भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 332
अ० १६ ]तृतीय स्कन्ध३२३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विप्राणां वेदपाठैश्च बन्दिनां स्तुतिभिस्तथा।<br>अयोध्या मुदितेवासीज्जयशब्दैः सुमङ्गलैः॥ ५ब्राह्मणोंके वेदपाठों, बन्दीजनोंके स्तुतिगान तथा मंगलकारी जयघोषसे अयोध्यानगरी प्रफुल्लित-सी दिखायी दे रही थी॥ ५॥
हृष्टपुष्टजनाकीर्णा स्तुतिवादित्रनिःस्वना।<br>नवे तस्मिन्महीपाले पूर्बभौ नूतनेव सा॥ ६हृष्ट-पुष्टजनोंसे भरी-पूरी और स्तुतियों तथा वाद्योंकी ध्वनिसे निनादित वह अयोध्या उस नये नरेशके अभिषिक्त होनेपर नवीन पुरीकी भाँति सुशोभित हो रही थी॥ ६॥
केचित्साधुजना ये वै चक्रुः शोकं गृहे स्थिताः।<br>सुदर्शनं विचिन्त्याद्य क्व गतोऽसौ नृपात्मजः॥ ७<br><br>मनोरमातिसाध्वी सा क्व गता सुतसंयुता।<br>पितास्या निहतः संख्ये राज्यलोभेन वैरिणा॥ ८उस नगरीमें जो कोई भी सज्जनलोग थे, उन्होंने अपने घरमें ही रहकर शोक मनाया। वे सुदर्शनके विषयमें सोचते हुए कह रहे थे कि वह राजकुमार कहाँ चला गया? महान् पतिव्रता वह मनोरमा अपने पुत्रके साथ कहाँ चली गयी? राज्यलोभी शत्रु युधाजित्ने युद्धमें उसके पिताको मार डाला॥ ७-८॥
इत्येवं चिन्त्यमानास्ते साधवः समबुद्धयः।<br>अतिष्ठन्दुःखितास्तत्र शत्रुजिद्वशवर्तिनः॥ ९ऐसा विचार करते हुए सबमें समान बुद्धि रखनेवाले वे साधुजन शत्रुजित्के अधीन होकर दुःखी मनसे रहने लगे॥ ९॥
युधाजिदपि दौहित्रं स्थापयित्वा विधानतः।<br>राज्यञ्च मन्त्रिसात्कृत्वा चलितः स्वां पुरीं प्रति॥ १०इस प्रकार युधाजित् भी विधानपूर्वक अपने दौहित्रको राजसिंहासनपर बैठाकर तथा राज्यभार मन्त्रियोंको सौंपकर अपनी नगरीको प्रस्थान कर गया॥ १०॥
श्रुत्वा सुदर्शनं तत्र मुनीनामाश्रमे स्थितम्।<br>हन्तुकामो जगामाशु चित्रकूटं स पर्वतम्॥ ११सुदर्शन मुनियोंके आश्रममें रह रहा है—ऐसा सुनकर युधाजित् उसे मार डालनेकी इच्छासे तत्काल ही चित्रकूट-पर्वतकी ओर चल पड़ा॥ ११॥
निषादाधिपतिं शूरं पुरस्कृत्य बलाभिधम्।<br>दुर्दशाख्यमगादाशु शृङ्गवेरपुराधिपम्॥ १२वह दुर्दर्श नामक शृंगवेरपुरके राजाके यहाँ पहुँचा और उस विशाल सेनासम्पन्न तथा पराक्रमी निषादराजको अगुआ बनाकर उसने शीघ्र ही आगेकी ओर प्रस्थान किया॥ १२॥
श्रुत्वा मनोरमा तत्र बभूवातिसुदुःखिता।<br>आगच्छन्तं बालपुत्रा भयार्ता सैन्यसंयुतम्॥ १३युधाजित्को सेनासहित आते हुए सुनकर अबोध सन्तानवाली वह मनोरमा भयभीत तथा अत्यन्त दुःखित हो गयी॥ १३॥
तमुवाचातिशोकार्ता मुनिं साश्रुविलोचना।<br>किं करोमि क्व गच्छामि युधाजित्समुपस्थितः॥ १४अत्यन्त शोकसन्तप्त वह मनोरमा आँखोंमें आँसू भरकर मुनि भारद्वाजसे बोली कि युधाजित् यहाँ भी आ पहुँचा; अब मैं क्या करूँ तथा कहाँ जाऊँ?॥ १४॥
पिता मे निहतोऽनेन दौहित्रो भूपतिः कृतः।<br>सुतं मे हन्तुकामोऽत्र समायाति बलान्वितः॥ १५इसने मेरे पिताका वध कर दिया तथा अपने दौहित्रको राजा बना दिया। अब वह विशाल सेनाके साथ मेरे पुत्रके वधकी कामनासे यहाँ आ रहा है॥ १५॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—11 C