>न द्विजाः पूजिता द्रव्यैस्तेन जातोऽस्मि दुष्टधीः॥ १४ | मैं दैवको दोष क्यों दूँ? निश्चित रूपसे मेरा कर्म ही ऐसा था। मैंने पुस्तक लिखकर उसे किसी महात्मा ब्राह्मणको दान नहीं दिया। मैंने पूर्वजन्ममें उत्तम विद्याका भी दान नहीं किया, इसीलिये प्रारब्धवश इस जन्ममें मूर्ख और अधम ब्राह्मण हुआ हूँ। मैंने किसी तीर्थमें तप नहीं किया और न साधुओंकी सेवा ही की। धन-दानसे मैंने ब्राह्मणोंकी पूजा भी नहीं की। इसी कारण मैं ऐसा दुर्बुद्धि हुआ॥ १२-१४॥ |
| वर्तन्ते मुनिपुत्राश्च वेदशास्त्रार्थपारगाः।<br>अहं समूढः सञ्जातो दैवयोगेन केनचित्॥ १५ | [मेरे साथके] बहुत-से मुनिकुमार वेदशास्त्रमें पारंगत हो गये, किंतु मैं न जाने किस दुर्विपाकसे महामूर्ख रह गया॥ १५॥ |
| न जानामि तपस्तप्तुं किं करोमि सुसाधनम्।<br>मिथ्यायं मेऽत्र सङ्कल्पो न मे भाग्यं शुभं किल॥ १६ | मैं तप करना भी नहीं जानता, तब कौन-सी साधना करूँ? अब तो मेरा यह सब सोचना भी व्यर्थ है; क्योंकि मेरा भाग्य ही अच्छा नहीं है॥ १६॥ |
| दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>वृथा श्रमकृतं कार्यं दैवाद्व्रवति सर्वथा॥ १७ | मैं भाग्यको ही सर्वोपरि मानता हूँ। निरर्थक पुरुषार्थको धिक्कार है; क्योंकि परिश्रमसे किया गया कार्य भी प्रारब्धवश सर्वथा विफल हो जाता है॥ १७॥ |
| ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च शक्राद्याः किल देवताः।<br>कालस्य वशगाः सर्वे कालो हि दुरतिक्रमः॥ १८ | ब्रह्मा, विष्णु शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता भी कालके वशमें रहते हैं। इसलिये काल सर्वथा अजेय है॥ १८॥ |
| एवंविधान्वितर्कांस्तु कुर्वाणोऽहर्निशं द्विजः।<br>स्थितस्तत्राश्रमे तीरे जाह्नव्याः पावने स्थले॥ १९ | दिन-रात इस प्रकारके अनेक तर्क-वितर्क करता हुआ वह द्विज गंगाके तटपर स्थित उस पावन आश्रममें रहता था॥ १९॥ |
| विरक्तः स तु सञ्जातः स्थितस्तत्राश्रमे द्विजः।<br>कालातिवाहनं शान्तश्चकार विजने वने॥ २० | अब वह ब्राह्मण सर्वथा विरक्त हो गया और उस निर्जन वनमें स्थित आश्रममें रहता हुआ शान्तचित्त होकर समय बिताने लगा॥ २०॥ |
| एवं स्थितस्य तु वने विमलोदके वै<br>वर्षाणि तत्र नवपञ्च गतानि कामम्।<br>नाराधनं न च जपं न विवेद मन्त्रं<br>कालातिवाहनमसौ कृतवान्वने वै॥ २१ | इस प्रकार निर्मल जलवाले उस वनमें रहते हुए उस ब्राह्मणके चौदह वर्ष बीत गये; पर उसने न कोई जप किया, न आराधना की और न कोई मन्त्र ही वह जान सका, केवल उसने वनमें रहकर कालक्षेप ही किया॥ २१॥ |
| जानाति तस्य विततं व्रतमेव लोकः<br>सत्यं वदत्यपि मुनिः किल नामजातम्।<br>जातं यशश्च सकलेषु जनेषु कामं<br>सत्यव्रतोऽयमर्निशं न मृषाभिभाषी॥ २२ | वहाँके लोग केवल उसके इस प्रसिद्ध व्रतको जानते थे कि यह मुनि सदा सत्य बोलता है। अतः सब लोगोंमें उसका यह सुयश फैल गया कि यह सदा सत्यव्रती है और मिथ्याभाषी नहीं॥ २२॥ |
| अ० ११ ] | तृतीय स्कन्ध | २९५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्रैकदा तु मृगयां रममाण एव<br>प्राप्तो निषादनिशठो धृतचापबाणः।<br>क्रीडन्वनेऽतिविपुले यमतुल्यदेहः<br>क्रूराकृतिर्हननकर्मणि चातिदक्षः॥ २३ | एक दिन आखेट करता हुआ एक महान् मूर्ख निषाद हाथोंमें धनुष-बाण लिये हुए उसी गहन वनमें आ पहुँचा। यमराजके समान शरीर तथा भीषण आकृतिवाला वह निषाद आखेट करते समय वधकार्यमें बड़ा ही कुशल जान पड़ता था॥ २३॥ |
| तेनातिकृष्टेन शरेण विद्धः<br>कोलः किरातेन धनुर्धरेण।<br>पलायमानो भयविह्वलश्च<br>मुनेः समीपं विद्रुतो जगाम॥ २४ | उस धनुर्धारी किरातने एक सूअरको लक्ष्य करके बड़े जोरसे खींचकर बाण चलाया। तब बाणसे बिंधा हुआ वह सूअर भयभीत होकर भागता हुआ उस मुनिके समीप जा पहुँचा॥ २४॥ |
| विकम्पमानो रुधिरार्द्रदेहो<br>यदा जगामाश्रममण्डलं वै।<br>कोलस्तदातीव दयार्द्रभावं<br>प्राप्तो मुनिस्तत्र समीक्ष्य दीनम्॥ २५<br><br>अग्रे व्रजन्तं रुधिरार्द्रदेहं<br>दृष्ट्वा मुनिः सूकरमाशु विद्धम्।<br>दयाभिवेशादतिकम्पमानः<br>सारस्वतं बीजमथोच्चचार॥ २६ | जब वह सूअर आश्रम-परिधिमें पहुँचा तो भयसे काँप रहा था और उसका शरीर रक्तसे लथपथ था। उस बेचारेको इस दशामें देखकर उस समय सत्यव्रतमुनि अत्यन्त दयार्द्रचित्त हो गये। रक्तसे सराबोर शरीरवाले उस आहत सूअरको अपने आगेसे जाते देखकर दयाके अतिरेकसे काँपते हुए मुनिने बिन्दुरहित सारस्वत बीजमन्त्र 'ऐ-ऐ' का उच्चारण किया॥ २५-२६॥ |
| अज्ञातपूर्वं च तथाश्रुतञ्च<br>दैवान्मुखे वै समुपागतञ्च।<br>न ज्ञातवान्बीजमदसौ विमूढो<br>ममज्ज शोके स मुनिर्महात्मा॥ २७ | उन्हें इसके पूर्व न तो इस मन्त्रका ज्ञान था और न उन्होंने कभी इसे सुना ही था; दैवयोगसे ही उनके मुखसे यह मन्त्र निकल पड़ा। अब भी उन विमूढ़को नहीं मालूम था कि यह सारस्वत बीजमन्त्र है। वे महात्मा सत्यव्रतमुनि तो उस घायल सूअरके शोकमें डूबे हुए थे॥ २७॥ |
| कोलः प्रविश्याश्रममण्डलं तद्<br>गतो निकुञ्जे प्रविलीय गूढम्।<br>अप्राप्तमार्गो दृढनिर्विण्णचेताः<br>प्रवेपमानः शरपीडितत्वात्॥ २८ | इसी बीच बाणकी पीड़ाके कारण अत्यन्त सन्तप्तचित्त तथा काँपते हुए शरीरवाला वह सूअर कोई दूसरा मार्ग न पाकर सत्यव्रतके आश्रममण्डलमें प्रविष्ट होकर कहीं झाड़ीमें छिप गया॥ २८॥ |
| ततः क्षणादाकर्णान्तकृष्टं<br>चापं दधानोऽतिकरालदेहः।<br>प्राप्तस्तदन्ते स च मृग्यमाणो<br>निषादराजः किल काल एव॥ २९ | थोड़ी देर बाद कानतक खींचे धनुषको धारण किये हुए दूसरे कालके समान विकराल देहवाला वह निषादराज भी उस सूअरको खोजता हुआ मुनिके निकट आ पहुँचा॥ २९॥ |
