देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 340, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 340
| अ० १७] | तृतीय स्कन्ध | ३३१ |
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य युधाजिन्नृपसत्तमः।<br>प्रणम्य तं मुनिं मूर्ध्ना जगाम स्वपुरं नृपः ॥ ३१<br><br>मनोरमापि स्वस्थाभूदाश्रमे तत्र संस्थिता।<br>पालयामास पुत्रं तं सुदर्शनमृतव्रतम् ॥ ३२ | [हे जनमेजय!] मन्त्रीकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ राजा युधाजित् भारद्वाजमुनिको सिर झुकाकर प्रणाम करके अपने पुरको चले गये। तब रानी मनोरमा भी निश्चिन्त हो गयीं और उस आश्रममें रहती हुई अपने सत्यव्रती पुत्र सुदर्शनका पालन करने लगीं ॥ ३१-३२॥ |
| दिने दिने कुमारोऽसौ जगामोपचयं ततः।<br>मुनिबालगतः क्रीडन्निर्भयः सर्वतः शुभः॥ ३३<br><br>एकस्मिन्समये तत्र विदल्लं समुपागतम्।<br>क्लीबेति मुनिपुत्रस्तमामन्त्रयत्तदन्तिके ॥ ३४ | अब वह सुन्दर कुमार मुनिबालकोंके साथ सर्वत्र निर्भय होकर क्रीड़ा करता हुआ दिनोंदिन बढ़ने लगा। एक दिन सुदर्शनके पास आये हुए विदल्लको किसी मुनिकुमारने ‘क्लीब’ इस नामसे पुकारा ॥ ३३-३४ ॥ |
| सुदर्शनस्तु तच्छ्रुत्वा दधारैकाक्षरं स्फुटम्।<br>अनुस्वारायुतं तच्च प्रोवाचापि पुनः पुनः॥ ३५ | उसे सुनकर सुदर्शनने उसके एकाक्षर ‘क्ली’ शब्दको स्पष्टरूपसे धारण कर लिया और उस अनुस्वारविहीन अक्षरका ही वह बार-बार उच्चारण करने लगा ॥ ३५ ॥ |
| बीजं वै कामराजाख्यं गृहीतं मनसा तदा।<br>जजाप बालकोऽत्यर्थं धृत्वा चेतसि सादरम् ॥ ३६<br><br>भावियोगान्महाराज कामराजाख्यमद्भुतम्।<br>स्वभावेनैव तेनेत्थं गृहीतं बालकेन वै॥ ३७ | बालकने इस कामराज नामक बीजमन्त्रको मनसे ग्रहण कर लिया और उसे हृदयंगम करके आदरपूर्वक जपना प्रारम्भ कर दिया। हे महाराज! दैवयोगसे ही उस बालक सुदर्शनको यह कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र स्वयमेव प्राप्त हो गया ॥ ३६-३७॥ |
| तदासौ पञ्चमे वर्षे प्राप्य मन्त्रमनुत्तमम्।<br>ऋषिच्छन्दोविहीनञ्च ध्यानन्यासविवर्जितम्॥ ३८<br><br>प्रजपन्मनसा नित्यं क्रीडत्यपि स्वपित्यपि।<br>विसस्मार न तं मन्त्रं ज्ञात्वा सारमिति स्वयम् ॥ ३९ | उस समय केवल पाँच वर्षकी अवस्थामें ही वह ऋषि तथा छन्दसे विहीन और ध्यान तथा न्यासरहित मन्त्र प्राप्तकर मन-ही-मन उसे जपता हुआ खेलता तथा सोता था; उस मन्त्रको स्वयं सबका सार समझकर वह सुदर्शन उसे कभी नहीं भूलता था॥ ३८-३९॥ |
| वर्षे चैकादशे प्राप्ते कुमारोऽसौ नृपात्मजः।<br>मुनिना चोपनीतोऽथ वेदमध्यापितस्तथा ॥ ४०<br><br>धनुर्वेदं तथा साङ्गं नीतिशास्त्रं विधानतः।<br>अभ्यस्ताः सकला विद्यास्तेन मन्त्रबलादिव ॥ ४१ | मुनिने ग्यारहवें वर्षमें उस राजकुमारका उपनयन संस्कार किया और उसे वेद पढ़ाया एवं सांगोपांग धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्रकी विधिवत् शिक्षा दी। उस बालकने उसी मन्त्रके प्रभावसे समस्त विद्याओंका सम्यक् अभ्यास कर लिया ॥ ४०-४१॥ |
| कदाचित्सोऽपि प्रत्यक्षं देवीरूपं ददर्श ह।<br>रक्ताम्बरं रक्तवर्णं रक्तसर्वाङ्गभूषणम् ॥ ४२ | एक बार उसने देवीके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन भी किया। उस समय वे लाल वस्त्र धारण किये थीं, उनके विग्रहका रंग भी लाल था और उनके सभी अंगोंमें रक्तवर्णके ही आभूषण सुशोभित हो रहे |