देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० १४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३११ |
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| महिमा तव भूर्लोके स्वर्गे च मधुसूदन ॥ ५३<br>पूजनाद्देवदेवेश वृद्धिमेष्यति मानवैः ।<br>व्यास उवाच<br>इति दत्त्वा वराण्वाणी विरराम खसम्भवा ॥ ५४<br>भगवानपि प्रीतात्मा हृष्टवच्छ्रवणाद्दिव ।<br>समाप्य विधिवद्यज्ञं भगवान्हरिरीश्वरः ॥ ५५<br>विसर्जयित्वा तान्देवान्ब्रह्मपुत्रान्मुनीनथ ।<br>जगामानुचरैः सार्धं वैकुण्ठं गरुडध्वजः ॥ ५६<br>स्वानि स्वानि च धिष्ण्यानि पुनः सर्वे सुरास्ततः ।<br>मुनयो विस्मिता वार्तां कुर्वन्तस्ते परस्परम् ॥ ५७<br>ययुः प्रमुदिताः कामं स्वाश्रमान्पावनानथ ॥ ५८<br>श्रुत्वा वाणीं परमविशदां व्योमजां श्रोत्ररम्यां<br>सर्वेषां वै प्रकृतिविषये भक्तिभावश्च जातः ।<br>चक्रुः सर्वे द्विजमुनिगणाः पूजनं भक्तियुक्ता-<br>स्तस्याः कामं निखिलफलदं चागमोक्तं मुनीन्द्राः ॥ ५९ | करेंगे। हे मधुसूदन! हे देवदेवेश! मनुष्योंके द्वारा सुपूजित होनेके कारण आपकी महिमा पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोकमें वृद्धिको प्राप्त होगी॥ ५१—५३ १/२॥<br>व्यासजी बोले— इस प्रकार भगवान् विष्णुको वरदान देकर वह आकाशवाणी चुप हो गयी। उसे सुनते ही भगवान् विष्णु भी प्रसन्नचित्त हो गये। तत्पश्चात् यज्ञका विधिपूर्वक समापन करके तथा उन देवताओं, ब्रह्मपुत्रों और मुनियोंको विदा करके सर्वसमर्थ गरुडध्वज भगवान् विष्णु अपने अनुचरोंके साथ वैकुण्ठलोकको चले गये॥ ५४—५६॥<br>तदनन्तर विस्मयके साथ यज्ञविषयक वार्ता करते हुए वे समस्त देवता अपने-अपने लोकोंको तथा मुनिजन अपने-अपने पवित्र आश्रमोंको अति प्रसन्नतापूर्वक चले गये॥ ५७-५८॥<br>आकाशसे प्रादुर्भूत उस कर्णप्रिय तथा परम विशद वाणीको सुनकर सबके हृदयमें परा प्रकृतिके प्रति भक्तिभाव उत्पन्न हो गया। हे मुनीन्द्रो! अतएव वे सभी ब्राह्मण तथा मुनिजन भक्तिपरायण होकर उन भगवतीका पूजन करने लगे, जो वेदशास्त्रोंमें वर्णित है तथा सम्पूर्ण वांछित फलोंको प्रदान करनेवाला है॥ ५९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे अम्बिकामखस्य विष्ण्वनुष्ठानवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
देवीमाहात्म्यसे सम्बन्धित राजा ध्रुवसन्धिकी कथा, ध्रुवसन्धिकी मृत्युके बाद राजा युधाजित् और वीरसेनका अपने-अपने दौहित्रोंके पक्षमें विवाद
| जनमेजय उवाच<br>श्रुतो वै हरिणा क्लृप्तो यज्ञो विस्तरतो द्विज ।<br>महिमानं तथाम्बाया वद विस्तरतो मम ॥ १<br>श्रुत्वा देव्याश्चरित्रं वै कुर्वे मखमनुत्तमम् ।<br>प्रसादात्तव विप्रेन्द्र भविष्यामि च पावनः ॥ २<br>व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्याश्चरितमुत्तमम् ।<br>इतिहासं पुराणञ्च कथयामि सुविस्तरम् ॥ ३ | जनमेजय बोले— हे द्विज! मैंने विष्णुद्वारा किये गये देवीयज्ञके विषयमें विस्तारपूर्वक सुन लिया। अब आप मुझे विस्तृत रूपसे भगवतीकी महिमा बताइये॥ १॥<br>हे विप्रेन्द्र! देवीका चरित्र सुनकर मैं भी वह उत्कृष्ट देवीयज्ञ अवश्य करूँगा और इस प्रकार आपकी कृपासे पवित्र हो जाऊँगा॥ २॥<br>व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, अब मैं भगवतीके उत्तम चरित्रका वर्णन करूँगा। मैं इसके साथ-साथ विस्तृत इतिहास तथा पुराण भी कहूँगा॥ ३॥ |
| ३१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कोसलेषु नृपश्रेष्ठः सूर्यवंशसमुद्भवः।<br>पुष्यपुत्रो महातेजा ध्रुवसन्धिरिति स्मृतः॥ ४ | कोसलदेशमें सूर्यवंशमें एक महातेजस्वी श्रेष्ठ राजा उत्पन्न हुए। वे महाराज पुष्यके पुत्र थे और ध्रुवसन्धिके नामसे विख्यात थे॥ ४॥ |
| धर्मात्मा सत्यसन्धश्च वर्णाश्रमहिते रतः।<br>अयोध्यायां समृद्धायां राज्यं चक्रे शुचिव्रतः॥ ५ | वे धर्मात्मा, सत्यनिष्ठ तथा वर्णाश्रम-धर्मकी रक्षाके लिये सदा तत्पर रहते थे। पवित्र व्रतधारी वे ध्रुवसन्धि वैभवशालिनी अयोध्यानगरीमें राज्य करते थे॥ ५॥ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये तथा द्विजाः।<br>स्वां स्वां वृत्तिं समास्थाय तद्राज्ये धर्मतोऽभवन्॥ ६<br><br>न चौराः पिशुना धूर्तास्तस्य राज्ये च कुत्रचित्।<br>दम्भाः कृतघ्ना मूर्खाश्च वसन्ति किल मानवाः॥ ७ | उनके राज्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, द्विजगण तथा अन्य सभी अपनी-अपनी जीविकामें तत्पर रहकर धर्मपूर्वक आचरण करते थे। उनके राज्यमें कहीं भी चोर, निन्दक, धूर्त, पाखण्डी, कृतघ्न तथा मूर्ख मनुष्य निवास नहीं करते थे॥ ६-७॥ |
| एवं वै वर्तमानस्य नृपस्य कुरुसत्तम।<br>द्वे पत्न्यौ रूपसम्पन्ने ह्यासतुः कामभोगदे॥ ८<br><br>मनोरमा धर्मपत्नी सुरूपातिविचक्षणा।<br>लीलावती द्वितीया च सापि रूपगुणान्विता॥ ९ | हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार धर्मपूर्वक राज्य करते हुए उन राजाकी रूपवती तथा आनन्दोपभोग प्रदान करनेवाली दो पत्नियाँ थीं। उनकी धर्मपत्नी मनोरमा थी, जो सुन्दर रूपवाली तथा परम विदुषी थी और दूसरी पत्नी लीलावती थी; वह भी रूप तथा गुणोंसे सम्पन्न थी॥ ८-९॥ |
| विजहार सपत्नीभ्यां गृहेषूपवनेषु च।<br>क्रीडागिरौ दीर्घिकासु सौधेषु विविधेषु च॥ १० | महाराज ध्रुवसन्धि उन दोनों पत्नियोंके साथ राजभवनों, उपवनों, क्रीड़ापर्वत, बावलियों तथा विभिन्न महलोंमें विहार करते थे॥ १०॥ |
| मनोरमा शुभे काले सुषुवे पुत्रमुत्तमम्।<br>सुदर्शनाभिधं पुत्रं राजलक्षणसंयुक्तम्॥ ११ | रानी मनोरमाने शुभ वेलामें राजलक्षणोंसे सम्पन्न एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया। उसका नाम सुदर्शन पड़ा॥ ११॥ |
| लीलावत्यपि तत्पत्नी मासेनेकेन भामिनी।<br>सुषुवे सुन्दरं पुत्रं शुभे पक्षे दिने तथा॥ १२ | उनकी दूसरी सुन्दर पत्नी लीलावतीने भी एक माहके भीतर शुभ पक्ष तथा शुभ दिनमें एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया॥ १२॥ |
| चकार नृपतिस्तत्र जातकर्मादिकं द्वयोः।<br>ददौ दानानि विप्रेभ्यः पुत्रजन्मप्रमोदितः॥ १३ | महाराज ध्रुवसन्धिने उन दोनों बालकोंका जातकर्म आदि संस्कार किया तथा पुत्र-जन्मसे प्रमुदित एवं उल्लसित होकर उन्होंने ब्राह्मणोंको नानाविध दान दिये॥ १३॥ |
| प्रीतिं तयोः समां राजा चकार सुतयोर्नृप।<br>नृपश्चकार सौहार्देष्वन्तरं न कदाचन॥ १४ | हे राजन्! महाराज ध्रुवसन्धि उन दोनों पुत्रोंपर समान प्रीति रखते थे। वे उन दोनोंके प्रति अपने प्रेम-भावमें कभी भी अन्तर नहीं आने देते थे॥ १४॥ |
| चूडाकर्म तयोश्चक्रे विधिना नृपसत्तमः।<br>यथाविभवमेवासौ प्रीतियुक्तः परन्तपः॥ १५ | परम तपस्वी उन राजेन्द्रने अपने वैभवके अनुसार बड़े हर्षोल्लासके साथ विधिपूर्वक उन दोनोंका चूडाकर्म-संस्कार किया॥ १५॥ |
| अ० १४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३१३ | | :--- | :--- |
| कृतचूडौ सुतौ कामं जह्रतुर्नृपतेर्मनः।<br>क्रीडमानावुभौ कान्तौ लोकानामनुरञ्जकौ॥ १६ | चूडाकर्म-संस्कार हो जानेपर उन दोनों बालकोंने राजाके मनको मोहित कर लिया; वे दोनों कान्तिमान् बालक खेलते समय सभी लोगोंको मुग्ध कर लेते थे॥ १६॥ |
| तयोः सुदर्शनो ज्येष्ठो लीलावत्याः सुतः शुभः।<br>शत्रुजित्संज्ञकः कामं चाटुवाक्यो बभूव ह॥ १७ | उन दोनोंमें [मनोरमाका पुत्र] सुदर्शन ज्येष्ठ था। लीलावतीका शत्रुजित् नामक पुत्र अत्यन्त सुन्दर तथा मृदुभाषी था॥ १७॥ |
| नृपतेः प्रीतिजनको मञ्जुवाक्चारुदर्शनः।<br>प्रजानां वल्लभः सोऽभूत्तथा मन्त्रिजनस्य वै॥ १८ | उसके मधुरभाषी तथा अत्यन्त सुन्दर होनेके कारण राजा उससे अधिक प्रेम करने लगे और उसी तरहसे वह प्रजाजनों तथा मन्त्रियोंका भी प्रियपात्र बन गया॥ १८॥ |
| यथा तस्मिन्नृपः प्रीतिं चकार गुणयोगतः।<br>मन्दभाग्यान्मन्दभावो न तथा वै सुदर्शने॥ १९ | शत्रुजित्के गुणोंके कारण राजाका जैसा प्रेम उसपर हो गया, वैसा प्रेम सुदर्शनके प्रति नहीं था। वे सुदर्शनके प्रति मन्दभाग्य होनेके कारण कम अनुराग रखने लगे॥ १९॥ |