| दृष्ट्वा मुनिं तत्र कुशासने स्थितं<br>नाम्ना तु सत्यव्रतमद्वितीयम्।<br>व्याधः प्रणम्य प्रमुखे स्थितोऽसौ<br>पप्रच्छ कोलः क्व गतो द्विजेश॥ ३० | वहाँ कुशासनपर बैठे हुए अद्वितीय सत्यव्रतमुनिको देखकर वह व्याध प्रणाम करके उनके सामने खड़ा हो गया और पूछने लगा—हे द्विजराज! वह सूअर कहाँ गया?॥ ३०॥ |
| २९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| जानामि तेऽहं सुव्रतं प्रसिद्धं<br>तेनाद्य पृच्छे मम बाणविद्धः।<br>क्षुधार्दितं मे सकलं कुटुम्बं<br>विभर्तुकामः किल आगतोऽस्मि॥ ३१ | मैं आपके सत्यभाषणके प्रसिद्ध व्रतको जानता हूँ इसलिये पूछता हूँ कि मेरे बाणसे घायल हुआ वह सूअर किधर गया ? मेरा सारा परिवार भूखसे पीड़ित है। मैं उनकी क्षुधा-शान्तिकी इच्छासे ही यहाँ आया हूँ॥ ३१॥ | | वृत्तिमैषा विहिता विधात्रा<br>नान्यास्ति विप्रेन्द्र ऋतं ब्रवीमि।<br>भर्तव्यमेवेह कुटुम्बमञ्जसा<br>केनाप्युपायेन शुभाशुभेन॥ ३२ | हे विप्रेन्द्र! विधाताने मेरी यही जीविका निर्धारित की है। इसके अतिरिक्त मेरा दूसरा कोई साधन नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ। अच्छे-बुरे किसी भी उपायसे अपने परिवारका पालन-पोषण तो निश्चितरूपसे करना ही चाहिये॥ ३२॥ | | सत्यं ब्रवीत्वद्य सत्यव्रतोऽसि<br>क्षुधातुरो वर्तते पोष्यवर्गः।<br>क्वासौ गतः सूकरो बाणविद्धः<br>पृच्छाम्यहं वाडव ब्रूहि तूर्णम्॥ ३३ | आप सत्यव्रत हैं, अतः मुझे अब सच-सच बता दीजिये। मेरा सारा कुटुम्ब भूखसे व्याकुल है। अतः हे विप्र! मैं आपसे पुनः पूछ रहा हूँ कि मेरे बाणसे घायल वह सूअर किधर गया है? आप मुझे शीघ्र बता दें॥ ३३॥ | | तेनेति पृष्टः स मुनिर्महात्मा<br>वितर्कमग्नः प्रबभूव कामम्।<br>सत्यव्रतं मेऽद्य भवेन्न भग्नं<br>न दृष्ट इत्युच्चरितेन किं वै॥ ३४ | उस व्याधके इस प्रकार बार-बार पूछनेपर महात्मा सत्यव्रतमुनि बड़े असमंजसमें पड़ गये और मनमें सोचने लगे कि अब मैं क्या करूँ? जिससे मेरा सत्यव्रत नष्ट न हो और मुझे यह भी न कहना पड़े कि ‘मैंने उसे नहीं देखा है’॥ ३४॥ | | गतोऽत्र कोलः शरविद्धदेहः<br>कथं ब्रवीम्यद्य मृषामृषा वा।<br>क्षुधार्दितोऽयं परिपृच्छतीव<br>दृष्ट्वा हनिष्यत्यपि सूकरं वै॥ ३५ | ‘तुम्हारे बाणसे घायल वह सूअर भाग गया।’ यह मिथ्या मैं कैसे कहूँ? और यदि इसे सच बता देता हूँ तो यह क्षुधासे आतुर होकर बार-बार सूअरको पूछ रहा है, अतः उसे खोजकर अवश्य ही मार डालेगा॥ ३५॥ | | सत्यं न सत्यं खलु यत्र हिंसा<br>दयान्वितं चानृतमेव सत्यम्।<br>हितं नराणां भवतीह येन<br>तदेव सत्यं न तथान्यथैव॥ ३६ | वह सत्य वास्तविक सत्य नहीं है जिससे किसी जीवकी हिंसा होती हो तथा वह असत्य भी सत्य ही है, जो दयासे युक्त हो। जिसके द्वारा प्राणियोंका कल्याण हो, वही सत्य है और जो इसके विपरीत है, वह असत्य है॥ ३६॥ | | हितं कथं स्यादुभयोर्विरुद्धयो-<br>स्तदुत्तरं किं न यथा मृषा वचः।<br>विचारयन्वाडव धर्मसङ्कटे<br>न प्राप वक्तुं वचनं यथोचितम्॥ ३७ | इन परस्पर विरोधी प्रसंगोंमें मेरा हित कैसे हो! मैं क्या उत्तर दूँ, जिससे मेरी बात झूठी न हो। [लोमशमुनिने कहा]—हे ब्राह्मण! ऐसा विचार करते हुए वे सत्यव्रतमुनि धर्मसंकटमें पड़ गये और व्याधको यथोचित उत्तर नहीं दे सके॥ ३७॥ |
| अ० ११ ] | तृतीय स्कन्ध | २९७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| बाणाहतं वीक्ष्य दयान्वितञ्च<br>कोलं तदन्ते समुदाहृतं वचः।<br>तेन प्रसन्ना निजबीजतः शिवा<br>विद्यां दुरापां प्रददौ च तस्मै॥ ३८ | बाणसे आहत सूअरको देखकर मुनि सत्यव्रतके द्वारा जो करुणायुक्त ‘ऐ-ऐ’ शब्द उच्चरित हो गया था; उस अपने बीजमन्त्रसे प्रसन्न होकर भगवती शिवाने उन्हें दुर्लभ विद्या दे दी॥ ३८॥ |
| बीजोच्चारणतो देव्या विद्या प्रस्फुरिताखिला।<br>वाल्मीकेश्च यथा पूर्वं तथा स ह्यभवत्कविः॥ ३९ | देवीके बीजमन्त्रका उच्चारण करते ही मुनि सत्यव्रतके हृदयमें समस्त विद्याएँ प्रस्फुटित हो गयीं और वे उसी प्रकार कवि हो गये, जिस प्रकार पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकि॥ ३९॥ |
| तमुवाच द्विजो व्याधं सम्मुखस्थं धनुर्धरम्।<br>सत्यकामस्तु धर्मात्मा श्लोकमेकं दयापरः॥ ४०<br><br>या पश्यति न सा ब्रूते या ब्रूते सा न पश्यति।<br>अहो व्याध स्वकार्यार्थिन् किं पृच्छसि पुनः पुनः॥ ४१ | तत्पश्चात् सत्यकाम, धर्मात्मा तथा दयालु ब्राह्मण सत्यव्रतने अपने सामने खड़े उस धनुर्धारी व्याधसे एक श्लोक इस प्रकार कहा—जो (आँख) देखती है, वह बोलती नहीं है और जो (वाणी) बोलती है, वह देखती नहीं। अतः अपने ही प्रयोजनकी सिद्धिमें तत्पर हे व्याध! तुम बार-बार क्यों पूछ रहे हो?॥ ४०-४१॥ |
| इत्युक्तस्तु तदा तेन गतोऽसौ पशुहा पुनः।<br>निराशः सूकरे तस्मिन्परावृत्तो निजालये॥ ४२ | उस मुनिके ऐसा कहनेपर पशुओंका वध करनेवाला वह व्याध उस सूअरसे निराश होकर अपने घर लौट गया॥ ४२॥ |
| ब्राह्मणस्तु कविर्जातः प्राचेतस इवापरः।<br>प्रसिद्धः सर्वलोकेषु नाम्ना सत्यव्रतो द्विजः॥ ४३ | इस प्रकार वे सत्यव्रत नामक ब्राह्मण दूसरे वाल्मीकिके समान कवि हो गये और समस्त लोकोंमें प्रख्यात हो गये॥ ४३॥ |
| सारस्वतं ततो बीजं जजाप विधिपूर्वकम्।<br>पण्डितश्चातिविख्यातो द्विजोऽसौ धरणीतले॥ ४४ | तत्पश्चात् उन सत्यव्रतब्राह्मणने सारस्वत बीजमन्त्रका विधिपूर्वक जप किया और वे पृथ्वीतलपर पण्डितके रूपमें अत्यधिक विख्यात हो गये॥ ४४॥ |
| प्रतिपर्वसु गायन्ति ब्राह्मणा यद्यशः सदा।<br>आख्यानं चातिविस्तीर्णं स्तुवन्ति मुनयः किल॥ ४५ | अब ब्राह्मणलोग प्रत्येक पर्वपर उनका यशोगान करने लगे और मुनिगण उनके विस्तृत आख्यानकी निरन्तर प्रशंसा करने लगे॥ ४५॥ |
