देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० १४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३१३ | | :--- | :--- |
| कृतचूडौ सुतौ कामं जह्रतुर्नृपतेर्मनः।<br>क्रीडमानावुभौ कान्तौ लोकानामनुरञ्जकौ॥ १६ | चूडाकर्म-संस्कार हो जानेपर उन दोनों बालकोंने राजाके मनको मोहित कर लिया; वे दोनों कान्तिमान् बालक खेलते समय सभी लोगोंको मुग्ध कर लेते थे॥ १६॥ |
| तयोः सुदर्शनो ज्येष्ठो लीलावत्याः सुतः शुभः।<br>शत्रुजित्संज्ञकः कामं चाटुवाक्यो बभूव ह॥ १७ | उन दोनोंमें [मनोरमाका पुत्र] सुदर्शन ज्येष्ठ था। लीलावतीका शत्रुजित् नामक पुत्र अत्यन्त सुन्दर तथा मृदुभाषी था॥ १७॥ |
| नृपतेः प्रीतिजनको मञ्जुवाक्चारुदर्शनः।<br>प्रजानां वल्लभः सोऽभूत्तथा मन्त्रिजनस्य वै॥ १८ | उसके मधुरभाषी तथा अत्यन्त सुन्दर होनेके कारण राजा उससे अधिक प्रेम करने लगे और उसी तरहसे वह प्रजाजनों तथा मन्त्रियोंका भी प्रियपात्र बन गया॥ १८॥ |
| यथा तस्मिन्नृपः प्रीतिं चकार गुणयोगतः।<br>मन्दभाग्यान्मन्दभावो न तथा वै सुदर्शने॥ १९ | शत्रुजित्के गुणोंके कारण राजाका जैसा प्रेम उसपर हो गया, वैसा प्रेम सुदर्शनके प्रति नहीं था। वे सुदर्शनके प्रति मन्दभाग्य होनेके कारण कम अनुराग रखने लगे॥ १९॥ |
| एवं गच्छति काले तु ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः।<br>जगाम वनमध्येऽसौ मृगयाभिरतः सदा॥ २० | इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर आखेटके प्रति सदा तत्पर रहनेवाले नृपश्रेष्ठ ध्रुवसन्धि आखेटके लिये वनमें गये॥ २०॥ |
| निघ्नन्मृगान् रुरूंश्कम्बून्सूकरानावयाञ्छशान्।<br>महिषाञ्छरभान्खड्गांश्चिक्रीड नृपतिर्वने॥ २१ | वे राजा ध्रुवसन्धि वनमें रुरु मृगों, बनैले सूअरों, गवयों, खरगोशों, भैंसों, शरभों तथा गैंडोंको मारते हुए आखेट करने लगे॥ २१॥ |
| क्रीडमाने नृपे तत्र वने घोरऽतिदारुणे।<br>उदतिष्ठन्निकुञ्जात्तु सिंहः परमकोपनः॥ २२ | जब महाराज उस गहन तथा महाभयंकर वनमें शिकार खेल रहे थे, उसी समय महान् रोषमें भरा हुआ एक सिंह झाड़ीसे निकला॥ २२॥ |
| राज्ञा शिलीमुखेनादौ विद्धः क्रोधवशं गतः।<br>दृष्ट्वाग्रे नृपतिं सिंहो ननाद मेघनिःस्वनः॥ २३ | पहले तो राजाने उसे बाणसे आहत कर दिया; तब अत्यन्त कोपाविष्ट वह सिंह उन्हें अपने सामने देखकर मेघके समान गरजने लगा॥ २३॥ |
| कृत्वा चोर्ध्वं स लाङ्गूलं प्रसारितबृहत्सटः।<br>हन्तुं नृपतिमाकाशादुत्पपातातिकोपनः॥ २४ | अपनी पूँछ खड़ी करके तथा गर्दनके लम्बे केशोंको छितराकर अत्यन्त कुपित वह सिंह राजाको मारनेके लिये छलाँग लगाकर उनपर झपटा॥ २४॥ |
| नृपतिस्तरसा वीक्ष्य दधारासिं करे तदा।<br>वामे चर्म समादाय स्थितः सिंह इवापरः॥ २५ | तब उसे देखकर राजाने भी तत्काल अपने हाथमें तलवार धारण कर ली और बायें हाथमें ढाल लेकर दूसरे सिंहके समान खड़े हो गये॥ २५॥ |
| सेवकास्तस्य ये सर्वे तेऽपि बाणान्मृथक्पृथक्।<br>अमुञ्चन्कुपिताः कामं सिंहोपरि रुषान्विताः॥ २६ | यह देखकर उनके जो सेवकगण थे, वे सभी अत्यन्त कुपित हो उठे और रोषपूर्वक उस सिंहपर अलग-अलग बाणोंसे प्रहार करने लगे॥ २६॥ |