भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 889 में से

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पृष्ठ 316

| अ० १३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३०७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
के सहायास्तु तत्रासन्ब्राह्मणाः के महामते।<br>ऋत्विजो वेदतत्त्वज्ञास्तन्मे ब्रूहि परन्तप॥ २<br><br>पश्चात्करोम्यहं यज्ञं विधिदृष्टेन कर्मणा।<br>श्रुत्वा विष्णुकृतं यागमम्बिकायाः समाहितः॥ ३ब्राह्मण सहायक थे और कौन-कौन वेदतत्त्वज्ञ विद्वान् ऋत्विज थे? हे परन्तप! यह सब आप मुझे बतायें। भगवान् विष्णुके द्वारा किये गये अम्बायज्ञको सुनकर बादमें मैं भी सावधान होकर उसी विहित कर्मके अनुसार यज्ञ करूँगा॥ १—३॥
व्यास उवाच<br>राजञ्छृणु महाभाग विस्तारं परमाद्भुतम्।<br>यथा भगवता यज्ञः कृतश्च विधिपूर्वकः॥ ४**व्यासजी बोले—**हे महाभाग! हे राजन्! भगवान् विष्णुने जिस तरह विधिपूर्वक देवीयज्ञ किया था, उस परम अद्भुत प्रसंगको आप विस्तारसे सुनें॥ ४॥
विसर्जिता यदा देव्या दत्त्वा शक्तीश्च तास्त्रयः।<br>काजेशाः पुरुषा जाता विमानवरमास्थिताः॥ ५<br><br>प्राप्ता महार्णवं घोरं त्रयस्ते विबुधोत्तमाः।<br>चक्रुः स्थानानि वासार्थं समुत्पाद्य धरां स्थिताः॥ ६उस समय जब आदिशक्तिने उन्हें विभिन्न शक्तियाँ प्रदान करके विदा कर दिया, तब श्रेष्ठ विमानपर स्थित वे तीनों ब्रह्मा, विष्णु और महेश पुनः पुरुषके रूपमें हो गये। [वहाँसे चलकर] वे तीनों श्रेष्ठ देवगण घोर महासागरमें पहुँच गये। वहाँ उन्होंने पृथ्वी उत्पन्न करके उसपर रहनेके लिये स्थान बनाया और वहीं रहने लगे॥ ५-६॥
आधारशक्तिरचला मुक्ता देव्या स्वयं ततः।<br>तदाधारा स्थिता जाता धरा मेदःसमन्विता॥ ७उसी समय देवीने अचल आधारशक्तिको मुक्त किया, जिसके आश्रयसे वह मेदयुक्त पृथ्वी टिक गयी॥ ७॥
मधुकैटभयोर्मेदःसंयोगान्मेदिनी स्मृता।<br>धारणाच्च धरा प्रोक्ता पृथ्वी विस्तारयोगतः॥ ८मधु-कैटभके मेदका संयोग होनेके कारण पृथ्वीको 'मेदिनी' कहा गया है। धारण करनेकी शक्ति होनेके कारण उसे 'धरा' तथा विस्तृत होनेके कारण उसे 'पृथ्वी' कहा गया है॥ ८॥
मही चापि महीयस्त्वाद्वृता सा शेषमस्तके।<br>गिरयश्च कृताः सर्वे धारणार्थं प्रविस्तराः॥ ९<br><br>लोहकीलं यथा काष्ठे तथा ते गिरयः कृताः।<br>महीधरा महाराज प्रोच्यन्ते विबुधैर्जनैः॥ १०यह पृथ्वी महनीय होनेके कारण 'मही' कही जाती है। यह शेषनागके मस्तकपर स्थित है। इसको यथास्थान स्थित रखनेके लिये सभी विशाल पर्वत रचे गये। जिस प्रकार काठमें लौह कीलें जड़ दी जाती हैं, उसी प्रकार पृथ्वीको सुस्थिर रखनेके लिये विशाल पर्वत बनाये गये। इसी कारण विद्वान्‌लोग उन पर्वतोंको 'महीधर' कहते हैं॥ ९-१०॥
जातरूपमयो मेरुर्बहुयोजनविस्तरः।<br>कृतो मणिमयैः शृङ्गैः शोभितः परमाद्भुतः॥ ११परम अद्भुत सुमेरुपर्वत सोनेका बना हुआ है, वह मणिमय चोटियोंसे सुशोभित है तथा अनेक योजन विस्तारवाला है॥ ११॥
मरीचिर्नारदोऽत्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>दक्षो वसिष्ठ इत्येते ब्रह्मणः प्रथिताः सुताः॥ १२<br><br>मरीचेः कश्यपो जातो दक्षकन्यास्त्रयोदश।<br>ताभ्यो देवाश्च दैत्याश्च समुत्पन्ना ह्यनेकशाः॥ १३[उस समय सृष्टिका विकास इस प्रकार हुआ—] सर्वप्रथम ब्रह्माके विख्यात मानसिक पुत्र मरीचि, नारद, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष और वसिष्ठ आदि हुए। तत्पश्चात् मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। दक्षप्रजापतिको तेरह कन्याएँ हुईं। उन्हीं कन्याओंसे अनेक देवता एवं दैत्य उत्पन्न हुए॥ १२-१३॥