| तच्छ्रुत्वा सदनं तस्य समागत्य तदाश्रमे।<br>येन त्यक्तः पुरा तेन गृहं नीतोऽतिमानितः॥ ४६ | उनका महान् यश सुनकर उनके परिवारके वे ही लोग, जिन्होंने उन्हें पहले त्याग दिया था, उनके आश्रममें आकर विशेष आदर-सम्मानके साथ उन्हें घर ले गये॥ ४६॥ |
| तस्माद्राजन्सदा सेव्या पूजनीया च भक्तितः।<br>आदिशक्तिः परा देवी जगतां कारणं हि सा॥ ४७ | अतः हे राजन्! उन आदिशक्ति तथा जगत्की कारणस्वरूपा परादेवीकी सदा भक्तिपूर्वक सेवा तथा पूजा करनी चाहिये॥ ४७॥ |
| तस्या यज्ञं महाराज कुरु वेदविधानतः।<br>सर्वकामप्रदं नित्यं निश्चयं कथितं पुरा॥ ४८ | हे महाराज! आप मेरे द्वारा पहले ही बताये गये सर्वकामप्रदायक अम्बामखका अनुष्ठान वैदिक विधिके अनुसार नित्य नियमपूर्वक कीजिये॥ ४८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
| २९८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| स्मृता सम्पूजिता भक्त्या ध्याता चोच्चारिता स्तुता।<br>ददाति वाञ्छितार्थान्कामदा तेन कीर्त्यते ॥ ४९ | वे भगवती स्मरण करने, पूजा करने, श्रद्धापूर्वक ध्यान करने, नामोच्चारण करने तथा स्तुति करनेसे [परम प्रसन्न होकर] सभी इच्छित मनोरथोंको पूर्ण कर देती हैं। इसीलिये वे 'कामदा' कही जाती हैं॥ ४९॥ | | अनुमानमिदं राजन् कर्तव्यं सर्वथा बुधैः।<br>दृष्ट्वा रोगयुतान्दीनान्क्षुधितान्निर्धनाञ्छठान् ॥ ५०<br><br>जनानार्तांस्तथा मूर्खान्पीडितान्वैरिविः सदा।<br>दासानाज्ञाकराञ्क्षुद्रान्विकलान्विह्वलानथ ॥ ५१<br><br>अतृप्तान्भोजने भोगे सदार्तानजितेन्द्रियान्।<br>तृष्णाधिकानशक्तांश्च सदाधिपरिपीडितान् ॥ ५२<br><br>तथा विभवसम्पन्नान् पुत्रपौत्रविवर्धनान्।<br>पुष्टदेहांश्च सम्भोगैः संयुतान्वेदवादिनः ॥ ५३<br><br>राजलक्ष्म्या युताञ्छूरान्वशीकृतजनानथ।<br>स्वजनैरवियुक्तांश्च सर्वलक्षणलक्षितान् ॥ ५४<br><br>व्यतिरेकान्वयाभ्यां च विचेतव्यं विचक्षणैः।<br>एभिर्न पूजिता देवी सर्वार्थफलदा शिवा ॥ ५५<br><br>समाराधिता च तथा नृभिरेभिः सदाम्बिका।<br>यतोऽमी सुखिनः सर्वे संसारेऽस्मिन्न संशयः ॥ ५६ | हे राजन्! रुग्ण, दीन, क्षुधापीडित, धनहीन, शठ, दुःखी, मूर्ख, शत्रुओंसे सदा प्रताड़ित, आज्ञाके अधीन रहनेवाले दास, क्षुद्र, विकल, अशान्त, भोजन तथा भोगसे अतृप्त, सदा कष्टमें रहनेवाले, अजितेन्द्रिय, अधिक तृष्णायुक्त, शक्तिहीन तथा सदैव मानसिक रोगोंसे पीड़ित रहनेवाले प्राणियोंको देखकर बुद्धिमानोंको यह अनुमान कर लेना चाहिये कि इन लोगोंने भगवतीकी सम्यक् उपासना नहीं की है। इसी प्रकार वैभवयुक्त, पुत्र-पौत्रादिसे सम्पन्न, हृष्ट-पुष्ट शरीरवाले, भोगयुक्त, वेदवादी, राजलक्ष्मीसे सम्पन्न, पराक्रमी, लोगोंको अपने वशमें रखनेवाले, स्वजनोंके साथ आनन्दपूर्वक रहनेवाले और समस्त उत्तम लक्षणोंसे युक्त लोगोंको देखकर यह अनुमान कर लेना चाहिये कि इन लोगोंने भगवतीकी उपासना की है। इस प्रकार पण्डितजनोंको व्यतिरेक-अन्वयके क्रमसे यह जान लेना चाहिये कि उपर्युक्त [दीन आदि] लोगोंने सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली शिवाकी पूजा नहीं की है तथा उपर्युक्त [विभवयुक्त] लोगोंने भगवती अम्बाकी सर्वदा विधिपूर्वक आराधना की है, जिससे ये सभी लोग इस संसारमें सुखी हैं। इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है॥ ५०—५६॥ | | व्यास उवाच<br>इति राजञ्छ्रुतं तत्र मया मुनिसमागमे।<br>लोमशस्य मुखात्कामं देवीमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ ५७ | व्यासजी बोले— हे राजन्! मैंने नैमिषारण्यतीर्थमें मुनियोंके समाजमें लोमशऋषिके मुखसे भगवतीका यह अत्युत्तम माहात्म्य सुना॥ ५७॥ | | इति सञ्चिन्त्य राजेन्द्र कर्तव्यं च सदार्चनम्।<br>भक्त्या परमया देव्याः प्रीत्या च पुरुषर्षभ ॥ ५८ | हे राजेन्द्र! हे पुरुषश्रेष्ठ! इसपर सम्यक् विचार करके परम भक्तिके साथ प्रेमपूर्वक भगवतीकी सदा अर्चना करनी चाहिये॥ ५८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
सत्यव्रताख्यानवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
~~ ० ~~
| अ० १२ ] | तृतीय स्कन्ध | २९९ |
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अथ द्वादशोऽध्यायः
सात्त्विक, राजस और तामस यज्ञोंका वर्णन; मानसयज्ञकी महिमा और व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको देवी-यज्ञके लिये प्रेरित करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| राजोवाच<br>वद यज्ञविधिं सम्यग्देव्यास्तस्याः समन्ततः।<br>श्रुत्वा करोम्यहं स्वामिन् यथाशक्ति ह्यतन्द्रितः॥ १ | राजा बोले—हे स्वामिन्! अब आप उन देवीके यज्ञकी विधिका पूर्णरूपसे सम्यक् वर्णन कीजिये। उसे सुनकर मैं यथाशक्ति प्रमादरहित होकर वह यज्ञ करूँगा॥ १॥ |
| पूजाविधिं च मन्त्रांश्च होमद्रव्यमसंशयम्।<br>ब्राह्मणाः कतिसंख्याश्च दक्षिणाश्च तथा पुनः॥ २ | उस यज्ञकी पूजा-विधि, उसके मन्त्र, होमद्रव्य, उसमें कितने ब्राह्मण हों और दक्षिणा—इन सभीके बारेमें निःसंकोच बताइये॥ २॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्या यज्ञं विधानतः।<br>त्रिविधं तु सदा ज्ञेयं विधिदृष्टेन कर्मणा॥ ३<br><br>सात्त्विकं राजसं चैव तामसं च तथापरम्।<br>मुनीनां सात्त्विकं प्रोक्तं नृपाणां राजसं स्मृतम्॥ ४<br><br>तामसं राक्षसानां वै ज्ञानिनां तु गुणोज्झितम्।<br>विमुक्तानां ज्ञानमयं विस्तरात्प्रब्रवीमि ते॥ ५ | व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, अब मैं आपसे देवीके यज्ञका विधानपूर्वक वर्णन करूँगा। अनुष्ठानमें विहित कर्मके अनुसार यह यज्ञ सात्त्विक, राजस तथा तामस भेदसे सदा तीन प्रकारका समझा जाना चाहिये। मुनियोंके लिये सात्त्विक यज्ञ, राजाओंके लिये राजस यज्ञ, राक्षसोंके लिये तामस यज्ञ, ज्ञानियोंके लिये निर्गुण यज्ञ और वैराग्ययुक्त लोगोंके लिये ज्ञानमय यज्ञ कहा गया है; मैं आपसे विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ॥ ३–५॥ |