| एवं गच्छति काले तु ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः।<br>जगाम वनमध्येऽसौ मृगयाभिरतः सदा॥ २० | इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर आखेटके प्रति सदा तत्पर रहनेवाले नृपश्रेष्ठ ध्रुवसन्धि आखेटके लिये वनमें गये॥ २०॥ |
| निघ्नन्मृगान् रुरूंश्कम्बून्सूकरानावयाञ्छशान्।<br>महिषाञ्छरभान्खड्गांश्चिक्रीड नृपतिर्वने॥ २१ | वे राजा ध्रुवसन्धि वनमें रुरु मृगों, बनैले सूअरों, गवयों, खरगोशों, भैंसों, शरभों तथा गैंडोंको मारते हुए आखेट करने लगे॥ २१॥ |
| क्रीडमाने नृपे तत्र वने घोरऽतिदारुणे।<br>उदतिष्ठन्निकुञ्जात्तु सिंहः परमकोपनः॥ २२ | जब महाराज उस गहन तथा महाभयंकर वनमें शिकार खेल रहे थे, उसी समय महान् रोषमें भरा हुआ एक सिंह झाड़ीसे निकला॥ २२॥ |
| राज्ञा शिलीमुखेनादौ विद्धः क्रोधवशं गतः।<br>दृष्ट्वाग्रे नृपतिं सिंहो ननाद मेघनिःस्वनः॥ २३ | पहले तो राजाने उसे बाणसे आहत कर दिया; तब अत्यन्त कोपाविष्ट वह सिंह उन्हें अपने सामने देखकर मेघके समान गरजने लगा॥ २३॥ |
| कृत्वा चोर्ध्वं स लाङ्गूलं प्रसारितबृहत्सटः।<br>हन्तुं नृपतिमाकाशादुत्पपातातिकोपनः॥ २४ | अपनी पूँछ खड़ी करके तथा गर्दनके लम्बे केशोंको छितराकर अत्यन्त कुपित वह सिंह राजाको मारनेके लिये छलाँग लगाकर उनपर झपटा॥ २४॥ |
| नृपतिस्तरसा वीक्ष्य दधारासिं करे तदा।<br>वामे चर्म समादाय स्थितः सिंह इवापरः॥ २५ | तब उसे देखकर राजाने भी तत्काल अपने हाथमें तलवार धारण कर ली और बायें हाथमें ढाल लेकर दूसरे सिंहके समान खड़े हो गये॥ २५॥ |
| सेवकास्तस्य ये सर्वे तेऽपि बाणान्मृथक्पृथक्।<br>अमुञ्चन्कुपिताः कामं सिंहोपरि रुषान्विताः॥ २६ | यह देखकर उनके जो सेवकगण थे, वे सभी अत्यन्त कुपित हो उठे और रोषपूर्वक उस सिंहपर अलग-अलग बाणोंसे प्रहार करने लगे॥ २६॥ |
| ३१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १४ |
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| हाहाकारो महानासीत्संप्रहारश्च दारुणः।<br>उत्पपात ततः सिंहो नृपस्योपरि दारुणः॥ २७ | वहाँ महान् हाहाकार मच गया तथा भीषण प्रहार होने लगा। इसी बीच वह भयानक सिंह राजापर टूट पड़ा॥ २७॥ | | तं पतन्तं समालोक्य खड्गेनाभ्यहनन्नृपः।<br>सोऽपि क्रूरैर्नखाग्रैश्च तत्रागत्य विदारितः॥ २८ | उसे अपने ऊपर झपटते देखकर राजाने खड्गसे उसपर प्रहार किया। उस सिंहने भी राजाके समीप आकर अपने भयानक तथा तीक्ष्ण नखोंसे राजाको क्षत-विक्षत कर डाला॥ २८॥ | | स नखैराहतो राजा पपात च ममार वै।<br>चुक्रुशुः सैनिकास्ते तु निर्जघ्नुर्विशिखैस्तदा॥ २९<br><br>मृतः सिंहोऽपि तत्रैव भूपतिश्च तथा मृतः।<br>सैनिकैर्मन्त्रिमुख्याश्च तत्रागत्य निवेदिताः॥ ३० | नखोंके प्रहारसे आहत होकर राजा गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गयी। इससे सभी सैनिक और भी क्रोधित हो उठे; तब वे बाणोंसे सिंहपर भीषण प्रहार करने लगे। इस प्रकार राजा ध्रुवसन्धि तथा वह सिंह दोनों मर गये। तदनन्तर सैनिकोंने आकर मन्त्रिप्रवरोंको यह समाचार बताया॥ २९-३०॥ | | परलोकगतं भूपं श्रुत्वा ते मन्त्रिसत्तमाः।<br>संस्कारं कारयामासुर्गत्वा तत्र वनान्तिके॥ ३१ | राजाके परलोकगमनका समाचार सुनकर उन श्रेष्ठ मन्त्रियोंने उस वनमें जाकर उनका दाह-संस्कार करवाया॥ ३१॥ | | परलोकक्रियां सर्वां वसिष्ठो विधिपूर्वकम्।<br>कारयामास तत्रैव परलोकसुखावहाम्॥ ३२ | वहींपर गुरु वसिष्ठने परलोकमें सुख प्रदान करनेवाले सभी श्राद्ध आदि पारलौकिक कृत्य विधिपूर्वक सम्पन्न करवाये॥ ३२॥ | | प्रजाः प्रकृतयश्चैव वसिष्ठश्च महामुनिः।<br>सुदर्शनं नृपं कर्तुं मन्त्रं चक्रुः परस्परम्॥ ३३ | तदनन्तर प्रजाजनों, मन्त्रियों तथा महामुनि वसिष्ठने सुदर्शनको राजा बनानेके उद्देश्यसे आपसमें विचार-विमर्श किया॥ ३३॥ | | धर्मपत्नीसुतः शान्तः पुरुषश्च सुलक्षणः।<br>अयं नृपासनार्हश्च ह्यब्रुवन्मन्त्रिसत्तमाः॥ ३४ | श्रेष्ठ मन्त्रियोंने कहा कि सुदर्शन महाराजकी धर्मपत्नी मनोरमाके पुत्र हैं, शान्त स्वभाववाले पुरुष हैं तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न हैं, अतः ये राजसिंहासनके योग्य हैं॥ ३४॥ | | वसिष्ठोऽपि तथैवाह योग्योऽयं नृपतेः सुतः।<br>बालोऽपि धर्मवान् राजा नृपासनमिहार्हति॥ ३५ | गुरु वसिष्ठने भी वही बात कही कि महाराजका यह पुत्र सुदर्शन राजपिके योग्य है; क्योंकि बालक होते हुए भी धर्मपरायण राजकुमार ही राजसिंहासनका अधिकारी होता है॥ ३५॥ | | कृते मन्त्रे मन्त्रिवृद्धैर्युधाजिन्नाम पार्थिवः।<br>तत्राजगाम तरसा श्रुत्वा तूज्जयिनीपतिः॥ ३६ | वयोवृद्ध मन्त्रियोंके द्वारा इस प्रकार विचार करनेके उपरान्त यह समाचार सुनकर उज्जयिनीनरेश राजा युधाजित् शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे॥ ३६॥ | | मृतं जामातरं श्रुत्वा लीलावत्याः पिता तदा।<br>तत्राजगाम त्वरितो दौहित्रप्रियकाम्यया॥ ३७ | लीलावतीके पिता युधाजित् अपने दामादकी मृत्युके विषयमें सुनकर अपने दौहित्रके हितकी कामनासे उस समय शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये॥ ३७॥ |
| अ० १४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३१५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वीरसेनस्तथायातः सुदर्शनहितेच्छया।<br>कलिङ्गाधिपतिश्चैव मनोरमापिता नृपः॥ ३८ | उसी समय सुदर्शनके हित-साधनके उद्देश्यसे मनोरमाके पिता कलिंगाधिपति महाराज वीरसेन भी वहाँ आ गये॥ ३८॥ |
| उभौ तौ सैन्यसंयुक्तौ नृपौ साध्वससंस्थितौ।<br>चक्रतुर्मन्त्रिमुख्यैस्तैर्मन्त्रं राज्यस्य कारणात्॥ ३९ | सेनाओंसे सम्पन्न तथा एक-दूसरेसे भयभीत वे दोनों राजा राज्यके अधिकारीका निर्णय करनेके लिये प्रधान अमात्योंके साथ मन्त्रणा करने लगे॥ ३९॥ |
| युधाजित्तु तदापृच्छज्ज्येष्ठः कः सुतयोर्द्वयोः।<br>राज्यं प्राप्नोति ज्येष्ठो वै न कनीयान्कदाचन॥ ४० | युधाजित्ने पूछा कि इन दोनों राजकुमारोंमें ज्येष्ठ कौन है? ज्येष्ठ ही राज्य प्राप्त करता है, कनिष्ठ कदापि नहीं॥ ४०॥ |
| वीरसेनोऽपि तत्राह धर्मपत्नीसुतः किल।<br>राज्यार्हः स यथा राजन् शास्त्रज्ञेभ्यो मया श्रुतम्॥ ४१ | उसी समय वीरसेनने भी कहा—हे राजन्! मैंने शास्त्रविदोंसे ऐसा सुना है कि धर्मपत्नीका पुत्र ही राज्यका अधिकारी माना जाता है॥ ४१॥ |
| युधाजित्पुनराहेदं ज्येष्ठोऽयं च यथा गुणैः।<br>राजलक्षणसंयुक्तो न तथायं सुदर्शनः॥ ४२ | युधाजित्ने पुनः कहा कि यह शत्रुजित् गुणोंके कारण ज्येष्ठ है। यह सुदर्शन राजोचित चिह्नोंसे युक्त होते हुए भी वैसा नहीं है॥ ४२॥ |
| विवादोऽत्र सुसम्पन्नो नृपयोस्तत्र लुब्धयोः।<br>कः सन्देहमपाकर्तुं क्षमः स्यादतिसङ्कटे॥ ४३ | अपने-अपने स्वार्थके वशीभूत उन दोनों राजाओंमें वहाँ विवाद होने लगा। अब उस महासंकटकी परिस्थितिमें उनके सन्देहका समाधान करनेमें कौन समर्थ हो सकता था?॥ ४३॥ |
| युधाजिन्मन्त्रिणः प्राह यूयं स्वार्थपराः किल।<br>सुदर्शनं नृपं कृत्वा धनं भोक्तुं किलेच्छथ॥ ४४ | युधाजित्ने मन्त्रियोंसे कहा कि आपलोग अवश्य ही स्वार्थपरायण हो गये हैं और सुदर्शनको राजा बनाकर धनका स्वयं उपभोग करना चाहते हैं॥ ४४॥ |
| युष्माकं तु विचारोऽयं मया ज्ञातस्तथेङ्गितैः।<br>शत्रुजित्सबलस्तस्मात्सम्मतो वो नृपासने॥ ४५ | मैंने आप लोगोंका यह विचार तो आप सबकी भाव-भंगिमासे पहले ही जान लिया था। शत्रुजित् सुदर्शनसे अधिक बलवान् है, अतः आप लोगोंकी सम्मति तो यह होनी चाहिये कि शत्रुजित् ही राजसिंहासनपर आसीन होनेयोग्य है॥ ४५॥ |
| मयि जीवति कः कुर्यात्कनीयांसं नृपं किल।<br>त्यक्त्वा ज्येष्ठं गुणार्हञ्च सेनया च समन्वितम्॥ ४६ | ऐसा कौन व्यक्ति है, जो मेरे जीवित रहते गुणोंमें बड़े तथा सेनासे सुसज्जित राजकुमारको छोड़कर [गुणोंमें] छोटे पुत्रको राजा बना सके॥ ४६॥ |
| नूनं युद्धं करिष्यामि तस्मिन्खड्गस्य मेदिनी।<br>धारया च द्विधा भूयाद्युष्माकं तत्र का कथा॥ ४७ | इसके लिये मैं निश्चितरूपसे घोर संग्राम करूँगा। मेरे खड्गकी धारसे पृथिवीके भी दो टुकड़े हो सकते हैं, फिर आप लोगोंकी बात ही क्या!॥ ४७॥ |
