भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 314
अ० १२ ]तृतीय स्कन्ध३०५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विप्रामानजं पापं दुर्घटं नरकप्रदम्।<br>तथैव शापजो दोषः प्राप्तः पित्रा तवानघ॥ ६९<br><br>तथा दुर्मरणं प्राप्तं सर्पदंशेन भूभुजा।<br>अन्तराले तथा मृत्युर्न भूमौ कुशसंस्तरे॥ ७०<br><br>न सङ्ग्रामे न गङ्गायां स्नानदानादिवर्जितम्।<br>मरणं ते पितुस्तत्र सौधे जातं कुरुद्वह॥ ७१ब्राह्मणके अपमानसे होनेवाला पाप बड़ा भयंकर और नरकदायक होता है। हे अनघ! आपके पिता वैसे ही शापजनित दोषसे ग्रस्त हो चुके हैं; साथ ही साँपके काटनेसे महाराजकी अकालमृत्यु हुई है और भूमिपर बिछे कुशासनपर नहीं अपितु आकाशमें उनका मरण हुआ है, उनकी मृत्यु न रणस्थलमें हुई है और न गंगातटपर ही अपितु हे कुरुश्रेष्ठ! आपके पिता बिना स्नान-दान आदि किये ही महलमें मर गये॥ ६९–७१॥
कृपणानि च सर्वाणि नरकस्य नृपोत्तम।<br>तत्रैकं कारणं तस्य न जातं चातिदुर्लभम्॥ ७२हे नृपश्रेष्ठ! ये सब कुत्सित साधन नरकके हेतु हैं। राजाके लिये नरकसे बचनेका एक उपाय था; किंतु वह अत्यन्त दुर्लभ उपाय भी उनसे न बन सका॥ ७२॥
यत्र यत्र स्थितः प्राणी ज्ञात्वा कालं समागतम्।<br>साधनानामभावेऽपि ह्यवशश्चातिसङ्कटे॥ ७३<br><br>यदा निर्वेदमायाति मनसा निर्मलेन वै।<br>पञ्चभूतात्मको देहो मम किञ्चात्र दुःखदम्॥ ७४जहाँ कहीं भी प्राणी स्थित रहे, कालको समीप आया जानकर साधनोंके अभावमें भी अत्यन्त कष्टके कारण विवश हुआ वह जब हृदयमें वैराग्य-भाव आ जाय, तब निर्मल मनसे यह सोचने लगे कि यह शरीर तो पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु—इन पंचभूतोंसे निर्मित है, तब फिर यह मेरे लिये क्या दुःखदायी हो सकता है!॥ ७३-७४॥
पतत्वद्य यथाकामं मुक्तोऽहं निर्गुणोऽव्ययः।<br>नाशात्मकानि तत्त्वानि तत्र का परिदेवना॥ ७५यह देह अभी नष्ट हो जाय; मैं तो मुक्त, निर्गुण तथा अविनाशी हूँ। ये पंचतत्त्व तो विनाशशील हैं, तब इनके लिये मुझे चिन्ता ही क्या!
ब्रह्मैवाहं न संसारी सदा मुक्तः सनातनः।<br>देहेन मम सम्बन्धः कर्मणा प्रतिपादितः॥ ७६मैं तो सदा मुक्त और सनातन ब्रह्म हूँ; संसारी जीव नहीं हूँ। इस देहसे मेरा सम्बन्ध केवल कर्मभोगके कारण ही है।
तानि सर्वाणि मुक्तानि शुभानि चेतराणि च।<br>मनुष्यदेहयोगेन सुखदुःखानुसाधनात्॥ ७७शरीरद्वारा किये गये उन सभी शुभाशुभ कर्मोंका मेरा बन्धन तो छूट चुका है; क्योंकि मनुष्यशरीरसे मैंने दुःख तथा सुख भोग लिया है
विमुक्तोऽतिभयाद् घोरादस्मात्संसारसङ्कटात्।<br>इत्येवं चिन्त्यमानस्तु स्नानदानविवर्जितः॥ ७८और इस अत्यन्त भयानक, घोर तथा भीषण सांसारिक कष्टसे मैं सर्वथा विमुक्त हूँ, इस प्रकारका चिन्तन करता हुआ पुरुष यदि स्नान-दानरहित भी मृत्यु प्राप्त करता है
मरणं चेदवाप्नोति स मुच्येज्जन्मदुःखतः।<br>एषा काष्ठा परा प्रोक्ता योगिनामपि दुर्लभा॥ ७९तो भी वह पुनः जन्म लेनेके दुःखसे छूट जाता है। यह सर्वोत्कृष्ट साधन कहा गया है, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है॥ ७५–७९॥
पिता ते नृपशार्दूल श्रुत्वा शापं द्विजोदितम्।<br>देहे ममत्वं कृतवान्न निर्वेदमवाप्तवान्॥ ८०हे नृपसत्तम! आपके पिताने ब्राह्मणके द्वारा दिये गये उस शापको सुनकर भी अपने शरीरके प्रति मोह रखा और वैराग्यका आश्रय नहीं लिया॥ ८०॥