भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 315
३०६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
नीरोगो मम देहोऽयं राज्यं निहतकण्टकम्।<br>कथं जीवाम्यहं कामं मन्त्रज्ञानानयन्तु वै॥ ८१उनकी यह प्रबल इच्छा थी कि मेरा यह शरीर सदा निरोग रहे, मैं निष्कंटक राज्य करता रहूँ और चिरकालतक कैसे जीता रहूँ, [—इस भावनासे उन्होंने सचिवोंको आज्ञा दी कि सर्पविष उतारनेका] मन्त्र जाननेवालोंको बुलाओ॥ ८१॥
औषधं मणिमन्त्रं च यन्त्रं परमकं तथा।<br>आरोहणं तथा सौधे कृतवान्नृपतिस्तदा॥ ८२राजाने औषध, मणि, मन्त्र तथा उत्तमोत्तम यन्त्रोंका संग्रह किया और वे एक ऊँचे महलपर आरूढ़ हो गये। उस समय उन्होंने न स्नान किया, न दान दिया और न भगवतीका स्मरण ही किया। दैवको प्रधान मानकर वे भूमिपर भी नहीं सोये॥ ८२-८३॥
न स्नानं न कृतं दानं न देव्याः स्मरणं कृतम्।<br>न भूमौ शयनं चैव दैवं मत्वा परं तथा॥ ८३
मग्नो मोहार्णवे घोरे मृतः सौधेऽहिना हतः।<br>कृत्वा पापं कलेर्द्योगात्तापसस्यावमानजम्॥ ८४कलिके प्रभावके कारण एक तपस्वीके प्रति अपमानजन्य पाप करके घोर मोहरूपी सागरमें डूबकर महलके ऊपर सर्पके डँसनेसे वे मर गये। ऐसे आचरणोंसे अवश्य ही नरक होता है। इसलिये हे नृपश्रेष्ठ! अपने उन पिताका पापसे उद्धार कीजिये॥ ८४-८५॥
अवश्यमेव नरकं एतैराचरणैर्भवेत्।<br>तस्मात्तं पितरं पापात्समुद्धर नृपोत्तम॥ ८५
सूत उवाच<br>इति श्रुत्वा वचस्तस्य व्यासस्यामिततेजसः।<br>साश्रुकण्ठोऽतिदुःखातो बभूव जनमेजयः॥ ८६सूतजी बोले— [हे ऋषिगण!] अमित तेजस्वी व्यासजीका यह वचन सुनकर महाराज जनमेजय बड़े दुःखी हुए और अश्रुप्रवाहके कारण उनका कण्ठ रुँध गया। [मनमें पश्चात्ताप करते हुए वे कहने लगे—] आज मेरे इस जीवनको धिक्कार है जो कि मेरे पिता नरकमें पड़े हैं। इसलिये अब मैं ऐसा उपाय करता हूँ, जिससे उत्तरातनय राजा परीक्षित् स्वर्ग चले जायें॥ ८६-८७॥
धिगिदं जीवितं मेऽद्य पिता मे नरके स्थितः।<br>तत्करोमि यथैवाद्य स्वर्गं यात्युत्तरासुतः॥ ८७

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे अम्बायज्ञविधिवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


अथ त्रयोदशोऽध्यायः

देवीकी आधारशक्तिसे पृथ्‍वीका अचल होना तथा उसपर सुमेरु आदि पर्वतोंकी रचना, ब्रह्माजीद्वारा मरीचि आदिकी मानसी सृष्टि करना, काश्यपी सृष्टिका वर्णन, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास और स्वर्ग आदिका निर्माण; भगवान् विष्णुद्वारा अम्बायज्ञ करना और प्रसन्न होकर भगवती आद्या-शक्तिद्वारा आकाशवाणीके माध्यमसे उन्हें वरदान देना

राजोवाच<br>हरिणा तु कथं यज्ञः कृतः पूर्वं पितामह।<br>जगत्कारणरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना॥ १राजा बोले— हे पितामह! जगत्‌के कारणस्वरूप तथा परम शक्तिशाली भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें वह यज्ञ कैसे किया? हे महामते! उस यज्ञमें कौन-कौन