भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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३१२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कोसलेषु नृपश्रेष्ठः सूर्यवंशसमुद्भवः।<br>पुष्यपुत्रो महातेजा ध्रुवसन्धिरिति स्मृतः॥ ४कोसलदेशमें सूर्यवंशमें एक महातेजस्वी श्रेष्ठ राजा उत्पन्न हुए। वे महाराज पुष्यके पुत्र थे और ध्रुवसन्धिके नामसे विख्यात थे॥ ४॥
धर्मात्मा सत्यसन्धश्च वर्णाश्रमहिते रतः।<br>अयोध्यायां समृद्धायां राज्यं चक्रे शुचिव्रतः॥ ५वे धर्मात्मा, सत्यनिष्ठ तथा वर्णाश्रम-धर्मकी रक्षाके लिये सदा तत्पर रहते थे। पवित्र व्रतधारी वे ध्रुवसन्धि वैभवशालिनी अयोध्यानगरीमें राज्य करते थे॥ ५॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये तथा द्विजाः।<br>स्वां स्वां वृत्तिं समास्थाय तद्राज्ये धर्मतोऽभवन्॥ ६<br><br>न चौराः पिशुना धूर्तास्तस्य राज्ये च कुत्रचित्।<br>दम्भाः कृतघ्ना मूर्खाश्च वसन्ति किल मानवाः॥ ७उनके राज्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, द्विजगण तथा अन्य सभी अपनी-अपनी जीविकामें तत्पर रहकर धर्मपूर्वक आचरण करते थे। उनके राज्यमें कहीं भी चोर, निन्दक, धूर्त, पाखण्डी, कृतघ्न तथा मूर्ख मनुष्य निवास नहीं करते थे॥ ६-७॥
एवं वै वर्तमानस्य नृपस्य कुरुसत्तम।<br>द्वे पत्न्यौ रूपसम्पन्ने ह्यासतुः कामभोगदे॥ ८<br><br>मनोरमा धर्मपत्नी सुरूपातिविचक्षणा।<br>लीलावती द्वितीया च सापि रूपगुणान्विता॥ ९हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार धर्मपूर्वक राज्य करते हुए उन राजाकी रूपवती तथा आनन्दोपभोग प्रदान करनेवाली दो पत्नियाँ थीं। उनकी धर्मपत्नी मनोरमा थी, जो सुन्दर रूपवाली तथा परम विदुषी थी और दूसरी पत्नी लीलावती थी; वह भी रूप तथा गुणोंसे सम्पन्न थी॥ ८-९॥
विजहार सपत्नीभ्यां गृहेषूपवनेषु च।<br>क्रीडागिरौ दीर्घिकासु सौधेषु विविधेषु च॥ १०महाराज ध्रुवसन्धि उन दोनों पत्नियोंके साथ राजभवनों, उपवनों, क्रीड़ापर्वत, बावलियों तथा विभिन्न महलोंमें विहार करते थे॥ १०॥
मनोरमा शुभे काले सुषुवे पुत्रमुत्तमम्।<br>सुदर्शनाभिधं पुत्रं राजलक्षणसंयुक्तम्॥ ११रानी मनोरमाने शुभ वेलामें राजलक्षणोंसे सम्पन्न एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया। उसका नाम सुदर्शन पड़ा॥ ११॥
लीलावत्यपि तत्पत्नी मासेनेकेन भामिनी।<br>सुषुवे सुन्दरं पुत्रं शुभे पक्षे दिने तथा॥ १२उनकी दूसरी सुन्दर पत्नी लीलावतीने भी एक माहके भीतर शुभ पक्ष तथा शुभ दिनमें एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया॥ १२॥
चकार नृपतिस्तत्र जातकर्मादिकं द्वयोः।<br>ददौ दानानि विप्रेभ्यः पुत्रजन्मप्रमोदितः॥ १३महाराज ध्रुवसन्धिने उन दोनों बालकोंका जातकर्म आदि संस्कार किया तथा पुत्र-जन्मसे प्रमुदित एवं उल्लसित होकर उन्होंने ब्राह्मणोंको नानाविध दान दिये॥ १३॥
प्रीतिं तयोः समां राजा चकार सुतयोर्नृप।<br>नृपश्चकार सौहार्देष्वन्तरं न कदाचन॥ १४हे राजन्! महाराज ध्रुवसन्धि उन दोनों पुत्रोंपर समान प्रीति रखते थे। वे उन दोनोंके प्रति अपने प्रेम-भावमें कभी भी अन्तर नहीं आने देते थे॥ १४॥
चूडाकर्म तयोश्चक्रे विधिना नृपसत्तमः।<br>यथाविभवमेवासौ प्रीतियुक्तः परन्तपः॥ १५परम तपस्वी उन राजेन्द्रने अपने वैभवके अनुसार बड़े हर्षोल्लासके साथ विधिपूर्वक उन दोनोंका चूडाकर्म-संस्कार किया॥ १५॥