देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ३३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| रथारूढः स मेधावी यत्र याति सुदर्शनः।<br>अक्षौहिणीसमावृत्त इवाभाति स तेजसा॥ २५<br><br>प्रतापो मन्त्रबीजस्य नान्यः कश्चन भूपते।<br>एवं वै जपतस्तस्य प्रीतियुक्तस्य सर्वथा॥ २६ | रथपर सवार होकर मेधावी सुदर्शन जहाँ भी जाता था, वहाँ वह अपने तेजसे एक अक्षौहिणी सेनासे आवृत प्रतीत होता था। हे भूप! यह उस बीजमन्त्रका ही प्रभाव था, दूसरा कोई कारण नहीं; क्योंकि वह सुदर्शन सर्वदा प्रसन्नतापूर्वक उसी मन्त्रका जप किया करता था॥ २५-२६॥ |
| सम्प्राप्य सद्गुरोर्बीजं कामराजाख्यमद्भुतम्।<br>जपेद्यस्तु शुचिः शान्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ २७ | जो मनुष्य किसी सद्गुरुसे कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र ग्रहण करके शान्त होकर पवित्रतापूर्वक उसका जप करता है, वह अपनी सभी कामनाएँ पूर्ण कर लेता है॥ २७॥ |
| न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि वापि सुदुर्लभम्।<br>प्रसन्नायाः शिवायाश्च यदप्राप्यं नृपोत्तम॥ २८ | हे नृपश्रेष्ठ! भूतलपर अथवा स्वर्गमें भी कोई ऐसा अत्यन्त दुर्लभ पदार्थ नहीं है, जो कल्याणकारिणी भगवतीके प्रसन्न होनेपर न मिल सके॥ २८॥ |
| ते मन्दास्तेऽतिदुर्भाग्या रोगैस्ते समभिद्रुताः।<br>येषां चित्ते न विश्वासो भवेदम्बार्थनादिषु॥ २९ | वे महान् मूर्ख, भाग्यहीन तथा रोगोंसे व्यथित होते हैं, जिनके मनमें जगदम्बाके अर्चन आदिमें विश्वास नहीं होता॥ २९॥ |
| या माता सर्वदेवानां युगादौ परिकीर्तिता।<br>आदिमातेति विख्याता नाम्ना तेन कुरूद्वह॥ ३०<br><br>बुद्धिः कीर्तिर्धृतिर्लक्ष्मीः शक्तिः श्रद्धा मतिः स्मृतिः।<br>सर्वेषां प्राणिनां सा वै प्रत्यक्षं वै विभासते॥ ३१ | हे कुरुनन्दन! जो भगवती युगके आदिमें सब देवताओंकी माता कही गयी थीं, इसी कारण आदिमाता—इस नामसे विख्यात हैं; वे ही बुद्धि, कीर्ति, धृति, लक्ष्मी, शक्ति, श्रद्धा, मति और स्मृति आदि रूपोंसे समस्त प्राणियोंमें प्रत्यक्ष दिखायी देती हैं॥ ३०-३१॥ |
| न जानन्ति नरा ये वै मोहिता मायया किल।<br>न भजन्ति कुतर्कज्ञा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्॥ ३२ | जो लोग मायासे मोहित हैं, वे उन्हें नहीं जान पाते। कुतर्क करनेवाले मनुष्य उन भुवनेश्वरी भगवती शिवाका भजन नहीं करते॥ ३२॥ |
| ब्रह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्वासवो वरुणो यमः।<br>वायुरग्निः कुबेरश्च त्वष्टा पूषाश्विनौ भगः॥ ३३<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः।<br>सर्वे ध्यायन्ति तां देवीं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्॥ ३४ | ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वरुण, यम, वायु, अग्नि, कुबेर, त्वष्टा, पूषा, दोनों अश्विनीकुमार, भग, आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव एवं मरुद्गण—ये सभी देवता सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली उन भगवतीका ध्यान करते हैं॥ ३३-३४॥ |
| को न सेवेत विद्वान्वै तां शक्तिं परमात्मिकाम्।<br>सुदर्शनेन सा ज्ञाता देवी सर्वार्थदा शिवा॥ ३५ | कौन ऐसा विद्वान् है, जो उन परमात्मिका शक्तिकी आराधना न करता हो? सुदर्शनने सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन्हीं कल्याणकारिणी भगवतीको जान लिया था॥ ३५॥ |
| ब्रह्मैव सातिदुष्प्राप्या विद्याविद्यास्वरूपिणी।<br>योगगम्या परा शक्तिर्मुमुक्षूणां च वल्लभा॥ ३६ | वे विद्या तथा अविद्यास्वरूपा भगवती ही ब्रह्म हैं और अत्यन्त दुष्प्राप्य हैं। वे पराशक्ति योगद्वारा ही अनुभवगम्य हैं और मोक्ष चाहनेवाले लोगोंको विशेष प्रिय हैं॥ ३६॥ |