| वीरसेनस्तु तच्छ्रुत्वा युधाजितमभाषत।<br>बालौ द्वौ सदृशप्रज्ञौ को भेदोऽत्र विचक्षण॥ ४८ | यह सुनकर वीरसेनने युधाजित्से कहा—हे विद्वन्! दोनों ही बालक समान बुद्धि रखते हैं; इनमें भेद ही क्या है?॥ ४८॥ |
| ३१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| एवं विवदमानौ तौ संस्थितौ नृपती तदा।<br>प्रजाश्च ऋषयश्चैव बभूवुर्व्यग्रमानसाः॥ ४९ | तदनन्तर उन दोनोंको इस प्रकार परस्पर विवाद करते देखकर प्रजाजनों तथा ऋषियोंके मनमें व्यग्रता होने लगी॥ ४९॥ | | समाजग्मुश्च सामन्ताः ससैन्याः क्लेशतत्पराः।<br>विग्रहं चाभिकाङ्क्षन्तः परस्परमतन्द्रिताः॥ ५० | तब एक-दूसरेको क्लेश पहुँचानेके लिये उद्यत तथा युद्धकी इच्छावाले दोनों पक्षोंके सामन्त सावधान होकर अपनी-अपनी सेनाओंके साथ वहाँ आ पहुँचे॥ ५०॥ | | निषादा ह्याययुस्तत्र शृङ्गवेरपुराश्रयाः।<br>राज्यद्रव्यमपाहर्तुं मृतं श्रुत्वा महीपतिम्॥ ५१<br><br>पुत्रौ च बालकौ श्रुत्वा विग्रहं च परस्परम्।<br>चौरास्तत्र समाजग्मुर्देशदेशान्तरादपि॥ ५२ | उसी समय महाराज ध्रुवसन्धिकी मृत्युका समाचार सुनकर शृंगवेरपुरमें रहनेवाले निषादगण राजकोष लूटनेके लिये वहाँ आ गये। दोनों राजकुमार अभी बालक हैं तथा वे आपसमें कलह कर रहे हैं—यह सुनकर देश-देशान्तरके चोर-लुटेरे भी वहाँ आ गये॥ ५१-५२॥ | | सम्मर्दस्तत्र सञ्जातः कलहे समुपस्थिते।<br>युधाजिद्वीरसेनश्च युद्धकामौ बभूवतुः॥ ५३ | इस प्रकार वहाँपर भारी कलह उपस्थित हो जानेपर युद्ध आरम्भ हो गया। युधाजित् तथा वीरसेन भी युद्धके लिये उद्यत हो गये॥ ५३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे युधाजिद्वीरसेनयोर्युद्धार्थं सजीभवनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
~~ ० ~~
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
राजा युधाजित् और वीरसेनका युद्ध, वीरसेनकी मृत्यु, राजा ध्रुवसन्धिकी रानी मनोरमाका अपने पुत्र सुदर्शनको लेकर भारद्वाजमुनिके आश्रममें जाना तथा वहीं निवास करना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| संयुगे च सति तत्र भूपयोराहवाय समुपात्तशस्त्रयोः।<br>क्रोधलोभवशयोः समं ततः सम्बभूव तुमुलस्तु विमर्दः॥ १ | [हे राजन्!] युद्ध आरम्भ हो जानेपर क्रोध एवं लोभके वशीभूत उन दोनों राजाओंने लड़नेके लिये शस्त्र उठा लिये और तब उनके बीच भयानक संग्राम आरम्भ हो गया॥ १॥ |
| संस्थितः स समरे धृतचापः पार्थिवः पृथुलबाहुयुधाजित्।<br>संयुतः स्वबलवाहनादिकैराहवाय कृतनिश्चयो नृपः॥ २ | युद्धके लिये कृतसंकल्प वे विशालबाहु राजा युधाजित् धनुष धारण करके अपनी सेना तथा वाहन आदिके साथ रणभूमिमें डट गये॥ २॥ |
| वीरसेन इह सैन्यसंयुतः क्षात्रधर्ममनुसृत्य सङ्गरे।<br>पुत्रिकामजहिताय पार्थिवः संस्थितः सुरपतेः समतेजाः॥ ३ | इधर इन्द्रके समान तेजस्वी राजा वीरसेन भी क्षत्रियोचित धर्मका अनुसरण करते हुए अपने दौहित्रके हित-साधनहेतु विशाल सेनाके साथ रणक्षेत्रमें उपस्थित हो गये॥ ३॥ |
| स बाणवृष्टिं विससर्ज पार्थिवो<br>युधाजितं वीक्ष्य रणे स्थितञ्च।<br>गिरिं तडित्वानिव तोयवृष्टिभिः<br>क्रोधान्वितः सत्यपराक्रमोऽसौ॥ ४ | सत्यपराक्रमी राजा वीरसेनने युधाजित्को समरांगणमें उपस्थित देखकर क्रोधयुक्त होकर इस प्रकार बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी, मानो पर्वतपर मेघ जल बरसा रहा हो॥ ४॥ |
| अ० १५ ] | तृतीय स्कन्ध | ३१७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं वीरसेनो विशिखैः शिलाशितैः<br> समावृणोदाशुगमैरजिह्मगैः ।<br>चिच्छेद बाणैश्च शिलीमुखानसौ<br> तेनैव मुक्तानतिवेगपातिनः ॥ ५ | राजा वीरसेनने पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये, द्रुतगामी तथा सीधे प्रवेश करनेवाले बाणोंसे युधाजित्को आच्छादित कर दिया और युधाजित्के द्वारा छोड़े गये अत्यन्त तीव्रगामी बाणोंको उन्होंने अपने बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े कर दिया ॥ ५ ॥ |
| गजरथतुरगाणां सम्बभूवातियुद्धं<br> सुरनरमुनिसङ्घैर्वीक्षितं चातिघोरम् ।<br>विततविहगवृन्दैरावृतं व्योम सद्यः<br> पिशितमशितुकामैः काकगृध्रादिभिश्च ॥ ६ | इस प्रकार हाथियों, रथों तथा घोड़ोंसे अतिभयंकर युद्ध होने लगा जिसे देवता, मनुष्य तथा मुनिगण देख रहे थे। मांसभक्षणकी लालसावाले कौए, गीध आदि पक्षियोंके विस्तृत समूहसे शीघ्र ही वहाँका आकाशमण्डल ढक गया ॥ ६ ॥ |
| तत्राद्भुता क्षतजसिन्धुरुवाह घोरा<br> वृन्देभ्य एव गजवीरतुरङ्गमाणाम् ।<br>त्रासावहा नयनमार्गगता नराणां<br> पापात्मनां रविजमार्गभवेव कामम् ॥ ७ | उस युद्धभूमिमें हाथियों, घोड़ों तथा सैन्यसमूहोंके शरीरसे निकले रक्तसे अद्भुत तथा भयंकर नदी बह चली, जो लोगोंको उसी प्रकार दिखायी पड़ रही थी, जैसे यमलोकके मार्गमें प्रवाहित वैतरणी पापियोंको भयावह दीखती है॥ ७॥ |
| कीर्णानि भिन्नपुलिने नरमस्तकानि<br> केशावृतानि च विभान्ति यथैव सिन्धौ ।<br>तुम्बीफलानि विहितानि विहर्तुकामै-<br> र्बालैर्यथा रविसुताप्रभवैश्च नूनम् ॥ ८ | [तीव्र धारके वेगसे] कटे हुए तटवाली उस नदीमें मनुष्योंके केशयुक्त इधर-उधर बिखरे मस्तक, खेलनेमें तत्पर बालकोंद्वारा यमुनामें फेंके गये तुम्बीफलोंके समान प्रतीत हो रहे थे ॥ ८ ॥ |
| वीरं मृतं भुवि गतं पतितं रथाद्वै<br> गृध्रः पलार्थमुपरि भ्रमतीति मन्ये ।<br>जीवोऽप्यसौ निजशरीरमवेक्ष्य कान्तं<br> काङ्क्षत्यहोऽतिविवशोऽपि पुनः प्रवेष्टुम् ॥ ९ | रथसे गिरे हुए किसी मृत वीरको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देखकर मांसकी इच्छासे गीध उसके ऊपर मँडराने लगता था, इससे ऐसा प्रतीत होता था मानो उस वीरका जीव अपने शरीरको अति सुन्दर देखकर अत्यन्त विवश हो उसमें पुनः प्रवेश करनेकी इच्छा कर रहा हो ॥ ९ ॥ |
| आजौ हतोऽपि नृवरः सुविमानरूढः<br> स्वाङ्के स्थितां सुरवधूं प्रवदत्यभीष्टम् ।<br>पश्याधुना मम शरीरमिदं पृथिव्यां<br> बाणाहतं निपतितं करभोरु कान्तम् ॥ १० | युद्धभूमिमें हत कोई वीर योद्धा सुन्दर विमानमें आरूढ़ होकर अपनी गोदमें बैठी हुई किसी देवांगनासे अपना मनोभाव इस प्रकार व्यक्त करता था—हे करभोरु! इस समय बाणोंसे आहत होकर धरतीपर पड़े हुए मेरे इस कान्तियुक्त शरीरको देखो ॥ १० ॥ |
| एको हतस्तु रिपुणैव गतोऽन्तरिक्षं<br> देवाङ्गनां समधिगम्य युतो विमाने ।<br>तावत्प्रिया हुतवहे सुसमर्प्य देहं<br> जग्राह कान्तमबला सबला स्वकीया ॥ ११ | शत्रुके द्वारा मारा गया एक वीर ज्यों ही अन्तरिक्षमें पहुँचा और अप्सराके पास जाकर विमानमें बैठा, त्यों ही उसकी अपनी प्रिय स्त्री अपना शरीर अग्निको भलीभाँति समर्पित करके पुनः दिव्य शरीर पाकर अपने पतिके पास जा पहुँची ॥ ११ ॥ |
| ३१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| युद्धे मृतौ च सुभटौ दिवि सङ्गतौ ता-<br>वन्योन्यशस्त्रनिहतौ सह सम्प्रयातौ।<br>तत्रैव जघ्नतुरलं परमाहितास्त्रा-<br>वेकाप्सरोऽर्थविहतौ कलहाकुलौ च॥ १२ | उस युद्धमें दो वीर परस्पर एक-दूसरेके शस्त्र-प्रहारसे आहत होकर मर गये और साथ-साथ ही स्वर्गलोकमें पहुँचे। वहाँपर भी एक अप्सराको प्राप्त करनेके लिये वे दोनों वीर शस्त्रयुक्त होकर एक-दूसरेको मारनेहेतु युद्ध करने लगे॥ १२॥ |
| कश्चिद्युवा समधिगम्य सुराङ्गनां वै<br>रूपाधिकां गुणवतीं किल भक्तियुक्तः।<br>स्वीयान् गुणान्प्रवितानान्प्रवदंस्तदासौ<br>तां प्रेमदामनुचकार च योगयुक्तः॥ १३ | कोई अनुरागमय युवा वीर अतिशय रूपवती तथा गुणवती अप्सराको प्राप्त करके अत्यन्त बढ़ा-चढ़ाकर अपने गुणोंका वर्णन करते हुए उसके प्रति भक्तिपरायण होकर प्रयत्नपूर्वक उस प्रेमदायिनीके गुण आदिका अनुकरण करने लगा॥ १३॥ |
| भौमं रजोऽतिविततं दिवि संस्थितञ्च<br>रात्रिं चकार तरणिञ्च समावृणोद्यत्।<br>मग्नं तदेव रुधिराम्बुनिधावकस्मात्<br>प्रादुर्बभूव रविरप्यतिकान्तियुक्तः॥ १४ | घोर युद्धके कारण रणभूमिसे उड़ी हुई अत्यधिक धूलने अन्तरिक्षस्थित सूर्यको ढक दिया और दिनमें ही रात हो गयी। पुनः वही धूल जब अथाह रक्त-सिन्धुमें विलीन हो जाती तब अत्यन्त प्रभाववाले सूर्य अचानक प्रकट हो जाते॥ १४॥ |
