भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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३२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६


श्लोकअर्थ
कस्यचिन्नैव विश्वासः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः।<br>कुर्वन्दुःखमवाप्नोति दृष्टान्तस्त्वत्र वै बलिः॥ ४०<br>वैरोचनसुतः श्रीमान्धर्मिष्ठः सत्यसङ्गरः।<br>यज्ञकर्ता च दाता च शरण्यः साधुसम्मतः॥ ४१[मनोरमाने कहा—हे स्वामिन्!] अतएव बुद्धिमान् लोगोंको चाहिये कि वे किसीपर भी विश्वास न करें, ऐसा करनेवाला व्यक्ति दुःख प्राप्त करता है। इस विषयमें राजा बलि उदाहरण हैं। विरोचनपुत्र राजा बलि वैभवसम्पन्न, धर्मपरायण, सत्यप्रतिज्ञ, यज्ञकर्ता, दानी, शरणदाता तथा साधुजनोंके सम्मान्य थे॥ ४०-४१॥
नाधर्मे निरतः क्वापि प्रह्लादस्य च पौत्रकः।<br>एकोनशतयज्ञान्वै स चकार सदक्षिणान्॥ ४२<br>सत्त्वमूर्तिः सदा विष्णुः सेव्यः स योगिनामपि।<br>निर्विकारोऽपि भगवान्देवकार्यार्थसिद्धये॥ ४३<br>कश्यपाच्च समुद्भूतो विष्णुः कपटवामनः।<br>राज्यं छलेन हृतवान्महीं चैव ससागराम्॥ ४४प्रह्लादके पौत्र वे राजा बलि कभी अधर्मका आचरण नहीं करते थे। उन्होंने दक्षिणायुक्त निन्यानवे यज्ञ किये थे, फिर भी सत्त्वगुणकी साक्षात् मूर्ति, योगियोंद्वारा सदा आराधित तथा विकारोंसे रहित भगवान् विष्णु भी देवताओंका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये कश्यपसे उत्पन्न हुए और उन्होंने वामनका कपटवेष धारण करके छलपूर्वक उनका राज्य तथा सागरसमेत पृथ्वी ले ली॥ ४२—४४॥
सोऽभवत्सत्यवाग्राजा बलिवैरोचनिस्तदा।<br>कपटं कृतवान्विष्णुुरिन्द्रार्थे तु मया श्रुतम्॥ ४५विरोचनके पुत्र बलि एक सत्यवादी राजा थे<br>मैंने तो ऐसा सुना है कि भगवान् विष्णुने इन्द्रके लिये ही यह कपट किया था॥ ४५॥
अन्यः किं न करोत्येवं कृतं वै सत्त्वमूर्त्तिना।<br>वामनं रूपमास्थाय यज्ञपातं चिकीर्षता॥ ४६जब साक्षात् सत्त्वकी मूर्ति भगवान् विष्णुने बलिका यज्ञ ध्वंस करनेकी कामनासे वामनरूप धारण करके ऐसा किया, तब अन्य लोग क्यों नहीं करेंगे?॥ ४६॥
न च विश्वसितव्यं वै कदाचित्केनचित्तथा।<br>लोभश्चेतसि चेत्स्वामिन्कीदृक्पापकृतं भयम्॥ ४७अतएव हे स्वामिन्! किसीपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि यदि चित्तमें लोभ रहता है तो पाप करनेमें किसी भी प्रकारका डर ही क्या?॥ ४७॥
लोभाहताः प्रकुर्वन्ति पापानि प्राणिनः किल।<br>परलोकाद्भयं नास्ति कस्यचित्कर्हिचिन्मुने॥ ४८हे मुने! लोभके वशीभूत प्राणी सभी प्रकारके पाप कर बैठते हैं। उस समय किसीको परलोकका किंचिन्मात्र भी भय नहीं रहता॥ ४८॥
मनसा कर्मणा वाचा परस्वादानहेतुतः।<br>प्रपतन्ति नराः सम्यग्लोभोपहतचेतसः॥ ४९लोभसे नष्ट हुए चित्तवाले प्राणी दूसरोंका धन हड़पनेके लिये मन, वचन तथा कर्मसे सम्यक् तत्पर रहते हैं॥ ४९॥
देवानाराध्य सततं वाञ्छन्ति च धनं नराः।<br>न देवास्तत्करे कृत्वा समर्था दातुमञ्जसा॥ ५०देवताओंकी निरन्तर आराधना करके मनुष्य उनसे धनकी कामना करते हैं। यह निश्चित है कि वे देवता अपने हाथोंसे धन उठाकर उन्हें देनेमें पूरी तरहसे समर्थ नहीं हैं॥ ५०॥