भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० १४ ]तृतीय स्कन्ध३११

| महिमा तव भूर्लोके स्वर्गे च मधुसूदन ॥ ५३<br>पूजनाद्देवदेवेश वृद्धिमेष्यति मानवैः ।<br>व्यास उवाच<br>इति दत्त्वा वराण्वाणी विरराम खसम्भवा ॥ ५४<br>भगवानपि प्रीतात्मा हृष्टवच्छ्रवणाद्दिव ।<br>समाप्य विधिवद्यज्ञं भगवान्हरिरीश्वरः ॥ ५५<br>विसर्जयित्वा तान्देवान्ब्रह्मपुत्रान्मुनीनथ ।<br>जगामानुचरैः सार्धं वैकुण्ठं गरुडध्वजः ॥ ५६<br>स्वानि स्वानि च धिष्ण्यानि पुनः सर्वे सुरास्ततः ।<br>मुनयो विस्मिता वार्तां कुर्वन्तस्ते परस्परम् ॥ ५७<br>ययुः प्रमुदिताः कामं स्वाश्रमान्पावनानथ ॥ ५८<br>श्रुत्वा वाणीं परमविशदां व्योमजां श्रोत्ररम्यां<br>सर्वेषां वै प्रकृतिविषये भक्तिभावश्च जातः ।<br>चक्रुः सर्वे द्विजमुनिगणाः पूजनं भक्तियुक्ता-<br>स्तस्याः कामं निखिलफलदं चागमोक्तं मुनीन्द्राः ॥ ५९ | करेंगे। हे मधुसूदन! हे देवदेवेश! मनुष्योंके द्वारा सुपूजित होनेके कारण आपकी महिमा पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोकमें वृद्धिको प्राप्त होगी॥ ५१—५३ १/२॥<br>व्यासजी बोले— इस प्रकार भगवान् विष्णुको वरदान देकर वह आकाशवाणी चुप हो गयी। उसे सुनते ही भगवान् विष्णु भी प्रसन्नचित्त हो गये। तत्पश्चात् यज्ञका विधिपूर्वक समापन करके तथा उन देवताओं, ब्रह्मपुत्रों और मुनियोंको विदा करके सर्वसमर्थ गरुडध्वज भगवान् विष्णु अपने अनुचरोंके साथ वैकुण्ठलोकको चले गये॥ ५४—५६॥<br>तदनन्तर विस्मयके साथ यज्ञविषयक वार्ता करते हुए वे समस्त देवता अपने-अपने लोकोंको तथा मुनिजन अपने-अपने पवित्र आश्रमोंको अति प्रसन्नतापूर्वक चले गये॥ ५७-५८॥<br>आकाशसे प्रादुर्भूत उस कर्णप्रिय तथा परम विशद वाणीको सुनकर सबके हृदयमें परा प्रकृतिके प्रति भक्तिभाव उत्पन्न हो गया। हे मुनीन्द्रो! अतएव वे सभी ब्राह्मण तथा मुनिजन भक्तिपरायण होकर उन भगवतीका पूजन करने लगे, जो वेदशास्त्रोंमें वर्णित है तथा सम्पूर्ण वांछित फलोंको प्रदान करनेवाला है॥ ५९॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे अम्बिकामखस्य विष्ण्वनुष्ठानवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥


अथ चतुर्दशोऽध्यायः

देवीमाहात्म्यसे सम्बन्धित राजा ध्रुवसन्धिकी कथा, ध्रुवसन्धिकी मृत्युके बाद राजा युधाजित् और वीरसेनका अपने-अपने दौहित्रोंके पक्षमें विवाद

| जनमेजय उवाच<br>श्रुतो वै हरिणा क्लृप्तो यज्ञो विस्तरतो द्विज ।<br>महिमानं तथाम्बाया वद विस्तरतो मम ॥ १<br>श्रुत्वा देव्याश्चरित्रं वै कुर्वे मखमनुत्तमम् ।<br>प्रसादात्तव विप्रेन्द्र भविष्यामि च पावनः ॥ २<br>व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्याश्चरितमुत्तमम् ।<br>इतिहासं पुराणञ्च कथयामि सुविस्तरम् ॥ ३ | जनमेजय बोले— हे द्विज! मैंने विष्णुद्वारा किये गये देवीयज्ञके विषयमें विस्तारपूर्वक सुन लिया। अब आप मुझे विस्तृत रूपसे भगवतीकी महिमा बताइये॥ १॥<br>हे विप्रेन्द्र! देवीका चरित्र सुनकर मैं भी वह उत्कृष्ट देवीयज्ञ अवश्य करूँगा और इस प्रकार आपकी कृपासे पवित्र हो जाऊँगा॥ २॥<br>व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, अब मैं भगवतीके उत्तम चरित्रका वर्णन करूँगा। मैं इसके साथ-साथ विस्तृत इतिहास तथा पुराण भी कहूँगा॥ ३॥ |