देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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३३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १७
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गरुडे वाहने संस्थां वैष्णवीं शक्तिमद्भुताम्।<br>दृष्ट्वा प्रसन्नवदनः स बभूव नृपात्मजः ॥ ४३ | थे। [इस प्रकारका दिव्य स्वरूप धारणकर] वाहन गरुडपर विराजमान उन अद्भुत वैष्णवी शक्तिको देखकर राजकुमार सुदर्शनके मुखमण्डलपर प्रसन्नता छा गयी॥ ४२-४३॥ |
| वने तस्मिन्स्थितः सोऽथ सर्वविद्यार्थतत्त्ववित्।<br>मातरं सेवमानस्तु विजहार नदीतटे॥ ४४<br><br>शरासनञ्च सम्प्राप्तं विशिखाश्च शिलाशिताः।<br>तूणीरकवचं तस्मै दत्तं चाम्बिकया वने ॥ ४५ | इस प्रकार समस्त विद्याओंका रहस्य जाननेवाला वह सुदर्शन उस वनमें रहकर जगदम्बाकी उपासना करता हुआ नदीतटपर विचरण करने लगा। उसी वनमें भगवती जगदम्बाने उसे धनुष, अनेक तीक्ष्ण बाण, तूणीर तथा कवच प्रदान किये॥ ४४-४५॥ |
| एतस्मिन्समये पुत्री काशिराजस्य सुप्रिया।<br>नाम्ना शशिकला दिव्या सर्वलक्षणसंयुता ॥ ४६<br><br>शुश्राव नृपपुत्रं तं वनस्थञ्च सुदर्शनम्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नं शूरं काममिवापरम्॥ ४७ | इसी समय सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त 'शशिकला' नामसे विख्यात काशिराजकी परम प्रिय पुत्रीने उस वनमें रहनेवाले समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, पराक्रमी तथा दूसरे कामदेवके समान प्रतीत होनेवाले राजकुमार सुदर्शनके विषयमें सुना॥ ४६-४७॥ |
| बन्दीजनमुखाच्छ्रुत्वा राजपुत्रं सुसम्मतम्।<br>चकमे मनसा तं वै वरं वरयितुं धिया॥ ४८ | बन्दीजनोंके मुखसे अतिसम्मानित राजकुमारके विषयमें सुनकर शशिकलाने मन-ही-मन बुद्धिपूर्वक उसे पतिरूपमें वरण करनेका निश्चय कर लिया॥ ४८॥ |
| स्वप्ने तस्याः समागम्य जगदम्बा निशान्तरे।<br>उवाच वचनं चेदं समाश्वास्य सुसंस्थिता॥ ४९<br><br>वरं वरय सुश्रोणि मम भक्तः सुदर्शनः।<br>सर्वकामप्रदस्तेऽस्तु वचनान्मम भामिनि ॥ ५० | [उसी दिन] आधी रातको जगदम्बा स्वप्नमें शशिकलाके पास आकर स्थित हो गयीं और उसे आश्वस्त करके यह वचन बोलीं—'हे सुश्रोणि! सुदर्शन मेरा भक्त है, तुम उसीको अपना पति स्वीकार कर लो। हे भामिनि! मेरी आज्ञासे वह तुम्हारी सब कामनाएँ पूर्ण करेगा'॥ ४९-५०॥ |
| एवं शशिकला दृष्ट्वा स्वप्ने रूपं मनोहरम्।<br>अम्बाया वचनं स्मृत्वा जहर्ष भृशमानिनी ॥ ५१ | इस प्रकार स्वप्नमें भगवतीका मनोहर स्वरूप देखकर तथा उनके इस वचनको स्मरण करके परम मानिनी शशिकला प्रसन्न हो गयी॥ ५१॥ |
| उत्थिता सा मुदा युक्ता पृष्टा मात्रा पुनः पुनः।<br>प्रमोदे कारणं बाला नोवाचातित्रपान्विता॥ ५२ | वह प्रसन्नताके साथ उठ गयी। उसकी माताने उसे हर्षित देखकर बार-बार प्रसन्नताका कारण पूछा, किंतु उस सुन्दरीने अति लज्जाके कारण कुछ नहीं बताया॥ ५२॥ |
| जहास मुदमापन्ना स्मृत्वा स्वप्नं मुहुर्मुहुः।<br>सखीं प्राह तदान्यां वै स्वप्नवृत्तं सुविस्तरम् ॥ ५३ | स्वप्नका बार-बार स्मरण करके प्रसन्नतासे युक्त होकर वह जोरसे हँस पड़ती थी। तब उसने अपनी एक अन्य सखीसे स्वप्नका सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह दिया॥ ५३॥ |
| कदाचित्सा विहारार्थमवापोपवनं शुभम्।<br>सखीयुक्ता विशालाक्षी चम्पकैरुपशोभितम् ॥ ५४<br><br>पुष्पाणि चिन्वती बाला चम्पकाधःस्थिताबला। | किसी दिन वह विशालनयनी शशिकला अपनी सखीके साथ चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित एक सुन्दर उपवनमें विहारके लिये गयी। वहाँ पुष्प चुनती हुई वह कुमारी एक चम्पावृक्षके नीचे खड़ी हो गयी। |