भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० १८ ]तृतीय स्कन्ध३३३
अपश्यद् ब्राह्मणं मार्गे आगच्छन्तं त्वरान्वितम् ॥ ५५<br>तं प्रणम्य द्विजं श्यामा बभाषे मधुरं वचः ।<br>कुतो देशान्महाभाग कृतमागमनं त्वया ॥ ५६<br><br>द्विज उवाच<br>भारद्वाजाश्रमाद् बाले नूनमागमनं मम ।<br>जातं वै कार्ययोगेन किं पृच्छसि वदस्व मे ॥ ५७<br><br>शशिकलोवाच<br>तत्राश्रमे महाभाग वर्णनीयं किमस्ति वै ।<br>लोकातिगं विशेषेण प्रेक्षणीयतमं किल ॥ ५८<br><br>ब्राह्मण उवाच<br>ध्रुवसन्धिसुतः श्रीमानास्ते सुदर्शनो नृपः ।<br>यथार्थनामा सुश्रोणि वर्तते पुरुषोत्तमः ॥ ५९<br>तस्य लोचनमत्यन्तं निष्फलं प्रतिभाति मे ।<br>येन दृष्टो न वामोरु कुमारस्तु सुदर्शनः ॥ ६०<br>एकत्र निहिता धात्रा गुणाः सर्वे सिसृक्षुणा ।<br>गुणानामाकरं द्रष्टुं मन्ये तेनैव कौतुकात् ॥ ६१<br>तव योग्यः कुमारोऽसौ भर्ता भवितुमर्हति ।<br>योगोऽयं विहितोऽप्यासीन्मणिकाञ्चनयोरिव ॥ ६२तभी उसने मार्गमें शीघ्रतापूर्वक आते हुए किसी ब्राह्मणको देखा। उस ब्राह्मणको प्रणाम करके सुन्दरी शशिकलाने मधुर वाणीमें कहा—हे महाभाग ! आप किस देशसे आये हैं ? ॥ ५४–५६ ॥<br><br>ब्राह्मणने कहा—हे बाले ! एक कार्यवश भारद्वाजमुनिके आश्रमसे मेरा आगमन हुआ है। तुम क्या पूछ रही हो; मुझे बताओ ॥ ५७ ॥<br><br>शशिकला बोली—हे महाभाग ! उस आश्रममें अत्यन्त प्रशंसनीय, संसारमें सबसे बढ़कर तथा विशेषरूपसे दर्शनीय कौन-सी वस्तु है ? ॥ ५८ ॥<br><br>ब्राह्मणने कहा—हे सुश्रोणि ! महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र श्रीमान् सुदर्शन वहाँ रहते हैं। पुरुषोंमें श्रेष्ठ वे सुदर्शन अपने नामके अनुरूप ही हैं ॥ ५९ ॥<br><br>हे सुन्दरि ! जिसने राजकुमार सुदर्शनको नहीं देखा, मैं तो उसके नेत्रोंको अत्यन्त निष्फल मानता हूँ ॥ ६० ॥<br><br>सृष्टिकी अभिलाषावाले ब्रह्माने कौतूहलवश उन एक सुदर्शनमें सभी गुणोंको भर दिया है। अतः गुणोंकी खान सुदर्शनको ही मैं देखनेयोग्य मानता हूँ ॥ ६१ ॥<br><br>वे राजकुमार तुम्हारे अनुरूप हैं और तुम्हारे पति होनेयोग्य हैं। मणि और कांचनकी भाँति यह तुम दोनोंका संयोग पहलेसे ही निश्चित हो चुका है ॥ ६२ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विश्वामित्रकथोत्तरं राजपुत्रस्य कामबीजप्राप्तिवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

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अथाष्टादशोऽध्यायः

राजकुमारी शशिकलाद्वारा मन-ही-मन सुदर्शनका वरण करना, काशिराजद्वारा स्वयंवरकी घोषणा, शशिकलाका सखीके माध्यमसे अपना निश्चय माताको बताना

व्यास उवाच<br>श्रुत्वा तद्वचनं श्यामा प्रेमयुक्ता बभूव ह ।<br>प्रतस्थे ब्राह्मणस्तस्मात्स्थानादुक्त्वा समाहितः ॥ १<br><br>सा तु पूर्वानुरागाद्वै मग्ना प्रेम्णातिचञ्चला ।<br>कामबाणाहतेवास गते तस्मिन्द्विजोत्तमे ॥ २व्यासजी बोले—उस ब्राह्मणका वचन सुनकर सुन्दरी शशिकला प्रेमविभोर हो गयी और वह ब्राह्मण इतना कहकर शान्तभावसे उस स्थानसे चला गया ॥ १ ॥<br><br>उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके चले जानेपर वह सुन्दरी पूर्व अनुरागसे तथा विप्रकी बातोंसे प्रेमातिरेकके कारण अत्यधिक अधीर हो उठी ॥ २ ॥