देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 344, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 344
| अ० १८ ] | तृतीय स्कन्ध | ३३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्वप्ने पश्यत्यसौ देवीं विष्णुमायामखण्डिताम्।<br>विश्वमातरमव्यक्तां सर्वसम्पत्कराम्बिकाम्॥ १४ | एक बार स्वप्नमें सुदर्शनने उन अव्यक्त, पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा, जगज्जननी, विष्णुमाया तथा सभी सम्पदा प्रदान करानेवाली भगवती अम्बिकाका दर्शन किया॥ १४॥ |
| शृङ्गवेरपुराध्यक्षो निषादः समुपेत्य तम्।<br>ददौ रथवरं तस्मै सर्वोपस्करसंयुतम्॥ १५<br><br>चतुर्भिस्तुरगैर्युक्तं पताकावरमण्डितम्।<br>जैत्रं राजसुतं ज्ञात्वा ददौ चोपायनं तदा॥ १६<br><br>सोऽपि जग्राह तं प्रीत्या मित्रत्वेन सुसंस्थितम्।<br>वन्यैर्मूलफलैः सम्यगर्चयामास शम्बरम्॥ १७ | उसी समय शृंगवेरपुरके अधिपति निषादने सुदर्शनके पास आकर उसे सब प्रकारकी सामग्रियोंसे परिपूर्ण उत्तम रथ प्रदान किया। उस रथमें चार घोड़े जुते हुए थे और वह सुन्दर पताकासे सुशोभित था। निषादराजने राजकुमार सुदर्शनको विजयशाली समझकर उसे भेंटस्वरूप वह रथ दिया था। सुदर्शनने भी प्रेमपूर्वक उसे स्वीकार कर लिया और मित्ररूपमें आये हुए उस निषादका वन्य फल-मूलोंसे भलीभाँति सत्कार किया॥ १५-१७॥ |
| कृतातिथ्ये गते तस्मिन्निषादाधिपतौ तदा।<br>मुनयः प्रीतियुक्तास्ते तमूचुस्तापसा मिथः॥ १८<br><br>राजपुत्र ध्रुवं राज्यं प्राप्स्यसि त्वं च सर्वथा।<br>स्वल्पैरहोभिरव्यग्रः प्रतापान्नात्र संशयः॥ १९<br><br>प्रसन्ना तेऽम्बिका देवी वरदा विश्वमोहिनी।<br>सहायस्तु सुसम्पन्नो न चिन्तां कुरु सुव्रत॥ २० | तब आतिथ्य स्वीकार करके उस निषादराजके चले जानेपर वहाँके तपस्वी मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर सुदर्शनसे कहने लगे—हे राजकुमार! आप धैर्यवान् हैं; भगवतीकी कृपासे थोड़े ही दिनोंमें निश्चय ही अपना राज्य प्राप्त करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है। हे सुव्रत! विश्वमोहिनी और वरदायिनी भगवती अम्बिका आपके ऊपर प्रसन्न हैं। अब आपको उत्तम सहायक भी मिल गया है, आप चिन्ता न करें॥ १८-२०॥ |
| मनोरमां तथोचुस्ते मुनयः संशितव्रताः।<br>पुत्रस्तेऽद्य धराधीशो भविष्यति शुचिस्मिते॥ २१ | तत्पश्चात् उन व्रतधारी मुनियोंने मनोरमासे कहा—हे शुचिस्मिते! अब आपका पुत्र सुदर्शन शीघ्र ही भूमण्डलका राजा होगा॥ २१॥ |
| सा तानुवाच तन्वङ्गी वचनं वोऽस्तु सत्फलम्।<br>दासोऽयं भवतां विप्राः किं चित्रं सदुपासनात्॥ २२<br><br>न सैन्यं सचिवाः कोशो न सहायश्च कश्चन।<br>केन योगेन पुत्रो मे राज्यं प्राप्तुमिहार्हति॥ २३<br><br>आशीर्वादाेश्च वो नूनं पुत्रोऽयं मे महीपतिः।<br>भविष्यति न सन्देहो भवन्तो मन्त्रवित्तमाः॥ २४ | तब उस कोमलांगी मनोरमाने उनसे कहा—आपलोगोंका वचन सफल हो। हे विप्रगण! यह सुदर्शन आपलोगोंका सेवक है। सच्ची उपासनासे सब कुछ सम्भव हो जाता है, इसमें आश्चर्य ही क्या? [किंतु] उसके पास न सेना है, न मन्त्री हैं, न कोश है और न कोई सहायक ही है। [ऐसी दशामें] किस उपायसे मेरा पुत्र राज्य पानेके योग्य बन सकता है? आपलोग मन्त्रके पूर्णवेत्ता हैं, अतः आपलोगोंके आशीर्वचनोंसे मेरा यह पुत्र निश्चय ही राजा होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ २२-२४॥ |