देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० १७ ] | तृतीय स्कन्ध | ३२१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नन्दिन्यासादितं सर्वं भक्ष्यभोज्यादिकं च यत्।<br>भुक्त्वा राजा ससैन्यश्च वाञ्छितं तत्र भोजनम्॥ १०<br><br>प्रतापं तञ्च नन्दिन्याः परिज्ञाय स पार्थिवः।<br>ययाचे नन्दिनीं राजा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्॥ ११ | उस समय भक्ष्य तथा भोज्य आदि जो भी आवश्यक हुआ, वह सब उनकी नन्दिनी गौने उपस्थित कर दिया। सेनासमेत राजा विश्वामित्र मनोवांछित भोजन करके इसे नन्दिनी गौका प्रभाव समझकर वे राजा उन मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीसे नन्दिनी गौ माँगने लगे॥ १०-११॥ |
| विश्वामित्र उवाच<br>मुने धेनुसहस्त्रं ते घटोध्नीनां ददाम्यहम्।<br>नन्दिनीं देहि मे धेनुं प्रार्थयामि परन्तप॥ १२ | विश्वामित्र बोले—हे मुने! मैं आपको पर्याप्त दूध देनेवाली हजारों गौएँ दूँगा; आप मुझे यह अपनी नन्दिनी गौ दे दीजिये। हे परन्तप! मैं यही प्रार्थना कर रहा हूँ॥ १२॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>होमधेनुरियं राजन्न ददामि कथञ्चन।<br>सहस्रञ्चापि धेनूनां तवेदं तव तिष्ठतु॥ १३ | वसिष्ठ बोले—हे राजन्! यह गौ होमके लिये हविष्य प्रदान करती है। अतः मैं इसे किसी प्रकार भी नहीं दे सकता। आपकी हजार गौएँ आपके ही पास रहें॥ १३॥ |
| विश्वामित्र उवाच<br>अयुतं वाथ लक्ष्यं वा ददामि मनसेप्सितम्।<br>देहि मे नन्दिनीं साधो ग्रहीष्यामि बलादथ॥ १४ | विश्वामित्र बोले—हे साधो! मैं आपकी इच्छाके अनुसार दस हजार अथवा एक लाख गौएँ दे रहा हूँ, आप नन्दिनी मुझे दे दीजिये, नहीं तो मैं इसे बलपूर्वक ग्रहण कर लूँगा॥ १४॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>कामं गृहाण नृपते बलादद्य यथारुचि।<br>नाहं ददामि ते राजन्स्वेच्छया नन्दिनीं गृहात्॥ १५ | वसिष्ठ बोले—हे नृपते! जैसी आपकी रुचि हो, आप इसे बलपूर्वक अभी ले लीजिये, किंतु हे राजन्! मैं तो इस नन्दिनीको स्वेच्छासे अपने आश्रमसे आपको नहीं दूँगा॥ १५॥ |
| तच्छ्रुत्वा नृपतिर्भृत्यानादिदेश महाबलान्।<br>नयध्वं नन्दिनीं धेनुं बलदर्पसुसंस्थिताः॥ १६ | यह सुनकर राजा विश्वामित्रने अपने महाबली अनुचरोंको आदेश दिया कि तुमलोग इस नन्दिनी गौको ले चलो। तब बलके अभिमानमें चूर उन अनुचरोंने आक्रमण करके उस धेनुको बलपूर्वक बाँधकर पकड़ लिया॥ १६ ½ ॥ |
| ते भृत्या जगृहुस्तां तु हठादाक्रम्य यन्त्रिताम्।<br>वेपमाना मुनिं प्राह सुरभिः साश्रुलोचना॥ १७ | तब आँखोंमें आँसू भरकर काँपती हुई उस नन्दिनीने मुनिसे कहा—हे मुने! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? ये सब मुझे बाँधकर खींच रहे हैं॥ १७ ½ ॥ |
| मुने त्यजसि मां कस्मात्कर्षयन्ति सुयन्त्रिताम्।<br>मुनिस्तां प्रत्युवाचेदं त्यजे नाहं सुदुग्धदे॥ १८<br><br>बलान्नयति राजासौ पूजितोऽद्य मया शुभे।<br>किं करोमि न चेच्छामि त्यक्तुं त्वां मनसा किल॥ १९ | वसिष्ठजीने उससे कहा—हे उत्तम दूध देनेवाली नन्दिनी! मैं तुम्हें त्याग नहीं रहा हूँ। ये राजा तुम्हें बलपूर्वक ले जा रहे हैं; जबकि मैंने अभी इनका स्वागत किया है। हे शुभे! मैं क्या करूँ? मैं अपने मनसे तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता॥ १८-१९॥ |
| ३३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| इत्युक्ता मुनिना धेनुः क्रोधयुक्ता बभूव ह।<br>हम्भारवं चकाराशु क्रूरशब्दं सुदारुणम्॥ २० | मुनिके ऐसा कहनेपर वह धेनु क्रोधित हो गयी और कर्कश शब्दोंवाला अत्यन्त भयंकर हम्भारव करने लगी॥ २०॥ |
| उद्गतास्तत्र देहात्तु दैत्या घोरतरास्तदा।<br>सायुधास्तिष्ठ तिष्ठेति ब्रुवन्तः कवचावृताः॥ २१ | उसी समय उसके शरीरसे महाभयंकर दैत्य 'ठहरो-ठहरो'—ऐसा कहते हुए निकल पड़े। वे शस्त्र धारण किये हुए थे और उनका शरीर कवचसे ढँका हुआ था॥ २१॥ |
| सैन्यं सर्वं हतं तैस्तु नन्दिनी प्रतिमोचिता।<br>एकाकी निर्गतो राजा विश्वामित्रोऽतिदुःखितः॥ २२<br><br>हन्त पापोऽतिदीनात्मा निन्दन् क्षात्रबलं महत्।<br>ब्राह्मं बलं दुराराध्यं मत्वा तपसि संस्थितः॥ २३<br><br>तप्त्वा बहूनि वर्षाणि तपो घोरं महावने।<br>ऋषित्वं प्राप गाधेयस्त्यक्त्वा क्षात्रं विधिं पुनः॥ २४ | उन्होंने सारी सेनाका संहार कर दिया और नन्दिनीको उनसे छुड़ा लिया। तब अत्यन्त व्यथित होकर राजा विश्वामित्र अकेले ही घर लौट गये। [वे अपने मनमें सोचने लगे—] हाय! मैं कितना पापी एवं दीनात्मा हूँ। क्षत्रियबलकी निन्दा करते हुए वे विश्वामित्र ब्राह्मणके बलको महान् तथा दुराराध्य समझकर तप करने लगे। महावनमें अनेक वर्षोंतक कठोर तपस्या करके विश्वामित्रने क्षात्रधर्मका त्याग करके अन्तमें ऋषित्व प्राप्त कर लिया॥ २२—२४॥ |
| तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मा कृथा वैरमद्भुतम्।<br>कुलनाशकरं नूनं तापसैः सह संयुगम्॥ २५ | अतः हे राजेन्द्र! आप भी ऐसा अद्भुत वैर न करें; क्योंकि तपस्वियोंके साथ किया जानेवाला युद्ध निश्चित ही कुलका नाश करनेवाला होता है॥ २५॥ |
| मुनिवर्यं व्रजाद्य त्वं समाश्वास्य तपोनिधिम्।<br>सुदर्शनोऽपि राजेन्द्र तिष्ठत्वत्र यथासुखम्॥ २६ | अतः आप तपोनिधि मुनिवर भारद्वाजके पास अभी जाइये और उन्हें आश्वासन दीजिये। हे राजेन्द्र! सुदर्शनको यहीं छोड़ दीजिये, जिससे वह आनन्दपूर्वक रह सके॥ २६॥ |
| बालोऽयं निर्धनः किं ते करिष्यति नृपाहितम्।<br>वृथा ते वैरभावोऽयमनाथे दुर्बले शिशौ॥ २७ | हे राजन्! यह दीन बालक आपका क्या अहित कर सकेगा? ऐसे दुर्बल एवं अनाथ बालकके प्रति आपका यह वैरभाव व्यर्थ है॥ २७॥ |
| दया सर्वत्र कर्तव्या दैवाधीनमिदं जगत्।<br>ईर्ष्या किं नृपश्रेष्ठ यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ २८ | हे नृपश्रेष्ठ! सर्वत्र दया करनी चाहिये। यह संसार सदा दैवके अधीन रहता है। ईर्ष्या करनेसे क्या लाभ? जो होनी होगी, वह तो होकर ही रहेगी॥ २८॥ |
| वज्रं तृणायते राजन् दैवयोगान्न संशयः।<br>तृणं वज्रायते क्वापि समये दैवयोगतः॥ २९<br><br>शशको हन्ति शार्दूलं मशको वै तथा गजम्।<br>साहसं मुञ्च मेधाविन् कुरु मे वचनं हितम्॥ ३० | हे राजन्! दैवयोगसे कभी वज्र तृण बन जाता है और किसी समय तृण वज्र बन जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। दैवयोगसे ही खरगोश सिंहको और मच्छर हाथीको मार देता है। अतः हे मेधाविन्! आप दुःसाहस छोड़िये तथा मेरा हितकर वचन मानिये॥ २९-३०॥ |
| अ० १७] | तृतीय स्कन्ध | ३३१ |
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य युधाजिन्नृपसत्तमः।<br>प्रणम्य तं मुनिं मूर्ध्ना जगाम स्वपुरं नृपः ॥ ३१<br><br>मनोरमापि स्वस्थाभूदाश्रमे तत्र संस्थिता।<br>पालयामास पुत्रं तं सुदर्शनमृतव्रतम् ॥ ३२ | [हे जनमेजय!] मन्त्रीकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ राजा युधाजित् भारद्वाजमुनिको सिर झुकाकर प्रणाम करके अपने पुरको चले गये। तब रानी मनोरमा भी निश्चिन्त हो गयीं और उस आश्रममें रहती हुई अपने सत्यव्रती पुत्र सुदर्शनका पालन करने लगीं ॥ ३१-३२॥ |
| दिने दिने कुमारोऽसौ जगामोपचयं ततः।<br>मुनिबालगतः क्रीडन्निर्भयः सर्वतः शुभः॥ ३३<br><br>एकस्मिन्समये तत्र विदल्लं समुपागतम्।<br>क्लीबेति मुनिपुत्रस्तमामन्त्रयत्तदन्तिके ॥ ३४ | अब वह सुन्दर कुमार मुनिबालकोंके साथ सर्वत्र निर्भय होकर क्रीड़ा करता हुआ दिनोंदिन बढ़ने लगा। एक दिन सुदर्शनके पास आये हुए विदल्लको किसी मुनिकुमारने ‘क्लीब’ इस नामसे पुकारा ॥ ३३-३४ ॥ |
| सुदर्शनस्तु तच्छ्रुत्वा दधारैकाक्षरं स्फुटम्।<br>अनुस्वारायुतं तच्च प्रोवाचापि पुनः पुनः॥ ३५ | उसे सुनकर सुदर्शनने उसके एकाक्षर ‘क्ली’ शब्दको स्पष्टरूपसे धारण कर लिया और उस अनुस्वारविहीन अक्षरका ही वह बार-बार उच्चारण करने लगा ॥ ३५ ॥ |
| बीजं वै कामराजाख्यं गृहीतं मनसा तदा।<br>जजाप बालकोऽत्यर्थं धृत्वा चेतसि सादरम् ॥ ३६<br><br>भावियोगान्महाराज कामराजाख्यमद्भुतम्।<br>स्वभावेनैव तेनेत्थं गृहीतं बालकेन वै॥ ३७ | बालकने इस कामराज नामक बीजमन्त्रको मनसे ग्रहण कर लिया और उसे हृदयंगम करके आदरपूर्वक जपना प्रारम्भ कर दिया। हे महाराज! दैवयोगसे ही उस बालक सुदर्शनको यह कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र स्वयमेव प्राप्त हो गया ॥ ३६-३७॥ |