| देशः कालस्तथा द्रव्यं मन्त्राश्च ब्राह्मणास्तथा।<br>श्रद्धा च सात्त्विकी यत्र तं यज्ञं सात्त्विकं विदुः॥ ६ | जिस यज्ञमें देश, काल, द्रव्य, मन्त्र, ब्राह्मण तथा श्रद्धा—ये सब सात्त्विक हों; उसे सात्त्विक यज्ञ कहा गया है॥ ६॥ |
| द्रव्यशुद्धिः क्रियाशुद्धिर्मन्त्रशुद्धिश्च भूमिप।<br>भवेद्यदि तदा पूर्णं फलं भवति नान्यथा॥ ७ | हे भूपाल! यदि द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और मन्त्रशुद्धिके साथ यज्ञ सम्पन्न होता है, तब पूर्ण फलकी प्राप्ति अवश्य होती है; अन्यथा नहीं होती॥ ७॥ |
| अन्यायोपार्जितेनैव द्रव्येण सुकृतं कृतम्।<br>न कीर्तिरिह लोके च परलोके न तत्फलम्॥ ८ | अन्यायके द्वारा उपार्जित किये गये धनसे यदि पुण्य-कार्य किया जाता है तो इस लोकमें यशकी प्राप्ति नहीं होती और परलोकमें उसका कोई फल भी नहीं मिलता है, इसलिये न्यायपूर्वक उपार्जित धनसे ही सदा पुण्यकार्य करना चाहिये। ऐसा कार्य इस लोकमें कीर्ति तथा परलोकमें आनन्दके लिये होता है॥ ८-९॥ |
| तस्मान्न्यायार्जितेनैव कर्तव्यं सुकृतं सदा।<br>यशसे परलोकाय भवत्येव सुखाय च॥ ९ | |
| प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र पाण्डवैस्तु मखः कृतः।<br>राजसूयः क्रतुवरः समाप्तवरदक्षिणः॥ १० | हे राजेन्द्र! आपके सामने इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। पाण्डवोंने यज्ञोंमें उत्तम राजसूय-यज्ञ किया था, जिसकी समाप्तिपर उन्होंने श्रेष्ठ दक्षिणा भी दी थी, |
| ३०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |
| यत्र साक्षाद्धरिः कृष्णो यादवेन्द्रो महामनाः।<br>ब्राह्मणाः पूर्णविद्याश्च भारद्वाजादयस्तथा॥ ११<br><br>कृत्वा यज्ञं सुसम्पूर्णं मासमात्रेण पाण्डवैः।<br>प्राप्तं महत्तरं कष्टं वनवासश्च दारुणः॥ १२ | जिसमें महामनस्वी यादवेन्द्र साक्षात् भगवान् कृष्ण विद्यमान थे और भारद्वाज आदि पूर्णतः विद्यानिष्ठ ब्राह्मणोंने जिस यज्ञका सम्पादन किया था, उस यज्ञको विधिवत् सम्पन्न करनेके पश्चात् एक मासके भीतर ही पाण्डवोंको महान् कष्ट प्राप्त हुआ तथा कठोर वनवास भोगना पड़ा॥ १०—१२॥ | | पीडनञ्चैव पाञ्चाल्यास्तथा द्यूते पराजयः।<br>वनवासो महत्कष्टं क्व गतं मखजं फलम्॥ १३ | द्रौपदीका अपमान हुआ, युधिष्ठिरकी जुएमें पराजय हुई, पाण्डवोंको वनवास हुआ और उन्हें तरह-तरहका घोर कष्ट मिला, तब यज्ञसे होनेवाला फल कहाँ चला गया?॥ १३॥ | | दासत्वञ्च विराटस्य कृतं सर्वैर्महात्मभिः।<br>कीचकेन परिक्लिष्टा द्रौपदी च प्रमद्वरा॥ १४<br><br>आशीर्वादा द्विजातीनां क्व गताः शुद्धचेतसाम्।<br>भक्तिर्वा वासुदेवस्य क्व गता तत्र सङ्कटे॥ १५ | महामनस्वी पाण्डवोंको राजा विराटकी दासता करनी पड़ी और नारियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदीको कीचकने प्रताड़ित किया। उस संकटकालमें विशुद्ध हृदयवाले ब्राह्मणोंके आशीर्वाद कहाँ चले गये थे और कृष्णकी भक्ति कहाँ चली गयी थी?॥ १४-१५॥ | | न रक्षिता तदा बाला केनापि द्रुपदात्मजा।<br>प्राप्तकेशग्रहा काले साध्वी च वरवर्णिनी॥ १६ | जिस समय परम सुन्दरी पतिव्रता द्रौपदीको बाल पकड़कर घसीटा जा रहा था, उस समय उस बेचारीकी रक्षा किसीने भी नहीं की॥ १६॥ | | किमत्र चिन्तनीयं वै धर्मवैगुण्यकारणम्।<br>केशवे सति देवेशे धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे॥ १७ | जिस यज्ञमें देवाधीश भगवान् श्रीकृष्ण रहे हों और जिस यज्ञके कर्ता धर्मराज युधिष्ठिर हों, उस यज्ञका विपरीत फल मिलनेका कारण अवश्य ही धर्मानुष्ठानमें कोई कमी रही होगी—ऐसा समझना चाहिये॥ १७॥ | | भवितव्यमिति प्रोक्ते निष्फलः स्यात्तदागमः।<br>वेदमन्त्रास्तथान्ये च वितथाः स्युरसंशयम्॥ १८<br><br>साधनं निष्फलं सर्वमुपायश्च निरर्थकः।<br>भवितव्यं भवत्येव वचने प्रतिपादके॥ १९<br><br>आगमोऽप्यर्थवादः स्यात्क्रियाः सर्वा निरर्थकाः।<br>स्वर्गार्थञ्च तपो व्यर्थं वर्णधर्मश्च वै तथा॥ २०<br><br>सर्वं प्रमाणं व्यर्थं स्याद्भवितव्ये कृते हृदि।<br>उभयञ्चापि मन्तव्यं दैवं चोपाय एव च॥ २१ | यदि कहा जाय कि प्रारब्ध ही ऐसा था तो सभी शास्त्र निष्फल हो जायेंगे और वेद-मन्त्र तथा अन्य धर्मग्रन्थ निरर्थक सिद्ध होंगे; इसमें संशय नहीं है। प्रारब्ध तो अवश्यम्भावी है, इस कथनको यदि स्वीकार कर लिया जाय तो सभी साधन निष्फल और सभी उपाय व्यर्थ हो जायँगे; सभी वेद-शास्त्र अर्थवादके रूपमें परिणत हो जायँगे, सभी क्रियाएँ निरर्थक हो जायँगी और स्वर्ग-प्राप्तिके लिये तप तथा वर्ण-धर्म सब व्यर्थ हो जायँगे। केवल प्रारब्धको ही हृदयमें धारण करनेसे सभी प्रमाण व्यर्थ हो जायेंगे। अतएव भाग्य तथा उपाय दोनोंको मानना चाहिये॥ १८—२१॥ |
| अ० १२ ] | तृतीय स्कन्ध | ३०१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कृते कर्मणि चेत्सिद्धिर्विपरीता यदा भवेत्।<br>वैगुण्यं कल्पनीयं स्यात्प्राज्ञैः पण्डितमौलिभिः॥ २२ | कर्म करनेपर भी यदि विपरीत परिणाम प्राप्त होता है तो पण्डितशिरोमणि विद्वानोंको सोचना चाहिये कि कार्य करनेमें कोई कमी अवश्य रह गयी थी॥ २२॥ |
| तत्कर्म बहुधा प्रोक्तं विद्वद्भिः कर्मकारिभिः।<br>कर्तृभेदान्मन्त्रभेदाद् द्रव्यभेदात्तथा पुनः॥ २३ | कर्मशील विद्वानोंने कर्तृभेद, मन्त्रभेद तथा द्रव्यभेदसे उस कर्मको अनेक प्रकारवाला बताया है॥ २३॥ |