| कश्चिद् गतस्तु गगनं किल देवकन्यां<br>सम्प्राप्य चारुवदनां किल भक्तियुक्ताम्।<br>नाङ्गीचकार चतुरो व्रतनाशभीतो<br>यास्यत्ययं मम वृथा ह्यनुकूलशब्दः॥ १५ | कोई युवक वीर युद्धमें मरकर स्वर्ग पहुँचा तो उसे एक सुन्दर रूपवाली देवकन्या मिली, जो उसके ऊपर आसक्त हो गयी। किंतु ब्रह्मचर्यव्रतके नाश होनेसे भयभीत उस चतुर वीरने उसे स्वीकार नहीं किया; [उसने सोचा कि ऐसा करनेसे] मेरे अनुरूप यह ब्रह्मचारी शब्द व्यर्थ हो जायगा॥ १५॥ |
| सङ्ग्रामे संवृते तत्र युधाजित्पृथिवीपतिः।<br>जघान वीरसेनं तं बाणैस्तीव्रैः सुदारुणैः॥ १६ | तदनन्तर घोर संग्राम छिड़ जानेपर राजा युधाजित्ने अपने तीक्ष्ण तथा अत्यन्त भीषण बाणोंसे वीरसेनको मार डाला॥ १६॥ |
| निहतः स पपातोर्व्यां छिन्नमूर्धा महीपतिः।<br>प्रभग्नं तद्बलं सर्वं निर्गतं च चतुर्दिशम्॥ १७ | इस प्रकार कटे मस्तकवाले महाराज वीरसेन पृथ्वीपर गिर पड़े। उनकी सम्पूर्ण सेना नष्ट हो गयी और चारों दिशाओंमें भाग गयी॥ १७॥ |
| मनोरमा हतं श्रुत्वा पितरं रणमूर्धनि।<br>भयत्रस्ताथ सञ्जाता पितुर्वैरमनुस्मरन्॥ १८<br>हनिष्यति युधाजिद्वै पुत्रं मम दुराशयः।<br>राज्यलोभेन पापात्मा सेति चिन्तापराभवत्॥ १९ | अपने पिता वीरसेनको समरांगणमें मारा गया सुनकर तथा अपने पिताके वैरका स्मरण करते हुए मनोरमा भयसे व्याकुल हो गई। वह इस चिन्तामें पड़ गई कि बुरे विचारोंवाला वह पापी युधाजित् राज्यके लोभसे मेरे पुत्रको अवश्य ही मार डालेगा॥ १८-१९॥ |
| किं करोमि क्व गच्छामि पिता मे निहतो रणे।<br>भर्ता चापि मृतोऽद्यैव पुत्रोऽयं मम बालकः॥ २० | अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पिताजी युद्धमें मारे गये तथा पतिदेव भी मर चुके हैं और मेरा यह पुत्र अभी बालक ही है॥ २०॥ |
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३१९
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लोभोऽतीव च पापिष्ठस्तेन को न वशीकृतः।<br>किं न कुर्यात्तदाविष्टः पापं पार्थिवसत्तमः॥ २१<br><br>पितरं मातरं भ्रातॄन्गुरून्स्वजनबान्धवान्।<br>हन्ति लोभसमाविष्टो जनो नात्र विचारणा॥ २२<br><br>अभक्ष्यभक्षणं लोभादगम्यागमनं तथा।<br>करोति किल तृष्णार्तो धर्मत्यागं तथा पुनः॥ २३ | लोभ बड़ा ही पापी होता है, इसने किसको अपने वशमें नहीं किया। लोभसे ग्रस्त हो जानेपर श्रेष्ठ राजा भी कौन-सा पाप नहीं कर सकता। लोभसे अभिभूत मनुष्य अपने माता-पिता, भाई, गुरु तथा बन्धु-बान्धवोंको भी मार डालता है; इसमें सन्देह नहीं है। लोभके कारण मनुष्य अभक्ष्यका भक्षण तथा अगम्या स्त्रीके साथ गमन भी कर लेता है; यहाँतक कि लोभसे व्याकुल होकर वह धर्मका त्याग भी कर देता है॥ २१—२३॥ |
| न सहायोऽस्ति मे कश्चिन्नगरेऽत्र महाबलः।<br>यदाधारे स्थिता चाहं पालयामि सुतं शुभम्॥ २४ | अब इस नगरमें कोई बलवान् पुरुष मुझे सहायता देनेवाला भी नहीं रह गया, जिसके आश्रयमें रहकर मैं अपने सुन्दर पुत्रका पालन कर सकूँ॥ २४॥ |
| हते पुत्रे नृपेणाद्य किं करिष्याम्यहं पुनः।<br>न मे त्रातास्ति भुवने येन वै सुस्थिता ह्यहम्॥ २५ | यदि राजा युधाजित् मेरे पुत्रको मार डाले, तो मैं फिर क्या करूँगी? इस संसारमें मेरा कोई रक्षक नहीं है, जिसके सहारे मैं निश्चिन्त रह सकूँ?॥ २५॥ |
| सापि वैरयुता कामं सपत्नी सर्वदा भवेत्।<br>लीलावती न मे पुत्रे भविष्यति दयावती॥ २६ | मेरी सौत लीलावती भी सदा मुझसे वैरभाव रखती है, अतः वह भी मेरे पुत्रपर दया नहीं करेगी॥ २६॥ |
| युधाजिति समायाते न मे निःसरणं भवेत्।<br>ज्ञात्वा बालं सुतं सोऽद्य कारागारं नयिष्यति॥ २७ | युधाजित्के रणभूमिसे लौटकर आ जानेपर मेरा यहाँसे निकल भागना सम्भव नहीं हो सकेगा; वह मेरे पुत्रको बालक जानकर उसे कारागारमें डाल देगा॥ २७॥ |
| श्रूयते हि पुरेन्द्रेण मातुर्गर्भगतः शिशुः।<br>कृन्तितः सप्तधा पश्चात्कृतास्ते सप्त सप्तधा॥ २८<br><br>प्रविश्य चोदरं मातुः करे कृत्वल्पकं पविम्।<br>एकोनपञ्चाशदपि तेऽभवन्मरुतो दिवि॥ २९ | सुना जाता है कि पूर्वकालमें इन्द्रने अपने वज्रको अत्यन्त छोटा बनाकर अपनी सौतेली माता दितिके गर्भमें प्रवेश करके गर्भस्थ शिशुको काटकर उसके सात टुकड़े कर दिये थे। इसके बाद उसने पुनः एक-एक टुकड़ेके सात-सात खण्ड कर दिये थे। वे ही आगे चलकर देवलोकमें उनचास मरुत्के रूपमें प्रतिष्ठित हुए॥ २८—२९॥ |
| सपत्न्यै गरलं दत्तं सपत्न्या नृपभार्यया।<br>गर्भनाशार्थमुद्दिश्य पुरैतद्वै मया श्रुतम्॥ ३०<br><br>जातस्तु बालकः पश्चाद्देहे विषयुतः किल।<br>तेनासौ सगरो नाम विख्यातो भुवि मण्डले॥ ३१ | मैंने यह भी सुना है कि पूर्वकालमें एक राजाकी किसी रानीने अपनी सौतके गर्भको नष्ट करनेके उद्देश्यसे उसे विष दे दिया था। कुछ समय बीतनेपर वह बालक विषके साथ उत्पन्न हुआ, इसीसे वह भूमण्डलपर ‘सगर’ नामसे प्रसिद्ध हो गया॥ ३०—३१॥ |
| जीवमानोऽथ भर्ता वै कैकेय्या नृपभार्यया।<br>रामः प्रव्राजितो ज्येष्ठो मृतो दशरथो नृपः॥ ३२ | महाराज दशरथकी भार्या कैकेयीने पतिके जीवनकालमें ही उनके ज्येष्ठ पुत्र रामचन्द्रको वनवास दे दिया था, जिसके फलस्वरूप राजा दशरथकी मृत्यु भी हो गयी॥ ३२॥ |
३२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मन्त्रिणस्त्ववशाः कामं ये मे पुत्रं सुदर्शनम्।<br>राजानं कर्तुकामा वै युधाजिद्वशगाश्च ते॥ ३३<br><br>न मे भ्राता तथा शूरो यो मां बन्धात्प्रमोचयेत्।<br>महत्कष्टं च सम्प्राप्तं मया वै दैवयोगतः॥ ३४<br><br>उद्यमः सर्वथा कार्यः सिद्धिर्दैवाद्धि जायते।<br>उपायं पुत्ररक्षार्थं करोम्यद्य त्वरान्विता॥ ३५ | जो मन्त्री मेरे पुत्र सुदर्शनको राजा बनाना चाहते थे, वे भी अब विवश होकर युधाजित्के अधीन हो गये हैं। मेरा भाई भी ऐसा योद्धा नहीं है, जो मुझे बन्धनसे छुड़ा सके। दैवयोगसे मैं महान् संकटमें पड़ गयी हूँ। फिर भी उद्योग तो सर्वथा करना ही चाहिये, सफलता तो दैवके आधीन है। अतः अब मैं अपने पुत्रकी रक्षाके लिये शीघ्र ही कोई उपाय करूँगी॥ ३३—३५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य सा बाला विदल्लं चातिमानिनम्।<br>निपुणं सर्वकार्येषु चिन्त्यं मन्त्रिवरोत्तमम्॥ ३६<br><br>समाहूय तमेकान्ते प्रोवाच बहुदुःखिता।<br>गृहीत्वा बालकं हस्ते रुदती दीनमानसा॥ ३७<br><br>पिता मे निहतः संख्ये पुत्रोऽयं बालकस्तथा।<br>युधाजिद् बलवान् राजा किं विधेयं वदस्व मे॥ ३८ | ऐसा सोचकर वह रानी अतिसम्मानित, सभी कार्योंमें दक्ष तथा विचार-कुशल श्रेष्ठ मन्त्रिप्रवर विदल्लको बुलवाकर उन्हें एकान्तमें ले गयी और बालकको हाथमें लेकर रोती हुई दीन मनवाली उस मनोरमाने अत्यन्त दुःखित होकर उनसे कहा—मेरे पिता युद्धमें मारे गये और मेरा यह पुत्र अभी अबोध बालक है। राजा युधाजित् बलवान् हैं। [ऐसी परिस्थितिमें] मुझे क्या करना चाहिये? मुझे बतायें॥ ३६—३८॥ |
| तामुवाच विदल्लोऽसौ नात्र स्थातव्यमेव च।<br>गमिष्यामो वने कामं वाराणस्याः पुनः किल॥ ३९<br><br>तत्र मे मातुलः श्रीमान्वर्तते बलवत्तरः।<br>सुबाहुरिति विख्यातो रक्षिता स भविष्यति॥ ४० | तब विदल्लने उससे कहा—अब यहाँ नहीं रहना चाहिये, हमलोग यहाँसे वाराणसीके वनमें चलेंगे। वहाँ सुबाहु नामसे विख्यात मेरे मामा रहते हैं। वे समृद्धिशाली तथा महाबलशाली हैं; वे ही हमारे रक्षक होंगे॥ ३९-४०॥ |
| युधाजिद्दर्शनोत्कण्ठमनसा नगराद् बहिः।<br>निर्गत्य रथमारुह्य गन्तव्यं नात्र संशयः॥ ४१ | मनमें युधाजित्के दर्शनकी लालसासे नगरसे बाहर निकल चलना चाहिये और रथपर सवार हो प्रस्थान कर देना चाहिये; इसमें शंकाकी आवश्यकता नहीं है॥ ४१॥ |
| इत्युक्ता तेन सा राज्ञी गत्वा लीलावतीं प्रति।<br>उवाच पितरं द्रष्टुं गच्छाम्यद्य सुलोचने॥ ४२ | विदल्लके ऐसा कहनेपर रानी मनोरमा लीलावतीके पास गयी और बोली—हे सुनयने! मैं [तुम्हारे] पिताजीका दर्शन करने जा रही हूँ॥ ४२॥ |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य सैरन्ध्रीसंयुता तदा।<br>विदल्लेन च संयुक्ता निःसृता नगराद् बहिः॥ ४३<br><br>त्रस्ता ह्यार्तातिकृपणा पितुः शोकसमाकुला।<br>दृष्ट्वा युधाजितं भूपं पितरं गतजीवितम्॥ ४४<br><br>संस्कार्य च त्वरायुक्ता वेपमाना भयाकुला।<br>दिनद्वयेन सम्प्राप्ता राज्ञी भागीरथी तटम्॥ ४५ | ऐसा कहकर मनोरमा एक दासी और मन्त्री विदल्लको साथ लेकर रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकल गयी। उस समय बहुत डरी हुई, दुःखित, अत्यन्त दीन तथा पिताके मृत्युजन्य शोकसे व्याकुल वह मनोरमा राजा युधाजित्से मिलकर तत्काल अपने मृत पिताका दाहसंस्कार कराकर भयसे व्याकुल हो काँपती हुई दो दिनोंमें गंगाजीके तटपर पहुँच गयी॥ ४३—४५॥ |