| तदासौ पञ्चमे वर्षे प्राप्य मन्त्रमनुत्तमम्।<br>ऋषिच्छन्दोविहीनञ्च ध्यानन्यासविवर्जितम्॥ ३८<br><br>प्रजपन्मनसा नित्यं क्रीडत्यपि स्वपित्यपि।<br>विसस्मार न तं मन्त्रं ज्ञात्वा सारमिति स्वयम् ॥ ३९ | उस समय केवल पाँच वर्षकी अवस्थामें ही वह ऋषि तथा छन्दसे विहीन और ध्यान तथा न्यासरहित मन्त्र प्राप्तकर मन-ही-मन उसे जपता हुआ खेलता तथा सोता था; उस मन्त्रको स्वयं सबका सार समझकर वह सुदर्शन उसे कभी नहीं भूलता था॥ ३८-३९॥ |
| वर्षे चैकादशे प्राप्ते कुमारोऽसौ नृपात्मजः।<br>मुनिना चोपनीतोऽथ वेदमध्यापितस्तथा ॥ ४०<br><br>धनुर्वेदं तथा साङ्गं नीतिशास्त्रं विधानतः।<br>अभ्यस्ताः सकला विद्यास्तेन मन्त्रबलादिव ॥ ४१ | मुनिने ग्यारहवें वर्षमें उस राजकुमारका उपनयन संस्कार किया और उसे वेद पढ़ाया एवं सांगोपांग धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्रकी विधिवत् शिक्षा दी। उस बालकने उसी मन्त्रके प्रभावसे समस्त विद्याओंका सम्यक् अभ्यास कर लिया ॥ ४०-४१॥ |
| कदाचित्सोऽपि प्रत्यक्षं देवीरूपं ददर्श ह।<br>रक्ताम्बरं रक्तवर्णं रक्तसर्वाङ्गभूषणम् ॥ ४२ | एक बार उसने देवीके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन भी किया। उस समय वे लाल वस्त्र धारण किये थीं, उनके विग्रहका रंग भी लाल था और उनके सभी अंगोंमें रक्तवर्णके ही आभूषण सुशोभित हो रहे |
३३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १७
३३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १७
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गरुडे वाहने संस्थां वैष्णवीं शक्तिमद्भुताम्।<br>दृष्ट्वा प्रसन्नवदनः स बभूव नृपात्मजः ॥ ४३ | थे। [इस प्रकारका दिव्य स्वरूप धारणकर] वाहन गरुडपर विराजमान उन अद्भुत वैष्णवी शक्तिको देखकर राजकुमार सुदर्शनके मुखमण्डलपर प्रसन्नता छा गयी॥ ४२-४३॥ |
| वने तस्मिन्स्थितः सोऽथ सर्वविद्यार्थतत्त्ववित्।<br>मातरं सेवमानस्तु विजहार नदीतटे॥ ४४<br><br>शरासनञ्च सम्प्राप्तं विशिखाश्च शिलाशिताः।<br>तूणीरकवचं तस्मै दत्तं चाम्बिकया वने ॥ ४५ | इस प्रकार समस्त विद्याओंका रहस्य जाननेवाला वह सुदर्शन उस वनमें रहकर जगदम्बाकी उपासना करता हुआ नदीतटपर विचरण करने लगा। उसी वनमें भगवती जगदम्बाने उसे धनुष, अनेक तीक्ष्ण बाण, तूणीर तथा कवच प्रदान किये॥ ४४-४५॥ |
| एतस्मिन्समये पुत्री काशिराजस्य सुप्रिया।<br>नाम्ना शशिकला दिव्या सर्वलक्षणसंयुता ॥ ४६<br><br>शुश्राव नृपपुत्रं तं वनस्थञ्च सुदर्शनम्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नं शूरं काममिवापरम्॥ ४७ | इसी समय सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त 'शशिकला' नामसे विख्यात काशिराजकी परम प्रिय पुत्रीने उस वनमें रहनेवाले समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, पराक्रमी तथा दूसरे कामदेवके समान प्रतीत होनेवाले राजकुमार सुदर्शनके विषयमें सुना॥ ४६-४७॥ |
| बन्दीजनमुखाच्छ्रुत्वा राजपुत्रं सुसम्मतम्।<br>चकमे मनसा तं वै वरं वरयितुं धिया॥ ४८ | बन्दीजनोंके मुखसे अतिसम्मानित राजकुमारके विषयमें सुनकर शशिकलाने मन-ही-मन बुद्धिपूर्वक उसे पतिरूपमें वरण करनेका निश्चय कर लिया॥ ४८॥ |
| स्वप्ने तस्याः समागम्य जगदम्बा निशान्तरे।<br>उवाच वचनं चेदं समाश्वास्य सुसंस्थिता॥ ४९<br><br>वरं वरय सुश्रोणि मम भक्तः सुदर्शनः।<br>सर्वकामप्रदस्तेऽस्तु वचनान्मम भामिनि ॥ ५० | [उसी दिन] आधी रातको जगदम्बा स्वप्नमें शशिकलाके पास आकर स्थित हो गयीं और उसे आश्वस्त करके यह वचन बोलीं—'हे सुश्रोणि! सुदर्शन मेरा भक्त है, तुम उसीको अपना पति स्वीकार कर लो। हे भामिनि! मेरी आज्ञासे वह तुम्हारी सब कामनाएँ पूर्ण करेगा'॥ ४९-५०॥ |
| एवं शशिकला दृष्ट्वा स्वप्ने रूपं मनोहरम्।<br>अम्बाया वचनं स्मृत्वा जहर्ष भृशमानिनी ॥ ५१ | इस प्रकार स्वप्नमें भगवतीका मनोहर स्वरूप देखकर तथा उनके इस वचनको स्मरण करके परम मानिनी शशिकला प्रसन्न हो गयी॥ ५१॥ |
| उत्थिता सा मुदा युक्ता पृष्टा मात्रा पुनः पुनः।<br>प्रमोदे कारणं बाला नोवाचातित्रपान्विता॥ ५२ | वह प्रसन्नताके साथ उठ गयी। उसकी माताने उसे हर्षित देखकर बार-बार प्रसन्नताका कारण पूछा, किंतु उस सुन्दरीने अति लज्जाके कारण कुछ नहीं बताया॥ ५२॥ |
| जहास मुदमापन्ना स्मृत्वा स्वप्नं मुहुर्मुहुः।<br>सखीं प्राह तदान्यां वै स्वप्नवृत्तं सुविस्तरम् ॥ ५३ | स्वप्नका बार-बार स्मरण करके प्रसन्नतासे युक्त होकर वह जोरसे हँस पड़ती थी। तब उसने अपनी एक अन्य सखीसे स्वप्नका सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह दिया॥ ५३॥ |
| कदाचित्सा विहारार्थमवापोपवनं शुभम्।<br>सखीयुक्ता विशालाक्षी चम्पकैरुपशोभितम् ॥ ५४<br><br>पुष्पाणि चिन्वती बाला चम्पकाधःस्थिताबला। | किसी दिन वह विशालनयनी शशिकला अपनी सखीके साथ चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित एक सुन्दर उपवनमें विहारके लिये गयी। वहाँ पुष्प चुनती हुई वह कुमारी एक चम्पावृक्षके नीचे खड़ी हो गयी। |
| अ० १८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३३३ |
|---|
| अपश्यद् ब्राह्मणं मार्गे आगच्छन्तं त्वरान्वितम् ॥ ५५<br>तं प्रणम्य द्विजं श्यामा बभाषे मधुरं वचः ।<br>कुतो देशान्महाभाग कृतमागमनं त्वया ॥ ५६<br><br>द्विज उवाच<br>भारद्वाजाश्रमाद् बाले नूनमागमनं मम ।<br>जातं वै कार्ययोगेन किं पृच्छसि वदस्व मे ॥ ५७<br><br>शशिकलोवाच<br>तत्राश्रमे महाभाग वर्णनीयं किमस्ति वै ।<br>लोकातिगं विशेषेण प्रेक्षणीयतमं किल ॥ ५८<br><br>ब्राह्मण उवाच<br>ध्रुवसन्धिसुतः श्रीमानास्ते सुदर्शनो नृपः ।<br>यथार्थनामा सुश्रोणि वर्तते पुरुषोत्तमः ॥ ५९<br>तस्य लोचनमत्यन्तं निष्फलं प्रतिभाति मे ।<br>येन दृष्टो न वामोरु कुमारस्तु सुदर्शनः ॥ ६०<br>एकत्र निहिता धात्रा गुणाः सर्वे सिसृक्षुणा ।<br>गुणानामाकरं द्रष्टुं मन्ये तेनैव कौतुकात् ॥ ६१<br>तव योग्यः कुमारोऽसौ भर्ता भवितुमर्हति ।<br>योगोऽयं विहितोऽप्यासीन्मणिकाञ्चनयोरिव ॥ ६२ | तभी उसने मार्गमें शीघ्रतापूर्वक आते हुए किसी ब्राह्मणको देखा। उस ब्राह्मणको प्रणाम करके सुन्दरी शशिकलाने मधुर वाणीमें कहा—हे महाभाग ! आप किस देशसे आये हैं ? ॥ ५४–५६ ॥<br><br>ब्राह्मणने कहा—हे बाले ! एक कार्यवश भारद्वाजमुनिके आश्रमसे मेरा आगमन हुआ है। तुम क्या पूछ रही हो; मुझे बताओ ॥ ५७ ॥<br><br>शशिकला बोली—हे महाभाग ! उस आश्रममें अत्यन्त प्रशंसनीय, संसारमें सबसे बढ़कर तथा विशेषरूपसे दर्शनीय कौन-सी वस्तु है ? ॥ ५८ ॥<br><br>ब्राह्मणने कहा—हे सुश्रोणि ! महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र श्रीमान् सुदर्शन वहाँ रहते हैं। पुरुषोंमें श्रेष्ठ वे सुदर्शन अपने नामके अनुरूप ही हैं ॥ ५९ ॥<br><br>हे सुन्दरि ! जिसने राजकुमार सुदर्शनको नहीं देखा, मैं तो उसके नेत्रोंको अत्यन्त निष्फल मानता हूँ ॥ ६० ॥<br><br>सृष्टिकी अभिलाषावाले ब्रह्माने कौतूहलवश उन एक सुदर्शनमें सभी गुणोंको भर दिया है। अतः गुणोंकी खान सुदर्शनको ही मैं देखनेयोग्य मानता हूँ ॥ ६१ ॥<br><br>वे राजकुमार तुम्हारे अनुरूप हैं और तुम्हारे पति होनेयोग्य हैं। मणि और कांचनकी भाँति यह तुम दोनोंका संयोग पहलेसे ही निश्चित हो चुका है ॥ ६२ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विश्वामित्रकथोत्तरं राजपुत्रस्य कामबीजप्राप्तिवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
$\sim\sim\circ\sim\sim$
अथाष्टादशोऽध्यायः
राजकुमारी शशिकलाद्वारा मन-ही-मन सुदर्शनका वरण करना, काशिराजद्वारा स्वयंवरकी घोषणा, शशिकलाका सखीके माध्यमसे अपना निश्चय माताको बताना
| व्यास उवाच<br>श्रुत्वा तद्वचनं श्यामा प्रेमयुक्ता बभूव ह ।<br>प्रतस्थे ब्राह्मणस्तस्मात्स्थानादुक्त्वा समाहितः ॥ १<br><br>सा तु पूर्वानुरागाद्वै मग्ना प्रेम्णातिचञ्चला ।<br>कामबाणाहतेवास गते तस्मिन्द्विजोत्तमे ॥ २ | व्यासजी बोले—उस ब्राह्मणका वचन सुनकर सुन्दरी शशिकला प्रेमविभोर हो गयी और वह ब्राह्मण इतना कहकर शान्तभावसे उस स्थानसे चला गया ॥ १ ॥<br><br>उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके चले जानेपर वह सुन्दरी पूर्व अनुरागसे तथा विप्रकी बातोंसे प्रेमातिरेकके कारण अत्यधिक अधीर हो उठी ॥ २ ॥ |
३३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
३३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