| यथा मघवता पूर्वं विश्वरूपो वृतो गुरुः।<br>विपरीतं कृतं तेन कर्म मातृहिताय वै॥ २४<br><br>देवेभ्यो दानवेभ्यस्तु स्वस्तीत्युक्त्वा पुनः पुनः।<br>असुरा मातृपक्षीयाः कृतं तेषाञ्च रक्षणम्॥ २५<br><br>दैत्यान् दृष्ट्वातिसम्पुष्टांश्चुकोप मघवा तदा।<br>शिरांसि तस्य वज्रेण चिच्छेद तरसा हरिः॥ २६ | पूर्वकालमें इन्द्रने यज्ञमें आचार्यके रूपमें विश्वरूपका वरण किया था। उस विश्वरूपने अपने मातृपक्षके दानवोंके हितार्थ विपरीत कार्य किया। देवताओं तथा दानवों दोनोंका कल्याण हो—ऐसा बार-बार कहकर उसने मातृपक्षके जो असुर थे, उनकी भी रक्षा की। तदनन्तर दानवोंको अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट देखकर इन्द्र कुपित हो उठे और उन्होंने वज्रसे तत्काल उस विश्वरूपके सिर काट दिये॥ २४–२६॥ |
| क्रियावैगुण्यमत्रैव कर्तृभेदादसंशयम्।<br>नोचेत्पञ्चालराजेन रोषेणापि कृता क्रिया॥ २७<br><br>भारद्वाजविनाशाय पुत्रस्योत्पादनाय च।<br>धृष्टद्युम्नः समुत्पन्नो वेदिमध्याच्च द्रौपदी॥ २८ | इससे यह निस्सन्देह सिद्ध हो जाता है कि कर्ताके भेदसे विपरीत फल हो जाता है। यदि इसे न मानें तो ठीक नहीं; क्योंकि पञ्चालनरेश द्रुपदने रोषपूर्वक द्रोणाचार्यके नाशके निमित्त एक पुत्र उत्पन्न होनेके लिये यज्ञ किया था। [इसके परिणामस्वरूप] यज्ञवेदीके मध्यभागसे धृष्टद्युम्न तथा द्रौपदी—ये दोनों उत्पन्न हुए॥ २७-२८॥ |
| पुरा दशरथेनापि पुत्रेष्टिस्तु कृता यदा।<br>अपुत्रस्य सुतास्तस्य चत्वारः सम्प्रजज्ञिरे॥ २९ | पूर्वकालमें जब महाराज दशरथने पुत्रेष्टि-यज्ञ किया तो उन पुत्रहीन राजा दशरथके भी चार पुत्र उत्पन्न हुए॥ २९॥ |
| अतः क्रिया कृता युक्त्या सिद्धिदा सर्वथा भवेत्।<br>अयुक्त्या विपरीता स्यात्सर्वथा नृपसत्तम॥ ३० | अतः हे नृपश्रेष्ठ! युक्तिपूर्वक किया गया कोई भी कार्य हर प्रकारसे सिद्धि प्रदान करनेवाला होता है और युक्तिपूर्वक न किया गया कार्य सर्वथा विपरीत फल प्रदान करनेवाला होता है॥ ३०॥ |
| पाण्डवानां यथा यज्ञे किञ्चिद्वैगुण्ययोगतः।<br>विपरीतं फलं प्राप्तं निर्जितास्ते दुरोदरे॥ ३१<br><br>सत्यवादी तथा राजन् धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः।<br>द्रौपदी च तथा साध्वी तथान्येऽप्यनुजाः शुभाः॥ ३२<br><br>कुद्रव्ययोगाद्वैगुण्यं समुत्पन्नं मखेऽथवा।<br>साभिमानैः कृताद्वापि दूषणं समुपस्थितम्॥ ३३ | जैसे पाण्डवोंके यज्ञमें किसी दोषके कारण ही उन्हें विपरीत फल मिला और जुएमें वे हार गये। हे राजन्! युधिष्ठिर सत्यवादी तथा धर्मपुत्र थे, द्रौपदी भी एक पतिव्रता स्त्री थी एवं युधिष्ठिरके अन्य छोटे भाई भी पुण्यात्मा थे, किंतु अन्यायोपार्जित द्रव्योंके प्रयोगके कारण उस यज्ञमें वैगुण्य उत्पन्न हुआ अथवा उन्होंने अभिमानपूर्वक यज्ञ किया था, जिससे दोष उत्पन्न हुआ॥ ३१—३३॥ |
| ३०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सात्त्विकस्तु महाराज दुर्लभो वै मखः स्मृतः।<br>वैखानसमुनीनां हि विहितोऽसौ महामखः ॥ ३४ | हे महाराज! सात्त्विक यज्ञ तो अत्यन्त दुर्लभ माना गया है। वह महायज्ञ केवल वानप्रस्थ मुनियोंके लिये ही विहित है॥ ३४॥ |
| सात्त्विकं भोजनं ये वै नित्यं कुर्वन्ति तापसाः।<br>न्यायार्जितञ्च वन्यञ्च तथा ऋष्यं सुसंस्कृतम्॥ ३५<br><br>पुरोडाशपरा नित्यं वियूपा मन्त्रपूर्वकाः।<br>श्रद्धाधिका मखा राजन् सात्त्विकाः परमाः स्मृताः॥ ३६ | हे राजन्! तपमें तत्पर जो लोग नित्य न्यायपूर्वक अर्जित किये गये द्रव्य-पदार्थ, वन्य फल-मूल तथा ऋषियोंका सुसंस्कृत सात्त्विक आहार ग्रहण करते हैं—ऐसे तपस्वियोंद्वारा नित्य अतिश्रद्धाके साथ पुरोडाशसे सम्पादित किये जानेवाले समन्त्रक तथा यूपविहीन यज्ञ परम सात्त्विक यज्ञ कहे गये हैं॥ ३५-३६॥ |
| राजसा द्रव्यबहुलाः सयूपाश्च सुसंस्कृताः।<br>क्षत्रियाणां विशाञ्चैव साभिमानाश्च वै मखाः॥ ३७ | जिस यज्ञमें अधिक धन व्यय किया जाता है, जिसमें पशु-बलिके लिये सुन्दर यूप गाड़े जाते हैं तथा जो अभिमानके साथ किये जाते हैं—क्षत्रियों तथा वैश्योंद्वारा सम्पादित किये जानेवाले वे यज्ञ राजस यज्ञ कहे गये हैं॥ ३७॥ |
| तामसा दानवानां वै सक्रोधा मदवर्धकाः।<br>सामर्षाः संस्कृताः क्रूरा मखाः प्रोक्ता महात्मभिः॥ ३८ | महात्माओंने दानवोंद्वारा किये जानेवाले यज्ञोंको तामस यज्ञ कहा है। ऐसे यज्ञ क्रोधभावनाके साथ किये जाते हैं, अहंकारको बढ़ानेवाले होते हैं, ईर्ष्यापूर्वक किये जाते हैं और बड़ी साज-सज्जा तथा क्रूरताके साथ सम्पन्न किये जाते हैं॥ ३८॥ |
| मुनीनां मोक्षकामानां विरक्तानां महात्मनाम्।<br>मानसस्तु स्मृतो यागः सर्वसाधनसंयुतः॥ ३९ | मोक्षकी कामना करनेवाले विरक्त मुनि-महात्माओंके लिये सर्वसाधनसम्पन्न मानस-यज्ञ बताया गया है॥ ३९॥ |
| अन्येषु सर्वयज्ञेषु किञ्चिन्न्यूनं भवेदपि।<br>द्रव्येण श्रद्धया वापि क्रियया ब्राह्मणैस्तथा॥ ४०<br><br>देशकालपृथग्द्रव्यसाधनैः सकलैस्तथा।<br>नान्यो भवति पूर्णो वै तथा भवति मानसः॥ ४१ | अन्य सभी यज्ञोंमें कुछ कमी हो भी सकती है; क्योंकि वे द्रव्य, श्रद्धा, कर्म, ब्राह्मण, देश, काल तथा अन्य द्रव्यसाधनोंसे सम्पन्न किये जाते हैं। अतः अन्य यज्ञ वैसा पूर्ण नहीं होता, जैसा मानस-यज्ञ सदैव पूर्ण हो जाता है॥ ४०-४१॥ |
| प्रथमं तु मनः शोध्यं कर्तव्यं गुणवर्जितम्।<br>शुद्धे मनसि देहो वै शुद्ध एव न संशयः॥ ४२ | [इस यज्ञके लिये] सर्वप्रथम मनको परिशुद्ध तथा गुणसे रहित बनाना चाहिये। मनके शुद्ध हो जानेपर शरीरकी शुद्धि स्वतः हो जाती है, इसमें संशय नहीं है॥ ४२॥ |
| इन्द्रियार्थपरित्यक्तं यदा जातं मनः शुचि।<br>तदा तस्य मखस्यासौ प्रभवेदधिकारवान्॥ ४३ | जब मनुष्यका मन इन्द्रियोंके विषयोंका परित्याग करके पवित्र हो जाता है, तभी वह उस मानस-यज्ञको करनेका अधिकारी होता है ॥ ४३॥ |