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३२१
अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३२१
| निषादैर्लुणि्ठता तत्र गृहीतं सकलं वसु।<br>रथञ्चापि गृहीत्वा ते निर्गता दस्यवः शठाः॥ ४६<br><br>रुदती सुतमादाय चारुवस्त्रा मनोरमा।<br>निर्ययौ जाह्नवीतीरे सैरन्ध्रीकरलम्बिता॥ ४७<br><br>आरुह्य च भयाच्छीघ्रमुडुपं सा भयाकुला।<br>तीर्त्वा भागीरथीं पुण्यां ययौ त्रिकूटपर्वतम्॥ ४८ | वहाँके निषादोंने उसे लूट लिया तथा उसका सारा धन और रथ छीन लिया। सब कुछ लेकर वे धूर्त दस्यु चले गये। तब वह रोती हुई अपने पुत्रको लेकर सैरंध्रीके हाथका सहारा लेकर किसी प्रकार गंगाके तटपर गयी और एक छोटी-सी नौकापर डरती हुई बैठकर पवित्र गंगाको पार करके वह भयाक्रान्त मनोरमा त्रिकूटपर्वतपर पहुँच गयी॥ ४६—४८॥ |
|---|---|
| भारद्वाजाश्रमं प्राप्ता त्वरया च भयाकुला।<br>संवीक्ष्य तापसांस्तत्र सञ्जाता निर्भया तदा॥ ४९<br><br>मुनिना सा ततः पृष्टा कासि कस्य परिग्रहः।<br>कष्टेनात्र कथं प्राप्ता सत्यं ब्रूहि शुचिस्मिते॥ ५०<br><br>देवी वा मानुषी वासि बालपुत्रा वने कथम्।<br>राज्यभ्रष्टेव वामोरु भासि त्वं कमलेक्षणे॥ ५१ | वह भयभीत मनोरमा भारद्वाजमुनिके आश्रममें शीघ्रतासे पहुँची। तब वहाँ तपस्वियोंको देखकर वह निर्भय हो गयी। तदनन्तर भारद्वाजमुनिने पूछा—हे शुचिस्मिते! तुम कौन हो, किसकी पत्नी हो? इतने कष्टसे तुम यहाँ कैसे आ गयी हो? मुझसे सत्य कहो। तुम कोई देवी हो अथवा मानवी हो। अपने इस बालक पुत्रके साथ वनमें क्यों विचरण कर रही हो? हे सुन्दरि! हे कमलनयने! तुम राज्यभ्रष्ट-जैसी प्रतीत हो रही हो॥ ४९—५१॥ |
| एवं सा मुनिना पृष्टा नोवाच वरवर्णिनी।<br>रुदती दुःखसन्तप्ता विदल्लं च समादिशत्॥ ५२ | मुनिके पूछनेपर उस रूपवती रानीने कुछ भी उत्तर नहीं दिया और दुःखसे सन्तप्त होकर रोती हुई उसने अपने मन्त्री विदल्लको सारी बातें बतानेके लिये संकेत किया॥ ५२॥ |
| विदल्लस्तमुवाचेदं ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः।<br>तस्य भार्या धर्मपत्नी नाम्ना चेयं मनोरमा॥ ५३ | तब विदल्लने मुनिसे कहा—ध्रुवसन्धि एक श्रेष्ठ नरेश थे। ये उन्हींकी मनोरमा नामवाली धर्मपत्नी हैं॥ ५३॥ |
| सिंहेन निहतो राजा सूर्यवंशी महाबलः।<br>पुत्रोऽयं नृपतेस्तस्य नाम्ना चैव सुदर्शनः॥ ५४ | सूर्यवंशमें उत्पन्न उन महाबली महाराजको सिंहने मार डाला। सुदर्शन नामका यह बालक उन्हीं राजाका पुत्र है॥ ५४॥ |
| अस्याः पितातिधर्मात्मा दौहित्रार्थं मृतो रणे।<br>युधाजिद्द्रव्यसन्त्रस्ता सम्प्राप्ता विजने वने॥ ५५ | इनके अत्यन्त धर्मात्मा पिता अपने इसी दौहित्रके लिये संग्राममें मारे गये। अतएव युधाजित्के भयसे संत्रस्त होकर ये इस निर्जन वनमें आयी हुई हैं॥ ५५॥ |
| त्वामेव शरणं प्राप्ता बालपुत्रा नृपात्मजा।<br>त्राता भव महाभाग त्वमस्या मुनिसत्तम॥ ५६ | हे महाभाग! हे मुनिश्रेष्ठ! अबोध पुत्रवाली ये राजपुत्री अब आपकी शरणमें आयी हैं। अतः आप इनकी रक्षा कीजिये॥ ५६॥ |
| आर्तस्य रक्षणे पुण्यं यज्ञाधिकमुदाहृतम्।<br>भयत्रस्तस्य दीनस्य विशेषफलदं स्मृतम्॥ ५७ | किसी दुःखी प्राणीकी रक्षा करनेमें यज्ञ करनेसे भी अधिक पुण्य बताया गया है। भयभीत तथा दीनकी रक्षाको तो और भी अधिक फलदायक कहा गया है॥ ५७॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 11 A
| ३२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
|---|
| ऋषिरुवाच | **ऋषि बोले—**हे कल्याणि! तुम यहाँ भयरहित होकर निवास करो; हे सुव्रते! अपने पुत्रका पालन-पोषण करो। हे विशालनयने! यहाँ तुम्हें शत्रुओंसे उत्पन्न होनेवाला किसी प्रकारका भी भय नहीं करना चाहिये। तुम अपने इस कान्तिमान् पुत्रका पालन करो, तुम्हारा यह पुत्र आगे चलकर राजा होगा। यहाँ तुम लोगोंको कभी भी कोई दुःख तथा शोक नहीं होगा॥ ५८-५९॥ | | निर्भया वस कल्याणि पुत्रं पालय सुव्रते।<br>न ते भयं विशालाक्षि कर्तव्यं शत्रुसम्भवम्॥ ५८<br><br>पालयस्व सुतं कान्तं राजा तेऽयं भविष्यति।<br>नात्र दुःखं तथा शोकः कदाचित्सम्भविष्यति॥ ५९ | | | व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**मुनिके इस प्रकार कहनेपर महारानी मनोरमा निश्चिन्त हो गयीं और मुनिके द्वारा प्रदान की गयी एक कुटियामें वे शोकरहित होकर निवास करने लगीं॥ ६०॥ | | इत्युक्ता मुनिना राज्ञी स्वस्था सा सम्बभूव ह।<br>उटजे मुनिना दत्ते वीतशोका तदावसत्॥ ६० | | | सैरन्ध्रीसहिता तत्र विदल्लेन च संयुता।<br>सुदर्शनं पालयाना न्यवसत्सा मनोरमा॥ ६१ | इस प्रकार सुदर्शनका पालन-पोषण करती हुई वे मनोरमा अपनी दासी तथा मन्त्री विदल्लके साथ वहाँ रहने लगीं॥ ६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे मनोरमया भारद्वाजाश्रमं प्रति गमनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
युधाजित्का भारद्वाजमुनिके आश्रमपर आना और उनसे मनोरमाको भेजनेका आग्रह करना, प्रत्युत्तरमें मुनिका 'शक्ति हो तो ले जाओ'—ऐसा कहना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] तदनन्तर महाबली युधाजित्ने रणभूमिसे अयोध्या पहुँचकर सुदर्शनको भी मार डालनेकी इच्छासे मनोरमाके विषयमें लोगोंसे पूछा॥ १॥ | | युधाजित्त्वथ संग्रामाद् गत्वायोध्यां महाबलः।<br>मनोरमां च पप्रच्छ सुदर्शनजिघांसया॥ १ | | | सेवकान् प्रेषयामास क्व गतेति मुहुर्वदन्।<br>शुभे दिनेऽथ दौहित्रं स्थापयामास चासने॥ २ | 'मनोरमा कहाँ चली गयी' ऐसा बार-बार कहते हुए उसने सेवकोंको इधर-उधर भेज दिया। तत्पश्चात् किसी शुभ दिनमें अपने दौहित्रको राजसिंहासनपर बैठा दिया॥ २॥ | | मन्त्रिभिश्च वसिष्ठेन मन्त्रैराथर्वणैः शुभैः।<br>अभिषिक्तश्च सम्पूर्णैः कलशैर्जलपूरितैः॥ ३ | समस्त मन्त्रियोंके साथ गुरु वसिष्ठने अथर्ववेदके कल्याणकारी मन्त्रोंका उच्चारण करके जलपूरित समस्त कलशोंसे राजकुमार शत्रुजित्का अभिषेक किया॥ ३॥ | | भेरीशङ्खनिनादैश्च तूर्याणां चाथ निःस्वनैः।<br>उत्सवस्तु नगर्यां वै सम्बभूव कुरुद्वह॥ ४ | हे कुरुनन्दन! उस समय शंख, भेरीके निनादों तथा तुरहियोंकी ध्वनियोंके साथ पूरे नगरमें उत्सव मनाया गया॥ ४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—11 B
| अ० १६ ] | तृतीय स्कन्ध | ३२३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विप्राणां वेदपाठैश्च बन्दिनां स्तुतिभिस्तथा।<br>अयोध्या मुदितेवासीज्जयशब्दैः सुमङ्गलैः॥ ५ | ब्राह्मणोंके वेदपाठों, बन्दीजनोंके स्तुतिगान तथा मंगलकारी जयघोषसे अयोध्यानगरी प्रफुल्लित-सी दिखायी दे रही थी॥ ५॥ |
| हृष्टपुष्टजनाकीर्णा स्तुतिवादित्रनिःस्वना।<br>नवे तस्मिन्महीपाले पूर्बभौ नूतनेव सा॥ ६ | हृष्ट-पुष्टजनोंसे भरी-पूरी और स्तुतियों तथा वाद्योंकी ध्वनिसे निनादित वह अयोध्या उस नये नरेशके अभिषिक्त होनेपर नवीन पुरीकी भाँति सुशोभित हो रही थी॥ ६॥ |
| केचित्साधुजना ये वै चक्रुः शोकं गृहे स्थिताः।<br>सुदर्शनं विचिन्त्याद्य क्व गतोऽसौ नृपात्मजः॥ ७<br><br>मनोरमातिसाध्वी सा क्व गता सुतसंयुता।<br>पितास्या निहतः संख्ये राज्यलोभेन वैरिणा॥ ८ | उस नगरीमें जो कोई भी सज्जनलोग थे, उन्होंने अपने घरमें ही रहकर शोक मनाया। वे सुदर्शनके विषयमें सोचते हुए कह रहे थे कि वह राजकुमार कहाँ चला गया? महान् पतिव्रता वह मनोरमा अपने पुत्रके साथ कहाँ चली गयी? राज्यलोभी शत्रु युधाजित्ने युद्धमें उसके पिताको मार डाला॥ ७-८॥ |
| इत्येवं चिन्त्यमानास्ते साधवः समबुद्धयः।<br>अतिष्ठन्दुःखितास्तत्र शत्रुजिद्वशवर्तिनः॥ ९ | ऐसा विचार करते हुए सबमें समान बुद्धि रखनेवाले वे साधुजन शत्रुजित्के अधीन होकर दुःखी मनसे रहने लगे॥ ९॥ |