| अथ कामार्दिता प्राह सखीं छन्दोऽनुवर्तिनीम्।<br>विकारश्च समुत्पन्नो देहे यच्छ्रवणादनु ॥ ३<br><br>अज्ञातरसविज्ञानं कुमारं कुलसम्भवम्।<br>धुनोति मदनः पापः किं करोमि क्व यामि च ॥ ४ | तदनन्तर उस शशिकलाने अपनी इच्छाके अनुसार चलनेवाली एक सखीसे कहा कि रससे अनभिज्ञ तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न उस राजकुमारके विषयमें सुनकर मेरे शरीरमें विकार उत्पन्न हो गया है। इस समय कामदेव मुझे अत्यधिक पीड़ा दे रहा है। अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? ॥ ३-४ ॥ |
|---|---|
| स्वप्नेषु वा मया दृष्टः पञ्चबाण इवापरः।<br>तपते मे मनोऽत्यर्थं विरहाकुलितं मृदु ॥ ५ | जबसे मैंने स्वप्नमें दूसरे कामदेवके सदृश उस राजकुमारको देखा है, तभीसे विरहसे आकुल हुआ मेरा कोमल मन अत्यधिक सन्तप्त हो रहा है ॥ ५ ॥ |
| चन्दनं देहलग्नं मे विषवद्भाति भामिनि।<br>स्रगियं सर्पवच्चैव चन्द्रपादाश्च वह्निवत् ॥ ६ | हे भामिनि! इस समय मेरे शरीरमें लगा हुआ चन्दन विषके समान, यह माला सर्पके तुल्य तथा चन्द्रमाकी किरणें अग्निसदृश प्रतीत हो रही हैं ॥ ६ ॥ |
| न च हर्म्ये वने शं मे दीर्घिकायां न पर्वते।<br>न दिवा न निशायां वा न सुखं सुखसाधनैः ॥ ७ | इस समय महलमें, वनमें, बावलीमें तथा पर्वतपर—कहीं भी मेरे चित्तको शान्ति नहीं मिल पा रही है। नानाविध सुख-साधनोंसे दिनमें अथवा रातमें किसी भी समय सुखकी अनुभूति नहीं हो रही है ॥ ७ ॥ |
| न शय्या न च ताम्बूलं न गीतं न च वादनम्।<br>प्रीणयन्ति मनो मेऽद्य न तृप्ते मम लोचने ॥ ८ | शय्या, ताम्बूल, गायन तथा वादन—इनमें कोई भी चीजें मेरे मनको प्रसन्न नहीं कर पा रही हैं और न तो मेरे नेत्रोंको कोई भी वस्तु तृप्त ही कर पा रही है ॥ ८ ॥ |
| प्रयाम्यद्य वने तत्र यत्रासौ वर्तते शठः।<br>भीतास्मि कुललज्जायाः परतन्त्रा पितुस्तथा ॥ ९ | [जी करता है] उसी वनमें चली जाऊँ जहाँ वह निष्ठुर विद्यमान है, किंतु कुलकी लज्जाके कारण भयभीत हूँ, और फिर अपने पिताके अधीन भी हूँ ॥ ९ ॥ |
| स्वयंवरं पिता मेऽद्य न करोति करोमि किम्।<br>दास्यामि राजपुत्राय कामं सुदर्शनाय वै ॥ १० | क्या करूँ, मेरे पिता अभी मेरा स्वयंवर भी नहीं आयोजित कर रहे हैं। [यदि स्वयंवर हुआ तो] मैं इच्छापूर्वक अपनेको सुदर्शनको समर्पित कर दूँगी ॥ १० ॥ |
| सन्त्यन्ये पृथिवीपालाः शतशः सम्भृतर्द्धयः।<br>रमणीया न मे तेऽद्य राज्यहीनोऽप्यसौ मतः ॥ ११ | यद्यपि दूसरे सैकड़ों समृद्धिशाली नरेश हैं, परंतु वे मुझे रमणीय नहीं लगते। राज्यहीन होते हुए भी इस सुदर्शनको मैं अधिक रमणीय मानती हूँ ॥ ११ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एकाकी निर्धनश्चैव बलहीनः सुदर्शनः।<br>वनवासी फलाहारस्तस्याश्चित्ते सुसंस्थितः ॥ १२<br><br>वाग्बीजस्य जपात्सिद्धिस्तस्या एषाप्युपस्थिता।<br>सोऽपि ध्यानपरोऽत्यन्तं जजाप मन्त्रमुत्तमम् ॥ १३ | **व्यासजी बोले—**अकेला, निर्धन, बलहीन, वनवासी तथा फलका आहार करनेवाला होते हुए भी सुदर्शन उस शशिकलाके हृदयमें पूर्णरूपसे बस गया था। भगवतीके वाग्बीजमन्त्रके जपसे सुदर्शनको यह सिद्धि प्राप्त हो गयी थी। वह पूर्णरूपसे ध्यानमग्न होकर उस सर्वोत्तम मन्त्रका निरन्तर जप करता रहता था ॥ १२-१३ ॥ |
| अ० १८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वप्ने पश्यत्यसौ देवीं विष्णुमायामखण्डिताम्।<br>विश्वमातरमव्यक्तां सर्वसम्पत्कराम्बिकाम्॥ १४ | एक बार स्वप्नमें सुदर्शनने उन अव्यक्त, पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा, जगज्जननी, विष्णुमाया तथा सभी सम्पदा प्रदान करानेवाली भगवती अम्बिकाका दर्शन किया॥ १४॥ |
| शृङ्गवेरपुराध्यक्षो निषादः समुपेत्य तम्।<br>ददौ रथवरं तस्मै सर्वोपस्करसंयुतम्॥ १५<br><br>चतुर्भिस्तुरगैर्युक्तं पताकावरमण्डितम्।<br>जैत्रं राजसुतं ज्ञात्वा ददौ चोपायनं तदा॥ १६<br><br>सोऽपि जग्राह तं प्रीत्या मित्रत्वेन सुसंस्थितम्।<br>वन्यैर्मूलफलैः सम्यगर्चयामास शम्बरम्॥ १७ | उसी समय शृंगवेरपुरके अधिपति निषादने सुदर्शनके पास आकर उसे सब प्रकारकी सामग्रियोंसे परिपूर्ण उत्तम रथ प्रदान किया। उस रथमें चार घोड़े जुते हुए थे और वह सुन्दर पताकासे सुशोभित था। निषादराजने राजकुमार सुदर्शनको विजयशाली समझकर उसे भेंटस्वरूप वह रथ दिया था। सुदर्शनने भी प्रेमपूर्वक उसे स्वीकार कर लिया और मित्ररूपमें आये हुए उस निषादका वन्य फल-मूलोंसे भलीभाँति सत्कार किया॥ १५-१७॥ |
| कृतातिथ्ये गते तस्मिन्निषादाधिपतौ तदा।<br>मुनयः प्रीतियुक्तास्ते तमूचुस्तापसा मिथः॥ १८<br><br>राजपुत्र ध्रुवं राज्यं प्राप्स्यसि त्वं च सर्वथा।<br>स्वल्पैरहोभिरव्यग्रः प्रतापान्नात्र संशयः॥ १९<br><br>प्रसन्ना तेऽम्बिका देवी वरदा विश्वमोहिनी।<br>सहायस्तु सुसम्पन्नो न चिन्तां कुरु सुव्रत॥ २० | तब आतिथ्य स्वीकार करके उस निषादराजके चले जानेपर वहाँके तपस्वी मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर सुदर्शनसे कहने लगे—हे राजकुमार! आप धैर्यवान् हैं; भगवतीकी कृपासे थोड़े ही दिनोंमें निश्चय ही अपना राज्य प्राप्त करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रत! विश्वमोहिनी और वरदायिनी भगवती अम्बिका आपके ऊपर प्रसन्न हैं। अब आपको उत्तम सहायक भी मिल गया है, आप चिन्ता न करें॥ १८-२०॥ |
| मनोरमां तथोचुस्ते मुनयः संशितव्रताः।<br>पुत्रस्तेऽद्य धराधीशो भविष्यति शुचिस्मिते॥ २१ | तत्पश्चात् उन व्रतधारी मुनियोंने मनोरमासे कहा—हे शुचिस्मिते! अब आपका पुत्र सुदर्शन शीघ्र ही भूमण्डलका राजा होगा॥ २१॥ |
| सा तानुवाच तन्वङ्गी वचनं वोऽस्तु सत्फलम्।<br>दासोऽयं भवतां विप्राः किं चित्रं सदुपासनात्॥ २२<br><br>न सैन्यं सचिवाः कोशो न सहायश्च कश्चन।<br>केन योगेन पुत्रो मे राज्यं प्राप्तुमिहार्हति॥ २३<br><br>आशीर्वादाेश्च वो नूनं पुत्रोऽयं मे महीपतिः।<br>भविष्यति न सन्देहो भवन्तो मन्त्रवित्तमाः॥ २४ | तब उस कोमलांगी मनोरमाने उनसे कहा—आपलोगोंका वचन सफल हो। हे विप्रगण! यह सुदर्शन आपलोगोंका सेवक है। सच्ची उपासनासे सब कुछ सम्भव हो जाता है, इसमें आश्चर्य ही क्या? [किंतु] उसके पास न सेना है, न मन्त्री हैं, न कोश है और न कोई सहायक ही है। [ऐसी दशामें] किस उपायसे मेरा पुत्र राज्य पानेके योग्य बन सकता है? आपलोग मन्त्रके पूर्णवेत्ता हैं, अतः आपलोगोंके आशीर्वचनोंसे मेरा यह पुत्र निश्चय ही राजा होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ २२-२४॥ |
| ३३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| रथारूढः स मेधावी यत्र याति सुदर्शनः।<br>अक्षौहिणीसमावृत्त इवाभाति स तेजसा॥ २५<br><br>प्रतापो मन्त्रबीजस्य नान्यः कश्चन भूपते।<br>एवं वै जपतस्तस्य प्रीतियुक्तस्य सर्वथा॥ २६ | रथपर सवार होकर मेधावी सुदर्शन जहाँ भी जाता था, वहाँ वह अपने तेजसे एक अक्षौहिणी सेनासे आवृत प्रतीत होता था। हे भूप! यह उस बीजमन्त्रका ही प्रभाव था, दूसरा कोई कारण नहीं; क्योंकि वह सुदर्शन सर्वदा प्रसन्नतापूर्वक उसी मन्त्रका जप किया करता था॥ २५-२६॥ |
| सम्प्राप्य सद्गुरोर्बीजं कामराजाख्यमद्भुतम्।<br>जपेद्यस्तु शुचिः शान्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ २७ | जो मनुष्य किसी सद्गुरुसे कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र ग्रहण करके शान्त होकर पवित्रतापूर्वक उसका जप करता है, वह अपनी सभी कामनाएँ पूर्ण कर लेता है॥ २७॥ |
| न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि वापि सुदुर्लभम्।<br>प्रसन्नायाः शिवायाश्च यदप्राप्यं नृपोत्तम॥ २८ | हे नृपश्रेष्ठ! भूतलपर अथवा स्वर्गमें भी कोई ऐसा अत्यन्त दुर्लभ पदार्थ नहीं है, जो कल्याणकारिणी भगवतीके प्रसन्न होनेपर न मिल सके॥ २८॥ |
| ते मन्दास्तेऽतिदुर्भाग्या रोगैस्ते समभिद्रुताः।<br>येषां चित्ते न विश्वासो भवेदम्बार्थनादिषु॥ २९ | वे महान् मूर्ख, भाग्यहीन तथा रोगोंसे व्यथित होते हैं, जिनके मनमें जगदम्बाके अर्चन आदिमें विश्वास नहीं होता॥ २९॥ |
| या माता सर्वदेवानां युगादौ परिकीर्तिता।<br>आदिमातेति विख्याता नाम्ना तेन कुरूद्वह॥ ३०<br><br>बुद्धिः कीर्तिर्धृतिर्लक्ष्मीः शक्तिः श्रद्धा मतिः स्मृतिः।<br>सर्वेषां प्राणिनां सा वै प्रत्यक्षं वै विभासते॥ ३१ | हे कुरुनन्दन! जो भगवती युगके आदिमें सब देवताओंकी माता कही गयी थीं, इसी कारण आदिमाता—इस नामसे विख्यात हैं; वे ही बुद्धि, कीर्ति, धृति, लक्ष्मी, शक्ति, श्रद्धा, मति और स्मृति आदि रूपोंसे समस्त प्राणियोंमें प्रत्यक्ष दिखायी देती हैं॥ ३०-३१॥ |
