भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 889 में से

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पृष्ठ 338

| अ० १७ ] | तृतीय स्कन्ध | ३२१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नन्दिन्यासादितं सर्वं भक्ष्यभोज्यादिकं च यत्।<br>भुक्त्वा राजा ससैन्यश्च वाञ्छितं तत्र भोजनम्॥ १०<br><br>प्रतापं तञ्च नन्दिन्याः परिज्ञाय स पार्थिवः।<br>ययाचे नन्दिनीं राजा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्॥ ११उस समय भक्ष्य तथा भोज्य आदि जो भी आवश्यक हुआ, वह सब उनकी नन्दिनी गौने उपस्थित कर दिया। सेनासमेत राजा विश्वामित्र मनोवांछित भोजन करके इसे नन्दिनी गौका प्रभाव समझकर वे राजा उन मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीसे नन्दिनी गौ माँगने लगे॥ १०-११॥
विश्वामित्र उवाच<br>मुने धेनुसहस्त्रं ते घटोध्नीनां ददाम्यहम्।<br>नन्दिनीं देहि मे धेनुं प्रार्थयामि परन्तप॥ १२विश्वामित्र बोले—हे मुने! मैं आपको पर्याप्त दूध देनेवाली हजारों गौएँ दूँगा; आप मुझे यह अपनी नन्दिनी गौ दे दीजिये। हे परन्तप! मैं यही प्रार्थना कर रहा हूँ॥ १२॥
वसिष्ठ उवाच<br>होमधेनुरियं राजन्न ददामि कथञ्चन।<br>सहस्रञ्चापि धेनूनां तवेदं तव तिष्ठतु॥ १३वसिष्ठ बोले—हे राजन्! यह गौ होमके लिये हविष्य प्रदान करती है। अतः मैं इसे किसी प्रकार भी नहीं दे सकता। आपकी हजार गौएँ आपके ही पास रहें॥ १३॥
विश्वामित्र उवाच<br>अयुतं वाथ लक्ष्यं वा ददामि मनसेप्सितम्।<br>देहि मे नन्दिनीं साधो ग्रहीष्यामि बलादथ॥ १४विश्वामित्र बोले—हे साधो! मैं आपकी इच्छाके अनुसार दस हजार अथवा एक लाख गौएँ दे रहा हूँ, आप नन्दिनी मुझे दे दीजिये, नहीं तो मैं इसे बलपूर्वक ग्रहण कर लूँगा॥ १४॥
वसिष्ठ उवाच<br>कामं गृहाण नृपते बलादद्य यथारुचि।<br>नाहं ददामि ते राजन्स्वेच्छया नन्दिनीं गृहात्॥ १५वसिष्ठ बोले—हे नृपते! जैसी आपकी रुचि हो, आप इसे बलपूर्वक अभी ले लीजिये, किंतु हे राजन्! मैं तो इस नन्दिनीको स्वेच्छासे अपने आश्रमसे आपको नहीं दूँगा॥ १५॥
तच्छ्रुत्वा नृपतिर्भृत्यानादिदेश महाबलान्।<br>नयध्वं नन्दिनीं धेनुं बलदर्पसुसंस्थिताः॥ १६यह सुनकर राजा विश्वामित्रने अपने महाबली अनुचरोंको आदेश दिया कि तुमलोग इस नन्दिनी गौको ले चलो। तब बलके अभिमानमें चूर उन अनुचरोंने आक्रमण करके उस धेनुको बलपूर्वक बाँधकर पकड़ लिया॥ १६ ½ ॥
ते भृत्या जगृहुस्तां तु हठादाक्रम्य यन्त्रिताम्।<br>वेपमाना मुनिं प्राह सुरभिः साश्रुलोचना॥ १७तब आँखोंमें आँसू भरकर काँपती हुई उस नन्दिनीने मुनिसे कहा—हे मुने! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? ये सब मुझे बाँधकर खींच रहे हैं॥ १७ ½ ॥
मुने त्यजसि मां कस्मात्कर्षयन्ति सुयन्त्रिताम्।<br>मुनिस्तां प्रत्युवाचेदं त्यजे नाहं सुदुग्धदे॥ १८<br><br>बलान्नयति राजासौ पूजितोऽद्य मया शुभे।<br>किं करोमि न चेच्छामि त्यक्तुं त्वां मनसा किल॥ १९वसिष्ठजीने उससे कहा—हे उत्तम दूध देनेवाली नन्दिनी! मैं तुम्हें त्याग नहीं रहा हूँ। ये राजा तुम्हें बलपूर्वक ले जा रहे हैं; जबकि मैंने अभी इनका स्वागत किया है। हे शुभे! मैं क्या करूँ? मैं अपने मनसे तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता॥ १८-१९॥