| युधाजिदपि दौहित्रं स्थापयित्वा विधानतः।<br>राज्यञ्च मन्त्रिसात्कृत्वा चलितः स्वां पुरीं प्रति॥ १० | इस प्रकार युधाजित् भी विधानपूर्वक अपने दौहित्रको राजसिंहासनपर बैठाकर तथा राज्यभार मन्त्रियोंको सौंपकर अपनी नगरीको प्रस्थान कर गया॥ १०॥ |
| श्रुत्वा सुदर्शनं तत्र मुनीनामाश्रमे स्थितम्।<br>हन्तुकामो जगामाशु चित्रकूटं स पर्वतम्॥ ११ | सुदर्शन मुनियोंके आश्रममें रह रहा है—ऐसा सुनकर युधाजित् उसे मार डालनेकी इच्छासे तत्काल ही चित्रकूट-पर्वतकी ओर चल पड़ा॥ ११॥ |
| निषादाधिपतिं शूरं पुरस्कृत्य बलाभिधम्।<br>दुर्दशाख्यमगादाशु शृङ्गवेरपुराधिपम्॥ १२ | वह दुर्दर्श नामक शृंगवेरपुरके राजाके यहाँ पहुँचा और उस विशाल सेनासम्पन्न तथा पराक्रमी निषादराजको अगुआ बनाकर उसने शीघ्र ही आगेकी ओर प्रस्थान किया॥ १२॥ |
| श्रुत्वा मनोरमा तत्र बभूवातिसुदुःखिता।<br>आगच्छन्तं बालपुत्रा भयार्ता सैन्यसंयुतम्॥ १३ | युधाजित्को सेनासहित आते हुए सुनकर अबोध सन्तानवाली वह मनोरमा भयभीत तथा अत्यन्त दुःखित हो गयी॥ १३॥ |
| तमुवाचातिशोकार्ता मुनिं साश्रुविलोचना।<br>किं करोमि क्व गच्छामि युधाजित्समुपस्थितः॥ १४ | अत्यन्त शोकसन्तप्त वह मनोरमा आँखोंमें आँसू भरकर मुनि भारद्वाजसे बोली कि युधाजित् यहाँ भी आ पहुँचा; अब मैं क्या करूँ तथा कहाँ जाऊँ?॥ १४॥ |
| पिता मे निहतोऽनेन दौहित्रो भूपतिः कृतः।<br>सुतं मे हन्तुकामोऽत्र समायाति बलान्वितः॥ १५ | इसने मेरे पिताका वध कर दिया तथा अपने दौहित्रको राजा बना दिया। अब वह विशाल सेनाके साथ मेरे पुत्रके वधकी कामनासे यहाँ आ रहा है॥ १५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—11 C
| ३२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
|---|
| पुरा श्रुतं मया स्वामिन् पाण्डवा वै वने स्थिताः।<br>मुनीनामाश्रमे पुण्ये पाञ्चाल्या सहितास्तदा ॥ १६<br>गतास्ते मृगयां पार्था भ्रातरः पञ्च एव ते।<br>द्रौपदी संस्थिता तत्र मुनीनामाश्रमे शुभे ॥ १७ | हे स्वामिन्! मैंने सुना है कि पूर्वकालमें जब मुनियोंके पवित्र आश्रममें द्रौपदीके साथ पाण्डव निवास कर रहे थे, उसी समय एक दिन वे पाँचों भाई आखेटके लिये चले गये और द्रौपदी वहींपर मुनियोंके उस पावन आश्रममें रह गयी थी॥ १६-१७॥ | | धौम्योऽत्रिर्गालवः पैलो जाबालिगौतमो भृगुः।<br>च्यवनश्चात्रिगोत्रश्च कण्वश्चैव जतुः क्रतुः ॥ १८<br>वीतिहोत्रः सुमन्तुश्च यज्ञदत्तोऽथ वत्सलः।<br>राशासनः कहोडश्च यवक्रीर्यज्ञकृत्क्रतुः ॥ १९<br>एते चान्ये च मुनयो भारद्वाजादयः शुभाः।<br>वेदपाठयुताः सर्वे संस्थिताश्चाश्रमे स्थिताः॥ २० | धौम्य, अत्रि, गालव, पैल, जाबालि, गौतम, भृगु, च्यवन, अत्रिगोत्रज कण्व, जतु, क्रतु, वीतिहोत्र, सुमन्तु, यज्ञदत्त, वत्सल, राशासन, कहोड, यवक्री, यज्ञकृत् क्रतु—ये सब और भारद्वाज आदि अन्य पुण्यात्मा मुनिगण उस पावन आश्रममें विराजमान थे। वे सभी वेदपाठ कर रहे थे॥ १८-२०॥ | | दासीभिः सहिता तत्र याज्ञसेनी स्थिता मुने।<br>आश्रमे चारुसर्वाङ्गी निर्भया मुनिसंवृते ॥ २१ | हे मुने! मुनि-समुदायसे सम्पन्न उस आश्रममें सर्वाङ्गसुन्दरी वह द्रौपदी अपनी दासियोंके साथ निर्भय होकर रहती थी॥ २१॥ | | पार्था मृगानुगास्तावत्प्रयाताश्च वनाद्वनम्।<br>धनुर्बाणधरा वीराः पञ्च वै शत्रुतापनाः ॥ २२ | शत्रुओंको सन्ताप पहुँचानेमें समर्थ तथा धनुष-बाण धारण किये वे पाँचों पाण्डव मृगका पीछा करते हुए एक वनसे दूसरे वनमें निकल गये॥ २२॥ | | तावत्सिन्धुपतिः श्रीमान्मार्गस्थो बलसंयुतः।<br>आगतश्चाश्रमाभ्याशे श्रुत्वा तु निगमध्वनिम् ॥ २३ | इसी बीच समृद्धिशाली सिन्धुनरेश [जयद्रथ] वेद-ध्वनि सुनकर अपनी सेनाके साथ आश्रमके पास आ गया॥ २३॥ | | श्रुत्वा वेदध्वनिं राजा मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>उत्ततार रथात्तूर्णं दर्शनाकाङ्क्षया नृपः ॥ २४ | वेदपाठ सुनकर राजा जयद्रथ पुण्यात्मा मुनियोंके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक रथसे उतरा॥ २४॥ | | यदा निरगमत्तत्र भृत्यद्वयसमन्वितः।<br>वेदपाठयुतान्वीक्ष्य मुनीनुद्यमसंस्थितः॥ २५<br>कृताञ्जलिपुटः स्वामिन्संस्थितोऽथ जयद्रथः।<br>आश्रमे मुनिभिर्जुष्टे भूपतिः संविवेश ह॥ २६ | जब वह अपने दो भृत्योंके साथ आगे बढ़ा तो मुनियोंको वेदपाठमें संलग्न देखकर वहींपर बैठ गया। हे स्वामिन्! राजा जयद्रथ हाथ जोड़कर कुछ देरतक बैठा रहा। इसके बाद वह मुनियोंसे भरे हुए उस आश्रममें प्रविष्ट हुआ॥ २५-२६॥ | | तत्रोपविष्टं राजानं द्रष्टुकामाः स्त्रियस्तदा।<br>आययुर्मुनिभार्याश्च कोऽयमित्यब्रुवन्नृपम् ॥ २७ | तत्पश्चात् मुनियोंकी पत्नियाँ तथा अन्य स्त्रियाँ वहाँ बैठे हुए राजा जयद्रथको देखनेकी इच्छासे वहाँ आ गयीं और लोगोंसे पूछने लगीं—यह कौन है?॥ २७॥ | | तासां मध्ये वरारोहा याज्ञसेनी समागता।<br>जयद्रथेन दृष्टा सा रूपेण श्रीरिवापरा॥ २८ | उन्हीं स्त्रियोंके साथ परम सुन्दरी द्रौपदी भी आयी थी। जयद्रथकी दृष्टि दूसरी लक्ष्मीके समान प्रतीत हो रही उस द्रौपदीपर पड़ गयी॥ २८॥ | | तां विलोक्यासितापाङ्गीं देवकन्यामिवापराम्।<br>पप्रच्छ नृपतिर्धौम्यं केयं श्यामा वरानना॥ २९ | दूसरी देवकन्याकी भाँति प्रतीत हो रही उस श्याम नेत्रोंवाली द्रौपदीको देखकर राजा जयद्रथने ऋषि धौम्यसे पूछा कि यह सुन्दर मुखवाली युवती कौन है?॥ २९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 11 D
| अ० १६ ] | तृतीय स्कन्ध | ३२५ |
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| भार्या कस्य सुता कस्य नाम्ना का वरवर्णिनी।<br>रूपलावण्यसंयुक्ता शचीव वसुधाङ्गता॥ ३० | यह किसकी पत्नी है, किसकी पुत्री है और इस परम सुन्दरीका नाम क्या है? रूप तथा सौन्दर्यसे सम्पन्न यह स्त्री तो धरापर उतरकर आयी हुई साक्षात् इन्द्राणीकी भाँति प्रतीत हो रही है॥ ३०॥ | | बर्बूलवनमध्यस्था लवङ्गलतिका यथा।<br>राक्षसीवृन्दगा नूनं रम्भेवाभाति भामिनी॥ ३१ | यह स्त्री बबूलके वनमें स्थित लवंगलता तथा [कुरूपा] राक्षसियोंके समूहमें सचमुच रम्भाके समान प्रतीत हो रही है॥ ३१॥ | | सत्यं वद महाभाग कस्येयं वल्लभाबला।<br>राजपत्नीव चाभाति नैषा मुनिवधूर्द्विज॥ ३२ | हे महाभाग! आप सच-सच बताइये कि यह स्त्री किसकी पत्नी है? हे द्विज! यह तो किसी रानी-जैसी प्रतीत हो रही है; मुनिपत्नी तो यह कदापि नहीं हो सकती॥ ३२॥ | | धौम्य उवाच<br>पाण्डवानां प्रिया भार्या द्रौपदी शुभलक्षणा।<br>पाञ्चाली सिन्धुराजेन्द्र वसत्यत्र वराश्रमे॥ ३३ | धौम्य बोले—हे सिन्धुराजेन्द्र! समस्त शुभ लक्षणोंवाली यह पाण्डवोंकी प्रिय भार्या तथा पांचालनरेशकी पुत्री द्रौपदी है। यह इसी पवित्र आश्रममें निवास करती है॥ ३३॥ | | जयद्रथ उवाच<br>क्व गताः पाण्डवाः पञ्च शूराः सम्प्रति विश्रुताः।<br>वसन्त्यत्र वने वीरा वीतशोका महाबलाः॥ ३४ | जयद्रथ बोला—विख्यात पराक्रमी पाँचों पाण्डव कहाँ गये हुए हैं? क्या वे महान् बलशाली वीर निश्चिन्त होकर इस समय इसी वनमें रह रहे हैं?॥ ३४॥ | | धौम्य उवाच<br>मृगयार्थं गताः पञ्च पाण्डवा रथसंस्थिताः।<br>आगमिष्यन्ति मध्याह्ने मृगानादाय पार्थिवाः॥ ३५ | धौम्य बोले—पाँचों पाण्डव इस समय रथपर आरूढ़ होकर आखेटके लिये वनमें गये हुए हैं। वे राजागण मध्याह्नकालमें मृगोंको लेकर आ जायँगे॥ ३५॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य उदतिष्ठदसौ नृपः।<br>द्रौपदीसन्निधौ गत्वा प्रणम्येदमुवाच ह॥ ३६<br><br>कुशलं ते वरारोहे क्व गताः पतयश्च ते।<br>एकादश गतान्यद्य वर्षाणि च वने किल॥ ३७ | मुनिका यह वचन सुनकर वह राजा जयद्रथ अपने आसनसे उठा और द्रौपदीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोला—हे परम सुन्दरि! आप सकुशल तो हैं न, आपके पतिगण कहाँ गये हुए हैं? आपको वनमें निवास करते हुए आज ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं॥ ३६-३७॥ | | द्रौपदी तु तदोवाच स्वस्ति तेऽस्तु नृपात्मज।<br>विश्रमस्वाश्रमाभ्याशे क्षणादायान्ति पाण्डवाः॥ ३८ | तत्पश्चात् द्रौपदीने कहा—हे राजकुमार! आपका कल्याण हो। अभी थोड़ी ही देरमें पाण्डव आ जायँगे, तबतक आप आश्रमके समीप ही विश्राम कीजिये॥ ३८॥ | | एवं ब्रुवन्त्यां तस्यां तु लोभाविष्टः स भूपतिः।<br>जहार द्रौपदीं वीरोऽनादृत्य मुनिसत्तमान्॥ ३९ | उसके ऐसा कहनेपर लोभसे आक्रान्त उस वीर जयद्रथने मुनिवरोंकी अवहेलना करके द्रौपदीका हरण कर लिया॥ ३९॥ |