| न जानन्ति नरा ये वै मोहिता मायया किल।<br>न भजन्ति कुतर्कज्ञा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्॥ ३२ | जो लोग मायासे मोहित हैं, वे उन्हें नहीं जान पाते। कुतर्क करनेवाले मनुष्य उन भुवनेश्वरी भगवती शिवाका भजन नहीं करते॥ ३२॥ |
| ब्रह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्वासवो वरुणो यमः।<br>वायुरग्निः कुबेरश्च त्वष्टा पूषाश्विनौ भगः॥ ३३<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः।<br>सर्वे ध्यायन्ति तां देवीं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्॥ ३४ | ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वरुण, यम, वायु, अग्नि, कुबेर, त्वष्टा, पूषा, दोनों अश्विनीकुमार, भग, आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव एवं मरुद्गण—ये सभी देवता सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली उन भगवतीका ध्यान करते हैं॥ ३३-३४॥ |
| को न सेवेत विद्वान्वै तां शक्तिं परमात्मिकाम्।<br>सुदर्शनेन सा ज्ञाता देवी सर्वार्थदा शिवा॥ ३५ | कौन ऐसा विद्वान् है, जो उन परमात्मिका शक्तिकी आराधना न करता हो? सुदर्शनने सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन्हीं कल्याणकारिणी भगवतीको जान लिया था॥ ३५॥ |
| ब्रह्मैव सातिदुष्प्राप्या विद्याविद्यास्वरूपिणी।<br>योगगम्या परा शक्तिर्मुमुक्षूणां च वल्लभा॥ ३६ | वे विद्या तथा अविद्यास्वरूपा भगवती ही ब्रह्म हैं और अत्यन्त दुष्प्राप्य हैं। वे पराशक्ति योगद्वारा ही अनुभवगम्य हैं और मोक्ष चाहनेवाले लोगोंको विशेष प्रिय हैं॥ ३६॥ |
| अ० १८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३३७ | | :--- | :--- |
| परमात्मस्वरूपं को वेत्तुमर्हति तां विना।<br>या सृष्टिं त्रिविधां कृत्वा दर्शयत्यखिलात्मने ॥ ३७<br><br>सुदर्शनस्तु तां देवीं मनसा परिचिन्तयन्।<br>राज्यलाभात्परं प्राप्य सुखं वै कानने स्थितः ॥ ३८ | उन भगवतीके बिना परमात्माका स्वरूप जाननेमें कौन समर्थ है? जो तीन प्रकारकी सृष्टि करके सर्वात्मा भगवान्को दिखलाती हैं, उन्हीं भगवतीका मनसे सम्यक् चिन्तन करता हुआ राजकुमार सुदर्शन राज्य-प्राप्तिसे भी अधिक सुखका अनुभव करके वनमें रहता था ॥ ३७-३८ ॥ | | सापि चन्द्रकलात्यर्थं कामबाणप्रपीडिता।<br>नानोपचारैरनिशं दधार दुःखितं वपुः ॥ ३९ | उधर, वह शशिकला भी कामसे निरन्तर अत्यधिक पीड़ित रहती हुई नानाविध उपचारोंसे किसी प्रकार अपना दुःखित शरीर धारण किये हुए थी ॥ ३९ ॥ | | तावत्तस्याः पिता ज्ञात्वा कन्यां पुत्रवरार्थिनीम्।<br>सुबाहुः कारयामास स्वयंवरमतन्द्रितः ॥ ४० | इसी बीच उसके पिता सुबाहुने कन्या शशिकलाको वरकी अभिलाषिणी जानकर बड़ी सावधानीके साथ स्वयंवर आयोजित कराया ॥ ४० ॥ | | स्वयंवरस्तु त्रिविधो विद्वद्भिः परिकीर्तितः।<br>राज्ञां विवाहयोग्यो वै नान्येषां कथितः किल ॥ ४१<br><br>इच्छास्वयंवरश्चैको द्वितीयश्च पणाभिधः।<br>यथा रामेण भग्नं वै त्र्यम्बकस्य शरासनम् ॥ ४२<br><br>तृतीयः शौर्यशुल्कश्च शूराणां परिकीर्तितः।<br>इच्छास्वयंवरं तत्र चकार नृपसत्तमः ॥ ४३ | विद्वानोंने स्वयंवरके तीन प्रकार बताये हैं। वह क्षत्रिय राजाओंके विवाहहेतु उचित कहा गया है, अन्यके लिये नहीं। उनमें प्रथम इच्छास्वयंवर है, जिसमें कन्या अपने इच्छानुसार पति स्वीकार करती है। दूसरा पणस्वयंवर है, जिसमें किसी प्रकारका पण (शर्त) रखा जाता है। जैसे भगवान् श्रीरामने [जानकीके स्वयंवरमें] शिवधनुष तोड़ा था। तीसरा स्वयंवर शौर्यशुल्क है, जो शूरवीरोंके लिये कहा गया है। नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उनमें इच्छास्वयंवरका आयोजन किया ॥ ४१—४३ ॥ | | शिल्पिभिः कारिता मञ्चाः शुभैरास्तरणैर्युताः।<br>ततश्च विविधाकाराः सुक्लृप्ताः सभ्यमण्डपाः ॥ ४४ | शिल्पियोंद्वारा बहुत-से मंच बनवाये गये और उनपर सुन्दर आसन बिछाये गये। तत्पश्चात् राजाओंके बैठनेयोग्य विविध आकार-प्रकारके सभामण्डप बनवाये गये ॥ ४४ ॥ | | एवं कृतेऽतिसम्भारे विवाहार्थं सुविस्तरे।<br>सखीं शशिकला प्राह दुःखिता चारुलोचना ॥ ४५<br><br>इदं मे मातरं ब्रूहि त्वमेकान्ते वचो मम।<br>मया वृतः पतिश्चित्ते ध्रुवसंधिसुतः शुभः ॥ ४६<br><br>नान्यं वरं वरिष्यामि तमृते वै सुदर्शनम्।<br>स मे भर्ता नृपसुतो भगवत्या प्रतिष्ठितः ॥ ४७ | इस प्रकार विवाहके लिये सम्पूर्ण सामग्री जुट जानेपर सुन्दर नेत्रोंवाली शशिकलाने दुःखित होकर अपनी सखीसे कहा—एकान्तमें जाकर तुम मेरी मातासे मेरा यह वचन कह दो कि मैंने अपने मनमें ध्रुवसन्धिके सुन्दर पुत्रका पतिरूपमें वरण कर लिया है। उन सुदर्शनके अतिरिक्त मैं किसी दूसरेको पति नहीं बनाऊँगी; क्योंकि स्वयं भगवतीने राजकुमार सुदर्शनको मेरा पति निश्चित कर दिया है ॥ ४५—४७ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा सखी गत्वा मातरं प्राह सत्वरा।<br>वैदर्भी विजने वाक्यं मधुरं मञ्जुभाषिणी ॥ ४८ | व्यासजी बोले—उसके ऐसा कहनेपर उस मृदुभाषिणी सखीने शशिकलाकी माता विदर्भसुताके पास शीघ्र जाकर एकान्तमें उनसे मधुर वाणीमें कहा— |
| ३३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ ] |
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| पुत्री ते दुःखिता प्राह साध्वि त्वां मन्मुखेन यत्।<br>शृणु त्वं कुरु कल्याणि तद्धितं त्वरिताधुना॥ ४९<br><br>भारद्वाजाश्रमे पुण्ये ध्रुवसन्धिंसुतोऽस्ति यः।<br>स मे भर्त्ता वृतश्चित्ते नान्यं भूपं वृणोम्यहम्॥ ५० | ‘हे साध्वि! आपकी पुत्रीने अत्यन्त दुःखित होकर मेरे मुखसे आपको जो कहलाया है, उसे आप सुन लें और हे कल्याणि! इस समय शीघ्र ही उसका हित-साधन करें’। [उसका कथन है कि] भारद्वाजमुनिके आश्रममें जो ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शन रहते हैं, उनका मैं अपने मनमें पतिरूपमें वरण कर चुकी हूँ। अतः मैं किसी दूसरे राजाका वरण नहीं करूँगी॥ ४८-५०॥ | | व्यास उवाच<br>राज्ञी तद्वचनं श्रुत्वा स्वपतौ गृहमागते।<br>निवेदयामास तदा पुत्रीवाक्यं यथातथम्॥ ५१ | व्यासजी बोले—वह वचन सुनकर रानीने राजाके आनेपर पुत्रीकी सारी बातें ज्यों-की-त्यों उनको बतायीं॥ ५१॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं राजा विस्मितः प्रहसन्मुहुः।<br>भार्यामुवाच वैदर्भीं सुबाहुस्तु ऋतं वचः॥ ५२ | उसे सुनकर राजा सुबाहु आश्चर्यमें पड़ गये और बार-बार मुसकराते हुए वे अपनी भार्या विदर्भराजकुमारीसे यथार्थ बात कहने लगे—॥ ५२॥ | | सुभ्रु जानासि बालोऽसौ राज्यान्निष्कासितो वने।<br>एकाकी सह मात्रा वै वसते निर्जने वने॥ ५३ | हे सुभ्रु! तुम तो यह जानती ही हो कि वह बालक राज्यसे निकाल दिया गया है और निर्जन वनमें अकेले ही अपनी माताके साथ रहता है। उसीके लिये राजा वीरसेन युधाजित्के द्वारा मार डाले गये। | | तत्कृते निहतो राजा वीरसेनो युधाजिता।<br>स कथं निर्धनो भर्त्ता योग्यः स्याच्चारुलोचने॥ ५४ | हे सुनयने! वह निर्धन योग्य पति कैसे हो सकता है?॥ ५३-५४॥ | | ब्रूहि पुत्रीं ततो वाक्यं कदाचिदपि विप्रियम्।<br>आगमिष्यन्ति राजानः स्थितिमन्तः स्वयंवरे॥ ५५ | तुम यह बात पुत्री शशिकलासे कह दो कि बड़े-से-बड़े प्रतिष्ठित राजा इस स्वयंवरमें आनेवाले हैं। अतः उनके प्रति ऐसी अप्रिय बात वह कभी भी न बोले॥ ५५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे शशिकलया मातरं प्रति संदेशप्रेषणं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
### अथैकोनविंशोऽध्यायः
#### माताका शशिकलाको समझाना, शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना, सुदर्शन तथा अन्य राजाओंका स्वयंवरमें आगमन, युधाजित्द्वारा सुदर्शनको मार डालनेकी बात कहनेपर केरलनरेशका उन्हें समझाना
| व्यास उवाच<br>भर्त्रा साभिहिता बालां पुत्रीं कृत्वाङ्कसंस्थिताम्।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं समाश्वास्य शुचिस्मिताम्॥ १<br><br>किं वृथा सुदति त्वं हि विप्रियं मम भाषसे।<br>पिता ते दुःखमाप्नोति वाक्येनानेन सुव्रते॥ २ | व्यासजी बोले—पतिके ऐसा कहनेपर रानीने सुन्दर मुसकानवाली उस कन्याको अपनी गोदमें बैठाकर उसे आश्वासन दे करके यह मधुर वचन कहा—हे सुदति! तुम मुझसे ऐसी अप्रिय एवं निष्प्रयोजन बात क्यों कह रही हो? हे सुव्रते! इस कथनसे तुम्हारे पिता बहुत दुःखित हो रहे हैं॥ १-२॥ |
अ० १९] तृतीय स्कन्ध ३३९
