देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० १६ ] तृतीय स्कन्ध ३२७
| अन्यस्यानीयते वित्तं प्रयच्छन्ति मनीषितम्।<br>वाणिज्येनाथ दानेन चौर्येणापि बलेन वा॥ ५१ | किंतु व्यवसाय, दान, चोरी अथवा बलपूर्वक लूट आदि किसी भी माध्यमसे मनुष्यका अभिलषित धन [उन देवताओंके द्वारा] दूसरेके पाससे ला करके उन्हें दे दिया जाता है॥ ५१॥ |
| विक्रयार्थं गृहीत्वा च धान्यवस्त्रादिकं बहु।<br>देवानर्चयते वैश्यो महर्द्धिर्मे भवेदिति॥ ५२ | विक्रय करनेके लिये पर्याप्त धान्य तथा वस्त्र आदिका संग्रह करके वैश्य इस भावनासे देवताओंकी पूजा करता है कि ‘मेरे पास विपुल धन हो जाय।’ |
| नात्र किं परवित्तेच्छा वाणिज्येन परन्तप।<br>ग्रहणकाले तु सम्प्राप्ते महर्घञ्चापि काङ्क्षति॥ ५३ | हे परन्तप! क्या इस व्यापारके द्वारा दूसरोंका धन ग्रहण करनेकी उन्हें इच्छा नहीं होती ? वस्तुका संग्रह करनेके बादसे ही वह भाव महँगा होनेकी इच्छा करने लगता है॥ ५२-५३॥ |
| एवं हि प्राणिनः सर्वे परस्वादानतत्पराः।<br>वर्तन्ते सततं ब्रह्मन् विश्वासः कीदृशः पुनः॥ ५४ | हे ब्रह्मन्! इस प्रकार सभी प्राणी दूसरोंका धन ले लेनेके लिये निरन्तर तत्पर रहते हैं तो फिर विश्वास कैसा?॥ ५४॥ |
| वृथा तीर्थं वृथा दानं वृथाध्ययनमेव च।<br>लोभमोहावृतानां वै कृतं तदकृतं भवेत्॥ ५५ | लोभ तथा मोहसे घिरे हुए लोगोंका तीर्थ, दान, अध्ययन—सब व्यर्थ हो जाता है; उनका किया हुआ वह सारा कर्म न करनेके समान हो जाता है॥ ५५॥ |
| तस्मादेनं महाभाग विसर्जय गृहं प्रति।<br>सपुत्राहं वसिष्यामि जानकीवद् द्विजोत्तम॥ ५६ | अतः हे महाभाग! इस युधाजित्को घर लौटा दीजिये। हे द्विजोत्तम! जानकीकी भाँति मैं अपने पुत्रके साथ यहीं निवास करूँगी॥ ५६॥ |
| इत्युक्तोऽसौ मुनिस्तावद् गत्वा युधाजितं नृपम्।<br>उवाच वचनं राज्ञे भारद्वाजः प्रतापवान्॥ ५७ | मनोरमाके ऐसा कहनेपर तेजस्वी भारद्वाजमुनि राजा युधाजित्के पास जाकर उनसे बोले—हे राजन्! |
| गच्छ राजन् यथाकामं स्वपुरं नृपसत्तम।<br>नेयं मनोरमाभ्येति बालपुत्रा सुदुःखिता॥ ५८ | हे नृपश्रेष्ठ! अपने इच्छानुसार आप अपने नगरको चले जायें। छोटे बालकवाली यह मनोरमा बड़ी दुःखी है; वह नहीं आ रही है॥ ५७-५८॥ |
| युधाजिदुवाच<br>मुने मुञ्च हठं सौम्य विसर्जय मनोरमाम्।<br>न च यास्याम्यहं मुक्त्वा नेष्याम्यद्य बलात्पुनः॥ ५९ | युधाजित् बोला— हे सौम्य मुने! आप हठ छोड़ दीजिये और मनोरमाको विदा कीजिये, इसे छोड़कर मैं नहीं जाऊँगा, [यदि आप नहीं मानेंगे तो] मैं इसे अभी बलपूर्वक ले जाऊँगा॥ ५९॥ |
| ऋषिरुवाच<br>नयस्व यदि शक्तिस्ते बलेनाद्य ममाश्रमात्।<br>विश्वामित्रो यथा धेनुं वसिष्ठस्य मुनेः पुरा॥ ६० | ऋषि बोले— जैसे प्राचीन कालमें विश्वामित्र वसिष्ठमुनिकी गौ ले जानेके लिये उद्यत हुए थे, उसी प्रकार यदि आपमें शक्ति हो तो आज मेरे आश्रमसे इसे बलपूर्वक ले जाइये॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे युधाजिद्भारद्वाजयोः संवादवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