भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 319
३१०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वां जनाः पूजयिष्यन्ति वरदस्त्वं भविष्यसि।<br>श्रयिष्यन्ति च देवास्त्वां दानवैरतिपीडिताः॥ ४०<br>शरणस्त्वञ्च सर्वेषां भविता पुरुषोत्तम।<br>पुराणेषु च सर्वेषु वेदेषु विततेषु च॥ ४१<br>त्वं वै पूज्यतमः कामं कीर्तिस्तव भविष्यति।लोग आपकी पूजा करेंगे और आप उनके लिये वरदाता होंगे। राक्षसोंके द्वारा अत्यधिक प्रताड़ित किये जानेपर देवगण आपका आश्रय ग्रहण करेंगे। हे पुरुषोत्तम! आप सभीके शरणदाता होंगे। अत्यन्त विस्तारवाले वेदों तथा सभी पुराणोंमें आप ही पूज्यतम होंगे और आपकी महान् कीर्ति होगी॥ ४०-४१ ½॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भूतले॥ ४२<br>तदांशेनावतीर्याशु कर्तव्यं धर्मरक्षणम्।<br>अवतारः सुविख्याताः पृथिव्यां तव भागशः॥ ४३<br>भविष्यन्ति धरायां वै माननीया महात्मनाम्।<br>अवतारेषु सर्वेषु नानायोनिषु माधव॥ ४४<br>विख्यातः सर्वलोकेषु भविता मधुसूदन।<br>अवतारेषु सर्वेषु शक्तिस्ते सहचारिणी॥ ४५<br>भविष्यति ममांशेन सर्वकार्यप्रसाधिनी।<br>वाराही नारसिंही च नानाभेदैरनेकधा॥ ४६इस पृथ्वीतलपर जब-जब धर्मका ह्रास होगा तब-तब आप शीघ्र अपने अंशसे अवतार लेकर धर्मकी रक्षा करेंगे। आपके अंशसे उत्पन्न वे समस्त अवतार पृथ्वीपर अत्यन्त प्रसिद्ध होंगे और महात्मागण आपके उन अवतारोंका सम्मान करेंगे। हे माधव! नानाविध योनियोंमें आपके द्वारा लिये गये अवतारोंमें आप सभी लोकोंमें विख्यात होंगे। हे मधुसूदन! उन सभी अवतारोंमें मेरे अंशसे उत्पन्न शक्ति सदा आपकी सहचारिणी होगी और आपके समस्त कार्योंको सम्पन्न करेगी। वह शक्ति वाराही, नारसिंही आदि भेदोंसे अनेक प्रकारकी होगी॥ ४२-४६॥
नानायुधाः शुभाकाराः सर्वाभरणमण्डिताः।<br>ताभिर्युक्तः सदा विष्णो सुरकार्याणि माधव॥ ४७<br>साधयिष्यसि तत्सर्वं मदत्तवरदानतः।<br>तास्त्वया नावमन्तव्याः सर्वदा गर्वलेशतः॥ ४८वे शक्तियाँ सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत, भव्य स्वरूपवाली एवं नानाविध शस्त्रास्त्रोंसे सज्जित होंगी। हे विष्णो! आप उन शक्तियोंसे सदैव युक्त रहेंगे। हे माधव! मेरे द्वारा प्रदत्त वरदानके प्रभावसे आप देवताओंके समस्त कार्य सिद्ध करेंगे। आप लेशमात्र भी अभिमान करके उन शक्तियोंका कभी अपमान न कीजियेगा, अपितु हर प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक उन शक्तियोंका पूजन तथा सम्मान कीजियेगा॥ ४७-४८ ½॥
पूजनीयाः प्रयत्नेन माननीयाश्च सर्वथा।<br>नूनं ता भारते खण्डे शक्तयः सर्वकामदाः॥ ४९<br>भविष्यन्ति मनुष्याणां पूजिताः प्रतिमासु च।<br>तासां तव च देवेश कीर्तिः स्यादखिलेष्वपि॥ ५०समस्त कामनाओंको प्रदान करनेवाली वे शक्तियाँ भारतवर्षमें मनुष्योंद्वारा विविध प्रतिमाओंमें प्रतिष्ठित होकर पूजी जायँगी। हे देवेश! उन शक्तियोंकी तथा आपकी कीर्ति पृथ्वीमण्डल तथा समस्त सातों द्वीपोंमें प्रसिद्ध होगी॥ ४९-५० ½॥
द्वीपेषु सप्तस्वपि च विख्याता भुवि मण्डले।<br>ताश्च त्वां वै महाभाग मानवा भुवि मण्डले॥ ५१<br>अर्चयिष्यन्ति वाञ्छार्थं सकामाः सततं हरे।<br>अर्चासु चोपहारैश्च नानाभावसमन्विताः॥ ५२<br>पूजयिष्यन्ति वेदोक्तैर्मन्त्रैर्नामजपैस्तथा।हे महाभाग! भूमण्डलपर सकाम मनुष्य अपने मनोरथोंको पूर्ण करनेके लिये आपकी तथा उन शक्तियोंकी निरन्तर उपासना करेंगे। हे हरे! वे लोग अर्चनाओंमें अनेक भावोंसे युक्त होकर नानाविध उपहारों, वैदिक मन्त्रों तथा नामजपसे आपकी आराधना