अ० १९] तृतीय स्कन्ध ३३९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सुदर्शनोऽतिदुर्भाग्यो राज्यभ्रष्टो निराश्रयः।<br>बलकोषविहीनश्च परित्यक्तस्तु बान्धवैः॥ ३<br><br>मात्रा सह वनं प्राप्तः फलमूलाशनः कृशः।<br>न ते योग्यो वरोऽयं वै वनवासी च दुर्भगः॥ ४ | वह सुदर्शन बड़ा ही अभागा, राज्यच्युत, आश्रयहीन और सेना तथा कोशसे विहीन है; बन्धु-बान्धवोंने उसका परित्याग कर दिया है। वह अपनी माताके साथ वनमें रहकर फल-मूल खाता है और अत्यन्त दुर्बल है। इसलिये वह मन्दभाग्य एवं वनवासी बालक सर्वथा तुम्हारे योग्य वर नहीं है॥ ३-४॥ |
| राजपुत्राः कृतप्रज्ञा रूपवन्तः सुसम्मताः।<br>त्वदर्हाः पुत्रि सन्त्यन्ये राजचिह्नैरलङ्कृताः॥ ५<br><br>भ्रातास्य वर्तते कान्तः स राज्यं कोसलेषु वै।<br>करोति रूपसम्पन्नः सर्वलक्षणसंयुतः॥ ६ | हे पुत्रि! तुम्हारे योग्य अनेक राजकुमार यहाँ उपस्थित हैं; जो बुद्धिमान्, रूपवान्, सम्माननीय और राजचिह्नोंसे अलंकृत हैं। इसी सुदर्शनका एक कान्तिमान्, रूपसम्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त भाई भी है, जो इस समय कोसलदेशमें राज्य करता है॥ ५-६॥ |
| अन्यच्च कारणं सुभ्रु शृणु यच्च मया श्रुतम्।<br>युधाजित्सततं तस्य वधकामोऽस्ति भूमिपः॥ ७ | हे सुभ्रु! इसके अतिरिक्त मैंने एक और जो बात सुनी है, तुम उसे सुनो—राजा युधाजित् उस सुदर्शनका वध करनेके लिये सतत प्रयत्नशील रहता है॥ ७॥ |
| दौहित्रः स्थापितस्तेन राज्ये कृत्वातिसङ्गरम्।<br>वीरसेनं नृपं हत्वा सम्मन्त्र्य सचिवैः सह॥ ८<br><br>भारद्वाजाश्रमं प्राप्तं हन्तुकामः सुदर्शनम्।<br>मुनिना वारितः पश्चाज्जगाम निजमन्दिरम्॥ ९ | उसने घोर संग्राम करके [इसके नाना] राजा वीरसेनको मारकर पुनः मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करके अपने दौहित्र शत्रुजित्को राज्यपर अभिषिक्त कर दिया है। इसके बाद भारद्वाजमुनिके आश्रममें शरणलिये उस सुदर्शनको मारनेकी इच्छासे वह वहाँ भी पहुँचा, किंतु मुनिके मना करनेपर अपने घर लौट गया॥ ८-९॥ |
| शशिकलोवाच<br>मातर्ममेप्सितः कामं वनस्थोऽपि नृपात्मजः।<br>शर्यातिवचनेनैव सुकन्या च पतिव्रता॥ १०<br><br>च्यवनञ्च यथा प्राप्य पतिशुश्रूषणे रता।<br>पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां स्वर्गदं मोक्षदं तथा॥ ११<br><br>अकैतवकृतं नूनं सुखदं भवति स्त्रियाः। | शशिकला बोली— हे माता! मुझे तो वह वनवासी राजकुमार ही अत्यन्त अभीष्ट है। [पूर्वकालमें] शर्यातिकी आज्ञासे ही उनकी पतिव्रता पुत्री सुकन्या च्यवनमुनिके पास जाकर उनकी सेवामें तत्पर हो गयी थी। उसी प्रकार मैं पतिसेवा करूँगी; पतिकी सेवा-शुश्रूषा स्त्रियोंके लिये स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली होती है। अपने पतिके लिये कपटरहित व्यवहार स्त्रियोंके लिये निश्चित रूपसे सुखदायक होता है॥ १०-११ १/२॥ |
| भगवत्या समादिष्टं स्वप्ने वरमनुत्तमम्॥ १२<br><br>तमृतेऽहं कथं चान्यं संश्रयामि नृपात्मजम्।<br>मच्चित्तभित्तौ लिखितो भगवत्या सुदर्शनः॥ १३<br><br>तं विहाय प्रियं कान्तं करिष्येऽहं न चापरम्। | स्वयं भगवती उस सर्वश्रेष्ठ वरका वरण करनेके लिये मुझे स्वप्नमें आज्ञा दे चुकी हैं। अतः उनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारका वरण कैसे करूँ? स्वयं भगवतीने मेरे चित्तकी भित्तिपर सुदर्शनको ही अंकित कर दिया है। अतः उस प्रिय सुदर्शनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारको पति नहीं बनाऊँगी॥ १२-१३ १/२॥ |
| ३४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
|---|
| व्यास उवाच<br>प्रत्यादिष्टाथ वैदर्भी तया बहुनिदर्शनैः ॥ १४<br><br>भर्तारं सर्वमाचष्ट पुत्र्योक्तं वचनं भृशम् ।<br>विवाहस्य दिनादर्वागाप्तं श्रुतसमन्वितम् ॥ १५<br><br>द्विजं शशिकला तत्र प्रेषयामास सत्वरम् ।<br>यथा न वेद मे तातस्तथा गच्छ सुदर्शनम् ॥ १६ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उस समय उस शशिकलाने अनेक प्रमाणोंके द्वारा विदर्भराजकुमारी अपनी माताको समझा दिया। तत्पश्चात् पुत्रीके द्वारा कही गयी सभी बातोंको महारानीने अपने पतिसे बताया॥ १४ १/२॥<br>उधर शशिकलाने विवाहके कुछ दिनों पूर्व ही एक विश्वस्त तथा वेदनिष्ठ ब्राह्मणको शीघ्र ही वहाँ भेज दिया। [जाते समय उसने ब्राह्मणसे कहा कि] आप सुदर्शनके पास इस प्रकार जायें, जिसे मेरे पिता न जान पायें॥ १५-१६॥ | | भारद्वाजाश्रमे ब्रूहि मद्वाक्यात्त्वरसा विभो ।<br>पित्रा मे सम्भृतः कामं मदर्थेन स्वयंवरः ॥ १७<br><br>आगमिष्यन्ति राजानो बलयुक्ता ह्यनेकंशः ।<br>मया त्वं वै वृतश्चित्ते सर्वथा प्रीतिपूर्वकम् ॥ १८<br><br>भगवत्या समादिष्टः स्वप्ने मम सुरोपम ।<br>विषमद्य हुताशे वा प्रपतामि प्रदीपिते ॥ १९<br><br>वरये त्वदृते नान्यं पितृभ्यां प्रेरितापि वा ।<br>मनसा कर्मणा वाचा संवृतस्त्वं मया वरः ॥ २०<br><br>भगवत्याः प्रसादेन शर्मावाभ्यां भविष्यति ।<br>आगन्तव्यं त्वयात्रैव दैवं कृत्वा परं बलम् ॥ २१<br><br>यदधीनं जगत्सर्वं वर्तते सचराचरम् ।<br>भगवत्या यदादिष्टं न तन्मिथ्या भविष्यति ॥ २२<br><br>यद्वशे देवताः सर्वा वर्तन्ते शङ्करादयः ।<br>वक्तव्योऽसौ त्वया ब्रह्मन्नेकान्ते वै नृपात्मजः ॥ २३ | हे विभो! आप बहुत शीघ्र ही भारद्वाजके आश्रम पहुँचकर सुदर्शनको मेरी ओरसे कहिये कि मेरे पिताने मेरे विवाहार्थ एक स्वयंवर आयोजित किया है; उसमें अनेक बलवान् राजा आयेंगे, किंतु मैं तो मनसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक हर तरहसे आपका वरण कर चुकी हूँ। हे देवोपम राजकुमार! मुझे भगवतीने स्वप्नमें आपको वरण करनेका आदेश दिया है। मैं विष खा लूँगी अथवा जलती हुई अग्निमें कूद पडूँगी, किंतु माता-पिताके द्वारा बहुत प्रेरित किये जानेपर भी मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्यका वरण नहीं करूँगी; क्योंकि मैं मन, वचन तथा कर्मसे आपको अपना पति मान चुकी हूँ। भगवतीकी कृपासे हम दोनोंका कल्याण होगा। प्रारब्धको प्रबल मानकर आप इस स्वयंवरमें अवश्य आयें। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिनके अधीन है तथा शंकर आदि सभी देवगण जिनके वशमें रहते हैं, उन भगवतीने जो आदेश दिया है, वह कभी भी असत्य नहीं होगा। हे ब्रह्मन्! आप उस राजकुमारसे यह सब एकान्तमें बताइयेगा। हे निष्पाप! आप वही कीजियेगा, जिससे मेरा काम बन जाय॥ १७—२३ १/२॥ | | यथा भवति मे कार्यं तत्कर्तव्यं त्वयानघ ।<br>इत्युक्त्वा दक्षिणां दत्त्वा मुनिर्व्यापारितस्तया ॥ २४<br><br>गत्वा सर्वं निवेद्याशु तत्र प्रत्यागतो द्विजः ।<br>सुदर्शनस्तु तज्ज्ञात्वा निश्चयं गमने तदा ॥ २५<br><br>चकार मुनिना तेन प्रेरितः परमादरात् । | ऐसा कहकर और दक्षिणा देकर शशिकलाने उस ब्राह्मणको भेज दिया। वह ब्राह्मण सुदर्शनसे सारी बातें कहकर शीघ्र ही वापस आ गया। उन बातोंको जानकर राजकुमार सुदर्शनने स्वयंवरमें जानेका निश्चय कर लिया; उन भारद्वाजमुनिने भी उसे आदरपूर्वक भेज दिया॥ २४-२५ १/२॥ |
| अ० १९ ] | तृतीय स्कन्ध | ३४१ | | :--- | :--- |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| गमनायोद्यतं पुत्रं तमुवाच मनोरमा ॥ २६<br>वेपमानातिदुःखातार् जातत्रासाश्रुलोचना ।<br>कुत्र गच्छसि पुत्राद्य समाजे भूभृतां किल ॥ २७<br>एकाकी कृतवैरश्च किं विचिन्त्य स्वयंवरे ।<br>युधाजिद्धन्तुकामस्त्वां समेष्यति महीपतिः ॥ २८<br>न तेऽन्योऽस्ति सहायश्च तस्मान्मा व्रज पुत्रक ।<br>एकपुत्रातिदीनास्मि तवाधारा निराश्रया ॥ २९<br>नार्हसि त्वं महाभाग निराशां कर्तुमद्य माम् ।<br>पिता मे निहतो येन सोऽपि तत्रागतो नृपः ॥ ३०<br>एकाकिनं गतं तत्र युधाजित्त्वां हनिष्यति । | तब अत्यधिक दुःखसे व्याकुल, काँपती हुई तथा भयभीत मनोरमा गमनके लिये तत्पर अपने पुत्र सुदर्शनसे आँखोंमें आँसू भरकर बोली—पुत्र ! तुम इस समय राजाओंके उस समाजमें कहाँ जा रहे हो ? तुम अकेले हो और तुमसे शत्रुता रखनेवाला राजा युधाजित् तुम्हें मारनेकी इच्छासे उस स्वयंवरमें अवश्य आयेगा, फिर तुम क्या सोचकर वहाँ जा रहे हो ? तुम्हारा कोई सहायक भी नहीं है। इसलिये हे पुत्र ! वहाँ मत जाओ। तुम ही मेरे एकमात्र पुत्र हो और मैं अति दीन हूँ तथा मुझ आश्रयहीनके लिये तुम्हीं एकमात्र आधार हो। हे महाभाग ! इस समय तुम मुझे निराश मत करो। जिसने मेरे पिताका वध कर दिया है, वह राजा युधाजित् भी वहाँ आयेगा और वहाँ तुझ अकेले गये हुएको मार डालेगा॥ २६–३० १/२ ॥ |