| तदासौ मण्डपं कृत्वा बहुयोजनविस्तृतम्।<br>स्तम्भैश्च विपुलैः श्लक्ष्णैर्यज्ञियद्रुमसंभवैः॥ ४४ | तत्पश्चात् वह अपने मनमें पवित्र यज्ञीय वृक्षोंसे निर्मित, अनेक सुन्दर-सुन्दर स्तम्भोंसे अलंकृत तथा अनेक योजन विस्तारवाले यज्ञमण्डपकी रचना करके |
अ० १२] तृतीय स्कन्ध ३०३
अ० १२] तृतीय स्कन्ध ३०३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वेदीं च विशदां तत्र मनसा परिकल्पयेत्।<br>अग्नयोऽपि तथा स्थाप्या विधिवन्मनसा किल॥ ४५ | उसमें मन-ही-मन एक विशाल यज्ञवेदीकी कल्पना करे और उसपर मानसिक अग्निकी विधिपूर्वक स्थापना करे॥ ४४-४५॥ |
| ब्राह्मणानाञ्च वरणं तथैव प्रतिपाद्य च।<br>ब्रह्माध्वर्युस्तथा होता प्रस्तोता विधिपूर्वकम्॥ ४६<br><br>उद्गाता प्रतिहर्ता च सभ्याश्चान्ये यथाविधि।<br>पूजनीया प्रयत्नेन मनसैव द्विजोत्तमाः॥ ४७ | उसी प्रकार [मनमें] ब्राह्मणोंका वरण करके ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता, प्रस्तोता, उद्गाता, प्रतिहर्ता तथा अन्य सभासदोंको नियुक्त करके यथोचित रूपसे प्रयत्नपूर्वक मनसे उनकी पूजा करनी चाहिये॥ ४६-४७॥ |
| प्राणोऽपानस्तथा व्यानः समानोदान एव च।<br>पावकाः पञ्च एवैते स्थाप्या वेद्यां विधानतः॥ ४८ | प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान—इन पाँचों अग्नियोंको यज्ञवेदीपर विधानपूर्वक स्थापित करना चाहिये॥ ४८॥ |
| गार्हपत्यस्तदा प्राणोऽपानश्चाहवनीयकः।<br>दक्षिणाग्निस्तथा व्यानः समानश्चावसथ्यकः॥ ४९<br><br>सभ्योदानः स्मृता होते पावकाः परमोत्कटाः।<br>द्रव्यं च मनसा भाव्यं निर्गुणं परमं शुचि॥ ५० | उनमें प्राणको गार्हपत्य अग्नि, अपानको आहवनीय अग्नि, व्यानको दक्षिणाग्नि, समानको आवसथ्य अग्नि तथा उदानको सभ्य अग्नि कहा गया है। ये पाँचों परम तेजस्वी हैं। इस यज्ञमें मानसिक रूपसे ही दोषरहित तथा परम पवित्र सामग्रियोंकी भी कल्पना करनी चाहिये॥ ४९-५०॥ |
| मन एव तदा होता यजमानस्तथैव तत्।<br>यज्ञाधिदेवता ब्रह्म निर्गुणं च सनातनम्॥ ५१ | इस यज्ञमें होता तथा यजमान दोनोंके रूपमें मन ही होता है। निर्गुण तथा अविनाशी ब्रह्म इस यज्ञमें अधिदेवता होते हैं॥ ५१॥ |
| फलदा निर्गुणा शक्तिः सदा निर्वेददा शिवा।<br>ब्रह्मविद्याखिलाधारा व्याप्य सर्वत्र संस्थिता॥ ५२ | निर्गुणा पराशक्ति सभी फलोंको प्रदान करनेवाली हैं। उन वैराग्यदायिनी, कल्याणकारिणी, ब्रह्मविद्या, समस्त जगत्की आधारस्वरूपा तथा जगत्को व्याप्त करके सर्वत्र विराजमान रहनेवाली आदिशक्ति-स्वरूपा भगवतीको प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे द्विजको मनःकल्पित हवन-सामग्रियोंकी आहुति अपने प्राणरूपी अग्निमें देनी चाहिये॥ ५२ १/२॥ |
| तदुद्देशेन तद् द्रव्यं हुनेत्प्राणाग्निषु द्विजः।<br>पश्चाच्चित्तं निरालम्बं कृत्वा प्राणानपि प्रभो॥ ५३ | हे प्रभो! मानस हवनके पश्चात् अपने मनको आलम्बनरहित करके कुण्डलिनीके मुखमार्गसे अर्थात् सुषुम्ना रन्ध्रद्वारा शाश्वत ब्रह्ममें अपने प्राणोंकी भी आहुति दे देनी चाहिये॥ ५३ १/२॥ |
| कुण्डलीमुखमार्गेण हुनेद् ब्रह्मणि शाश्वते।<br>स्वानुभूत्या स्वयं साक्षात्वात्मभूतां महेश्वरीम्॥ ५४ | अपनी अनुभूतिसे स्वयंका साक्षात्कार करके तथा महेश्वरीको अपनी आत्मस्वरूपा जानकर समाधियोगसे शान्तचित्त होकर ध्यान करना चाहिये॥ ५४ १/२॥ |
| समाधिनैव योगेन ध्यायेच्चेतस्यनाकुलः।<br>सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि॥ ५५ | इस प्रकार जब वह साधक सभी प्राणियोंमें अपने-आपको तथा अपनेमें सभी प्राणियोंको देखने लगता है, तब वह भूतात्मा उन कल्याणस्वरूपा |
| ३०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदा पश्यति भूतात्मा तदा पश्यति तां शिवाम्।<br>दृष्ट्वा तां ब्रह्मविद्भूयात्सच्चिदानन्दरूपिणीम्॥ ५६<br><br>तदा मायादिकं सर्वं दग्धं भवति भूमिप।<br>प्रारब्धं कर्ममात्रं तु यावद्देहं च तिष्ठति॥ ५७ | भगवतीका दर्शन प्राप्त कर लेता है और उन सच्चिदानन्दस्वरूपिणीका दर्शन करके ब्रह्मज्ञानी हो जाता है। हे भूपाल! तब उसका सब मायाजनित प्रपंच जलकर भस्म हो जाता है और केवल प्रारब्धकर्मका भोग करनेके लिये ही शरीर रहता है॥ ५५–५७॥ |
| जीवन्मुक्तस्तदा जातो मृतो मोक्षमवाप्नुयात्।<br>कृतकृत्यो भवेत्तात यो भजेज्जगदम्बिकाम्॥ ५८<br><br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ध्येया श्रीभुवनेश्वरी।<br>श्रोतव्या चैव मन्तव्या गुरुवाक्यानुसारतः॥ ५९ | हे तात! तब वह जीवन्मुक्त हो जाता है और मृत्युके उपरान्त मोक्ष प्राप्त करता है। जो भगवतीको भजता है, वह सब प्रकारसे कृतकृत्य हो जाता है। इसलिये गुरुके वचनोंके अनुसार सम्पूर्ण प्रयत्नके साथ श्रीभुवनेश्वरी भगवतीका ध्यान, उनके चरित्रका श्रवण तथा मनन करना चाहिये॥ ५८–५९॥ |
| राजन्नेवं कृतो यज्ञो मोक्षदो नात्र संशयः।<br>अन्ये यज्ञाः सकामास्तु प्रभवन्ति क्षयोन्मुखाः॥ ६० | हे राजन्! इस प्रकार किया हुआ यज्ञ मोक्षप्रद होता है; इसमें सन्देह नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य सकाम यज्ञ विनाशोन्मुख होते हैं॥ ६०॥ |
| अग्निष्टोमेन विधिवत्स्वर्गकामो यजेदिति।<br>वेदानुशासनं चैतत्प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ६१<br><br>क्षीणे पुण्ये मृत्युलोकं विशन्ति च यथामति।<br>तस्मात्तु मानसः श्रेष्ठो यज्ञोऽप्यक्षय एव सः॥ ६२ | मनीषी विद्वान् यह वेदानुशासन बताते हैं कि स्वर्गकी इच्छावालेको विधिपूर्वक अग्निष्टोम यज्ञ करना चाहिये। मेरी समझसे पुण्य क्षीण होनेपर पुनः उन्हें मृत्युलोकमें आना ही पड़ता है, अतः अक्षय फलवाला वह मानस-यज्ञ ही श्रेष्ठ है॥ ६१–६२॥ |
