भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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३२४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६

| पुरा श्रुतं मया स्वामिन् पाण्डवा वै वने स्थिताः।<br>मुनीनामाश्रमे पुण्ये पाञ्चाल्या सहितास्तदा ॥ १६<br>गतास्ते मृगयां पार्था भ्रातरः पञ्च एव ते।<br>द्रौपदी संस्थिता तत्र मुनीनामाश्रमे शुभे ॥ १७ | हे स्वामिन्! मैंने सुना है कि पूर्वकालमें जब मुनियोंके पवित्र आश्रममें द्रौपदीके साथ पाण्डव निवास कर रहे थे, उसी समय एक दिन वे पाँचों भाई आखेटके लिये चले गये और द्रौपदी वहींपर मुनियोंके उस पावन आश्रममें रह गयी थी॥ १६-१७॥ | | धौम्योऽत्रिर्गालवः पैलो जाबालिगौतमो भृगुः।<br>च्यवनश्चात्रिगोत्रश्च कण्वश्चैव जतुः क्रतुः ॥ १८<br>वीतिहोत्रः सुमन्तुश्च यज्ञदत्तोऽथ वत्सलः।<br>राशासनः कहोडश्च यवक्रीर्यज्ञकृत्क्रतुः ॥ १९<br>एते चान्ये च मुनयो भारद्वाजादयः शुभाः।<br>वेदपाठयुताः सर्वे संस्थिताश्चाश्रमे स्थिताः॥ २० | धौम्य, अत्रि, गालव, पैल, जाबालि, गौतम, भृगु, च्यवन, अत्रिगोत्रज कण्व, जतु, क्रतु, वीतिहोत्र, सुमन्तु, यज्ञदत्त, वत्सल, राशासन, कहोड, यवक्री, यज्ञकृत् क्रतु—ये सब और भारद्वाज आदि अन्य पुण्यात्मा मुनिगण उस पावन आश्रममें विराजमान थे। वे सभी वेदपाठ कर रहे थे॥ १८-२०॥ | | दासीभिः सहिता तत्र याज्ञसेनी स्थिता मुने।<br>आश्रमे चारुसर्वाङ्गी निर्भया मुनिसंवृते ॥ २१ | हे मुने! मुनि-समुदायसे सम्पन्न उस आश्रममें सर्वाङ्गसुन्दरी वह द्रौपदी अपनी दासियोंके साथ निर्भय होकर रहती थी॥ २१॥ | | पार्था मृगानुगास्तावत्प्रयाताश्च वनाद्वनम्।<br>धनुर्बाणधरा वीराः पञ्च वै शत्रुतापनाः ॥ २२ | शत्रुओंको सन्ताप पहुँचानेमें समर्थ तथा धनुष-बाण धारण किये वे पाँचों पाण्डव मृगका पीछा करते हुए एक वनसे दूसरे वनमें निकल गये॥ २२॥ | | तावत्सिन्धुपतिः श्रीमान्मार्गस्थो बलसंयुतः।<br>आगतश्चाश्रमाभ्याशे श्रुत्वा तु निगमध्वनिम् ॥ २३ | इसी बीच समृद्धिशाली सिन्धुनरेश [जयद्रथ] वेद-ध्वनि सुनकर अपनी सेनाके साथ आश्रमके पास आ गया॥ २३॥ | | श्रुत्वा वेदध्वनिं राजा मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>उत्ततार रथात्तूर्णं दर्शनाकाङ्क्षया नृपः ॥ २४ | वेदपाठ सुनकर राजा जयद्रथ पुण्यात्मा मुनियोंके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक रथसे उतरा॥ २४॥ | | यदा निरगमत्तत्र भृत्यद्वयसमन्वितः।<br>वेदपाठयुतान्वीक्ष्य मुनीनुद्यमसंस्थितः॥ २५<br>कृताञ्जलिपुटः स्वामिन्संस्थितोऽथ जयद्रथः।<br>आश्रमे मुनिभिर्जुष्टे भूपतिः संविवेश ह॥ २६ | जब वह अपने दो भृत्योंके साथ आगे बढ़ा तो मुनियोंको वेदपाठमें संलग्न देखकर वहींपर बैठ गया। हे स्वामिन्! राजा जयद्रथ हाथ जोड़कर कुछ देरतक बैठा रहा। इसके बाद वह मुनियोंसे भरे हुए उस आश्रममें प्रविष्ट हुआ॥ २५-२६॥ | | तत्रोपविष्टं राजानं द्रष्टुकामाः स्त्रियस्तदा।<br>आययुर्मुनिभार्याश्च कोऽयमित्यब्रुवन्नृपम् ॥ २७ | तत्पश्चात् मुनियोंकी पत्नियाँ तथा अन्य स्त्रियाँ वहाँ बैठे हुए राजा जयद्रथको देखनेकी इच्छासे वहाँ आ गयीं और लोगोंसे पूछने लगीं—यह कौन है?॥ २७॥ | | तासां मध्ये वरारोहा याज्ञसेनी समागता।<br>जयद्रथेन दृष्टा सा रूपेण श्रीरिवापरा॥ २८ | उन्हीं स्त्रियोंके साथ परम सुन्दरी द्रौपदी भी आयी थी। जयद्रथकी दृष्टि दूसरी लक्ष्मीके समान प्रतीत हो रही उस द्रौपदीपर पड़ गयी॥ २८॥ | | तां विलोक्यासितापाङ्गीं देवकन्यामिवापराम्।<br>पप्रच्छ नृपतिर्धौम्यं केयं श्यामा वरानना॥ २९ | दूसरी देवकन्याकी भाँति प्रतीत हो रही उस श्याम नेत्रोंवाली द्रौपदीको देखकर राजा जयद्रथने ऋषि धौम्यसे पूछा कि यह सुन्दर मुखवाली युवती कौन है?॥ २९॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 11 D