देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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३३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
| अथ कामार्दिता प्राह सखीं छन्दोऽनुवर्तिनीम्।<br>विकारश्च समुत्पन्नो देहे यच्छ्रवणादनु ॥ ३<br><br>अज्ञातरसविज्ञानं कुमारं कुलसम्भवम्।<br>धुनोति मदनः पापः किं करोमि क्व यामि च ॥ ४ | तदनन्तर उस शशिकलाने अपनी इच्छाके अनुसार चलनेवाली एक सखीसे कहा कि रससे अनभिज्ञ तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न उस राजकुमारके विषयमें सुनकर मेरे शरीरमें विकार उत्पन्न हो गया है। इस समय कामदेव मुझे अत्यधिक पीड़ा दे रहा है। अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? ॥ ३-४ ॥ |
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| स्वप्नेषु वा मया दृष्टः पञ्चबाण इवापरः।<br>तपते मे मनोऽत्यर्थं विरहाकुलितं मृदु ॥ ५ | जबसे मैंने स्वप्नमें दूसरे कामदेवके सदृश उस राजकुमारको देखा है, तभीसे विरहसे आकुल हुआ मेरा कोमल मन अत्यधिक सन्तप्त हो रहा है ॥ ५ ॥ |
| चन्दनं देहलग्नं मे विषवद्भाति भामिनि।<br>स्रगियं सर्पवच्चैव चन्द्रपादाश्च वह्निवत् ॥ ६ | हे भामिनि! इस समय मेरे शरीरमें लगा हुआ चन्दन विषके समान, यह माला सर्पके तुल्य तथा चन्द्रमाकी किरणें अग्निसदृश प्रतीत हो रही हैं ॥ ६ ॥ |
| न च हर्म्ये वने शं मे दीर्घिकायां न पर्वते।<br>न दिवा न निशायां वा न सुखं सुखसाधनैः ॥ ७ | इस समय महलमें, वनमें, बावलीमें तथा पर्वतपर—कहीं भी मेरे चित्तको शान्ति नहीं मिल पा रही है। नानाविध सुख-साधनोंसे दिनमें अथवा रातमें किसी भी समय सुखकी अनुभूति नहीं हो रही है ॥ ७ ॥ |
| न शय्या न च ताम्बूलं न गीतं न च वादनम्।<br>प्रीणयन्ति मनो मेऽद्य न तृप्ते मम लोचने ॥ ८ | शय्या, ताम्बूल, गायन तथा वादन—इनमें कोई भी चीजें मेरे मनको प्रसन्न नहीं कर पा रही हैं और न तो मेरे नेत्रोंको कोई भी वस्तु तृप्त ही कर पा रही है ॥ ८ ॥ |
| प्रयाम्यद्य वने तत्र यत्रासौ वर्तते शठः।<br>भीतास्मि कुललज्जायाः परतन्त्रा पितुस्तथा ॥ ९ | [जी करता है] उसी वनमें चली जाऊँ जहाँ वह निष्ठुर विद्यमान है, किंतु कुलकी लज्जाके कारण भयभीत हूँ, और फिर अपने पिताके अधीन भी हूँ ॥ ९ ॥ |
| स्वयंवरं पिता मेऽद्य न करोति करोमि किम्।<br>दास्यामि राजपुत्राय कामं सुदर्शनाय वै ॥ १० | क्या करूँ, मेरे पिता अभी मेरा स्वयंवर भी नहीं आयोजित कर रहे हैं। [यदि स्वयंवर हुआ तो] मैं इच्छापूर्वक अपनेको सुदर्शनको समर्पित कर दूँगी ॥ १० ॥ |
| सन्त्यन्ये पृथिवीपालाः शतशः सम्भृतर्द्धयः।<br>रमणीया न मे तेऽद्य राज्यहीनोऽप्यसौ मतः ॥ ११ | यद्यपि दूसरे सैकड़ों समृद्धिशाली नरेश हैं, परंतु वे मुझे रमणीय नहीं लगते। राज्यहीन होते हुए भी इस सुदर्शनको मैं अधिक रमणीय मानती हूँ ॥ ११ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एकाकी निर्धनश्चैव बलहीनः सुदर्शनः।<br>वनवासी फलाहारस्तस्याश्चित्ते सुसंस्थितः ॥ १२<br><br>वाग्बीजस्य जपात्सिद्धिस्तस्या एषाप्युपस्थिता।<br>सोऽपि ध्यानपरोऽत्यन्तं जजाप मन्त्रमुत्तमम् ॥ १३ | **व्यासजी बोले—**अकेला, निर्धन, बलहीन, वनवासी तथा फलका आहार करनेवाला होते हुए भी सुदर्शन उस शशिकलाके हृदयमें पूर्णरूपसे बस गया था। भगवतीके वाग्बीजमन्त्रके जपसे सुदर्शनको यह सिद्धि प्राप्त हो गयी थी। वह पूर्णरूपसे ध्यानमग्न होकर उस सर्वोत्तम मन्त्रका निरन्तर जप करता रहता था ॥ १२-१३ ॥ |