भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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३१४श्रीमद्देवीभागवत[अ० १४

| हाहाकारो महानासीत्संप्रहारश्च दारुणः।<br>उत्पपात ततः सिंहो नृपस्योपरि दारुणः॥ २७ | वहाँ महान् हाहाकार मच गया तथा भीषण प्रहार होने लगा। इसी बीच वह भयानक सिंह राजापर टूट पड़ा॥ २७॥ | | तं पतन्तं समालोक्य खड्गेनाभ्यहनन्नृपः।<br>सोऽपि क्रूरैर्नखाग्रैश्च तत्रागत्य विदारितः॥ २८ | उसे अपने ऊपर झपटते देखकर राजाने खड्गसे उसपर प्रहार किया। उस सिंहने भी राजाके समीप आकर अपने भयानक तथा तीक्ष्ण नखोंसे राजाको क्षत-विक्षत कर डाला॥ २८॥ | | स नखैराहतो राजा पपात च ममार वै।<br>चुक्रुशुः सैनिकास्ते तु निर्जघ्नुर्विशिखैस्तदा॥ २९<br><br>मृतः सिंहोऽपि तत्रैव भूपतिश्च तथा मृतः।<br>सैनिकैर्मन्त्रिमुख्याश्च तत्रागत्य निवेदिताः॥ ३० | नखोंके प्रहारसे आहत होकर राजा गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गयी। इससे सभी सैनिक और भी क्रोधित हो उठे; तब वे बाणोंसे सिंहपर भीषण प्रहार करने लगे। इस प्रकार राजा ध्रुवसन्धि तथा वह सिंह दोनों मर गये। तदनन्तर सैनिकोंने आकर मन्त्रिप्रवरोंको यह समाचार बताया॥ २९-३०॥ | | परलोकगतं भूपं श्रुत्वा ते मन्त्रिसत्तमाः।<br>संस्कारं कारयामासुर्गत्वा तत्र वनान्तिके॥ ३१ | राजाके परलोकगमनका समाचार सुनकर उन श्रेष्ठ मन्त्रियोंने उस वनमें जाकर उनका दाह-संस्कार करवाया॥ ३१॥ | | परलोकक्रियां सर्वां वसिष्ठो विधिपूर्वकम्।<br>कारयामास तत्रैव परलोकसुखावहाम्॥ ३२ | वहींपर गुरु वसिष्ठने परलोकमें सुख प्रदान करनेवाले सभी श्राद्ध आदि पारलौकिक कृत्य विधिपूर्वक सम्पन्न करवाये॥ ३२॥ | | प्रजाः प्रकृतयश्चैव वसिष्ठश्च महामुनिः।<br>सुदर्शनं नृपं कर्तुं मन्त्रं चक्रुः परस्परम्॥ ३३ | तदनन्तर प्रजाजनों, मन्त्रियों तथा महामुनि वसिष्ठने सुदर्शनको राजा बनानेके उद्देश्यसे आपसमें विचार-विमर्श किया॥ ३३॥ | | धर्मपत्नीसुतः शान्तः पुरुषश्च सुलक्षणः।<br>अयं नृपासनार्हश्च ह्यब्रुवन्मन्त्रिसत्तमाः॥ ३४ | श्रेष्ठ मन्त्रियोंने कहा कि सुदर्शन महाराजकी धर्मपत्नी मनोरमाके पुत्र हैं, शान्त स्वभाववाले पुरुष हैं तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न हैं, अतः ये राजसिंहासनके योग्य हैं॥ ३४॥ | | वसिष्ठोऽपि तथैवाह योग्योऽयं नृपतेः सुतः।<br>बालोऽपि धर्मवान् राजा नृपासनमिहार्हति॥ ३५ | गुरु वसिष्ठने भी वही बात कही कि महाराजका यह पुत्र सुदर्शन राजपिके योग्य है; क्योंकि बालक होते हुए भी धर्मपरायण राजकुमार ही राजसिंहासनका अधिकारी होता है॥ ३५॥ | | कृते मन्त्रे मन्त्रिवृद्धैर्युधाजिन्नाम पार्थिवः।<br>तत्राजगाम तरसा श्रुत्वा तूज्जयिनीपतिः॥ ३६ | वयोवृद्ध मन्त्रियोंके द्वारा इस प्रकार विचार करनेके उपरान्त यह समाचार सुनकर उज्जयिनीनरेश राजा युधाजित् शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे॥ ३६॥ | | मृतं जामातरं श्रुत्वा लीलावत्याः पिता तदा।<br>तत्राजगाम त्वरितो दौहित्रप्रियकाम्यया॥ ३७ | लीलावतीके पिता युधाजित् अपने दामादकी मृत्युके विषयमें सुनकर अपने दौहित्रके हितकी कामनासे उस समय शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये॥ ३७॥ |