देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 339, कुल 889 में से
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| ३३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
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| इत्युक्ता मुनिना धेनुः क्रोधयुक्ता बभूव ह।<br>हम्भारवं चकाराशु क्रूरशब्दं सुदारुणम्॥ २० | मुनिके ऐसा कहनेपर वह धेनु क्रोधित हो गयी और कर्कश शब्दोंवाला अत्यन्त भयंकर हम्भारव करने लगी॥ २०॥ |
| उद्गतास्तत्र देहात्तु दैत्या घोरतरास्तदा।<br>सायुधास्तिष्ठ तिष्ठेति ब्रुवन्तः कवचावृताः॥ २१ | उसी समय उसके शरीरसे महाभयंकर दैत्य 'ठहरो-ठहरो'—ऐसा कहते हुए निकल पड़े। वे शस्त्र धारण किये हुए थे और उनका शरीर कवचसे ढँका हुआ था॥ २१॥ |
| सैन्यं सर्वं हतं तैस्तु नन्दिनी प्रतिमोचिता।<br>एकाकी निर्गतो राजा विश्वामित्रोऽतिदुःखितः॥ २२<br><br>हन्त पापोऽतिदीनात्मा निन्दन् क्षात्रबलं महत्।<br>ब्राह्मं बलं दुराराध्यं मत्वा तपसि संस्थितः॥ २३<br><br>तप्त्वा बहूनि वर्षाणि तपो घोरं महावने।<br>ऋषित्वं प्राप गाधेयस्त्यक्त्वा क्षात्रं विधिं पुनः॥ २४ | उन्होंने सारी सेनाका संहार कर दिया और नन्दिनीको उनसे छुड़ा लिया। तब अत्यन्त व्यथित होकर राजा विश्वामित्र अकेले ही घर लौट गये। [वे अपने मनमें सोचने लगे—] हाय! मैं कितना पापी एवं दीनात्मा हूँ। क्षत्रियबलकी निन्दा करते हुए वे विश्वामित्र ब्राह्मणके बलको महान् तथा दुराराध्य समझकर तप करने लगे। महावनमें अनेक वर्षोंतक कठोर तपस्या करके विश्वामित्रने क्षात्रधर्मका त्याग करके अन्तमें ऋषित्व प्राप्त कर लिया॥ २२—२४॥ |
| तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मा कृथा वैरमद्भुतम्।<br>कुलनाशकरं नूनं तापसैः सह संयुगम्॥ २५ | अतः हे राजेन्द्र! आप भी ऐसा अद्भुत वैर न करें; क्योंकि तपस्वियोंके साथ किया जानेवाला युद्ध निश्चित ही कुलका नाश करनेवाला होता है॥ २५॥ |
| मुनिवर्यं व्रजाद्य त्वं समाश्वास्य तपोनिधिम्।<br>सुदर्शनोऽपि राजेन्द्र तिष्ठत्वत्र यथासुखम्॥ २६ | अतः आप तपोनिधि मुनिवर भारद्वाजके पास अभी जाइये और उन्हें आश्वासन दीजिये। हे राजेन्द्र! सुदर्शनको यहीं छोड़ दीजिये, जिससे वह आनन्दपूर्वक रह सके॥ २६॥ |
| बालोऽयं निर्धनः किं ते करिष्यति नृपाहितम्।<br>वृथा ते वैरभावोऽयमनाथे दुर्बले शिशौ॥ २७ | हे राजन्! यह दीन बालक आपका क्या अहित कर सकेगा? ऐसे दुर्बल एवं अनाथ बालकके प्रति आपका यह वैरभाव व्यर्थ है॥ २७॥ |
| दया सर्वत्र कर्तव्या दैवाधीनमिदं जगत्।<br>ईर्ष्या किं नृपश्रेष्ठ यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ २८ | हे नृपश्रेष्ठ! सर्वत्र दया करनी चाहिये। यह संसार सदा दैवके अधीन रहता है। ईर्ष्या करनेसे क्या लाभ? जो होनी होगी, वह तो होकर ही रहेगी॥ २८॥ |
| वज्रं तृणायते राजन् दैवयोगान्न संशयः।<br>तृणं वज्रायते क्वापि समये दैवयोगतः॥ २९<br><br>शशको हन्ति शार्दूलं मशको वै तथा गजम्।<br>साहसं मुञ्च मेधाविन् कुरु मे वचनं हितम्॥ ३० | हे राजन्! दैवयोगसे कभी वज्र तृण बन जाता है और किसी समय तृण वज्र बन जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। दैवयोगसे ही खरगोश सिंहको और मच्छर हाथीको मार देता है। अतः हे मेधाविन्! आप दुःसाहस छोड़िये तथा मेरा हितकर वचन मानिये॥ २९-३०॥ |