३२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६
३२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| कस्यचिन्नैव विश्वासः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः।<br>कुर्वन्दुःखमवाप्नोति दृष्टान्तस्त्वत्र वै बलिः॥ ४०<br>वैरोचनसुतः श्रीमान्धर्मिष्ठः सत्यसङ्गरः।<br>यज्ञकर्ता च दाता च शरण्यः साधुसम्मतः॥ ४१ | [मनोरमाने कहा—हे स्वामिन्!] अतएव बुद्धिमान् लोगोंको चाहिये कि वे किसीपर भी विश्वास न करें, ऐसा करनेवाला व्यक्ति दुःख प्राप्त करता है। इस विषयमें राजा बलि उदाहरण हैं। विरोचनपुत्र राजा बलि वैभवसम्पन्न, धर्मपरायण, सत्यप्रतिज्ञ, यज्ञकर्ता, दानी, शरणदाता तथा साधुजनोंके सम्मान्य थे॥ ४०-४१॥ |
| नाधर्मे निरतः क्वापि प्रह्लादस्य च पौत्रकः।<br>एकोनशतयज्ञान्वै स चकार सदक्षिणान्॥ ४२<br>सत्त्वमूर्तिः सदा विष्णुः सेव्यः स योगिनामपि।<br>निर्विकारोऽपि भगवान्देवकार्यार्थसिद्धये॥ ४३<br>कश्यपाच्च समुद्भूतो विष्णुः कपटवामनः।<br>राज्यं छलेन हृतवान्महीं चैव ससागराम्॥ ४४ | प्रह्लादके पौत्र वे राजा बलि कभी अधर्मका आचरण नहीं करते थे। उन्होंने दक्षिणायुक्त निन्यानवे यज्ञ किये थे, फिर भी सत्त्वगुणकी साक्षात् मूर्ति, योगियोंद्वारा सदा आराधित तथा विकारोंसे रहित भगवान् विष्णु भी देवताओंका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये कश्यपसे उत्पन्न हुए और उन्होंने वामनका कपटवेष धारण करके छलपूर्वक उनका राज्य तथा सागरसमेत पृथ्वी ले ली॥ ४२—४४॥ |
| सोऽभवत्सत्यवाग्राजा बलिवैरोचनिस्तदा।<br>कपटं कृतवान्विष्णुुरिन्द्रार्थे तु मया श्रुतम्॥ ४५ | विरोचनके पुत्र बलि एक सत्यवादी राजा थे<br>मैंने तो ऐसा सुना है कि भगवान् विष्णुने इन्द्रके लिये ही यह कपट किया था॥ ४५॥ |
| अन्यः किं न करोत्येवं कृतं वै सत्त्वमूर्त्तिना।<br>वामनं रूपमास्थाय यज्ञपातं चिकीर्षता॥ ४६ | जब साक्षात् सत्त्वकी मूर्ति भगवान् विष्णुने बलिका यज्ञ ध्वंस करनेकी कामनासे वामनरूप धारण करके ऐसा किया, तब अन्य लोग क्यों नहीं करेंगे?॥ ४६॥ |
| न च विश्वसितव्यं वै कदाचित्केनचित्तथा।<br>लोभश्चेतसि चेत्स्वामिन्कीदृक्पापकृतं भयम्॥ ४७ | अतएव हे स्वामिन्! किसीपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि यदि चित्तमें लोभ रहता है तो पाप करनेमें किसी भी प्रकारका डर ही क्या?॥ ४७॥ |
| लोभाहताः प्रकुर्वन्ति पापानि प्राणिनः किल।<br>परलोकाद्भयं नास्ति कस्यचित्कर्हिचिन्मुने॥ ४८ | हे मुने! लोभके वशीभूत प्राणी सभी प्रकारके पाप कर बैठते हैं। उस समय किसीको परलोकका किंचिन्मात्र भी भय नहीं रहता॥ ४८॥ |
| मनसा कर्मणा वाचा परस्वादानहेतुतः।<br>प्रपतन्ति नराः सम्यग्लोभोपहतचेतसः॥ ४९ | लोभसे नष्ट हुए चित्तवाले प्राणी दूसरोंका धन हड़पनेके लिये मन, वचन तथा कर्मसे सम्यक् तत्पर रहते हैं॥ ४९॥ |
| देवानाराध्य सततं वाञ्छन्ति च धनं नराः।<br>न देवास्तत्करे कृत्वा समर्था दातुमञ्जसा॥ ५० | देवताओंकी निरन्तर आराधना करके मनुष्य उनसे धनकी कामना करते हैं। यह निश्चित है कि वे देवता अपने हाथोंसे धन उठाकर उन्हें देनेमें पूरी तरहसे समर्थ नहीं हैं॥ ५०॥ |
अ० १६ ] तृतीय स्कन्ध ३२७
| अन्यस्यानीयते वित्तं प्रयच्छन्ति मनीषितम्।<br>वाणिज्येनाथ दानेन चौर्येणापि बलेन वा॥ ५१ | किंतु व्यवसाय, दान, चोरी अथवा बलपूर्वक लूट आदि किसी भी माध्यमसे मनुष्यका अभिलषित धन [उन देवताओंके द्वारा] दूसरेके पाससे ला करके उन्हें दे दिया जाता है॥ ५१॥ |
| विक्रयार्थं गृहीत्वा च धान्यवस्त्रादिकं बहु।<br>देवानर्चयते वैश्यो महर्द्धिर्मे भवेदिति॥ ५२ | विक्रय करनेके लिये पर्याप्त धान्य तथा वस्त्र आदिका संग्रह करके वैश्य इस भावनासे देवताओंकी पूजा करता है कि ‘मेरे पास विपुल धन हो जाय।’ |
| नात्र किं परवित्तेच्छा वाणिज्येन परन्तप।<br>ग्रहणकाले तु सम्प्राप्ते महर्घञ्चापि काङ्क्षति॥ ५३ | हे परन्तप! क्या इस व्यापारके द्वारा दूसरोंका धन ग्रहण करनेकी उन्हें इच्छा नहीं होती ? वस्तुका संग्रह करनेके बादसे ही वह भाव महँगा होनेकी इच्छा करने लगता है॥ ५२-५३॥ |
| एवं हि प्राणिनः सर्वे परस्वादानतत्पराः।<br>वर्तन्ते सततं ब्रह्मन् विश्वासः कीदृशः पुनः॥ ५४ | हे ब्रह्मन्! इस प्रकार सभी प्राणी दूसरोंका धन ले लेनेके लिये निरन्तर तत्पर रहते हैं तो फिर विश्वास कैसा?॥ ५४॥ |
| वृथा तीर्थं वृथा दानं वृथाध्ययनमेव च।<br>लोभमोहावृतानां वै कृतं तदकृतं भवेत्॥ ५५ | लोभ तथा मोहसे घिरे हुए लोगोंका तीर्थ, दान, अध्ययन—सब व्यर्थ हो जाता है; उनका किया हुआ वह सारा कर्म न करनेके समान हो जाता है॥ ५५॥ |
| तस्मादेनं महाभाग विसर्जय गृहं प्रति।<br>सपुत्राहं वसिष्यामि जानकीवद् द्विजोत्तम॥ ५६ | अतः हे महाभाग! इस युधाजित्को घर लौटा दीजिये। हे द्विजोत्तम! जानकीकी भाँति मैं अपने पुत्रके साथ यहीं निवास करूँगी॥ ५६॥ |
| इत्युक्तोऽसौ मुनिस्तावद् गत्वा युधाजितं नृपम्।<br>उवाच वचनं राज्ञे भारद्वाजः प्रतापवान्॥ ५७ | मनोरमाके ऐसा कहनेपर तेजस्वी भारद्वाजमुनि राजा युधाजित्के पास जाकर उनसे बोले—हे राजन्! |
| गच्छ राजन् यथाकामं स्वपुरं नृपसत्तम।<br>नेयं मनोरमाभ्येति बालपुत्रा सुदुःखिता॥ ५८ | हे नृपश्रेष्ठ! अपने इच्छानुसार आप अपने नगरको चले जायें। छोटे बालकवाली यह मनोरमा बड़ी दुःखी है; वह नहीं आ रही है॥ ५७-५८॥ |
| युधाजिदुवाच<br>मुने मुञ्च हठं सौम्य विसर्जय मनोरमाम्।<br>न च यास्याम्यहं मुक्त्वा नेष्याम्यद्य बलात्पुनः॥ ५९ | युधाजित् बोला— हे सौम्य मुने! आप हठ छोड़ दीजिये और मनोरमाको विदा कीजिये, इसे छोड़कर मैं नहीं जाऊँगा, [यदि आप नहीं मानेंगे तो] मैं इसे अभी बलपूर्वक ले जाऊँगा॥ ५९॥ |
| ऋषिरुवाच<br>नयस्व यदि शक्तिस्ते बलेनाद्य ममाश्रमात्।<br>विश्वामित्रो यथा धेनुं वसिष्ठस्य मुनेः पुरा॥ ६० | ऋषि बोले— जैसे प्राचीन कालमें विश्वामित्र वसिष्ठमुनिकी गौ ले जानेके लिये उद्यत हुए थे, उसी प्रकार यदि आपमें शक्ति हो तो आज मेरे आश्रमसे इसे बलपूर्वक ले जाइये॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे युधाजिद्भारद्वाजयोः संवादवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
| ३२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
|---|
अथ सप्तदशोऽध्यायः
युधाजित्का अपने प्रधान अमात्यसे परामर्श करना, प्रधान अमात्यका इस सन्दर्भमें वसिष्ठ-विश्वामित्र-प्रसंग सुनाना और परामर्श मानकर युधाजित्का वापस लौट जाना, बालक सुदर्शनको दैवयोगसे कामराज नामक बीजमन्त्रकी प्राप्ति, भगवतीकी आराधनासे सुदर्शनको उनका प्रत्यक्ष दर्शन होना तथा काशिराजकी कन्या शशिकलाको स्वप्नमें भगवतीद्वारा सुदर्शनका वरण करनेका आदेश देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनेस्तत्रावनीपतिः।<br>मन्त्रिवृद्धं समाहूय पप्रच्छ तमतन्द्रितः॥ १<br><br>किं कर्तव्यं सुबुद्धेऽत्र मयाद्य वद सुव्रत।<br>बलान्नयामि तां कामं सपुत्राञ्च सुभाषिणीम्॥ २<br><br>रिपुरल्पोऽपि नोपेक्ष्यः सर्वथा शुभमिच्छता।<br>राजयक्ष्मेव संवृद्धो मृत्यवे परिकल्पयेत्॥ ३ | [हे राजन्!] भारद्वाजमुनिका यह वचन सुनकर राजा युधाजित्ने अपने प्रधान अमात्यको बुलाकर बड़ी सावधानीसे उनसे पूछा— हे सुबुद्धे! आप बतायें कि अब मुझे क्या करना चाहिये? हे सुव्रत! क्या मधुर वचन बोलनेवाली मनोरमाको पुत्रसहित बलपूर्वक ले चलूँ? अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह तुच्छ शत्रुकी भी उपेक्षा न करे; क्योंकि वह राजयक्ष्मा रोगके समान बढ़कर मृत्युका कारण बन जाता है॥ १-३॥ |