| न राज्ञा साधितुं योग्यो मखोऽसौ जयमिच्छता।<br>तामसस्तु कृतः पूर्वं सर्पयज्ञस्त्वयाधुना॥ ६३<br><br>वैरं निर्वार्हितं राजंस्तक्षकस्य दुरात्मनः।<br>यत्कृते निहताः सर्पास्त्वयाग्नौ कोटिशः परे॥ ६४ | विजयकी इच्छा रखनेवाला राजा इस मानस-यज्ञको सम्पन्न नहीं कर सकता। हे राजन्! अभी कुछ ही समय पूर्व आपने तामस सर्पयज्ञ किया था, जिसमें आपने दुरात्मा तक्षकसे वैरका बदला चुकाया था और उसमें आपने करोड़ों सर्पोंको अग्निमें जलाकर मार डाला था॥ ६३–६४॥ |
| देवीयज्ञं कुरुष्वाद्य विततं विधिपूर्वकम्।<br>विष्णुना यः कृतः पूर्वं सृष्ट्यादौ नृपसत्तम॥ ६५ | हे नृपश्रेष्ठ! अब आप विधिपूर्वक विस्तृत देवीयज्ञ कीजिये, जिसे पूर्वकालमें सृष्टिके आरम्भमें भगवान् विष्णुने किया था॥ ६५॥ |
| तथा त्वं कुरु राजेन्द्र विधिं ते प्रब्रवीम्यहम्।<br>ब्राह्मणाः सन्ति राजेन्द्र विधिज्ञा वेदवित्तमाः॥ ६६<br><br>देवीबीजविधानज्ञा मन्त्रमार्गविचक्षणाः।<br>याजकास्ते भविष्यन्ति यजमानस्त्वमेव हि॥ ६७ | हे राजेन्द्र! मैं आपको उसकी विधि बता रहा हूँ, आप वैसा कीजिये। हे राजेन्द्र! आपके यहाँ वेदोंके पूर्ण ज्ञाता, विधिको जाननेवाले, देवीके बीजमन्त्रके विधानके जानकार तथा मन्त्रमार्गके विद्वान् अनेक ब्राह्मण हैं, वे ही उस यज्ञमें आपके याजक होंगे और आप यजमान बनेंगे॥ ६६–६७॥ |
| कृत्वा यज्ञं विधानेन दत्त्वा पुण्यं मखार्जितम्।<br>समुद्धर महाराज पितरं दुर्गतिङ्गतम्॥ ६८ | हे महाराज! इस प्रकार आप विधिवत् देवीयज्ञ करके उस यज्ञसे मिले हुए पुण्यको अर्पित करके अपने दुर्गतिप्राप्त पिताका उद्धार कीजिये॥ ६८॥ |
| अ० १२ ] | तृतीय स्कन्ध | ३०५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विप्रामानजं पापं दुर्घटं नरकप्रदम्।<br>तथैव शापजो दोषः प्राप्तः पित्रा तवानघ॥ ६९<br><br>तथा दुर्मरणं प्राप्तं सर्पदंशेन भूभुजा।<br>अन्तराले तथा मृत्युर्न भूमौ कुशसंस्तरे॥ ७०<br><br>न सङ्ग्रामे न गङ्गायां स्नानदानादिवर्जितम्।<br>मरणं ते पितुस्तत्र सौधे जातं कुरुद्वह॥ ७१ | ब्राह्मणके अपमानसे होनेवाला पाप बड़ा भयंकर और नरकदायक होता है। हे अनघ! आपके पिता वैसे ही शापजनित दोषसे ग्रस्त हो चुके हैं; साथ ही साँपके काटनेसे महाराजकी अकालमृत्यु हुई है और भूमिपर बिछे कुशासनपर नहीं अपितु आकाशमें उनका मरण हुआ है, उनकी मृत्यु न रणस्थलमें हुई है और न गंगातटपर ही अपितु हे कुरुश्रेष्ठ! आपके पिता बिना स्नान-दान आदि किये ही महलमें मर गये॥ ६९–७१॥ |
| कृपणानि च सर्वाणि नरकस्य नृपोत्तम।<br>तत्रैकं कारणं तस्य न जातं चातिदुर्लभम्॥ ७२ | हे नृपश्रेष्ठ! ये सब कुत्सित साधन नरकके हेतु हैं। राजाके लिये नरकसे बचनेका एक उपाय था; किंतु वह अत्यन्त दुर्लभ उपाय भी उनसे न बन सका॥ ७२॥ |
| यत्र यत्र स्थितः प्राणी ज्ञात्वा कालं समागतम्।<br>साधनानामभावेऽपि ह्यवशश्चातिसङ्कटे॥ ७३<br><br>यदा निर्वेदमायाति मनसा निर्मलेन वै।<br>पञ्चभूतात्मको देहो मम किञ्चात्र दुःखदम्॥ ७४ | जहाँ कहीं भी प्राणी स्थित रहे, कालको समीप आया जानकर साधनोंके अभावमें भी अत्यन्त कष्टके कारण विवश हुआ वह जब हृदयमें वैराग्य-भाव आ जाय, तब निर्मल मनसे यह सोचने लगे कि यह शरीर तो पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु—इन पंचभूतोंसे निर्मित है, तब फिर यह मेरे लिये क्या दुःखदायी हो सकता है!॥ ७३-७४॥ |
| पतत्वद्य यथाकामं मुक्तोऽहं निर्गुणोऽव्ययः।<br>नाशात्मकानि तत्त्वानि तत्र का परिदेवना॥ ७५ | यह देह अभी नष्ट हो जाय; मैं तो मुक्त, निर्गुण तथा अविनाशी हूँ। ये पंचतत्त्व तो विनाशशील हैं, तब इनके लिये मुझे चिन्ता ही क्या! |
| ब्रह्मैवाहं न संसारी सदा मुक्तः सनातनः।<br>देहेन मम सम्बन्धः कर्मणा प्रतिपादितः॥ ७६ | मैं तो सदा मुक्त और सनातन ब्रह्म हूँ; संसारी जीव नहीं हूँ। इस देहसे मेरा सम्बन्ध केवल कर्मभोगके कारण ही है। |
| तानि सर्वाणि मुक्तानि शुभानि चेतराणि च।<br>मनुष्यदेहयोगेन सुखदुःखानुसाधनात्॥ ७७ | शरीरद्वारा किये गये उन सभी शुभाशुभ कर्मोंका मेरा बन्धन तो छूट चुका है; क्योंकि मनुष्यशरीरसे मैंने दुःख तथा सुख भोग लिया है |
| विमुक्तोऽतिभयाद् घोरादस्मात्संसारसङ्कटात्।<br>इत्येवं चिन्त्यमानस्तु स्नानदानविवर्जितः॥ ७८ | और इस अत्यन्त भयानक, घोर तथा भीषण सांसारिक कष्टसे मैं सर्वथा विमुक्त हूँ, इस प्रकारका चिन्तन करता हुआ पुरुष यदि स्नान-दानरहित भी मृत्यु प्राप्त करता है |
| मरणं चेदवाप्नोति स मुच्येज्जन्मदुःखतः।<br>एषा काष्ठा परा प्रोक्ता योगिनामपि दुर्लभा॥ ७९ | तो भी वह पुनः जन्म लेनेके दुःखसे छूट जाता है। यह सर्वोत्कृष्ट साधन कहा गया है, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है॥ ७५–७९॥ |
| पिता ते नृपशार्दूल श्रुत्वा शापं द्विजोदितम्।<br>देहे ममत्वं कृतवान्न निर्वेदमवाप्तवान्॥ ८० | हे नृपसत्तम! आपके पिताने ब्राह्मणके द्वारा दिये गये उस शापको सुनकर भी अपने शरीरके प्रति मोह रखा और वैराग्यका आश्रय नहीं लिया॥ ८०॥ |
| ३०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| नीरोगो मम देहोऽयं राज्यं निहतकण्टकम्।<br>कथं जीवाम्यहं कामं मन्त्रज्ञानानयन्तु वै॥ ८१ | उनकी यह प्रबल इच्छा थी कि मेरा यह शरीर सदा निरोग रहे, मैं निष्कंटक राज्य करता रहूँ और चिरकालतक कैसे जीता रहूँ, [—इस भावनासे उन्होंने सचिवोंको आज्ञा दी कि सर्पविष उतारनेका] मन्त्र जाननेवालोंको बुलाओ॥ ८१॥ |
| औषधं मणिमन्त्रं च यन्त्रं परमकं तथा।<br>आरोहणं तथा सौधे कृतवान्नृपतिस्तदा॥ ८२ | राजाने औषध, मणि, मन्त्र तथा उत्तमोत्तम यन्त्रोंका संग्रह किया और वे एक ऊँचे महलपर आरूढ़ हो गये। उस समय उन्होंने न स्नान किया, न दान दिया और न भगवतीका स्मरण ही किया। दैवको प्रधान मानकर वे भूमिपर भी नहीं सोये॥ ८२-८३॥ |
