देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 331, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| ऋषिरुवाच | **ऋषि बोले—**हे कल्याणि! तुम यहाँ भयरहित होकर निवास करो; हे सुव्रते! अपने पुत्रका पालन-पोषण करो। हे विशालनयने! यहाँ तुम्हें शत्रुओंसे उत्पन्न होनेवाला किसी प्रकारका भी भय नहीं करना चाहिये। तुम अपने इस कान्तिमान् पुत्रका पालन करो, तुम्हारा यह पुत्र आगे चलकर राजा होगा। यहाँ तुम लोगोंको कभी भी कोई दुःख तथा शोक नहीं होगा॥ ५८-५९॥ | | निर्भया वस कल्याणि पुत्रं पालय सुव्रते।<br>न ते भयं विशालाक्षि कर्तव्यं शत्रुसम्भवम्॥ ५८<br><br>पालयस्व सुतं कान्तं राजा तेऽयं भविष्यति।<br>नात्र दुःखं तथा शोकः कदाचित्सम्भविष्यति॥ ५९ | | | व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**मुनिके इस प्रकार कहनेपर महारानी मनोरमा निश्चिन्त हो गयीं और मुनिके द्वारा प्रदान की गयी एक कुटियामें वे शोकरहित होकर निवास करने लगीं॥ ६०॥ | | इत्युक्ता मुनिना राज्ञी स्वस्था सा सम्बभूव ह।<br>उटजे मुनिना दत्ते वीतशोका तदावसत्॥ ६० | | | सैरन्ध्रीसहिता तत्र विदल्लेन च संयुता।<br>सुदर्शनं पालयाना न्यवसत्सा मनोरमा॥ ६१ | इस प्रकार सुदर्शनका पालन-पोषण करती हुई वे मनोरमा अपनी दासी तथा मन्त्री विदल्लके साथ वहाँ रहने लगीं॥ ६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे मनोरमया भारद्वाजाश्रमं प्रति गमनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
युधाजित्का भारद्वाजमुनिके आश्रमपर आना और उनसे मनोरमाको भेजनेका आग्रह करना, प्रत्युत्तरमें मुनिका 'शक्ति हो तो ले जाओ'—ऐसा कहना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] तदनन्तर महाबली युधाजित्ने रणभूमिसे अयोध्या पहुँचकर सुदर्शनको भी मार डालनेकी इच्छासे मनोरमाके विषयमें लोगोंसे पूछा॥ १॥ | | युधाजित्त्वथ संग्रामाद् गत्वायोध्यां महाबलः।<br>मनोरमां च पप्रच्छ सुदर्शनजिघांसया॥ १ | | | सेवकान् प्रेषयामास क्व गतेति मुहुर्वदन्।<br>शुभे दिनेऽथ दौहित्रं स्थापयामास चासने॥ २ | 'मनोरमा कहाँ चली गयी' ऐसा बार-बार कहते हुए उसने सेवकोंको इधर-उधर भेज दिया। तत्पश्चात् किसी शुभ दिनमें अपने दौहित्रको राजसिंहासनपर बैठा दिया॥ २॥ | | मन्त्रिभिश्च वसिष्ठेन मन्त्रैराथर्वणैः शुभैः।<br>अभिषिक्तश्च सम्पूर्णैः कलशैर्जलपूरितैः॥ ३ | समस्त मन्त्रियोंके साथ गुरु वसिष्ठने अथर्ववेदके कल्याणकारी मन्त्रोंका उच्चारण करके जलपूरित समस्त कलशोंसे राजकुमार शत्रुजित्का अभिषेक किया॥ ३॥ | | भेरीशङ्खनिनादैश्च तूर्याणां चाथ निःस्वनैः।<br>उत्सवस्तु नगर्यां वै सम्बभूव कुरुद्वह॥ ४ | हे कुरुनन्दन! उस समय शंख, भेरीके निनादों तथा तुरहियोंकी ध्वनियोंके साथ पूरे नगरमें उत्सव मनाया गया॥ ४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—11 B