भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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३०८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
श्लोकअर्थ
ततस्तु काश्यपी सृष्टिः प्रवृत्ता चातिविस्तरा।<br>मनुष्यपशुसर्पादिजातिभेदैरनेकधा ॥ १४॥उसके बाद काश्यपी सृष्टि संसारमें फैल गयी। उस सृष्टिमें मनुष्य, पशु और सर्प आदि योनिभेदोंसे अनेक जीव उत्पन्न हुए॥ १४॥
ब्रह्मणश्चार्धदेहात्तु मनुः स्वायम्भुवोऽभवत्।<br>शतरूपा तथा नारी सञ्जाता वामभागतः॥ १५॥ब्रह्माके दाहिने आधे शरीरसे स्वायम्भुव मनु उत्पन्न हुए तथा बायें भागसे स्त्रीके रूपमें शतरूपा उत्पन्न हुईं॥ १५॥
प्रियव्रतोत्तानपादौ सुतौ तस्या बभूवतुः।<br>तिस्रः कन्या वरारोहा ह्यभवन्नतिसुन्दराः॥ १६॥उन्हीं शतरूपासे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए तथा तीन अत्यन्त सुन्दर और उत्तम गुणोंवाली पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं॥ १६॥
एवं सृष्टिं समुत्पाद्य भगवान्कमलोद्भवः।<br>चकार ब्रह्मलोकञ्च मेरुशृङ्गे मनोहरम्॥ १७॥इस प्रकार सृष्टिरचना करके कमलसे उत्पन्न भगवान् ब्रह्माजीने सुमेरुपर्वतके शिखरपर एक सुन्दर ब्रह्मलोक बनाया॥ १७॥
वैकुण्ठं भगवान्विष्णू रमारमणमुत्तमम्।<br>क्रीडास्थानं सुरम्यञ्च सर्वलोकोपरिस्थितम्॥ १८॥भगवान् विष्णुने भी लक्ष्मीजीके विहार करनेयोग्य वैकुण्ठलोक बनाया। वह अत्यन्त रमणीय तथा उत्तम क्रीडास्थान सभी लोकोंके ऊपर विराजमान है॥ १८॥
शिवोऽपि परमं स्थानं कैलासाख्यं चकार ह।<br>समासाद्य भूतगणं विजहार यथारुचि॥ १९॥शिवजीने भी कैलास नामक एक उत्तम स्थान बना लिया, जिसमें वे भूतगणोंको साथ लेकर इच्छानुसार विहार करने लगे॥ १९॥
स्वर्गस्त्रिविष्टपो मेरुशिखरोपरि कल्पितः।<br>तच्च स्थानं सुरेन्द्रस्य नानारत्नविराजितम्॥ २०॥सुमेरुपर्वतके एक शिखरपर देवलोक स्वर्गकी रचना हुई। वह इन्द्रलोक अनेक प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित तथा इन्द्रका निवास था॥ २०॥
समुद्रमथनात्प्राप्तः पारिजातस्तरूत्तमः।<br>चतुर्दन्तस्तथा नागः कामधेनुश्च कामदा॥ २१॥<br>उच्चैःश्रवास्तथाश्वो वै रम्भाद्याप्सरसस्तथा।<br>इन्द्रेणोपात्तमखिलं जातं वै स्वर्गभूषणम्॥ २२॥<br>धन्वन्तरिश्चन्द्रमाश्च सागराच्च समुद्बभौ।<br>स्वर्गस्थितौ विराजते देवौ बहुगुणैर्वृतौ॥ २३॥समुद्रमन्थनसे सर्वोत्तम वृक्ष पारिजात, चार दाँतोंवाला ऐरावत हाथी, कामना पूर्ण करनेवाली कामधेनु, उच्चैःश्रवा घोड़ा और रम्भा आदि अनेक अप्सराएँ निकलीं। इन्द्रने स्वर्गको सुशोभित करनेवाले इन सबको अपने पास रख लिया। धन्वन्तरिवैद्य तथा चन्द्रमा भी समुद्रसे निकले; वे दोनों देव अनेक गुणोंसे युक्त होकर स्वर्गमें रहते हुए शोभा पाने लगे॥ २१-२३॥
एवं सृष्टिः समुत्पन्ना त्रिविधा नृपसत्तम।<br>देवतैर्यङ्मनुष्यादिभेदैर्विविधकल्पिता ॥ २४॥<br>अण्डजाः स्वेदजाश्चैव चोद्भिजाश्च जरायुजाः।<br>चतुर्भेदैः समुत्पन्ना जीवाः कर्मयुताः किल॥ २५॥<br>एवं सृष्टिं समासाद्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>विहारं स्वेषु स्थानेषु चक्रुः सर्वे यथेप्सितम्॥ २६॥हे नृपश्रेष्ठ! इस तरह तीन प्रकारकी सृष्टि हुई। देवता, पशु-पक्षी और मानव आदि अनेक भेदोंसे यह सृष्टि कल्पित है। अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज तथा जरायुज—इन चार भेदोंसे अनेक जीवोंकी सृष्टि हुई। उन सभी जीवोंके साथ कर्मका बन्धन लगा हुआ है। इस प्रकार सृष्टि करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये सब अपने-अपने लोकोंमें इच्छापूर्वक विहार करने लगे॥ २४-२६॥