| सुदर्शन उवाच | सुदर्शन बोला— |
| भवितव्यं भवत्येव नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१<br>आदेशाच्च जगन्मातुर्गच्छाम्यद्य स्वयंवरे ।<br>मा शोकं कुरु कल्याणि क्षत्रियासि वरानने ॥ ३२<br>न बिभेमि प्रसादेन भगवत्या निरन्तरम् । | होनी तो होकर रहती है, इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे कल्याणि ! जगज्जननीके आदेशसे मैं आज स्वयंवरमें जा रहा हूँ। हे वरानने ! तुम क्षत्राणी हो, अतः इस विषयमें चिन्ता मत करो। भगवतीकी सदा अपने ऊपर कृपा रहनेके कारण मैं किसीसे भी भयभीत नहीं होता॥ ३१–३२ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य गन्तुकामं सुदर्शनम् ॥ ३३<br>दृष्ट्वा मनोरमा पुत्रमाशीर्भिdocश्चान्वमोदयत् ।<br>अग्रतस्तेऽम्बिका पातु पार्वती पातु पृष्ठतः ॥ ३४<br>( पार्वती पार्श्वयोः पातु शिवा सर्वत्र साम्प्रतम् । )<br>वाराही विषमे मार्गे दुर्गा दुर्गेषु कर्हिचित् ।<br>कालिका कलहे घोरे पातु त्वां परमेश्वरी ॥ ३५<br>मण्डपे तत्र मातङ्गी तथा सौम्या स्वयंवरे ।<br>भवानी भूपमध्ये तु पातु वां भवमोचनी ॥ ३६<br>गिरिजा गिरिदुर्गेषु चामुण्डा चत्वरेषु च ।<br>कामगा काननेष्वेवं रक्षतु त्वां सनातनी ॥ ३७<br>विवादे वैष्णवी शक्तिरक्षतात्त्वां रघूद्वह ।<br>भैरवी च रणे सौम्य शत्रूणां वै समागमे ॥ ३८<br>सर्वदा सर्वदेशेषु पातु त्वां भुवनेश्वरी ।<br>महामाया जगद्धात्री सच्चिदानन्दरूपिणी ॥ ३९ | ऐसा कहकर रथपर आरूढ़ होकर स्वयंवरमें जानेके लिये उद्यत पुत्र सुदर्शनको देखकर मनोरमाने इन आशीर्वादोंसे उसका अनुमोदन किया—भगवती अम्बिका आगेसे, पार्वती पीछेसे, (पार्वती दोनों पार्श्वभागमें तथा शिवा सर्वत्र तुम्हारी रक्षा करें।) विषम मार्गमें वाराही, किसी भी प्रकारके दुर्गम स्थानोंमें दुर्गा और भयानक संग्राममें परमेश्वरी कालिका तुम्हारी रक्षा करें। उस मण्डपमें देवी मातंगी, स्वयंवरमें भगवती सौम्या तथा भव-बन्धनसे मुक्त करनेवाली भवानी राजाओंके बीचमें तुम्हारी रक्षा करें। इसी प्रकार पर्वतीय दुर्गम स्थानोंमें गिरिजा, चौराहोंपर देवी चामुण्डा तथा वनोंमें सनातनी कामगादेवी तुम्हारी रक्षा करें। हे रघूद्वह ! विवादमें भगवती वैष्णवी तुम्हारी रक्षा करें। हे सौम्य ! शत्रुओंके साथ युद्धमें भैरवी तुम्हारी रक्षा करें। जगत्को धारण करनेवाली सच्चिदानन्दस्वरूपिणी महामाया भुवनेश्वरी सभी स्थानोंपर सर्वदा तुम्हारी रक्षा करें॥ ३३—३९॥ |
३४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
३४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इत्युक्त्वा तं तदा माता वेपमाना भयाकुला।<br>उवाचाहं त्वया सार्धमागमिष्यामि सर्वथा॥ ४०<br><br>निमिषार्धं विना त्वां वै नाहं स्थातुमिहोत्सहे।<br>सहैव नय मां वत्स यत्र ते गमने मतिः॥ ४१ | —ऐसा कहकर भयसे व्याकुल तथा काँपती हुई उसकी माता मनोरमाने उससे कहा—मैं भी तुम्हारे साथ अवश्य चलूँगी। हे पुत्र! मैं तुम्हारे बिना आधे क्षण भी यहाँ नहीं रह सकती, अतएव तुम्हारी जहाँ जानेकी इच्छा है, वहीं मुझे भी अपने साथ ले चलो॥ ४०-४१॥ |
| इत्युक्त्वा निःसृता माता धात्रेयीसंयुता तदा।<br>विप्रैर्दत्ताशिषः सर्वे निर्ययुर्हर्षसंयुताः॥ ४२ | तब ऐसा कहकर अपनी दासीको साथ लेकर माता मनोरमा चल पड़ीं। ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद प्राप्त करके वे सभी प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े॥ ४२॥ |
| वाराणस्यां ततः प्राप्तो रथेनैकेन राघवः।<br>ज्ञातः सुबाहुना तत्र पूजितश्चार्हणादिभिः॥ ४३<br><br>निवेशार्थं गृहं दत्तमन्नपानादिकं तथा।<br>सेवकं समनुज्ञाप्य परिचर्यार्थमेव च॥ ४४ | इसके बाद वह रघुवंशी सुदर्शन एक रथपर आरूढ़ होकर वाराणसी पहुँचा। राजा सुबाहुको उसके आनेकी जानकारी होनेपर उन्होंने आदर-सम्मान आदिके द्वारा उसका सत्कार किया। उन लोगोंके निवासके लिये भवन तथा अन्न-जल आदिकी व्यवस्था कर दी तथा उनकी सेवा-शुश्रूषाहेतु सेवकको भी नियुक्त कर दिया॥ ४३-४४॥ |
| मिलितास्त्वथ राजानो नानादेशाधिपाः किल।<br>युधाजिदपि सम्प्राप्तो दौहित्रेण समन्वितः॥ ४५ | इसके बाद वहाँ अनेक देशोंके राजा-महाराजा एकत्र हुए। वहाँ अपने नातीको साथ लेकर युधाजित् भी आया॥ ४५॥ |
| करूषाधिपतिश्चैव तथा मद्रेश्वरो नृपः।<br>सिन्धुराजस्तथा वीरो योद्धा माहिष्मतीपतिः॥ ४६<br><br>पाञ्चालः पर्वतीयश्च कामरूपोऽतिवीर्यवान्।<br>कार्णाटश्चोलदेशीयो वैदर्भश्च महाबलः॥ ४७ | करूषाधिपति, मद्रदेशके महाराज, वीर सिन्धुराज, युद्धकुशल माहिष्मतीनरेश, पांचालपति, पर्वतीय राजा, कामरूपदेशके अति पराक्रमी महाराज, कर्णाटकनरेश, चोलराज और महाबली विदर्भनरेश वहाँ आये थे॥ ४६-४७॥ |
| अक्षौहिणी त्रिषष्टिश्च मिलिता संख्यया तदा।<br>वेष्टिता नगरी सा तु सैन्यैः सर्वत्र संस्थितैः॥ ४८ | उन राजाओंकी कुल मिलाकर तिरसठ अक्षौहिणी सेना थी। वहाँ सर्वत्र स्थित उन सैनिकोंसे वह वाराणसी नगरी पूरी तरहसे घिर गयी॥ ४८॥ |
| एते चान्ये च बहवः स्वयंवरदिदृक्षया।<br>मिलितास्तत्र राजानो वरवारणसंयुताः॥ ४९ | इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से राजा भी स्वयंवर देखनेकी इच्छासे बड़े-बड़े हाथियोंपर आरूढ़ होकर उस स्वयंवरमें सम्मिलित हुए॥ ४९॥ |
| अन्योन्यं नृपपुत्रास्त इत्यूचुर्मिलितास्तदा।<br>सुदर्शनो नृपसुतो ह्यागतोऽस्ति निराकुलः॥ ५०<br><br>एकाकी रथमारुह्य मात्रा सह महामतिः।<br>विवाहार्थमिहायातः काकुत्स्थः किन्तु साम्प्रतम्॥ ५१<br><br>एतान् राजसुतांस्त्यक्त्वा ससैन्यान्सायुधानथ।<br>किमेनं राजपुत्री सा वरिष्यति महाभुजम्॥ ५२ | उस समय सभी राजकुमार आपसमें मिलकर कहने लगे कि राजकुमार सुदर्शन भी निश्चिन्त होकर यहाँ आया है। वह महाबुद्धिमान् सूर्यवंशी सुदर्शन अपनी माताके साथ इस समय अकेला ही रथपर चढ़कर विवाहके लिये यहाँ आ पहुँचा है। सैन्यशक्तिसे सम्पन्न तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित इन राजकुमारोंको छोड़कर क्या वह राजकुमारी बड़ी भुजाओंवाले इस सुदर्शनका वरण करेगी?॥ ५०-५२॥ |
अ० १९] तृतीय स्कन्ध ३४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| युधाजिदथ राजेशस्तानुवाच महीपतीन्।<br>अहमेनं हनिष्यामि कन्यार्थे नात्र संशयः॥ ५३ | इसके बाद राजा युधाजित्ने उन नरेशोंसे कहा—राजकुमारीको प्राप्त करनेके लिये मैं इसे मार डालूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है॥ ५३॥ |
| केरलाधिपतिः प्राह तं तदा नीतिसत्तमः।<br>नात्र युद्धं प्रकर्तव्यं राजन्निच्छास्वयंवरे॥ ५४<br><br>बलेन हरणं नास्ति नात्र शुल्कस्वयंवरः।<br>कन्येच्छयात्र वरणं विवादः कीदृशस्त्विह॥ ५५ | तब महान् नीतिज्ञ केरलनरेशने उस युधाजित्से कहा—हे राजन्! इच्छास्वयंवरमें युद्ध नहीं करना चाहिये। यह शुल्कस्वयंवर भी नहीं है, अतः कन्याका बलपूर्वक हरण भी नहीं किया जाना चाहिये। इसमें तो कन्याकी इच्छासे पति चुनना निर्धारित है; तो फिर इसमें विवाद कैसा?॥ ५४-५५॥ |
| अन्यायेन त्वया पूर्वमसौ राज्यात्प्रवासितः।<br>दौहित्रायार्पितं राज्यं बलवन्नृपसत्तम॥ ५६ | हे नृपश्रेष्ठ! आपने पहले तो इस सुदर्शनको अन्यायपूर्वक राज्यसे निकाल दिया और अपने दौहित्रको बलपूर्वक उस राज्यका स्वामी बना दिया॥ ५६॥ |
| काकुत्स्थोऽयं महाभाग कोसलाधिपतेः सुतः।<br>कथमेनं राजपुत्रं हनिष्यसि निरागसम्॥ ५७ | हे महाभाग! यह सूर्यवंशी राजकुमार कोसल-नरेशका सुपुत्र है। इस निरपराध राजकुमारका वध आप क्यों करेंगे?॥ ५७॥ |
| लप्स्यसे तत्फलं नूनमनयस्य नृपोत्तम।<br>शास्तास्ति कश्चिदायुष्मञ्जगतोऽस्य जगत्पतिः॥ ५८ | हे नृपोत्तम! आपको अन्यायका फल अवश्य ही मिलेगा। हे आयुष्मन्! इस संसारपर शासन करनेवाला कोई और ही जगत्पति परमेश्वर है॥ ५८॥ |
| धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम्।<br>मानयं कुरु राजेन्द्र त्यज पापमतिं किल॥ ५९ | धर्मकी जय होती है, अधर्मकी नहीं। सत्यकी जय होती है, असत्यकी नहीं। अतएव हे राजेन्द्र! आप अन्याय न कीजिये और इस प्रकारके पापमय विचारका सर्वथा परित्याग कर दीजिये॥ ५९॥ |
| दौहित्रस्तव सम्प्राप्तः सोऽपि रूपसमन्वितः।<br>राज्ययुक्तस्तथा श्रीमान् कथं तं न वरिष्यति॥ ६० | आपका दौहित्र यहाँ आया ही है। वह भी अत्यन्त रूपवान् और राज्य तथा लक्ष्मीसे सम्पन्न है; तब भला कन्या उसका वरण क्यों नहीं करेगी?॥ ६०॥ |