| नात्र सैन्यं न योद्धास्ति यो मामत्र निवारयेत्।<br>गृहीत्वा हन्मि तं तत्र दौहित्रस्य रिपुं किल॥ ४<br><br>निष्कण्टकं भवेद्राज्यं यताम्यद्य बलादहम्।<br>हते सुदर्शने नूनं निर्भयोऽसौ भवेदिति॥ ५ | यहाँ न कोई सेना है और न कोई योद्धा ही है जो मुझे रोक सके। अतः मैं अपने दौहित्रके शत्रु उस सुदर्शनको पकड़कर अभी मार डालूँगा। यदि मैं बलपूर्वक इस प्रयत्नमें सफल हो जाता हूँ तो उसका राज्य निष्कंटक हो जायगा। सुदर्शनके मर जानेपर निश्चय ही वह निर्भय हो जायगा॥ ४-५॥ |
| प्रधान उवाच | प्रधान अमात्यने कहा— |
| साहसं न हि कर्तव्यं श्रुतं राजन् मुनेर्वचः।<br>विश्वामित्रस्य दृष्टान्तः कथितस्तेन मारिष॥ ६ | हे राजन्! ऐसा दुःसाहस नहीं करना चाहिये। अभी आपने भारद्वाजमुनिका वचन सुना ही है। हे मान्य! उन्होंने [इस सम्बन्धमें] विश्वामित्रका दृष्टान्त दिया है॥ ६॥ |
| पुरा गाधिसुतः श्रीमान्विश्वामित्रोऽतिविश्रुतः।<br>विचरन्स नृपश्रेष्ठो वसिष्ठाश्रममभ्यगात्॥ ७ | प्राचीन समयमें गाधितनय विश्वामित्र एक समृद्धिशाली तथा प्रसिद्ध राजा थे। एक बार वे महाराज घूमते हुए महर्षि वसिष्ठके आश्रममें जा पहुँचे॥ ७॥ |
| नमस्कृत्य च तं राजा विश्वामित्रः प्रतापवान्।<br>उपविष्टो नृपश्रेष्ठो मुनिना दत्तविष्टरः॥ ८<br><br>निमन्त्रितो वसिष्ठेन भोजनाय महात्मना।<br>ससैन्यश्च स्थितो राजा गाधिपुत्रो महायशाः॥ ९ | प्रतापी राजाओंमें श्रेष्ठ वे महाराज विश्वामित्र उन्हें प्रणाम करके मुनिद्वारा प्रदत्त आसनपर बैठ गये। उसके बाद महात्मा वसिष्ठजीने उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया, तब वे महायशस्वी गाधिपुत्र विश्वामित्र अपने सैनिकोंसहित उपस्थित हो गये॥ ८-९॥ |
| अ० १७ ] | तृतीय स्कन्ध | ३२१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नन्दिन्यासादितं सर्वं भक्ष्यभोज्यादिकं च यत्।<br>भुक्त्वा राजा ससैन्यश्च वाञ्छितं तत्र भोजनम्॥ १०<br><br>प्रतापं तञ्च नन्दिन्याः परिज्ञाय स पार्थिवः।<br>ययाचे नन्दिनीं राजा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्॥ ११ | उस समय भक्ष्य तथा भोज्य आदि जो भी आवश्यक हुआ, वह सब उनकी नन्दिनी गौने उपस्थित कर दिया। सेनासमेत राजा विश्वामित्र मनोवांछित भोजन करके इसे नन्दिनी गौका प्रभाव समझकर वे राजा उन मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीसे नन्दिनी गौ माँगने लगे॥ १०-११॥ |
| विश्वामित्र उवाच<br>मुने धेनुसहस्त्रं ते घटोध्नीनां ददाम्यहम्।<br>नन्दिनीं देहि मे धेनुं प्रार्थयामि परन्तप॥ १२ | विश्वामित्र बोले—हे मुने! मैं आपको पर्याप्त दूध देनेवाली हजारों गौएँ दूँगा; आप मुझे यह अपनी नन्दिनी गौ दे दीजिये। हे परन्तप! मैं यही प्रार्थना कर रहा हूँ॥ १२॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>होमधेनुरियं राजन्न ददामि कथञ्चन।<br>सहस्रञ्चापि धेनूनां तवेदं तव तिष्ठतु॥ १३ | वसिष्ठ बोले—हे राजन्! यह गौ होमके लिये हविष्य प्रदान करती है। अतः मैं इसे किसी प्रकार भी नहीं दे सकता। आपकी हजार गौएँ आपके ही पास रहें॥ १३॥ |
| विश्वामित्र उवाच<br>अयुतं वाथ लक्ष्यं वा ददामि मनसेप्सितम्।<br>देहि मे नन्दिनीं साधो ग्रहीष्यामि बलादथ॥ १४ | विश्वामित्र बोले—हे साधो! मैं आपकी इच्छाके अनुसार दस हजार अथवा एक लाख गौएँ दे रहा हूँ, आप नन्दिनी मुझे दे दीजिये, नहीं तो मैं इसे बलपूर्वक ग्रहण कर लूँगा॥ १४॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>कामं गृहाण नृपते बलादद्य यथारुचि।<br>नाहं ददामि ते राजन्स्वेच्छया नन्दिनीं गृहात्॥ १५ | वसिष्ठ बोले—हे नृपते! जैसी आपकी रुचि हो, आप इसे बलपूर्वक अभी ले लीजिये, किंतु हे राजन्! मैं तो इस नन्दिनीको स्वेच्छासे अपने आश्रमसे आपको नहीं दूँगा॥ १५॥ |
| तच्छ्रुत्वा नृपतिर्भृत्यानादिदेश महाबलान्।<br>नयध्वं नन्दिनीं धेनुं बलदर्पसुसंस्थिताः॥ १६ | यह सुनकर राजा विश्वामित्रने अपने महाबली अनुचरोंको आदेश दिया कि तुमलोग इस नन्दिनी गौको ले चलो। तब बलके अभिमानमें चूर उन अनुचरोंने आक्रमण करके उस धेनुको बलपूर्वक बाँधकर पकड़ लिया॥ १६ ½ ॥ |
| ते भृत्या जगृहुस्तां तु हठादाक्रम्य यन्त्रिताम्।<br>वेपमाना मुनिं प्राह सुरभिः साश्रुलोचना॥ १७ | तब आँखोंमें आँसू भरकर काँपती हुई उस नन्दिनीने मुनिसे कहा—हे मुने! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? ये सब मुझे बाँधकर खींच रहे हैं॥ १७ ½ ॥ |
| मुने त्यजसि मां कस्मात्कर्षयन्ति सुयन्त्रिताम्।<br>मुनिस्तां प्रत्युवाचेदं त्यजे नाहं सुदुग्धदे॥ १८<br><br>बलान्नयति राजासौ पूजितोऽद्य मया शुभे।<br>किं करोमि न चेच्छामि त्यक्तुं त्वां मनसा किल॥ १९ | वसिष्ठजीने उससे कहा—हे उत्तम दूध देनेवाली नन्दिनी! मैं तुम्हें त्याग नहीं रहा हूँ। ये राजा तुम्हें बलपूर्वक ले जा रहे हैं; जबकि मैंने अभी इनका स्वागत किया है। हे शुभे! मैं क्या करूँ? मैं अपने मनसे तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता॥ १८-१९॥ |
| ३३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| इत्युक्ता मुनिना धेनुः क्रोधयुक्ता बभूव ह।<br>हम्भारवं चकाराशु क्रूरशब्दं सुदारुणम्॥ २० | मुनिके ऐसा कहनेपर वह धेनु क्रोधित हो गयी और कर्कश शब्दोंवाला अत्यन्त भयंकर हम्भारव करने लगी॥ २०॥ |
| उद्गतास्तत्र देहात्तु दैत्या घोरतरास्तदा।<br>सायुधास्तिष्ठ तिष्ठेति ब्रुवन्तः कवचावृताः॥ २१ | उसी समय उसके शरीरसे महाभयंकर दैत्य 'ठहरो-ठहरो'—ऐसा कहते हुए निकल पड़े। वे शस्त्र धारण किये हुए थे और उनका शरीर कवचसे ढँका हुआ था॥ २१॥ |
| सैन्यं सर्वं हतं तैस्तु नन्दिनी प्रतिमोचिता।<br>एकाकी निर्गतो राजा विश्वामित्रोऽतिदुःखितः॥ २२<br><br>हन्त पापोऽतिदीनात्मा निन्दन् क्षात्रबलं महत्।<br>ब्राह्मं बलं दुराराध्यं मत्वा तपसि संस्थितः॥ २३<br><br>तप्त्वा बहूनि वर्षाणि तपो घोरं महावने।<br>ऋषित्वं प्राप गाधेयस्त्यक्त्वा क्षात्रं विधिं पुनः॥ २४ | उन्होंने सारी सेनाका संहार कर दिया और नन्दिनीको उनसे छुड़ा लिया। तब अत्यन्त व्यथित होकर राजा विश्वामित्र अकेले ही घर लौट गये। [वे अपने मनमें सोचने लगे—] हाय! मैं कितना पापी एवं दीनात्मा हूँ। क्षत्रियबलकी निन्दा करते हुए वे विश्वामित्र ब्राह्मणके बलको महान् तथा दुराराध्य समझकर तप करने लगे। महावनमें अनेक वर्षोंतक कठोर तपस्या करके विश्वामित्रने क्षात्रधर्मका त्याग करके अन्तमें ऋषित्व प्राप्त कर लिया॥ २२—२४॥ |
| तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मा कृथा वैरमद्भुतम्।<br>कुलनाशकरं नूनं तापसैः सह संयुगम्॥ २५ | अतः हे राजेन्द्र! आप भी ऐसा अद्भुत वैर न करें; क्योंकि तपस्वियोंके साथ किया जानेवाला युद्ध निश्चित ही कुलका नाश करनेवाला होता है॥ २५॥ |
| मुनिवर्यं व्रजाद्य त्वं समाश्वास्य तपोनिधिम्।<br>सुदर्शनोऽपि राजेन्द्र तिष्ठत्वत्र यथासुखम्॥ २६ | अतः आप तपोनिधि मुनिवर भारद्वाजके पास अभी जाइये और उन्हें आश्वासन दीजिये। हे राजेन्द्र! सुदर्शनको यहीं छोड़ दीजिये, जिससे वह आनन्दपूर्वक रह सके॥ २६॥ |
| बालोऽयं निर्धनः किं ते करिष्यति नृपाहितम्।<br>वृथा ते वैरभावोऽयमनाथे दुर्बले शिशौ॥ २७ | हे राजन्! यह दीन बालक आपका क्या अहित कर सकेगा? ऐसे दुर्बल एवं अनाथ बालकके प्रति आपका यह वैरभाव व्यर्थ है॥ २७॥ |
| दया सर्वत्र कर्तव्या दैवाधीनमिदं जगत्।<br>ईर्ष्या किं नृपश्रेष्ठ यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ २८ | हे नृपश्रेष्ठ! सर्वत्र दया करनी चाहिये। यह संसार सदा दैवके अधीन रहता है। ईर्ष्या करनेसे क्या लाभ? जो होनी होगी, वह तो होकर ही रहेगी॥ २८॥ |
| वज्रं तृणायते राजन् दैवयोगान्न संशयः।<br>तृणं वज्रायते क्वापि समये दैवयोगतः॥ २९<br><br>शशको हन्ति शार्दूलं मशको वै तथा गजम्।<br>साहसं मुञ्च मेधाविन् कुरु मे वचनं हितम्॥ ३० | हे राजन्! दैवयोगसे कभी वज्र तृण बन जाता है और किसी समय तृण वज्र बन जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। दैवयोगसे ही खरगोश सिंहको और मच्छर हाथीको मार देता है। अतः हे मेधाविन्! आप दुःसाहस छोड़िये तथा मेरा हितकर वचन मानिये॥ २९-३०॥ |