देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ३२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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अथ सप्तदशोऽध्यायः
युधाजित्का अपने प्रधान अमात्यसे परामर्श करना, प्रधान अमात्यका इस सन्दर्भमें वसिष्ठ-विश्वामित्र-प्रसंग सुनाना और परामर्श मानकर युधाजित्का वापस लौट जाना, बालक सुदर्शनको दैवयोगसे कामराज नामक बीजमन्त्रकी प्राप्ति, भगवतीकी आराधनासे सुदर्शनको उनका प्रत्यक्ष दर्शन होना तथा काशिराजकी कन्या शशिकलाको स्वप्नमें भगवतीद्वारा सुदर्शनका वरण करनेका आदेश देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनेस्तत्रावनीपतिः।<br>मन्त्रिवृद्धं समाहूय पप्रच्छ तमतन्द्रितः॥ १<br><br>किं कर्तव्यं सुबुद्धेऽत्र मयाद्य वद सुव्रत।<br>बलान्नयामि तां कामं सपुत्राञ्च सुभाषिणीम्॥ २<br><br>रिपुरल्पोऽपि नोपेक्ष्यः सर्वथा शुभमिच्छता।<br>राजयक्ष्मेव संवृद्धो मृत्यवे परिकल्पयेत्॥ ३ | [हे राजन्!] भारद्वाजमुनिका यह वचन सुनकर राजा युधाजित्ने अपने प्रधान अमात्यको बुलाकर बड़ी सावधानीसे उनसे पूछा— हे सुबुद्धे! आप बतायें कि अब मुझे क्या करना चाहिये? हे सुव्रत! क्या मधुर वचन बोलनेवाली मनोरमाको पुत्रसहित बलपूर्वक ले चलूँ? अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह तुच्छ शत्रुकी भी उपेक्षा न करे; क्योंकि वह राजयक्ष्मा रोगके समान बढ़कर मृत्युका कारण बन जाता है॥ १-३॥ |
| नात्र सैन्यं न योद्धास्ति यो मामत्र निवारयेत्।<br>गृहीत्वा हन्मि तं तत्र दौहित्रस्य रिपुं किल॥ ४<br><br>निष्कण्टकं भवेद्राज्यं यताम्यद्य बलादहम्।<br>हते सुदर्शने नूनं निर्भयोऽसौ भवेदिति॥ ५ | यहाँ न कोई सेना है और न कोई योद्धा ही है जो मुझे रोक सके। अतः मैं अपने दौहित्रके शत्रु उस सुदर्शनको पकड़कर अभी मार डालूँगा। यदि मैं बलपूर्वक इस प्रयत्नमें सफल हो जाता हूँ तो उसका राज्य निष्कंटक हो जायगा। सुदर्शनके मर जानेपर निश्चय ही वह निर्भय हो जायगा॥ ४-५॥ |
| प्रधान उवाच | प्रधान अमात्यने कहा— |
| साहसं न हि कर्तव्यं श्रुतं राजन् मुनेर्वचः।<br>विश्वामित्रस्य दृष्टान्तः कथितस्तेन मारिष॥ ६ | हे राजन्! ऐसा दुःसाहस नहीं करना चाहिये। अभी आपने भारद्वाजमुनिका वचन सुना ही है। हे मान्य! उन्होंने [इस सम्बन्धमें] विश्वामित्रका दृष्टान्त दिया है॥ ६॥ |
| पुरा गाधिसुतः श्रीमान्विश्वामित्रोऽतिविश्रुतः।<br>विचरन्स नृपश्रेष्ठो वसिष्ठाश्रममभ्यगात्॥ ७ | प्राचीन समयमें गाधितनय विश्वामित्र एक समृद्धिशाली तथा प्रसिद्ध राजा थे। एक बार वे महाराज घूमते हुए महर्षि वसिष्ठके आश्रममें जा पहुँचे॥ ७॥ |
| नमस्कृत्य च तं राजा विश्वामित्रः प्रतापवान्।<br>उपविष्टो नृपश्रेष्ठो मुनिना दत्तविष्टरः॥ ८<br><br>निमन्त्रितो वसिष्ठेन भोजनाय महात्मना।<br>ससैन्यश्च स्थितो राजा गाधिपुत्रो महायशाः॥ ९ | प्रतापी राजाओंमें श्रेष्ठ वे महाराज विश्वामित्र उन्हें प्रणाम करके मुनिद्वारा प्रदत्त आसनपर बैठ गये। उसके बाद महात्मा वसिष्ठजीने उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया, तब वे महायशस्वी गाधिपुत्र विश्वामित्र अपने सैनिकोंसहित उपस्थित हो गये॥ ८-९॥ |