| अन्ये राजसुताः कामं वर्तन्ते बलवत्तराः।<br>कन्यास्वयंवरे कन्या स्वीकरिष्यति साम्प्रतम्॥ ६१ | अन्य एकसे बढ़कर एक बलवान् राजकुमार आये हैं। इस स्वयंवरमें कन्या शशिकला किसी भी राजकुमारको अपनी इच्छासे चुन लेगी॥ ६१॥ |
| वृते तथा विवादः कः प्रवदन्तु महीभुजः।<br>परस्परं विरोधोऽत्र न कर्तव्यो विजानता॥ ६२ | हे राजागण! अब आप ही लोग बतायें कि इस प्रकारके विवाहमें विवाद ही क्या? विवेकवान् पुरुषको इस विषयमें परस्पर विरोधभाव नहीं रखना चाहिये॥ ६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां तृतीयस्कन्धे राजसंवादवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
| ३४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
|---|
अथ विंशोऽध्यायः
राजाओंका सुदर्शनसे स्वयंवरमें आनेका कारण पूछना और सुदर्शनका उन्हें स्वप्नमें भगवतीद्वारा दिया गया आदेश बताना, राजा सुबाहुका शशिकलाको समझाना, परंतु उसका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इतिवादिनि भूपाले केरलाधिपतौ तदा।<br>प्रत्युवाच महाभाग युधाजिदपि पार्थिवः॥ १ | हे महाभाग! तब महाराज केरल-नरेशके ऐसा कहनेपर राजा युधाजित्ने कहा— ॥ १ ॥ |
| नीतिरेषा महीपाल यद् ब्रवीति भवानिह।<br>समाजे पार्थिवानां वै सत्यवाग्विजितेन्द्रियः॥ २ | हे पृथ्विपते! आपने अभी-अभी जो कहा है, क्या यही नीति है? राजाओंके समाजमें आप तो सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय माने जाते हैं॥ २॥ |
| योग्येषु वर्तमानेषु कन्यारत्नं कुलोद्वह।<br>अयोग्योऽर्हति भूपाल न्यायोऽयं तव रोचते॥ ३ | हे कुलोद्वह! हे राजन्! योग्य राजाओंके रहते हुए एक अयोग्य व्यक्ति कन्यारत्नको प्राप्त कर ले, क्या यही न्याय आपको अच्छा लगता है?॥ ३॥ |
| भागं सिंहस्य गोमायुर्भोंक्तुमर्हति वा कथम्।<br>तथा सुदर्शनोऽयं वै कन्यारत्नं किमर्हति॥ ४ | एक सियार सिंहके भागको खानेका अधिकारी कैसे हो सकता है? उसी प्रकार क्या यह सुदर्शन इस कन्यारत्नको पानेकी योग्यता रखता है?॥ ४॥ |
| बलं वेदो हि विप्राणां भूभुजां चापजं बलम्।<br>किमन्याय्यं महाराज ब्रवीम्यहमिहाधुना॥ ५ | ब्राह्मणोंका बल वेद है और राजाओंका बल धनुष। हे महाराज! क्या मैं इस समय अन्यायपूर्ण बात कह रहा हूँ?॥ ५॥ |
| बलं शुल्कं यथा राज्ञां विवाहे परिकीर्तितम्।<br>बलवानेव गृह्णातु नाबलस्तु कदाचन॥ ६ | राजाओंके विवाहमें बलको ही शुल्क कहा गया है। यहाँ जो भी बलशाली हो, वह कन्यारत्नको प्राप्त कर ले; बलहीन इसे कदापि नहीं पा सकता॥ ६॥ |
| तस्मात्कन्यापणं कृत्वा नीतिरत्र विधीयताम्।<br>अन्यथा कलहः कामं भविष्यति महीभुजाम्॥ ७ | अतएव कन्याके लिये कोई शर्त निर्धारित करके ही राजकुमारीका विवाह हो—यही नीति इस अवसरपर अपनायी जानी चाहिये; अन्यथा राजाओंमें परस्पर घोर कलहकी स्थिति उत्पन्न हो जायगी॥ ७॥ |
| एवं विवादे संवृत्ते राज्ञां तत्र परस्परम्।<br>आहूतस्तु सभामध्ये सुबाहुर्नृपसत्तमः॥ ८ | इस प्रकार वहाँ राजाओंमें परस्पर विवाद उत्पन्न हो जानेपर नृपश्रेष्ठ सुबाहु सभामें बुलाये गये॥ ८॥ |
| समाहूय नृपाः सर्वे तमूचुस्तत्त्वदर्शिनः।<br>राजनीतिस्त्वया कार्या विवाहेऽत्र समाहिता॥ ९<br><br>किं ते चिकीर्षितं राजंस्तद्बदस्व समाहितः।<br>पुत्र्याः प्रदानं कस्मै ते रोचते नृप चेतसि॥ १० | उन्हें बुलवाकर तत्त्वदर्शी राजाओंने उनसे कहा— हे राजन्! इस विवाहमें आप राजोचित नीतिका अनुसरण करें। हे राजन्! आप क्या करना चाहते हैं, उसे सावधान होकर बतायें। हे नृप! आप अपने मनसे इस कन्याको किसे प्रदान करना पसन्द करते हैं?॥ ९-१०॥ |
| सुबाहुरुवाच | सुबाहु बोले— |
| पुत्र्या मे मनसा कामं वृतः किल सुदर्शनः।<br>मया निवारितात्यर्थं न सा प्रत्येति मे वचः॥ ११<br><br>किं करोमि सुताया मे न वशे वर्तते मनः।<br>सुदर्शनस्त्वैकाकी सम्प्राप्तोऽस्ति निराकुलः॥ १२ | मेरी पुत्रीने मन-ही-मन सुदर्शनका वरण कर लिया है। इसके लिये मैंने उसे बहुत रोका, किंतु वह मेरी बात नहीं मानती। मैं क्या करूँ? मेरी पुत्रीका मन वशमें नहीं है और यह सुदर्शन भी निर्भीक होकर यहाँ अकेले आ गया है॥ ११-१२॥ |
| अ० २० ] | तृतीय स्कन्ध | ३४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br><br>सम्पन्नभूभुजः सर्वे समाहूय सुदर्शनम्।<br>ऊचुः समागतं शान्तमेकाकिनमतन्द्रिताः॥ १३<br><br>राजपुत्र महाभाग केनाहूतोऽसि सुव्रत।<br>एकाकी यः समायातः समाजे भूभृतामिह॥ १४ | व्यासजी बोले—तत्पश्चात् सभी वैभवशाली राजाओंने सुदर्शनको बुलवाया। उस शान्तस्वभाव सुदर्शनसे राजाओंने सावधान होकर पूछा—हे राजपुत्र! हे महाभाग! हे सुव्रत! तुम्हें यहाँ किसने बुलाया है, जो तुम इस राजसमाजमें अकेले ही चले आये हो? ॥ १३-१४॥ |
| न वै सैन्यं न सचिवा न कोशो न बृहद्बलम्।<br>किमर्थञ्च समायातस्तत्त्वं ब्रूहि महामते॥ १५ | तुम्हारे पास न सेना है, न मन्त्री हैं, न कोश है और न अधिक बल ही है। हे महामते! तुम यहाँ किसलिये आये हो? उसे बताओ॥ १५॥ |
| युद्धकामा नृपतयो वर्तन्तेऽत्र समागमे।<br>कन्यार्थं सैन्यसम्पन्नाः किं त्वं कर्तुमिहेच्छसि॥ १६ | युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले बहुत-से राजागण इस कन्याको प्राप्त करनेकी इच्छासे अपनी-अपनी सेनासहित इस समाजमें विद्यमान हैं। यहाँ तुम क्या करना चाहते हो? ॥ १६॥ |
| भ्राता ते सुबलः शूरः सम्प्राप्तोऽस्ति जिघृक्षया।<br>युधाजिच्च महाबाहुः साहाय्यं कर्तुमागतः॥ १७ | तुम्हारा शूरवीर भाई शत्रुजित् भी एक महान् सेनाके साथ राजकुमारीको प्राप्त करनेकी इच्छासे यहाँ आया हुआ है और उसकी सहायता करनेके लिये महाबाहु युधाजित् भी आये हैं॥ १७॥ |
| गच्छ वा तिष्ठ राजेन्द्र याथातथ्यमुदाहृतम्।<br>त्वयि सैन्यविहीने च यथेष्टं कुरु सुव्रत॥ १८ | हे राजेन्द्र! तुम जाओ अथवा रहो। हमने तो सारी वास्तविकता तुम्हें बतला दी; क्योंकि तुम सेना-विहीन हो। हे सुव्रत! अब तुम्हारी जो इच्छा हो, वह करो॥ १८॥ |
| सुदर्शन उवाच<br><br>न बलं न सहायो मे न कोशो दुर्गसंश्रयः।<br>न मित्राणि न सौहार्दी न नृपा रक्षका मम॥ १९ | सुदर्शन बोला—मेरे पास न सेना है, न कोई सहायक है, न खजाना है, न सुरक्षित किला है, न मित्र हैं, न सुहृद् हैं तथा न तो मेरी रक्षा करनेवाले कोई राजा ही हैं॥ १९॥ |
| अत्र स्वयंवरं श्रुत्वा द्रष्टुकाम इहागतः।<br>स्वप्ने देव्या प्रेरितोऽस्मि भगवत्या न संशयः॥ २० | यहाँपर स्वयंवर होनेका समाचार सुनकर उसे देखनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। देवी भगवतीने स्वप्नमें मुझे यहाँ आनेकी प्रेरणा दी है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥ |
| नान्यच्चिकीर्षितं मेऽद्य मामाह जगदीश्वरी।<br>तया यद्विहितं तच्च भविताद्य न संशयः॥ २१ | मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है। मुझे यहाँ आनेके लिये जगज्जननी भगवतीने आदेश दिया है। उन्होंने जो विधान रच दिया होगा, वह होकर ही रहेगा; इसमें कोई संशय नहीं है॥ २१॥ |
| न शत्रुरस्ति संसारे कोऽप्यत्र जगतीश्वराः।<br>सर्वत्र पश्यतो मेऽद्य भवानीं जगदम्बिकाम्॥ २२ | हे राजागण! इस संसारमें मेरा कोई शत्रु नहीं है। मैं सर्वत्र भवानी जगदम्बाको विराजमान देख रहा हूँ॥ २२॥ |
| ३४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| यः करिष्यति शत्रुत्वं मया सह नृपात्मजाः।<br>शास्ता तस्य महाविद्या नाहं जानामि शत्रुताम्॥ २३ | हे राजकुमारो! जो कोई भी प्राणी मुझसे शत्रुता करेगा, उसे महाविद्या जगदम्बा दण्डित करेंगी; मैं तो वैर-भाव जानता ही नहीं॥ २३॥ | | यद्भावि तद्वै भविता नान्यथा नृपसत्तमाः।<br>का चिन्ता ह्यत्र कर्तव्या दैवाधीनोऽस्मि सर्वदा॥ २४ | हे श्रेष्ठ राजाओ! जो होना है, वह अवश्य ही होगा; उसके विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें क्या चिन्ता की जाय? मैं तो सदा प्रारब्धपर भरोसा करता हूँ?॥ २४॥ | | देवभूतमनुष्येषु सर्वभूतेषु सर्वदा।<br>सर्वेषां तत्कृता शक्तिर्नान्यथा नृपसत्तमाः॥ २५ | हे श्रेष्ठ राजाओ! देवताओं, दानवों, मनुष्यों तथा सभी प्राणियोंमें एकमात्र जगदम्बाकी शक्ति ही विद्यमान है। उनके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है॥ २५॥ | | सा यं चिकीर्षते भूपं तं करोति नृपाधिपाः।<br>निर्धनं वा नरं कामं का चिन्ता वै तदा मम॥ २६ | हे महाराजाओ! वे जिस मनुष्यको राजा बनाना चाहती हैं, उसे राजा बना देती हैं और जिसे निर्धन बनाना चाहती हैं, उसे निर्धन बना देती हैं; तब मुझे किस बातकी चिन्ता?॥ २६॥ | | तामृते परमां शक्तिं ब्रह्मविष्णुहरादयः।<br>न शक्ताः स्पन्दितुं देवाः का चिन्ता मे तदा नृपाः॥ २७ | हे राजाओ! ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी उन महाशक्तिके बिना हिलने-डुलनेमें भी समर्थ नहीं हैं, तब मुझे क्या चिन्ता?॥ २७॥ | | अशक्तो वा सशक्तो वा यादृशस्तादृशस्त्वहम्।<br>तदाज्ञया नृपाद्यैव सम्प्राप्तोऽस्मि स्वयंवरे॥ २८ | मैं शक्तिसम्पन्न हूँ या शक्तिहीन, जैसा भी हूँ वैसा आपके समक्ष हूँ। हे राजाओ! मैं उन्हीं भगवतीकी आज्ञासे ही इस स्वयंवरमें आया हुआ हूँ॥ २८॥ | | सा यदिच्छति तत्कुर्यान्मम किं चिन्तनेन वै।<br>नात्र शङ्का प्रकर्तव्या सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ २९ | वे भगवती जो चाहेंगीं, सो करेंगीं। मेरे सोचनेसे क्या होगा? मैं यह सत्य कह रहा हूँ, इस विषयमें शंका नहीं करनी चाहिये॥ २९॥ | | जये पराजये लज्जा न मेऽत्राण्वपि पार्थिवाः।<br>भगवत्यास्तु लज्जास्ति तदधीनोऽस्मि सर्वथा॥ ३० | हे राजाओ! जय अथवा पराजयमें मुझे अणुमात्र भी लज्जा नहीं है। लज्जा तो उन भगवतीको होगी; क्योंकि मैं तो सर्वथा उन्हींके अधीन हूँ॥ ३०॥ | | व्यास उवाच<br>इति तस्य तदाकर्ण्य वचनं राजसत्तमाः।<br>ऊचुः परस्परं प्रेक्ष्य निश्चयज्ञा नराधिपाः॥ ३१<br><br>सत्यमुक्तं त्वया साधो न मिथ्या कर्हिचिद्भवेत्।<br>तथाप्युज्जयनीनाथस्त्वां हन्तुं परिकाङ्क्षति॥ ३२<br><br>त्वत्कृतेन दयादिष्टा त्वां ब्रवीमो महामते।<br>यदुक्तं तत्त्वया कार्यं विचार्य मनसानघ॥ ३३ | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उस सुदर्शनकी यह बात सुनकर सभी श्रेष्ठ राजागण उसके निश्चयको जान गये और एक-दूसरेको देखकर उन राजाओंने सुदर्शनसे कहा—हे साधो! आपने सत्य कहा है, आपका कथन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। तथापि उज्जयिनीपति महाराज युधाजित् आपको मार डालना चाहते हैं। हे महामते! हमें आपके ऊपर दया आ रही है, इसीलिये हमने आपको यह सब बता दिया। हे अनघ! अब आपको जो उचित जान पड़े, वैसा मनसे खूब सोच-समझकर कीजिये॥ ३१—३३॥ |
| अ० २० ] | तृतीय स्कन्ध | ३४७ |
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| सुदर्शन उवाच | |
|---|---|
| सत्यमुक्तं भवद्भिश्च कृपावद्भिः सुहृज्जनैः ।<br>किं ब्रवीमि पुनर्वाक्यमुक्तवा नृपतिसत्तमाः ॥ ३४ | सुदर्शन बोला— आप सब बड़े कृपालु एवं सहृदय-जनोंने सत्य ही कहा है, किंतु हे श्रेष्ठ राजागण ! अब मैं अपनी पूर्वकथित बात फिरसे क्या दोहराऊँ ! ॥ ३४ ॥ |
| न मृत्युः केनचिद्भाव्यः कस्यचिद्वा कदाचन ।<br>दैवाधीनमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ३५ | किसीकी भी मृत्यु किसीसे भी कभी भी नहीं हो सकती; क्योंकि यह सम्पूर्ण चराचर जगत् तो दैवके अधीन है ॥ ३५ ॥ |
| स्ववशोऽयं न जीवोऽस्ति स्वकर्मवशगः सदा ।<br>तत्कर्म त्रिविधं प्रोक्तं विद्वद्भिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ३६<br><br>सञ्चितं वर्तमानञ्च प्रारब्धञ्च तृतीयकम् ।<br>कालकर्मस्वभावैश्च ततं सर्वमिदं जगत् ॥ ३७ | यह जीव भी स्वयं अपने वशमें नहीं है; यह सदा अपने कर्मके अधीन रहता है। तत्त्वदर्शी विद्वानोंने उस कर्मके तीन प्रकार बतलाये हैं— संचित, वर्तमान तथा प्रारब्ध। यह सम्पूर्ण जगत् काल, कर्म तथा स्वभावसे व्याप्त है ॥ ३६-३७ ॥ |
| न देवो मानुषं हन्तुं शक्तः कालागमं विना ।<br>हतं निमित्तमात्रेण हन्ति कालः सनातनः ॥ ३८ | बिना कालके आये देवता भी किसी मनुष्यको मारनेमें समर्थ नहीं हो सकते। किसीको भी मारनेवाला तो निमित्तमात्र होता है; वास्तविकता यह है कि सभीको अविनाशी काल ही मारता है ॥ ३८ ॥ |
| यथा पिता मे निहतः सिंहेनामित्रकर्षणः ।<br>तथा मातामहोऽप्येवं युद्धे युधाजिता हतः ॥ ३९ | जैसे शत्रुओंका शमन करनेवाले मेरे पिताको सिंहने मार डाला। वैसे ही मेरे नानाको भी युद्धमें युधाजित्ने मार डाला ॥ ३९ ॥ |
| यत्नकोटिं प्रकुर्वाणो हन्यते दैवयोगतः ।<br>जीवेद्वर्षसहस्त्राणि रक्षणेन विना नरः ॥ ४० | प्रारब्ध पूरा हो जानेपर करोड़ों प्रयत्न करनेपर भी अन्ततः मनुष्य मर ही जाता है और दैवके अनुकूल रहनेपर बिना किसी रक्षाके ही वह हजारों वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ ४० ॥ |
| नाहं बिभेमि धर्मिष्ठाः कदाचिच्च युधाजितः ।<br>दैवमेव परं मत्वा सुस्थितोऽस्मि सदा नृपाः ॥ ४१ | हे धर्मनिष्ठ राजाओ ! मैं युधाजित्से कभी नहीं डरता। मैं दैवको ही सर्वोपरि मानकर पूर्णरूपसे निश्चिन्त रहता हूँ ॥ ४१ ॥ |
| स्मरणं सततं नित्यं भगवत्याः करोम्यहम् ।<br>विश्वस्य जननी देवी कल्याणं सा करिष्यति ॥ ४२ | मैं नित्य-निरन्तर भगवतीका स्मरण करता रहता हूँ। विश्वकी जननी वे भगवती ही कल्याण करेंगी ॥ ४२ ॥ |
| पूर्वार्जितं हि भोक्तव्यं शुभं वाप्यशुभं तथा ।<br>स्वकृतस्य च भोगेन कीदृक्शोको विजानताम् ॥ ४३ | पूर्वजन्ममें किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मोंका फल प्राणीको भोगना ही पड़ता है; तो फिर अपने द्वारा किये गये कर्मका फल भोगनेमें विवेकी पुरुषोंको शोक कैसा ? ॥ ४३ ॥ |
| स्वकर्मफलयोगेन प्राप्य दुःखमचेतनः ।<br>निमित्तकारणे वैरं करोत्यल्पमतिः किल ॥ ४४ | अपने द्वारा उपार्जित कर्मफल भोगनेमें दुःख प्राप्त होनेके कारण अज्ञानी तथा अल्पबुद्धिवाला प्राणी निमित्त कारणके प्रति शत्रुता करने लगता है ॥ ४४ ॥ |
| ३४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न तथाहं विजानामि वैरं शोकं भयं तथा।<br>निःशङ्कमिह सम्प्राप्तः समाजे भूभृतामिह॥ ४५ | उनकी भाँति मैं वैर, शोक तथा भयको नहीं जानता। अतः मैं राजाओंके इस समाजमें भयरहित होकर आया हुआ हूँ॥ ४५॥ |
| एकाकी द्रष्टुकामोऽहं स्वयंवरमनुत्तमम्।<br>भविष्यति च यद्भाव्यं प्राप्तोऽस्मि चण्डिकाज्ञया॥ ४६ | जो होना है, वह तो होकर ही रहेगा। मैं तो भगवतीके आदेशसे इस उत्कृष्ट स्वयंवरको देखनेकी अभिलाषासे यहाँ अकेला ही आया हूँ॥ ४६॥ |
| भगवत्याः प्रमाणं मे नान्यं जानामि संयतः।<br>तत्कृतं च सुखं दुःखं भविष्यति च नान्यथा॥ ४७ | मैं भगवतीके वचनको ही प्रमाण मानता हूँ और उनकी आज्ञाके अधीन रहता हुआ मैं अन्य किसीको नहीं जानता। उन्होंने सुख-दुःखका जो विधान कर दिया है, वही प्राप्त होगा, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं॥ ४७॥ |
| युधाजित्सुखमाप्नोतु न मे वैरं नृपोत्तमाः।<br>यः करिष्यति मे वैरं स प्राप्स्यति फलं तथा॥ ४८ | हे श्रेष्ठ राजाओ! युधाजित् सुखी रहें। मेरे मनमें उनके प्रति वैरभाव नहीं है। जो मुझसे शत्रुता करेगा, वह उसका फल पायेगा॥ ४८॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| इत्युक्तास्ते तथा तेन सन्तुष्टा भूभुजः स्थिताः।<br>सोऽपि स्वमाश्रमं प्राप्य सुस्थितः सम्बभूव ह॥ ४९ | उस सुदर्शनके इस प्रकार कहनेपर वहाँ उपस्थित सभी राजा अत्यन्त प्रसन्न हो गये। वह भी अपने निवासमें आकर शान्तभावसे बैठ गया॥ ४९॥ |
| अपरेऽह्नि शुभे काले नृपाः सम्मन्त्रिताः किल।<br>सुबाहुना नृपेणाथ रुचिरे वै स्वमण्डपे॥ ५० | तदनन्तर दूसरे दिन शुभ मुहूर्तमें राजा सुबाहुने अपने भव्य मण्डपमें सभी राजाओंको बुलाया॥ ५०॥ |
| दिव्यास्तरणयुक्तेषु मञ्चेषु रचितेषु च।<br>उपविष्टाश्च राजानः शुभालङ्करणैर्युताः॥ ५१ | उस मण्डपमें दिव्य आसनोंसे सुशोभित पूर्णरूपसे सजाये गये मंचोंपर मनोहारी आभूषणोंसे अलंकृत राजागण विराजमान हुए॥ ५१॥ |
| दिव्यवेषधराः कामं विमानेष्वमरा इव।<br>दीप्यमानाः स्थितास्तत्र स्वयंवरदिदृक्षया॥ ५२ | स्वयंवर देखनेकी इच्छासे वहाँ मंचोंपर विराजमान वे दिव्य वेषधारी देदीप्यमान राजागण विमानपर बैठे हुए देवताओंकी भाँति प्रतीत हो रहे थे॥ ५२॥ |
| इति चिन्तापराः सर्वे कदा साप्योगमिष्यति।<br>भाग्यवन्तं नृपश्रेष्ठं श्रुतपुण्यं वरिष्यति॥ ५३ | सभी राजा इस बातके लिये बहुत चिन्तित थे कि वह राजकुमारी कब आयेगी और किस पुण्यवान् तथा भाग्यशाली श्रेष्ठ नरेशका वरण करेगी?॥ ५३॥ |
| यदा सुदर्शनं दैवात्स्रजा सम्भूषयेदिह।<br>विवादो वै नृपाणां च भविता नात्र संशयः॥ ५४ | संयोगवश यदि राजकुमारीने सुदर्शनके गलेमें माला डाल दी तो राजाओंमें परस्पर कलह होने लगेगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५४॥ |
| इत्येवं चिन्त्यमानास्ते भूपा मञ्चेषु संस्थिताः।<br>वादित्रघोषः सुमहानुत्थितो नृपमण्डपे॥ ५५ | मंचोंपर विराजमान राजालोग ऐसा सोच ही रहे थे तभी राजा सुबाहुके भवनमें वाद्योंकी ध्वनि होने लगी॥ ५५॥ |