देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 318, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 318
| अ० १३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३०९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं प्रवर्तिते सर्गे भगवान्प्रभुरच्युतः ।<br>महालक्ष्म्या समं तत्र चिक्रीड भुवने स्वके ॥ २७ | इस प्रकार सृष्टिके विस्तृत हो जानेपर अच्युत भगवान् विष्णु अपने लोकमें लक्ष्मीके साथ विराजमान होकर आनन्द करने लगे ॥ २७ ॥ |
| एकस्मिन्समये विष्णुर्वैकुण्ठे संस्थितः पुरा ।<br>सुधासिन्धुस्थितं द्वीपं सस्मार मणिमण्डितम् ॥ २८<br><br>यत्र दृष्ट्वा महामायां मन्त्रश्चासादितः शुभः ।<br>स्मृत्वा तां परमां शक्तिं स्त्रीभावं गमितो यया ॥ २९<br><br>यज्ञं कर्तुं मनश्चक्रे अम्बिकाया रमापतिः ।<br>उत्तीर्य भुवनात्तस्मात्समाहूय महेश्वरम् ॥ ३० | एक समयकी बात है—भगवान् विष्णु वैकुण्ठमें विराजमान थे। उन्हें एकाएक अमृतसागरमें विद्यमान तथा मणियोंसे सुशोभित उस द्वीपका स्मरण हो आया, जहाँ महामायाका दर्शन करके उन्होंने शुभ मन्त्र प्राप्त किया था। तदनन्तर जिन भगवतीके द्वारा वे पुरुषसे स्त्री बना दिये गये थे, उन परमशक्तिका स्मरण करके लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुने अम्बायज्ञ करनेका मनमें निश्चय कर लिया ॥ २८-२९ १/२ ॥ |
| ब्रह्माणं वरुणं शक्रं कुबेरं पावकं यमम् ।<br>वसिष्ठं कश्यपं दक्षं वामदेवं बृहस्पतिम् ॥ ३१<br><br>सम्भारं कल्पयामास यज्ञार्थं चातिविस्तरम् ।<br>महाविभवसंयुक्तं सात्त्विकं च मनोहरम् ॥ ३२ | इसके बाद अपने धामसे उतरकर उन्होंने शिव, ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, कुबेर, अग्नि, यम, वसिष्ठ, कश्यप, दक्ष, वामदेव तथा बृहस्पतिको आमन्त्रित करके अत्यन्त विस्तारके साथ यज्ञ सम्पन्न करनेके लिये अत्यधिक मूल्यवाली, सात्त्विक तथा मनोरम बहुत-सी सामग्रियाँ एकत्र कीं ॥ ३०-३२ ॥ |
| मण्डपं विततं तत्र कारयामास शिल्पिभिः ।<br>ऋत्विजो वरयामास सप्तविंशतिसुव्रतान् ॥ ३३<br><br>चितिञ्च कारयामास वेदीश्चैव सुविस्तराः ।<br>प्रजेपुर्ब्राह्मणा मन्त्रान्देव्या बीजसमन्वितान् ॥ ३४ | उन्होंने शिल्पियोंद्वारा विशाल यज्ञमण्डप बनवाया और सत्ताईस महान् व्रती ऋत्विजोंका वरण किया। तत्पश्चात् अग्निस्थापनके लिये बड़ी-बड़ी वेदियाँ बनायी गयीं। ब्राह्मणगण बीजसहित देवीमन्त्रोंका जप करने लगे ॥ ३३-३४ ॥ |
| जुहुवुस्ते हविः कामं विधिवत्परिकल्पिते ।<br>कृते तु वितते होमे वागुवाचाशरीरिणी ॥ ३५<br><br>विष्णुं तदा समाभाष्य सुस्वरा मधुराक्षरा ।<br>विष्णो त्वं भव देवानां हरे श्रेष्ठतमः सदा ॥ ३६<br><br>मान्यश्च पूजनीयश्च समर्थश्च सुरेष्वपि ।<br>सर्वे त्वामर्चयिष्यन्ति ब्रह्माद्याश्च सवासवाः ॥ ३७ | विधिवत् प्रज्वलित की गयी अग्निमें वे ब्राह्मण यथेच्छ हव्य-पदार्थकी आहुति देने लगे। इस प्रकार विस्तृत होमकृत्य सम्पन्न होते ही भगवान् विष्णुको सम्बोधित करके मधुर अक्षरों तथा स्पष्ट स्वरोंसे युक्त आकाशवाणी हुई। हे हरे ! हे विष्णो ! आप सदा देवताओंमें श्रेष्ठतम होंगे। सभी देवगणोंमें आप मान्य, पूज्य तथा समर्थ होंगे। संसारमें इन्द्रसहित ब्रह्मा आदि सभी देवता आपकी अर्चना करेंगे ॥ ३५-३७ ॥ |
| प्रभविष्यन्ति भो भक्त्या मानवा भुवि सर्वतः ।<br>वरदस्त्वं च सर्वेषां भविता मानवेषु वै ॥ ३८ | हे विष्णो ! पृथ्वीपर सभी मानव आपकी भक्तिसे युक्त होकर रहेंगे और आप सभी मनुष्योंको वर देनेवाले होंगे ॥ ३८ ॥ |
| कामदः सर्वदेवानां परमः परमेश्वरः ।<br>सर्वयज्ञेषु मुख्यस्त्वं पूज्यः सर्वैश्च याज्ञिकैः ॥ ३९ | आप सभी देवताओंको वांछित फल प्रदान करनेवाले महान् परमेश्वर होंगे। सभी यज्ञोंमें प्रधानरूपसे सभी याज्ञिकोंके द्वारा आप ही पूजे जायँगे ॥ ३९ ॥ |