| न स्नानं न कृतं दानं न देव्याः स्मरणं कृतम्।<br>न भूमौ शयनं चैव दैवं मत्वा परं तथा॥ ८३ | |
| मग्नो मोहार्णवे घोरे मृतः सौधेऽहिना हतः।<br>कृत्वा पापं कलेर्द्योगात्तापसस्यावमानजम्॥ ८४ | कलिके प्रभावके कारण एक तपस्वीके प्रति अपमानजन्य पाप करके घोर मोहरूपी सागरमें डूबकर महलके ऊपर सर्पके डँसनेसे वे मर गये। ऐसे आचरणोंसे अवश्य ही नरक होता है। इसलिये हे नृपश्रेष्ठ! अपने उन पिताका पापसे उद्धार कीजिये॥ ८४-८५॥ |
| अवश्यमेव नरकं एतैराचरणैर्भवेत्।<br>तस्मात्तं पितरं पापात्समुद्धर नृपोत्तम॥ ८५ | |
| सूत उवाच<br>इति श्रुत्वा वचस्तस्य व्यासस्यामिततेजसः।<br>साश्रुकण्ठोऽतिदुःखातो बभूव जनमेजयः॥ ८६ | सूतजी बोले— [हे ऋषिगण!] अमित तेजस्वी व्यासजीका यह वचन सुनकर महाराज जनमेजय बड़े दुःखी हुए और अश्रुप्रवाहके कारण उनका कण्ठ रुँध गया। [मनमें पश्चात्ताप करते हुए वे कहने लगे—] आज मेरे इस जीवनको धिक्कार है जो कि मेरे पिता नरकमें पड़े हैं। इसलिये अब मैं ऐसा उपाय करता हूँ, जिससे उत्तरातनय राजा परीक्षित् स्वर्ग चले जायें॥ ८६-८७॥ |
| धिगिदं जीवितं मेऽद्य पिता मे नरके स्थितः।<br>तत्करोमि यथैवाद्य स्वर्गं यात्युत्तरासुतः॥ ८७ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे अम्बायज्ञविधिवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
देवीकी आधारशक्तिसे पृथ्वीका अचल होना तथा उसपर सुमेरु आदि पर्वतोंकी रचना, ब्रह्माजीद्वारा मरीचि आदिकी मानसी सृष्टि करना, काश्यपी सृष्टिका वर्णन, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास और स्वर्ग आदिका निर्माण; भगवान् विष्णुद्वारा अम्बायज्ञ करना और प्रसन्न होकर भगवती आद्या-शक्तिद्वारा आकाशवाणीके माध्यमसे उन्हें वरदान देना
| राजोवाच<br>हरिणा तु कथं यज्ञः कृतः पूर्वं पितामह।<br>जगत्कारणरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना॥ १ | राजा बोले— हे पितामह! जगत्के कारणस्वरूप तथा परम शक्तिशाली भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें वह यज्ञ कैसे किया? हे महामते! उस यज्ञमें कौन-कौन |
| अ० १३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३०७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| के सहायास्तु तत्रासन्ब्राह्मणाः के महामते।<br>ऋत्विजो वेदतत्त्वज्ञास्तन्मे ब्रूहि परन्तप॥ २<br><br>पश्चात्करोम्यहं यज्ञं विधिदृष्टेन कर्मणा।<br>श्रुत्वा विष्णुकृतं यागमम्बिकायाः समाहितः॥ ३ | ब्राह्मण सहायक थे और कौन-कौन वेदतत्त्वज्ञ विद्वान् ऋत्विज थे? हे परन्तप! यह सब आप मुझे बतायें। भगवान् विष्णुके द्वारा किये गये अम्बायज्ञको सुनकर बादमें मैं भी सावधान होकर उसी विहित कर्मके अनुसार यज्ञ करूँगा॥ १—३॥ |
| व्यास उवाच<br>राजञ्छृणु महाभाग विस्तारं परमाद्भुतम्।<br>यथा भगवता यज्ञः कृतश्च विधिपूर्वकः॥ ४ | **व्यासजी बोले—**हे महाभाग! हे राजन्! भगवान् विष्णुने जिस तरह विधिपूर्वक देवीयज्ञ किया था, उस परम अद्भुत प्रसंगको आप विस्तारसे सुनें॥ ४॥ |
| विसर्जिता यदा देव्या दत्त्वा शक्तीश्च तास्त्रयः।<br>काजेशाः पुरुषा जाता विमानवरमास्थिताः॥ ५<br><br>प्राप्ता महार्णवं घोरं त्रयस्ते विबुधोत्तमाः।<br>चक्रुः स्थानानि वासार्थं समुत्पाद्य धरां स्थिताः॥ ६ | उस समय जब आदिशक्तिने उन्हें विभिन्न शक्तियाँ प्रदान करके विदा कर दिया, तब श्रेष्ठ विमानपर स्थित वे तीनों ब्रह्मा, विष्णु और महेश पुनः पुरुषके रूपमें हो गये। [वहाँसे चलकर] वे तीनों श्रेष्ठ देवगण घोर महासागरमें पहुँच गये। वहाँ उन्होंने पृथ्वी उत्पन्न करके उसपर रहनेके लिये स्थान बनाया और वहीं रहने लगे॥ ५-६॥ |
| आधारशक्तिरचला मुक्ता देव्या स्वयं ततः।<br>तदाधारा स्थिता जाता धरा मेदःसमन्विता॥ ७ | उसी समय देवीने अचल आधारशक्तिको मुक्त किया, जिसके आश्रयसे वह मेदयुक्त पृथ्वी टिक गयी॥ ७॥ |
| मधुकैटभयोर्मेदःसंयोगान्मेदिनी स्मृता।<br>धारणाच्च धरा प्रोक्ता पृथ्वी विस्तारयोगतः॥ ८ | मधु-कैटभके मेदका संयोग होनेके कारण पृथ्वीको 'मेदिनी' कहा गया है। धारण करनेकी शक्ति होनेके कारण उसे 'धरा' तथा विस्तृत होनेके कारण उसे 'पृथ्वी' कहा गया है॥ ८॥ |
| मही चापि महीयस्त्वाद्वृता सा शेषमस्तके।<br>गिरयश्च कृताः सर्वे धारणार्थं प्रविस्तराः॥ ९<br><br>लोहकीलं यथा काष्ठे तथा ते गिरयः कृताः।<br>महीधरा महाराज प्रोच्यन्ते विबुधैर्जनैः॥ १० | यह पृथ्वी महनीय होनेके कारण 'मही' कही जाती है। यह शेषनागके मस्तकपर स्थित है। इसको यथास्थान स्थित रखनेके लिये सभी विशाल पर्वत रचे गये। जिस प्रकार काठमें लौह कीलें जड़ दी जाती हैं, उसी प्रकार पृथ्वीको सुस्थिर रखनेके लिये विशाल पर्वत बनाये गये। इसी कारण विद्वान्लोग उन पर्वतोंको 'महीधर' कहते हैं॥ ९-१०॥ |
| जातरूपमयो मेरुर्बहुयोजनविस्तरः।<br>कृतो मणिमयैः शृङ्गैः शोभितः परमाद्भुतः॥ ११ | परम अद्भुत सुमेरुपर्वत सोनेका बना हुआ है, वह मणिमय चोटियोंसे सुशोभित है तथा अनेक योजन विस्तारवाला है॥ ११॥ |
| मरीचिर्नारदोऽत्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>दक्षो वसिष्ठ इत्येते ब्रह्मणः प्रथिताः सुताः॥ १२<br><br>मरीचेः कश्यपो जातो दक्षकन्यास्त्रयोदश।<br>ताभ्यो देवाश्च दैत्याश्च समुत्पन्ना ह्यनेकशाः॥ १३ | [उस समय सृष्टिका विकास इस प्रकार हुआ—] सर्वप्रथम ब्रह्माके विख्यात मानसिक पुत्र मरीचि, नारद, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष और वसिष्ठ आदि हुए। तत्पश्चात् मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। दक्षप्रजापतिको तेरह कन्याएँ हुईं। उन्हीं कन्याओंसे अनेक देवता एवं दैत्य उत्पन्न हुए॥ १२-१३॥ |