भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 889 में से

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पृष्ठ 334
अ० १६ ]तृतीय स्कन्ध३२५

| भार्या कस्य सुता कस्य नाम्ना का वरवर्णिनी।<br>रूपलावण्यसंयुक्ता शचीव वसुधाङ्गता॥ ३० | यह किसकी पत्नी है, किसकी पुत्री है और इस परम सुन्दरीका नाम क्या है? रूप तथा सौन्दर्यसे सम्पन्न यह स्त्री तो धरापर उतरकर आयी हुई साक्षात् इन्द्राणीकी भाँति प्रतीत हो रही है॥ ३०॥ | | बर्बूलवनमध्यस्था लवङ्गलतिका यथा।<br>राक्षसीवृन्दगा नूनं रम्भेवाभाति भामिनी॥ ३१ | यह स्त्री बबूलके वनमें स्थित लवंगलता तथा [कुरूपा] राक्षसियोंके समूहमें सचमुच रम्भाके समान प्रतीत हो रही है॥ ३१॥ | | सत्यं वद महाभाग कस्येयं वल्लभाबला।<br>राजपत्नीव चाभाति नैषा मुनिवधूर्द्विज॥ ३२ | हे महाभाग! आप सच-सच बताइये कि यह स्त्री किसकी पत्नी है? हे द्विज! यह तो किसी रानी-जैसी प्रतीत हो रही है; मुनिपत्नी तो यह कदापि नहीं हो सकती॥ ३२॥ | | धौम्य उवाच<br>पाण्डवानां प्रिया भार्या द्रौपदी शुभलक्षणा।<br>पाञ्चाली सिन्धुराजेन्द्र वसत्यत्र वराश्रमे॥ ३३ | धौम्य बोले—हे सिन्धुराजेन्द्र! समस्त शुभ लक्षणोंवाली यह पाण्डवोंकी प्रिय भार्या तथा पांचालनरेशकी पुत्री द्रौपदी है। यह इसी पवित्र आश्रममें निवास करती है॥ ३३॥ | | जयद्रथ उवाच<br>क्व गताः पाण्डवाः पञ्च शूराः सम्प्रति विश्रुताः।<br>वसन्त्यत्र वने वीरा वीतशोका महाबलाः॥ ३४ | जयद्रथ बोला—विख्यात पराक्रमी पाँचों पाण्डव कहाँ गये हुए हैं? क्या वे महान् बलशाली वीर निश्चिन्त होकर इस समय इसी वनमें रह रहे हैं?॥ ३४॥ | | धौम्य उवाच<br>मृगयार्थं गताः पञ्च पाण्डवा रथसंस्थिताः।<br>आगमिष्यन्ति मध्याह्ने मृगानादाय पार्थिवाः॥ ३५ | धौम्य बोले—पाँचों पाण्डव इस समय रथपर आरूढ़ होकर आखेटके लिये वनमें गये हुए हैं। वे राजागण मध्याह्नकालमें मृगोंको लेकर आ जायँगे॥ ३५॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य उदतिष्ठदसौ नृपः।<br>द्रौपदीसन्निधौ गत्वा प्रणम्येदमुवाच ह॥ ३६<br><br>कुशलं ते वरारोहे क्व गताः पतयश्च ते।<br>एकादश गतान्यद्य वर्षाणि च वने किल॥ ३७ | मुनिका यह वचन सुनकर वह राजा जयद्रथ अपने आसनसे उठा और द्रौपदीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोला—हे परम सुन्दरि! आप सकुशल तो हैं न, आपके पतिगण कहाँ गये हुए हैं? आपको वनमें निवास करते हुए आज ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं॥ ३६-३७॥ | | द्रौपदी तु तदोवाच स्वस्ति तेऽस्तु नृपात्मज।<br>विश्रमस्वाश्रमाभ्याशे क्षणादायान्ति पाण्डवाः॥ ३८ | तत्पश्चात् द्रौपदीने कहा—हे राजकुमार! आपका कल्याण हो। अभी थोड़ी ही देरमें पाण्डव आ जायँगे, तबतक आप आश्रमके समीप ही विश्राम कीजिये॥ ३८॥ | | एवं ब्रुवन्त्यां तस्यां तु लोभाविष्टः स भूपतिः।<br>जहार द्रौपदीं वीरोऽनादृत्य मुनिसत्तमान्॥ ३९ | उसके ऐसा कहनेपर लोभसे आक्रान्त उस वीर जयद्रथने मुनिवरोंकी अवहेलना करके द्रौपदीका हरण कर लिया॥ ३९॥ |

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